Home विषयजाति धर्म परम पूजनीय ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य जी

परम पूजनीय ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य जी

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जोशी मठ की दरारें ही नहीं , सनातन धर्म के लोग जो आसमानी किताब के ढोंग और चमत्कार से खिंचे जा रहे हैं और जो दरार हमारे समाज में पड़ रही है उसे भरने की आज आवश्यकता है ..
एक ढोंगी भारत तेरे टुकड़े के अवयवों के साथ घूम घूम बयान दे रहा है ;
कि यह देश पुजारियों का नहीं बल्कि तपस्वियों का है और आप मौन हैं ?
क्या आप अर्चा अवतार नहीं मानते ? क्या अर्चना ( जिसे सामान्य हिंदी में पूजा कहते हैं ) सनातन धर्म का अंग नहीं है ? क्यों नहीं तुरंत प्रतिकार किया गया ?
क्या सेवा , सनातन हिन्दू धर्म का अंग नहीं है ? क्यों नहीं फ़िरोज़ गांधी के अवयव का विरोध हुआ ?
क्या उपासना, सनातन हिन्दू धर्म का अंग नहीं है ?
आपने पूछा उस ढोंगी से कि “ तपस्या “ की परिभाषा बताये ? तपस्या , जीवन का अंग अवश्य है पर वह अहंकार को जन्म न दे । पौराणिक कथाओं में तपस्वियों का तप नष्ट होते हुये हमने देखा है । कैसे ? उनको उनकी तपस्या का अभिमान हो गया था ।
आप , सनातन हिन्दू धर्म की चार पीठों में से एक पीठ पर बैठें हैं । सभी कथावाचक, यदि संत न भी हों तो भी यदि वे येन केन प्रकारेण लोगों की घर वापसी करवा रहे हैं तो उनके उतने अंश का समर्थन हो ।
अर्चावतार की निंदा हम न सुनें और जो भी अर्चावतार ( पूजा ) का विरोधी हो उसका प्रचंड विरोध हो ..
क्या एक गृहस्थ को किसी संन्यासी पर प्रश्न उठाने का अधिकार है ?
एक सज्जन का यह प्रश्न , इनबॉक्स में, मेरी पिछली पोस्ट जो ज्योतिष पीठ को संबोधित करते हुये लिखी है पर आया है ..
उत्तर , यहाँ लिख रहा हूँ ..
प्रश्न एक संन्यासी या दण्डी स्वामी से नहीं प्रश्न एक धर्माधिकारी से एक मान्य पीठ के शंकराचार्य से
किया गया है ।
और सभी सनातन हिन्दू धर्मी एक बात ध्यान से सुन लें । प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों ही सनातन धर्म के आधार हैं ।
जितना सम्मान निवृत्ति पारायण शुकदेव जी का है उतना ही सम्मान
प्रवृति पारायण परीक्षित
ध्रुव
प्रह्लाद
या युधिष्ठिर का है ।
विवाह करने से और परिवार पालने के कारण सनातन धर्म मेरा किसी शंकराचार्य से प्रश्न पूछने का या उनके किसी कृत्य के विरोध अधिकार नहीं छीन लेता ।
कहाँ लिखा है कि गृहस्थ होने से हमारी सनातन क्षमता घट जाती है ..
क्या हम
पार्वती शंकर
लक्ष्मी नारायण
सीता राम
राधा कृष्ण में पूर्ण आदर्श नहीं देखते ?
क्या देवहूति , कुंती द्रौपदी या उत्तरा को ईश्वर से प्रश्न करने का अधिकार नहीं मिला ?
पीठ का सम्मान सदैव रहेगा पर पीठ सनातन धर्म के मान्य बिंदुओं की रक्षा करती हुयी दिखे ।
सभी कथावाचक सभी विषयों में विद्वान नहीं हो सकते पर वे जितने अंश में सनातन हिन्दू धर्म की रक्षा कर रहे उतने अंश में उनका समर्थन हो । हम बचेंगे ही नहीं तो विद्वता लेकर क्या करेंगे ।
जब तक भारत में चंगाई सभाएँ और मुर्दे की मज़ार उपस्थित है तब तक हर वो व्यक्ति जो इनके चंगुल से सनातन हिन्दू धर्मियों को बचा रहा उसका पुरज़ोर समर्थन हो ।
शंकराचार्य या कोई भी धर्माधिकारी यह समझ ले कि हम उद्देश्य प्रधान लोग हैं और हमारे राजनेता भी अब #bycotpathan मूवी को देखने के लिये कहेंगे तो हम उनकी उतने अंश की उपेक्षा कर देंगे ।
अलक्ष्य ..
क्या हमारे धर्मगुरु पुराणों शास्त्रों में वर्णित “ अलक्ष्य “ को नहीं मानते ?
क्या हमारे धर्मगुरु पुराणों शास्त्रों में वर्णित “ भगवत संकल्प “ को नहीं मानते ?
क्या हमारे शंकराचार्य या अन्य आचार्य उन घटनाओं को आध्यात्मिक आधिभौतिक और आधिदैविक रूप से सत्य नहीं मानते कि जब किसी भक्त पर संकट आया या कोई भगवत कार्य करवाने का ईश्वरीय संकल्प हुआ तो “ नारद “ जी वहाँ प्रकट हो गये ।
जैसे ही पाँच वर्ष के बालक ध्रुव को बाहर निकाला , तुरंत अलक्ष्य सिद्धि हुयी । भगवत संकल्प ( नारद जी जिसका आध्यात्मिक अर्थ भगवान का मन होता है ) ध्रुव के समक्ष प्रकट हुआ ।
और ऐसे अलक्ष्य चमत्कार हम सबके जीवन में आते हैं जब कोई उपाय नहीं होता तो ईश्वर कुछ न कुछ उपाय बना ही देता है । आज हम जीवित हैं और यह पोस्ट पढ़ रहे हैं यह भी ईश्वरीय प्रेरणा है ।
हम सभी कथावाचकों में विद्वता न ढूँढ़ें । वह जितने अंश में सनातन हिन्दू धर्म की रक्षा कर रहा है उतने अंश में उसका भरपूर समर्थन करें । आज हमारे अस्तित्व पर ही संकट आया हुआ है । चादर फादर हमें लीलने के लिए तत्पर हैं और हम अपने लोगों को ही नीचे खींच रहे हैं ।
ऐसा न हो ।

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