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वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड भाग 120

सुमंत विद्वन्स

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रावण को युद्धभूमि में आता देख श्रीराम ने मातलि से कहा, “मातले! देखो रावण का रथ बड़े वेग से आ रहा है। तुम भी सावधानी से उसके रथ की ओर आगे बढ़ो। आज मैं रावण का वध कर दूँगा।” यह कहकर श्रीराम ने इन्द्र का भेजा हुआ शक्तिशाली धनुष हाथ में उठा लिया।
उस समय रोंगटे खड़े कर देने वाले भयंकर संकेत रावण को दिखाई दिए। बादलों से रक्त की वर्षा होने लगी। उसके रथ पर गिद्ध मँडराने लगे। असमय ही संध्या हो गई। गीदड़ अमंगल बोली बोलने लगे और रावण के सामने बड़ी-बड़ी उल्काएँ गिरने लगीं। सूर्य की किरणों का रंग बदल गया। उसकी सेना पर भयानक बिजलियाँ गिरने लगीं और अन्धकार छा गया। भारी धूल से आकाश व्याप्त हो गया।
शुभ और अशुभ शकुनों के ज्ञाता श्रीराम इन लक्षणों को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। रावण के वध को निश्चित जानकर उन्होंने युद्ध में अब अत्यधिक पराक्रम प्रकट किया। उन अपशकुनों से रावण को भी अपनी मृत्यु की आहट मिल गई, अतः उसने भी जीवन का मोह छोड़कर स्वयं को युद्ध में झोंक दिया।
बहुत देर तक उन दोनों का भयंकर युद्ध चलता रहा, किन्तु कोई भी दूसरे को परास्त नहीं कर पा रहा था। क्रोधित होकर श्रीराम ने एक भयंकर बाण से रावण का सिर काट डाला, किन्तु तत्क्षण ही दूसरा सिर वहाँ उत्पन्न हो गया। इस प्रकार श्रीराम अनेक बार उसका सिर काटते रहे, किन्तु हर बार नया सिर उग आता था। इससे वे चिंतित हो गए कि जिन अस्त्रों ने बड़े-बड़े राक्षसों का संहार कर डाला था, वे सब अस्त्र आज रावण पर निष्फल क्यों हो रहे हैं?
तब मातलि ने श्रीराम से कहा, “प्रभु! आप केवल इस राक्षस का अनुसरण क्यों कर रहे हैं? यह जो अस्त्र चलाता है, आप केवल उसे रोकने वाले अस्त्र का ही प्रयोग करते हैं। आप इसका वध करने के लिए ब्रह्माजी के अस्त्र का प्रयोग कीजिए। अब इसके विनाश का समय आ चुका है।”
यह सुनते ही श्रीराम को उस अस्त्र का स्मरण हो गया। तब उन्होंने महर्षि अगस्त्य का दिया हुआ एक अमोघ बाण हाथों में लिया, जो ब्रह्मा जी से मिला था। उस बाण में वायु का वेग, सूर्य का तेज तथा मन्दराचल का भार था। वह स्वर्ण से भूषित, सुन्दर पंखों से युक्त, अग्नि के समान भयंकर तथा वज्र के समान कठोर था। वह बाण कभी निष्फल नहीं होता था। लक्ष्य पर एकाग्र होकर श्रीराम ने अपने धनुष को पूरी तरह खींचा और सहसा वह बाण रावण पर चला दिया।
वज्र के समान भयंकर वह बाण सीधा जाकर रावण की छाती पर लगा और उसने दुरात्मा रावण के हृदय को फाड़ डाला। उस भीषण प्रहार से रावण का धनुष उसके हाथों से छूटकर गिर गया और वह दुष्ट निशाचर निष्प्राण होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
