Home लेखक और लेखस्वामी व्यालोक एक उदास पोस्ट : बसंत और आज की सामाजिक शादियाँ

एक उदास पोस्ट : बसंत और आज की सामाजिक शादियाँ

Vyalok Swami

by Swami Vyalok
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बसंत का एक अजीब सा उखड़ा हुआ दिन। मौसमों के साथ जो घालमेल हुआ है, उनमें उनका होना भी अब गड़बड़ सा हो गया है। सुना था, इस देश में छह ऋतुएं होती थीं, चार तो खुद देखी भी हैं। अब दो ही हैं। नौ महीने तक गरमी रहती है, बाकी 20 दिन प्रचंड सर्दी, 15 दिन बारिश और बाकी बचे दिनों में फिर गरमी।
पड़ोस में एक शादी है। कुछ दिनों से लोगों का आना-जाना है, पर कुछ खास हलचल नहीं। आवारा कुत्ते काफी आस लगाकर आते हैं, लेकिन मेरी शत्रुता उनसे प्रसिद्ध है। वैसे भी, कथित गार्डेड सोसाइटी है, तो बाहर बहुत माल मिलता नहीं कुत्तों को।
पत्नीजी को एक बार कुछ गाने-गवाने के लिए बुलाया गया, लेकिन 15 मिनट बाद वह फिर हाजिर। मैंने पूछा तो बोलीं, हो गया। हो गया। ये कैसा गीत-नाद है, जो 15 मिनट में हो गया। अस्तु। कल रात में कुछ बालक-बालिकाओं ने गाना बजाकर माहौल बनाने की कोशिश की, लेकिन शायद बड़ों ने डांट दिया।
शाम में देखा तो एक बीएमडब्ल्यू-ई क्लास आकर सामने लगी। उसको भी हस्बेमामूल गुलाब और टेप से खराब कर दिया गया। लड़का-लड़की दोनों किसी महानगर के हैं, मान लीजिए। तय हुआ कि शादी यहां लखनऊ से कर दी जाए। लड़का पायलट है, लड़की एयर-होस्टेस। पैसों का अंदाजा आप लगा लें।
मुझे छोटे भाई की शादी याद है। माताजी, भाभीजी, मेरी पत्नीजी सहित न जाने कितनी औरतें लस्त-पस्त इधर-उधर करती रहती थीं। 7 दिनों पहले से घर के आगे पुरुषों का गोल लगने लगा था, जिसमें कम से कम 50 की संख्या होती थी। अनावश्यक व्यस्तता का वातावरण था। यहां ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बहुत संयत और धीमे से। सब कुछ ऑर्केस्ट्रेटेड।
शाम के वक्त मैंने गिना। बीएमडब्ल्यू के गिर्द कुल मिलाकर 17 लोग थे। 7 जनानियां, 10 मरदाने। ऐन मौके पर बिजली भी दगा दे गयी। दो-तीन बुचिया ने जबरन नाचकर माहौल बनाना चाहा, पर कंबख्त बात बनी नहीं। तड़कुल जी बीच में घुस गए, फिर निकल गए। लोग उनसे भी निरपेक्ष रहे।
दूल्हे ने जरूर दो-तीन ठुमके लगाए। एकाध झटके खाए। फिर, पांच लोगों ने परिछावन कर उसे विदा कर दिया। वह रिसॉर्ट गया है। अब मुझे भी जाना है। पत्नीजी नहीं जाएंगी। महिलाओं के हिसाब से उनको ढंग से नहीं पूछा गया है, तो वे घर पर विश्राम करेंगी।
रिसॉर्ट में शायद माहौल ठीक हो। बुचिया सब यहां भी मुंह बिचका के फोटू-सेल्फी ले रही थीं। वहां जाकर कदरन भव्य माहौल में और ठीक हो। इंस्टा पर लिखने लायक- फीलिंग फेस्टिव एट ब्रदर्स वेडिंग विद ट्वेंटी अदर्स
गूगल की महिमा भी गजब है। मैं दो बार गूगल की करनी से ऐसी अबूझ गलियों में फंसा हूं कि तब से तौबा ही कर ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर ह्युमन इंटेलिजेंस हमेशा भारी पड़ेगा। गूगल ने इस बार भी हमें रिसॉर्ट के पीछे पहुंचाया, जहां पैदल भी चलने की जगह नहीं थी, कूड़े का अंबार था, तमाम तरह का निर्माण कार्य और उनका मलबा भी दर्शनीय था। हम लेकिन रिसॉर्ट के मुख्य द्वार से प्रवेश पाने में सफल रहे। वहां बोर्ड पर जो वेडिंग-कार्ड लगा था, उसने आश्वस्ति दी कि हम सही जगह पर हैं, वरना मेरे जैसा भभ्भड़ आदमी किसी भी शादी में वैसी ही मौज से पहुंच जाए, जहां का उसे निमंत्रण मिला है। वैसे, वर्तमान समाजवाद में यह संभव भी है। मुख्य द्वार पर कोई हमारा स्वागत करने को था नहीं, सब गाडि़यों को पार्क करने की जद्दोजहद में थे।
