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सच मुंबई के माता रमाबाई आंबेडकर नगर का

आर ए एम देव

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मुंबई में एक जगह है – माता रमाबाई आंबेडकर नगर। वहाँ १९९७ में भीषण दंगे हुए थे। उन दंगों से संबंधित एक ही प्रसंग की यहाँ बात करनी है क्योंकि उस प्रसंग का मैं प्रत्यक्षदर्शी था।
पुलिस फायरिंग में मारे गए कुछ लोगों का अंतिम संस्कार घाटकोपर की स्मशान भूमि में होना था। इनकी अंतिम यात्रा का मार्ग जो था वहीं मेरी ससुराल थी – हाल ही में वे लोग अन्यत्र शिफ्ट हुए। और उस दिन मैं वहीं था।
नाथ पै नगर से स्मशानभूमि को वो यात्रा आ रही थी। पूरे रास्ते में रैपिड एक्शन फोर्स तैनात था। यात्रा में शामिल लोग गुस्सा भरे नारे दे तो रहे थे लेकिन साथ में जो मृतकों के शव थे उनके सम्मान में कोई हरकत नहीं कर रहे थे। रैपिड एक्शन फोर्स के लोग भी अलसाये से खड़े थे ।
अंत्ययात्रा स्मशान पहुंची और कुछ समय बाद अंतिम संस्कार कर के भीड़ बाहर आई । लोग पूरी तरह गुस्से में दिखाई दे रहे थे, शायद स्मशान में भाषण भी हुए थे । और अब रैपिड एक्शन फोर्स के लोग पूरी मुस्तैदी से खड़े थे। शस्त्र हाथों में आ गए थे और बिल्कुल घूरती नज़रों से भीड़ को scan कर रहे थे।
कुछ नहीं हुआ। भीड़ बस नारे देती देती चले गई, जरा दूर पर नारे भी ठंडे हो गए। मुझे मेरे एक सहकर्मी का वाक्य याद आया – गुस्सा बड़ा होशियार होता है, कमजोर पर ही आता है।
इसमें एक सबक है। अगर आप को पता है कि कोई उन्मादी भीड़ आप के पड़ोस से निकल कर आप के मुहल्ले को भेंट देगी तो आप को अतिथि धर्म का पालन करना चाहिए। यजमान का धर्म है कि आतिथ्य भरपूर हो, सेवा में कोई कमी न रहे। जाहीर है, केवल साहित्य की विपुल उपलब्धता काम नहीं आती, लोगों को परोसने का भी अभ्यास चाहिए होता है।
पुराणों में ऐसे ऋषियों का वर्णन है जो आतिथ्य में कमी आने से भस्म कर देने का सामर्थ्य रखते थे। यह बात भूलनी नहीं चाहिए, अतिथियों के कोप से घर भस्म हो तो कहाँ रहेंगे ? इसलिए आतिथ्य की पूरी तैयारी होनी चाहिए और यजमान परिवर याने मोहल्ले से सभी लोगों को आतिथ्य का अभ्यास भी चाहिए।
हर स्थान की अपनी विशेषता होती है कि आप कहाँ कितना व्यक्त हो सकते हैं। इतना ही पर्याप्त है।

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