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वाल्मीकि रामायण सुन्दरकांड भाग 80

सुमंत विद्वांस

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जब यह निश्चित हो गया कि वह स्त्री ही सीता है, तो हनुमान जी उससे मिलने के लिए सही अवसर की प्रतीक्षा में वृक्ष पर ही छिपकर बैठे रहे। दिन बीत जाने पर जब चन्द्रमा का उदय हो गया, तब हनुमान जी ने सीता को देखने के लिए पुनः दृष्टि दौड़ाई।
उन्हें दिखाई दिया कि सीता के आस-पास अनेक विकराल राक्षसियाँ बैठी हुई थीं। उनमें से किसी की एक आँख नहीं थी, तो किसी का एक कान। किसी के कान इतने बड़े-बड़े थे कि वह उन्हें चादर के समान लपेटे हुए थी। किसी-किसी के कान थे ही नहीं और किसी के कान ऐसे थे, मानो खूँटे गड़े हुए हों।
किसी का शरीर बहुत बड़ा था, किसी की गर्दन बहुत पतली और लंबी थी, किसी के सिर पर केश ही नहीं थे, तो किसी राक्षसी का पूरा शरीर ही बालों से कम्बल के समान ढका हुआ था। किसी के होंठ बहुत बड़े होने के कारण लटके हुए थे, तो किसी के ठोड़ी में ही चिपके हुए थे। किसी का मुँह बहुत बड़ा था, तो किसी के घुटने बड़े-बड़े थे। उनमें से कोई नाटी, कोई लंबी, कोई कुबड़ी, कोई टेढ़ी-मेढ़ी, कोई विकराल, तो कोई पीली आँखों और विकट मुँह वाली थीं।
कई राक्षसियों के मुँह सूअर, मृग, सिंह, भैंस, बकरी और सियारिनों के समान थे। किसी के पैर हाथी जैसे, किसी के ऊँट जैसे, तो किसी के घोड़े जैसे थे। किसी का एक ही हाथ, तो किसी का एक ही पैर था। किसी के कान गधे या घोड़े जैसे थे, तो किसी गाय, हाथी और सिंह जैसे कान भी थे।
वे सब राक्षसियाँ अपने हाथों में लोहे के बड़े-बड़े शूल, कूट और मुद्गर धारण किए हुए थीं। वे रक्त और मांस का ही भोजन करती थीं और अनेक राक्षसियाँ सदा मद्यपान करती रहती थीं। बहुत-सी राक्षसियाँ तो अपने अंगों में भी रक्त और मांस का लेप लगाए रहती थीं। उन्हें देखते ही रोंगटे खड़े हो जाते थे।
वे सब राक्षसियाँ एक अशोक-वृक्ष को चारों ओर से घेरकर उससे कुछ दूरी पर बैठी हुई थीं। सीताजी उसी वृक्ष के नीचे बैठी हुई थीं। उनके सारे अंगों पर मैल जम गया था। उनके मुख पर दीनता छाई हुई थी। उनकी आँखें शोक में डूबी हुई थीं और उनका शरीर बहुत दुर्बल दिखाई दे रहा था।
लगभग पूरी रात बीत गई, पर हनुमान जी को सीता जी के पास जाने के लिए उपयुक्त अवसर नहीं मिल पाया।
अब केवल एक पहर की रात बाकी थी। लंका में जो राक्षस वेदों के छहों अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरूक्त, छंद और ज्योतिष) सहित संपूर्ण वेदों के विद्वान थे, उनके घरों से हनुमान जी को वेदपाठ की ध्वनि सुनाई देने लगी।
उचित समय पर मंगलवाद्यों तथा सुखद शब्दों के द्वारा लंकापति रावण को जगाया गया। काम-विकारी होने के कारण उस दुष्ट निशाचर ने जागते ही सबसे पहले सीता का ही विचार किया। उसने अनेक प्रकार के आभूषण धारण किए, सब प्रकार की साज-सज्जा की और अशोक वाटिका में प्रवेश किया।