लाल कालीन हमारे पैरों तले था, बगल में फूलों के गुलदस्ते। ऊपर भी फूल। बस, सारे फूल प्लास्टिक के थे। कोई भी असली फूल न था। दस कदम चलने के बाद दूल्हा काफी चुस्त-दुरुस्त शेरवानी और कुरते में गणेश जी की मूर्ति के नीचे कुछ कर्मकांड करवा रहा था।
नाश्ते का दौर शुरू हो चुका था। मेरे हिसाब से आजकल की शादियों में यह भी षडयंत्र किया जाता है कि नाश्ता इतना भकोसवा दिया जाए कि खाना लोग कम खा पाएं। छोटी-छोटी ट्रे में पनीर कबाब, आलू चिप्स और एक और अबूझ व्यंजन लेकर खानसामा छोटी ठेलियों को लुढकाते आ रहे थे। उनके कोट-पैंट इतने सुथरे थे कि जब उन्होंने मुझे सर कहकर संबोधित किया, तो मैंने जीजाजी को इशारा किया- आपको कुछ बोल रहे हैं (भली दुनिया में मुझे कोई क्यों सर कहेगा)।
लकड़ी के कोयले अंगीठीनुमा मर्तबान में दहक रहे थे। पानी-पूरी की ठेली पर हमेशा की तरह महिलाओं ने ऐसा कब्जा कर रखा था कि आप वहां तक पहुंचने की सोच भी नहीं सकते थे।
तभी, अचानक -अजीमोश्शान शहंशाह पूरी तेजी से बजने लगा। अचानक एक गुप्त द्वार सा खुला और मुगलों के कट में (जो हमें दिखाया गया है, वरना मुगल तो कुरूपता में एक से बढ़कर एक थे) दाढ़ी रखे नौजवान प्रकट हुआ। उसकी सिली हुई धोती, डिजाइनर कुर्ते के ऊपर पंडीजी (गरीब बेचारे) ने जनेऊ पहना दिया था, जिसे अब वापस उसका भाई बड़ी हिकारत से निकाल रहा था, क्योंकि डिजाइनर छवि का वह सूत सत्यानाश कर रहा था।
शहंशाह अपने सिंहासन पर विराजे और उसके बाद जैसे ही बहारों फूल बरसाया की मातमी धुन बजी, समझ में आ गया कि दुल्हन का प्रवेश होने वाला है। नयी परंपरा के मुताबिक पांच किलो मेकअप थोप कर प्रकट हुई दुल्हन के सिर पर एक खाट नुमा कुछ चार कोने से चार वीर पकड़े हुए थे। लोहे के उस ढांचे में हालांकि जंग लग गया था, लेकिन फूल ठीकठाक लिपटे हुए थे। किसी बदमाश ने उसी पर आधे लीटर पानी की बोतल भी फेंक दी थी। उस पर किसी का ध्यान नहीं था, लेकिन बाद में जब सभी वीडियो देखेंगे तो पक्का बहुत निराश होंगे।
शहंशाह और मलिका स्टेज पर पहुंचे ही कि मेरे सिर पर कुछ घूं-घूं करने की आवाज आई और मेरे घोड़े की तरह के बाल लहराने लगे। घबराकर ऊपर देखा तो पता चला कि ड्रोन की करामात है। बहरहाल, बहरकैफ। स्टेज पर वरमाला और एक-दूसरे के माथे को चूमने, सूंघने, बालों को हटाने, बतियाने, दुलराने, नेह लुटाने का कार्यक्रम शुरू हुआ, उधर जनता ने खाने पर धावा बोला। खाना बहुत बढ़िया और कई तरह का था।मेन्यू बनवाने वाले फूफा जरूर मीठे के शौकीन थे, इसलिए मीठा काफी मात्रा में मौजूद था।
जीजाजी ने खाने के बाद कहा- चलिए महाराज, हो गयी शादी। अब क्या यहां रुककर शादी की रस्म भी देखने का इरादा है….
मैंने कहा- चार घंटे में शादी निपटना भी ठीके बात है, महाराज..चलिए घर।

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