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कैकई के वरदान और भरत राम

Sharad Kumar Verma

by Sharad Kumar
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राम के भाई भरत जिनका वर्णन सबसे कम होता है विवाह से पहले कैकेयी महर्षि दुर्वासा की सेवा किया करती थीं। कैकेयी की सेवा से प्रसन्न होकर महर्षि दुर्वास ने कैकेयी का एक हाथ बज्र का बना दिया और आशीर्वाद दिया कि भविष्य में भगवान तुम्हारी गोद में खेलेंगे। समय का पहिया चलता रहा और कैकेयी का विवाह राजा दशरथ से हो गया। एक समय स्वर्ग में देवासुर संग्राम आरंभ हो गया।

 

देवराज इंद्र ने राजा दशरथ को सहायता के लिए बुलाया। रानी कैकेयी भी महाराज की रक्षा के लिए सारथी बनकर देवासुर संग्राम में पहुंच गईं। युद्ध के दौरान दशरथजी के रथ के पहिये से कील निकल गया और रथ लड़खड़ाने लगा। ऐसे में कैकेयी ने कील की जगह अपनी उंगली लगा दी और महाराज की जान बचा ली।राजा दशरथ को जब पता चला कि कैकेयी ने युद्ध भूमि में किस साहस का परिचय दिया है तो वह वह बहुत प्रसन्न हुए और तीन वरदान मांगने के लिए कहा। कैकेयी ने उस समय प्रेमवश यह कह दिया कि इसकी जरूरत नहीं है अगर कभी जरूरत होगी तो मांग लूंगी। सरस्वती माँ के वश में आकर कैकेयी ने राजा दशरथ को इसी वरदान के जाल में फांस लिया और राम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांग लिया।

 

सरस्वती माँ ने देवताओ के कहने पर जब मंथरा और कैकई की बुद्धि हर ली थी जिससे दुखी होकर दशरथ दिवंगत हो गए कैकेयी ने चौहद वर्ष का वनवास मांगकर यह समझाया कि अगर व्यक्ति युवावस्था में चौदह यानी पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (कान, नाक, आंख, जीभ, त्वचा) पांच कर्मेन्द्रियां (वाक्, पाणी, पाद, पायु, उपस्थ) तथा मन, बुद्धि, चित और अहंकार को वनवास (एकान्त आत्मा के वश) में रखेगा तभी अपने अंदर के घमंड और रावण को मार पाएगा। भरत अपने ननिहाल में थे उनको इस बात का पता नहीं था जब उनको वापस बुलाया गया तब भी उनको ये बात नहीं बताई गयी की उनके भाई राम को माता कैकई ने 14 वर्ष का वनवास दिलाया है पर जब उनको ये बात पता चली तो उनकी गलती न होने पर भी अपनी ही गलती मान बैठे और भाई राम को वापस लाने के लिए सम्पूर्ण अयोध्यावासियों के साथ वन को जाने लगे

 

ये बात जब देवताओ को पता चली तो वो एक बार फिर व्याकुल हो उठे और माँ सरस्वती के पास जा पहुंचे लेकिन माँ सरस्वती ने देवताओ से कहा की तुम लोग ऐसे पुरुष की बुद्धि हरने की बात कहे रहे हो जिसका कोई दोष न होने पर भी ग्लानि से भरा हुआ है की उसकी वजह से भईया राम को १४ वर्ष का वनवास हो गया ऐसे भ्रात प्रेम की बुद्धि हारना मेरे बस में नहीं है भरत अपने देव ऋषि वशिष्ट से कहते है की क्या भाई राम उनको उनकी गलती के लिए उनको माफ़ कर देंगे इस पर देव ऋषि वशिष्ट कहते है की मुझे इस बात का ज्ञान तो नहीं है किन्तु जब प्रभु राम वनवास को गए तो उनका स्वागत वन देवी ने किया था और प्रभु राम की सेवा की अनुमति मांगी थी जिस पर रामजी ने वन देवी से कहा की अगर हो सके तो राम जिस रास्ते से आये है उन रास्ते पर जो काटें है उनको हटा दिए जाए

 

इस पर वन देवी ने कौतुहल वश राम से पूछा की आप तो आ गए फिर उस रास्ते के काटे क्यों हटाने को बोल रहे है इस पर प्रभु राम ने वन देवी से कहा मुझे मेरी कोई परवाह नहीं किन्तु मेरे पीछे मेरा भाई भरत आ रहा है इस पर राम से वन देवी से कहा प्रभु क्या आपके भाई भरत इतने कोमल है की एक काटे की पीढ़ा भी नहीं सहन कर पाएंगे प्रभु राम ने कहा नहीं भरत तो वज्र के सामान कठोर है किन्तु अगर उसके पैरो में कोई काटा चुभ गया तो वो और टूट जायेगा यह सोच के की उसकी वजह से मैं कोई कष्ट उठा रहे है

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