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रूस यूक्रेन युद्ध | प्रारब्ध

Author - Vivek Umrao

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जब रूस ने यूक्रेन पर कब्जा करने के लिए युद्ध शुरू किया तो भारतीय सोशल मीडिया में बहुत लोगों ने अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया दी। अधिकतर लोग पुतिन की धूर्तता को वाजिब साबित कर रहे थे, जस्टिफाई कर रहे थे। समय गुजरने के साथ, इन लोगों में से कुछ लोगों ने यह महसूस किया कि रूस यूक्रेन में जो कर रहा है वह गलत है, कुछ ऐसे भी लोग हैं जो आज भी पुतिन की धूर्तता को जायज ठहराते हैं और कमर-कसे पुतिन के प्रति अपनी भगतई को साबित करते रहते हैं। खैर।
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यह लेख इस बात पर है कि बहुत लोगों का यह तर्क था कि रूस ने यूक्रेन पर इसलिए कब्जा करने के लिए युद्ध छेड़ा क्योंकि यूक्रेन नाटो से जुड़ने की बात कर रहा था। इन लोगों को इतनी बेसिक समझ भी नहीं है कि यूक्रेन एक सार्वभौम देश है, उसे किसके साथ कैसे रिश्ते रखने हैं, यह उसे अधिकार है, रूस कौन होता है उसे बताने वाला। रूस ने सोवियत संघ वाले देशों के साथ ऐसे रिश्ते क्यों नहीं बनाए कि इन देशों को लगता कि रूस उनकी परवाह करता है, रूस के साथ होने से उनका विकास होना है।
उल्टे यूक्रेन यह देख चुका था कि रूस ने चेचन्या के साथ क्या किया, बेलारूस के साथ क्या किया, जार्जिया के साथ क्या किया, कजाखस्तान के साथ क्या किया, जबकि इनमें से कोई भी देश नाटो के साथ नहीं जुड़ रहा था।
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चलिए मान भी लेते हैं कि रूस के लिए यूक्रेन पर बर्बरता से भरा हुआ युद्ध थोपने के पीछे नाटो एक फर्जी बहाना नहीं बल्कि एक वास्तविक जरूरत थी, जिसे रूस ने मजबूरी में किया जबकि वह करना नहीं चाहता था। क्योंकि रूस नाटो को अपने दरवाजे पर नहीं आने देना चाहता था।
जबकि रूस से सटे हुए पांच ऐसे देश हैं जो नाटो के सदस्य हैं, मतलब नाटो तो रूस के दरवाजे पर तो दशकों से है ही, ये देश जब नाटो ज्वाइन कर रहे थे तब पुतिन ने वह कांड क्यों नहीं किया जो कांड यूक्रेन के साथ कर रहा है। बात सिर्फ यह है कि पुतिन रूस को एक साम्राज्य के तौर देखता है, इसलिए उसकी दृष्टि में चेचन्या, बेलारूस, जार्जिया, यूक्रेन जैसे देश देश ही नहीं हैं। इसलिए सबको या तो कब्जाना चाहता है या उनको अपनी कठपुतली बनाना चाहता है।
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अब सवाल यह है कि यदि रूस ने यूक्रेन पर क्रूरता, बर्बरता व जनसंहार से भरा वीभत्स युद्ध इसलिए थोपा क्योंकि यूक्रेन नाटो में शामिल होने की बात कर रहा था, तो पुतिन ने जो किया है वह तो बैकफायर कर रहा है, क्योंकि अब तो फिनलैंड व स्वीडन जैसे देश नाटो ज्वाइन करने की बात कर रहे हैं। जबकि ये दोनों देश दशकों ने नाटो ज्वाइन करने के आग्रह को मना करते आ रहे थे।
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जिस दिन तक रूस ने यूक्रेन पर कब्जा करने के लिए युद्ध नहीं थोपा था, उसके पहले तक फिनलैंड व स्वीडन तो नाटो ज्वाइन करने के लिए विचार भी नहीं कर रहे थे। लेकिन अब ये दोनों देश नाटो ज्वाइन करने के संदर्भ में गंभीरता से विचार कर रहे हैं। फिनलैंड की रूस से सटी सीमा 1200 किलोमीटर से भी अधिक लंबी है।