रावण की मृत्यु से भयभीत होकर सब राक्षस लंका में भाग गए। वानर सेना हर्ष से गर्जना करने लगी। अंतरिक्ष से देवताओं ने श्रीराम के रथ पर फूलों की वर्षा की और सब लोग श्रीराम की जय-जयकार करने लगे। सबने मिलकर श्रीराम की विधिवत पूजा की।
इस प्रकार श्रीराम ने रावण का वध करने की अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण कर ली।
अपने पराजित भाई को रणभूमि में मृत पड़ा देख विभीषण शोक से विलाप करने लगा। श्रीराम ने उसे सांत्वना दी। रावण-वध का समाचार सुनकर शोकाकुल राक्षसियाँ भी अन्तःपुर से निकल पड़ीं और युद्धभूमि में आ पहुँची। वहाँ अपने मृत पति को भूमि पर पड़ा देख वे सब करुण क्रन्दन करने लगीं। विलाप करती हुई मन्दोदरी बोली, “राक्षसराज! आपके क्रोध से तो इन्द्र को भी भय लगता था, फिर आप एक मानव से कैसे परास्त हो गए? यह असंभव है कि कोई साधारण मनुष्य आप जैसे महापराक्रमी का वध कर सके। अवश्य ही भगवान विष्णु ने स्वयं ही श्रीराम के रूप में प्रकट होकर आपका वध किया है क्योंकि आप समस्त देवताओं के शत्रु बन गए थे। आपने छल से एक परायी स्त्री का अपहरण किया और शक्ति के मद में बन्धु-बान्धवों सहित अपना विनाश कर डाला। आपकी मृत्यु से मेरा जीवन भी नष्ट हो गया है।”
यह कहती हुई मन्दोदरी रोने लगी व रावण को धिक्कारने लगी। इसी बीच श्रीराम ने विभीषण से कहा, “मरने के बाद वैर समाप्त हो जाता है। अतः सब भूलकर अब तुम अपने भाई के दाह संस्कार का प्रबंध करो।”
तब विभीषण ने लंका में प्रवेश करके दाह संस्कार के लिए शकट, अग्नि, चंदन की लकड़ियाँ, मणि, मोती, मूँगा, अगर एवं अन्य सुगन्धित पदार्थ एकत्र करवाए। रावण के शव को रेशमी वस्त्र से ढककर सोने की शिबिका में रखा गया। राक्षस जाति के ब्राह्मण दुःख से आँसू बहाते हुए हुए वहाँ खड़े हो गए। विभीषण आदि राक्षस फूलों व पताकाओं से सजी उस शिबिका को अपने कन्धों पर उठाकर श्मशान भूमि की ओर चले। यजुर्वेदीय याजकों द्वारा त्रिविध अग्नियाँ प्रज्वलित की गईं। उन सबको कुण्डों में रखकर पुरोहितगण शव के आगे चले। अन्तःपुर की सारी स्त्रियाँ रोती हुई शव के पीछे-पीछे चल पड़ीं।
श्मशान में पहुँचकर राक्षसों ने मलय एवं चन्दन की लकड़ियों, पद्मक, उशीर (खस) आदि से चिता बनाई और उस पर रंकु नामक मृग का चर्म बिछाया। उस पर रावण के शव को लिटाकर उन्होंने चिता के दक्षिण-पूर्व में वेदी बनाई और वहाँ अग्नि को स्थापित किया। फिर दही मिश्रित घी से भरी हुई स्रुवा (यज्ञ में आहुति डालने की करछी) रावण के कंधे पर रखी। फिर पैरों पर शकट (छकड़ा/गाड़ी) और जाँघों पर उलूखल (ओखली) रखा गया। अरणि, उत्तरारणि, मूसल आदि को भी यथास्थान रखा गया।