उसकी लगभग एक सौ सुन्दर पत्नियाँ भी उसके पीछे-पीछे वहाँ गईं। उनमें से कुछ ने सोने के दीपक अपने हाथों में पकड़े हुए थे, कुछ के हाथों में चँवर थे, तो कुछ के पास ताड़ के पत्ते। कुछ सुंदरियाँ सोने की झारियाँ, कुछ गोलाकार बृसी नामक आसन, कुछ पेय से भरी हुई चमचमाती कलसी, तो कोई स्त्री सोने के डंडे वाला सफेद छत्र पकड़कर उसके पीछे-पीछे चल रही थी।
रावण के आगे-आगे भी कुछ स्त्रियाँ प्रकाश के लिए मशाल लेकर चल रही थीं। उनमें से कई तो अभी भी मद्य अथवा नींद के कारण झूमती हुई चल रही थीं और आधी नींद या नशे के कारण उनकी पलकें बार-बार झपक जाती थीं। उन सबके आने का स्वर सुनते ही हनुमान जी तुरंत पत्तों की आड़ में छिप गए। उन्होंने देखते ही पहचान लिया कि यही रावण है, क्योंकि पिछली रात उसी राक्षस को उन्होंने महल में सोया हुआ देखा था।
जैसे ही सीता जी ने उस नीच को आते हुए देखा, तो वे भय के समान थर-थर काँपने लगीं। उस दुराचारी की दृष्टि से स्वयं को बचाने के लिए उन्होंने अपने अंगों को समेट लिया और श्रीराम का स्मरण करके अत्यंत दुःख से रोने लगीं।
पापी रावण ने वहाँ पहुँचते ही अश्लील बातों से अपने मन के विकारों को प्रकट कर दिया। वह सीता को देखकर बोला, “सुन्दर अंगों वाली सीते! मुझे देखकर तुम अपने स्तनों को इस प्रकार क्यों छिपा रही हो? परायी स्त्रियों को बलपूर्वक उठा लाना या उनकी इच्छा के बिना भी उनका उपभोग करना राक्षसों की परंपरा ही है। इसमें कोई अधर्म नहीं है। अतः तुम भी मेरी बात मान लो और मेरी शैय्या पर चलो।”
“तुम्हें यह सौंदर्य ऐसे मैले-कुचैले वस्त्र पहनने, भूमि पर सोने, उपवास करने और चिंतामग्न रहने के लिए नहीं मिला है। मुझे स्वीकार करके तुम सुन्दर पुष्पमालाओं, चंदन, अगरु, अनेक प्रकार के बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण, स्वादिष्ट भोजन, पेय, सुखद शय्या, नृत्य-गान, संगीत-वाद्य आदि का सुख भोगो। तुम्हारा यह सुन्दर यौवन व्यर्थ ही नष्ट हो रहा है। यह लौटकर वापस नहीं आएगा, अतः मेरे साथ इसका आनंद लो। तुम्हारे अंग-प्रत्यंग इतने सुन्दर हैं कि मैं तुम्हें देखते ही काम बाणों से पीड़ित हो जाता हूँ। तुम भी पतिव्रता होने का संकल्प छोड़ो और मेरे इस राज्य की महारानी बन जाओ।”
“मुझे पराजित करना असुरों व देवताओं के लिए भी असंभव है। फिर तुम्हारा पति तो एक तुच्छ मानव है। वह मुझसे युद्ध करने का विचार भी नहीं कर सकता। वैसे भी अपना राज्य और सम्मान गँवाकर वह वन-वन भटक रहा है। मुझे तो संदेह है कि अब वह जीवित भी है या नहीं। तुमको पाना तो दूर, वह तुमको अब कभी देख भी नहीं सकेगा। ऐसे तुच्छ मनुष्य के लिए तुम अपना जीवन व्यर्थ न करो। तुम्हारा यह रूप, यौवन और शरीर केवल मेरे ही योग्य है। यह सब मुझे सौंपकर तुम मेरे साथ जीवन का सुख भोगो।”