स्वीडन की थल सीमा रूस से नहीं मिलती है, इसके बावजूद स्वीडन नाटो में शामिल होने की बात गंभीरता से सोचने लगा है क्योंकि स्वीडन की समुद्री सीमा रूस से मिलती है।
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यदि रूस ने यूक्रेन पर युद्ध नाटो के कारण से किया, तो यह तो बैक-फायर कर गया है। यूक्रेन के साथ नाटो तो पूरी तरह से खड़ा है ही मानो यूक्रेन नाटो का पूर्ण सदस्य हो (केवल नाटो के सैनिक यूक्रेन की धरती पर नहीं हैं, शेष पूरा सहयोग यूक्रेन को दिया जा रहा है नाटो द्वारा)। फिनलैंड व स्वीडन जैसे देश, जो दशकों से लगातार नाटो में शामिल होने से मना करते आ रहे थे, वे अब नाटो में शामिल होने के लिए गंभीरता से विचार कर रहे हैं।
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लगातार कहता आया हूं, फिर कहता हूं कि नाटो तो फर्जी बहाना था, रूस यूक्रेन पर हमला करता ही, क्योंकि पुतिन यूक्रेन को देश नहीं मानता है। यह वैसी ही बात है कि इंग्लैंड कहे कि वह दुनिया के तमाम देशों को देश नहीं मानता है क्योंकि कभी ये देश ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा थे। दरअसल पुतिन पुराना वाला रसियन साम्राज्य खड़ा करना चाहते हैं, इसलिए कभी चेचन्या, कभी बेलारूस, कभी जार्जिया, कभी कजखस्तान, कभी यूक्रेन कभी कुछ करते रहते हैं। पुतिन के यह सब करने का कभी विरोध नहीं हुआ, इसलिए पुतिन का हौसला बढ़ता गया और स्थिति इतनी भयानक पहुंच गई कि अब तो स्थिति यह है कि अपने अहंकार व बीमार मानसिकता के कारण पुतिन दुनिया को परमाणु युद्ध में भी झोंक सकता है।
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परमाणु युद्ध की भयावहता का अंदाजा बहुत लोगों को नहीं। मेरे एक लेख में एक बंदा कहता है कि भारत भी युद्ध में है क्या। इस बंदे को यह लगता है कि परमाणु युद्ध कोई बंदूक है जिसकी मार केवल वहीं तक है जहां गोली मारी जाती है। परमाणु युद्ध जब शुरू होगा तो बहुत कुछ बदलेगा, बहुत कुछ होगा, इसके अलावा वातावरण पर जो प्रभाव पड़ेगा उससे योरप, एशिया, नार्थ-अमेरिका के देश तो छोड़िए दक्षिणी-गोलार्ध के दूर दराज वाले देश भी शायद अछूते न रह सकें, वह भी तब जब यह माना जाए कि परमाणु युद्ध सीमित दायरे में ही होगा।
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अभी की स्थिति देखकर तो यही लगता है कि युद्ध लंबा चलेगा, लंबा चलने में खतरा यह है कि किसी भी समय युद्ध विश्वयुद्ध की ओर बढ़ सकता है। पुतिन को पता ही नहीं है कि युद्ध खतम कैसे किया जाए क्योंकि जिन समीकरणों को सोच कर युद्ध करना शुरू किया था, वह सब तो बुरी तरह से फेल हुआ है। अब तो स्थिति यह है कि युद्ध के पहले जिस रूस को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सैन्य ताकत माना जाता था, उसकी पोलपट्टी खुल गई है, परमाणु जैसे अतिविध्वंसकारी हथियारों का ही भरोसा रह गया है।
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मैं तो यही कहूंगा कि बकैती, लफ्फाजी, लंपटई इत्यादि से ऊपर उठकर रूस व पुतिन की मानसिकता व कांडों पर विशेष ध्यान रखिए। हो सके तो पुतिन को नियंत्रित कीजिए। रूस व चीन के फर्जी साम्यवाद इत्यादि के प्रति अपना फर्जी-रोमांस व प्रेम बाद में जीते रहिएगा। यदि थोड़ी सी भी अकल है तो ऐसा कीजिए, नहीं तो अपनी अगली पीढ़ियों तक को बुरी तरह से बर्बाद करने के लिए तैयार रहिए।
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विवेक उमराव

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