वेदोक्त विधि से तथा कल्पसूत्रों में बताई गई प्रणाली से सारा कार्य संपन्न हुआ। राक्षसों ने एक पशु की बलि दी और चिता पर बिछे मृगचर्म को घी से तर किया। फिर रावण के शव को चन्दन व पुष्पों सजाकर चिता पर अनेक प्रकार के वस्त्र एवं लावा बिखेरा गया। अब विभीषण ने विधि के अनुसार चिता में आग लगाई। फिर स्नान करके उसने भीगे वस्त्र पहने हुए ही तिल, कुश और जल के द्वारा रावण को जलांजलि दी। इसके बाद रावण की स्त्रियों को सांत्वना देकर उन्हें घर जाने के लिए अनुनय-विनय की। उन सबके चले जाने पर विभीषण श्रीराम के पास आकर विनीत भाव से खड़ा हो गया।
अब तक श्रीराम ने भी युद्ध का रोष त्याग दिया था और वे शान्त भाव से खड़े थे। उन्होंने मातलि को विदा किया और फिर प्रसन्नता से उन्होंने सुग्रीव को गले लगाया और सबके साथ वे वानर-सेना की छावनी में लौटे। तब उन्होंने लक्ष्मण से कहा, “अब तुम लंका में जाकर विभीषण का राज्याभिषेक करो।”
लक्ष्मण के आदेश पर तुरंत ही वानर एक सोने के घड़े में समुद्र का जल ले आए। उस जल के द्वारा लक्ष्मण ने वेदोक्त विधि से विभीषण का राज्याभिषेक किया। फिर श्रीराम ने हनुमान जी से कहा, “हनुमान! अब तुम महाराज विभीषण की आज्ञा लेकर लंका में प्रवेश करो व सीता से मिलकर उनका कुशल-क्षेम जानो। उन्हें यह प्रिय समाचार सुनाना कि युद्ध में रावण मारा गया।”
तब हनुमान जी लंका में गए और विभीषण से आज्ञा लेकर अशोकवाटिका में पहुँचे। सीता जी को प्रणाम करके उन्होंने कहा, “विदेहनन्दिनी! श्रीराम सकुशल हैं व उन्होंने आपका कुशल समाचार पूछा है। श्रीराम ने युद्ध में रावण को मार डाला है। अतः अब आप चिन्ता छोड़कर प्रसन्न हो जाइये। श्रीराम ने आपके लिए सन्देश भिजवाया है कि ‘अब तुम इसे रावण का घर समझकर भयभीत न होना। लंका का राज्य अब विभीषण को दे दिया गया है। अब तुम अपने ही घर में हो, ऐसा समझकर निश्चिन्त रहो।’”
यह सुनकर सीता जी को अपार हर्ष हुआ। उन्होंने कहा, “इस प्रिय समाचार के लिए मैं तुम्हें पुरस्कार देना चाहती हूँ, किन्तु सोना, चाँदी, रत्न अथवा तीनों लोकों का राज्य भी इस शुभ समाचार की बराबरी नहीं कर सकता।”
इस पर हनुमान जी बोले, “देवी! श्रीराम की विजय से ही मेरे सब प्रयोजन सिद्ध हो गए हैं। मुझे कुछ नहीं चाहिए। अब आप श्रीराम के लिए कोई सन्देश मुझे दीजिए।”
तब सीता जी बोलीं, “मैं उनका दर्शन करना चाहती हूँ।”
यह सुनकर हनुमान जी ने उन्हें प्रणाम किया और लौटकर श्रीराम से बोले, “प्रभु! सीता देवी ने नेत्रों में आँसू भरकर मुझसे कहा है कि ‘मैं श्रीराम का दर्शन करना चाहती हूँ।’”
यह सुनकर श्रीराम की आँखें डबडबा गईं। लम्बी साँस खींचकर उन्होंने आँखें बंद कर लीं और भूमि की ओर देखते हुए उन्होंने विभीषण से कहा, “तुम सीता को सिर से स्नान करवाकर, दिव्य वस्त्र एवं आभूषणों से विभूषित करके शीघ्र मेरे पास ले आओ।”