नीच रावण के ऐसे कलुषित विचार सुनकर सीता जी को बड़ी पीड़ा हुई। उन्होंने दुःख के साथ कातर स्वर में कहा, “पापी! तू परायी स्त्री में मन लगाना छोड़ दे और अपनी पत्नियों से ही प्रेम कर। परायी स्त्रियों के मोह में पड़ने वाला पुरुष सदा ही कष्ट पाता है और यदि राजा का ही मन अपवित्र हो जाए, तो वह राजा अपने साथ-साथ अपने समस्त राज्य के भी विनाश का कारण बनता है। तेरे इस दुष्कृत्य के कारण सब राक्षसों का विनाश होगा और यह संपूर्ण लंकापुरी ही नष्ट हो जाएगी। तूने आज तक अनेक स्त्रियों पर अन्याय किया है। अब तेरे विनाश से उन सबको भी बड़ी प्रसन्नता होगी।”
“जिस प्रकार सूर्य से उसकी किरणें अलग नहीं हो सकतीं, उसी प्रकार मैं भी श्रीराम से अलग नहीं हूँ। किसी भी ऐश्वर्य, धन अथवा सुख के लोभ से तू मुझे लुभा नहीं सकता। यदि तू जीवित रहना चाहता है, तो चुपचाप मुझे श्रीराम के पास वापस भेज दे और उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँग ले। युद्ध में श्रीराम और लक्ष्मण के सामने टिकना तेरे लिए असंभव है। तीनों लोकों में कहीं भी छिपकर तू श्रीराम के बाण से बच नहीं सकेगा।”
ऐसे कठोर वचनों को सुनकर रावण क्रोधित हो गया। उसने कहा, “सीता! तू पांखडी और तिरस्कार के योग्य है। मेरे इस अपमान के लिए तुझे प्राण-दण्ड दिया जाना चाहिए, फिर भी केवल मेरे मोह के कारण ही तू अभी तक जीवित है। अब विचार करने के लिए तेरे पास केवल दो माह का समय शेष है। उसके बाद तुझे मेरी शैय्या पर आना ही होगा। यदि तूने मुझे प्रसन्न नहीं किया, तो मेरे भोजन के लिए रसोइये तेरे टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे।”
यह सुनकर सीता ने तिरस्कार पूर्वक कहा, “नीच राक्षस! तू तो बड़ा शूरवीर बनता है, फिर तूने श्रीराम को छल से दूर हटाकर उनकी स्त्री क्यों चुराई? परम तेजस्वी श्रीराम की पत्नी से ऐसी अशोभनीय बात कहकर तू कैसे बच सकेगा? अवश्य ही इस राज्य में तेरा हित चाहने वाला कोई भी नहीं बचा है, जो तुझे ऐसे निन्दित कर्म करने से रोके। तेरे ऐसे निंदनीय कर्म ही संकेत दे रहे हैं कि तेरे विनाश का समय अब निकट है।”
यह सुनकर रावण क्रोध से जल उठा। उसकी आँखें अंगारों के समान लाल हो गईं। क्रोध से उसका मुकुट हिलने लगा और जीभ आग की लपटों के समान लपलपाने लगी। उसने आँखें तरेरकर क्रोध से सीता की ओर देखा और फिर गर्जना के स्वर में वहाँ उपस्थित राक्षसियों से कहा, निशाचरियों! तुम सब किसी भी प्रकार यह प्रयास करो कि सीता जल्दी ही मेरे वश में आ जाए। किसी भी प्रकार से समझाकर अथवा भय दिखाकर उसे मेरे जाल में फँसाओ।”
रावण को इस प्रकार क्रोध से व्याकुल देखकर रानी मन्दोदरी तथा धान्यमालिनी नामक सुन्दर राक्षसी ने आकर उसका आलिंगन कर लिया और बोली, “राक्षसराज! इस तुच्छ मानव-कन्या के कारण आप क्यों कष्ट उठा रहे हैं? आप महल में चलकर हमारे साथ प्रेम-क्रीड़ा कीजिए। इस दुष्टा के भाग्य में सुख नहीं लिखा है, तभी यह इस प्रकार यहाँ पड़ी कष्ट पा रही है।”
यह सुनकर रावण अट्टहास करता हुआ उनके साथ वहाँ से चला गया। जो राक्षस-कन्याएँ उसके साथ आई थीं, वे भी उसके पीछे-पीछे चली गईं।
आगे जारी रहेगा…..
(स्रोत: वाल्मीकि रामायण। सुन्दरकाण्ड। गीताप्रेस)

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