Home लेखक और लेखस्वामी व्यालोक ड्राइवर विमल कुमार की दुःख भरी दास्तान ।

ड्राइवर विमल कुमार की दुःख भरी दास्तान ।

by Swami Vyalok
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निजता का सम्मान करते हुए मैंने पात्रों के नाम बदल दिए हैं पर कहानी बिल्कुल सत्य है मेरी आँखों के सामने यह सब घटित हुआ है । आधुनिक चकाचौन्ध में डूबा समाज कितना निष्ठुर हो सकता है उसकी पराकाष्ठा है यह रियल लाइफ स्टोरी ।
विमल कुमार बिहार के किसी दूर दराज गाँव का नवयुवक है जो करीब तीस साल पहले रोजगार की तलाश में दिल्ली आ गया था । बहुत ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था पर एक सामान्य बिहारी की भाँति अच्छी बकलोली कर लेता था व्यवहार कुशल था , प्रभावी ढँग से बात कर सामने वाले को इम्प्रेस कर लेता था । जल्दी ही वह कनॉट प्लेस ( वर्तमान में राजीव चौक ) में एक बड़ी दुकान चलाने वाले चतुर पँजाबी खत्री सेठ के सम्पर्क में आया । सेठ को एक ड्राइवर की जरूरत थी और विमल को नौकरी की । डिमांड सप्लाई मैच हुई और विमल नौकरी पर रख लिया गया । करीब तीस साल विमल ने सेठ की गाड़ी चलाई । सेठ को और उसके परिवार को गाड़ी में बिठा पूरे देश घुमाया । धीरे धीरे विमल सेठ का विश्वासपात्र बन गया । अब सेठ उससे ड्राइवर के अतिरिक्त अन्य काम भी लेने लगा मसलन सब्जी लाना , मेम साहब को पार्लर ले जाना , बच्चों को स्कूल ले जाना इत्यादि ….सामान्यतः घरेलू ड्राइवर यह सब कार्य भी करते ही हैं । जब सेठ को पूरा यकीन हो गया विमल पर तब वह सेठ उसे अपने काले धन्धे में भी इस्तेमाल करने लगा । बेनामी रूपयो को गाड़ी में छुपा कर इधर से उधर करने में शीघ्र ही कुशलता प्राप्त कर ली ।
विमल के अच्छे दिन चल रहे थे पर शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था । विमल के सेठ ने पँजाब नेशनल बैंक से करीब 250 करोड़ का कर्जा ले रखा था जिसकी किश्तें वह कई सालों से जमा नहीं कर रहा था । बैंक अधिकारियों की साँठगाँठ से वह कर्जा लेकर घी पी रहा था । तभी न जाने ऐसा क्या बदलाव हुआ के बैंक सेठ के पीछे पड़ गया बकाया राशि के लिए । सेठ ने कई साल मुकदमेबाजी की पर अंततः हार गया , बैंक के लोग आए उसकी दुकान को सील कर दिया और उसकी तममा लक्ज़री कारें जो विमल चलाता था उन्हें टोचन कर के बैंक वाले ले गए क्योंकि कार का लोन भी डिफ़ॉल्ट हो रहा था …..
अब विमल सड़क पर । जब मालिक के पास कार ही न रही तो विमल ड्राइवर का काम कैसे करता , पँजाबी सेठ ने उसको मीठी कहानी सुना चलता कर दिया । अब विमल को काटो तो खून नहीं क्योंकि वह अब किसी और काम के लायक बचा नहीं । इतने बड़े सेठ की नौकरी बजाने के बाद किसी हलवाई की दुकान पर टेम्पो चलाने की नौकरी उसे अपने स्तर से कमतर लगती थी ।
कुछ दिनों इधर उधर घूमने के बाद विमल वापिस अपने गाँव पँहुच गया बिहार में ….जब साथियों ने पूछा क्या हो गया तो बस वह बिहारी स्टाइल में यही बकलोली ठेलता था के …..
पँजाब नेशनल बैंक के पास इतना पैसा नहीं है के वह विमल को खरीद सके , बैंक के पास बहुत पैसा है पर मैं नहीं हूँ । मैं गाड़ी न चला सकूँ इसलिए बैंक ने गाड़ी जब्त कर ली है । मैं सब समझता हूँ , हैं न । आप के पास पैसा है तो क्या कुछ भी खरीद लीजियेगा क्या ? आप मुझे रोक नहीं सकते हैं न ….अब मैं यूट्यूब पर गाड़ी चलाना सिखाउंगा ….
विमल अर्धविक्षिप्त सा घूम रहा है आजकल ।
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बहुत दिनों बाद फेसबुक पर किसी का लिखा बेहद पसंद आया है। कमाल है।
राकेश कुमार मिश्रा जी की हाहाकारी कलम…

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