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डॉ. बाबा साहेब भीमराव रामजी आंबेडकर

पुण्यतिथि_विशेष

by Pranjay Kumar
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डॉ. बाबा साहेब भीमराव रामजी आंबेडकर अपने अधिकांश सभी समकालीन राजनीतिज्ञों में राजनीति की ठोस, बेहतर एवं व्यावहारिक समझ रखते थे। उसके कुछ उदाहरण देखिए —
— उन्होंने 1933 में महाराष्ट्र की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि – ”कुछ लोग मेरे बारे में दुष्प्रचार कर रहे हैं कि मैं कम्युनिस्टों से मिल गया हूँ। यह मनगढ़ंत और बेबुनियाद है। मैं कम्युनिस्टों से कभी नहीं मिल सकता, क्योंकि कम्युनिस्ट बड़े धूर्त्त होते हैं। वे मजदूरों के नाम पर राजनीति तो करते हैं, पर मज़दूरों को भयानक शोषण के चक्र में फँसाए रखते हैं।”
— उन्होंने नेहरू सरकार की विदेश नीति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ”हमारी विदेश नीति बिलकुल लचर है। हम गुटनिरपेक्षता के नाम पर भारत की महान संसदीय परंपरा को साम्यवादियों(कम्युनिस्टों) की झोली में नहीं डाल सकते।”
— उन्होंने 1952 में नेहरू सरकार की यह कहते हुए आलोचना की कि उसने सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ”भारत अपनी महान संसदीय एवं लोकतांत्रिक परंपरा के आधार पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा-परिषद का स्वाभाविक दावेदार है।”
— उन्होंने 1953 में तत्कालीन नेहरू सरकार को आगाह करते हुए चेताया कि ”चीन तिब्बत पर आधिपत्य स्थापित कर रहा है और भारत उसकी सुरक्षा के लिए कोई पहल नहीं कर रहा है, भविष्य में भारत को उसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगें।” तिब्बत पर चीन के कब्ज़े का उन्होंने बहुत मुखर विरोध किया और इस मुद्दे को विश्व-मंच पर उठाने के लिए नेहरू सरकार से अपील की।
— वे नेहरू जी द्वारा कश्मीर के मुद्दे को यू.एन में ले जाने की मुखर आलोचना करते रहे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ”कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है और कोई भी संप्रभु राष्ट्र अपने आंतरिक मामले को स्वयं सुलझाता है, कहीं अन्य लेकर नहीं जाता।”
— शेख अब्दुल्ला के साथ धारा 370 पर बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि ”आप चाहते हैं कि कश्मीर का भारत में विलय हो, कश्मीर के नागरिकों को भारत में कहीं भी आने-जाने-बसने का अधिकार हो, पर शेष भारत को यह अधिकार न मिले। देश के क़ानून-मंत्री के रूप में मैं देश के साथ ऐसी गद्दारी और विश्वासघात नहीं कर सकता।”
— जिन्ना द्वारा छेड़े गए पृथकतावादी आंदोलन, द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का प्रवर्त्तन और उसे मिले लगभग 90 प्रतिशत मुस्लिमों के व्यापक समर्थन पर उन्होंने कहा- ” पूरी दुनिया में रह रहे मुसलमानों की एक सामान्य प्रवृत्ति है, कि उनकी निष्ठा अपने राष्ट्र-राज्य(नेशन स्टेट) से अधिक अपने पवित्र स्थानों या पैग़ंबरों के प्रति होती है। मुस्लिम समुदाय राष्ट्रीय समाज के साथ आसानी से घुल-मिल नहीं सकता।”
— मज़हब के आधार पर हुए विभाजन के पश्चात तत्कालीन काँग्रेस नेतृत्व द्वारा मुसलमानों को उनके हिस्से का भूभाग (कुल भूभाग का 35 प्रतिशत) दिए जाने के बावजूद उन्हें भारत में रोके जाने को लेकर वे बहुत क्षुब्ध एवं असंतुष्ट थे। उन्होंने इस संदर्भ में गाँधी को पत्र लिखकर अपना विरोध व्यक्त किया था।
— वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में तीन बार गए थे। विजयादशमी पर आहूत संघ के एक वार्षिक आयोजन में वे मुख्य अतिथि की हैसियत से सम्मिलित हुए। उस कार्यक्रम में लगभग 610 स्वयंसेवक थे। उनके द्वारा आग्रहपूर्वक पूछे जाने पर जब उन्हें विदित हुआ कि उनमें से 103 वंचित/दलित समाज से हैं तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन सब स्वयंसेवकों के बीच आत्मीय एवं समरस व्यवहार देखकर उन्होंने संघ और डॉ हेडगेवार की सार्वजनिक सराहना की।
— उन्होंने अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए केवल दस साल तक आरक्षण की व्यवस्था रखी थी।
— और हिंदू-समाज में व्याप्त छुआछूत एवं भेदभाव से तंग आकर जब उन्होंने अपनी मृत्यु से दो वर्ष पूर्व अपने अनुयायियों समेत धर्म परिवर्तन किया तो हिंदू-मूल के बौद्ध धर्म को अपनाया, जबकि उन्हें और उनके अनुयायियों को लुभाने के लिए दूसरी ओर से तमाम पासे फेंकें जा रहे थे।
काश कि उनके नाम पर दलितों की राजनीति करने वाले तमाम दल और नेता उन्हें पढ़ने का भी वक्त निकालते और उनसे कुछ सीख लेते!! काश!!!!!

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