यह सुनकर विभीषण तुरंत अपने अन्तःपुर में गया और अपनी स्त्रियों को सीता के पास भेजकर उसने अपने आगमन की सूचना दी। फिर सीता को प्रणाम करके उसने श्रीराम का संदेश सुनाया। इस पर सीता जी ने कहा, “मैं बिना स्नान किए अभी तुरंत ही श्रीराम का दर्शन करना चाहती हूँ।”
लेकिन विभीषण के समझाने पर उन्होंने श्रीराम की इच्छा के अनुसार स्नान किया तथा सुन्दर श्रृंगार करके बहुमूल्य वस्त्र एवं आभूषण पहने। तब एक पालकी में बिठाकर उन्हें श्रीराम के पास लाया गया। सीता के आगमन की सूचना मिलने पर श्रीराम का मन भर आया।
सीता के आगमन का मार्ग बनाने के लिए राक्षस सिपाही हाथों में छड़ी लेकर वानरों को हटाने लगे। इससे बड़ा कोलाहल मच गया। तब श्रीराम ने क्रोधित होकर विभीषण से कहा, “तुम क्यों इन सबको कष्ट देकर मेरा अनादर कर रहे हो? ये सब वानर भी मेरे आत्मीय जन हैं। अतः जानकी पालकी को छोड़कर पैदल ही मेरे पास आएँ और ये सब वानर भी उनका दर्शन करें।”
तब पालकी से उतरकर लज्जा से सकुचाती हुई सीता जी धीरे-धीरे चलती हुई श्रीराम के सामने पहुँचीं। अपनी लज्जा के होते हुए भी उन्होंने जी भरकर अपने पति को निहारा और अपने मन की पीड़ा दूर की।
तब श्रीराम ने सीता जी से कहा, “भद्रे! युद्ध-भूमि में शत्रु को परास्त करके मैंने तुम्हें छुड़ा लिया। मुझ पर जो कलंक लगा था, आज मैंने उसे धो लिया। अब मैं अपनी प्रतिज्ञा के भार से मुक्त हो गया। तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिए कि मैंने यह युद्ध तुम्हें पाने के लिए नहीं किया। अपवाद (बदनामी) का निवारण करने व अपने सुविख्यात वंश पर लगे कलंक को मिटाने के लिए ही मैंने यह सब किया है। यह तुम्हारे चरित्र पर संदेह का अवसर है, फिर भी तुम मेरे सामने खड़ी हो। जैसे आँखों के रोगी को दीपक की ज्योति नहीं सुहाती है, उसी प्रकार तुम भी आज मुझे अत्यंत अप्रिय लग रही हो।”
“ऐसा कौन सामर्थ्यवान पुरुष होगा, जो दूसरे के घर में रह चुकी स्त्री को मन से स्वीकार कर लेगा? रावण तुम्हें गोद में उठाकर ले गया था और तुम पर अपनी दूषित दृष्टि डाल चुका है। तुम जैसी सुन्दर स्त्री को अपने घर में देखकर वह बहुत समय तक तुमसे दूर नहीं रह सका होगा। ऐसी दशा में मैं तुम्हें कैसे स्वीकार कर सकता हूँ?”
“अब मेरा तुमसे कोई संबंध नहीं है। अतः तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, तुम वहाँ जाने को स्वतंत्र हो। तुम चाहो तो भरत या लक्ष्मण के साथ रह सकती हो, अथवा शत्रुघ्न, सुग्रीव या विभीषण के पास भी रह सकती हो। जहाँ तुम्हें सुख मिले, तुम वहीं अपना मन लगाओ।”
इतने दुःखों, कष्टों और चिरकाल की प्रतीक्षा के बाद मिले अपने पति के मुख से ऐसी कड़वी बातें सुनकर सीताजी का मन आहत हो गया। उन्होंने कठोर शब्दों में श्रीराम से कहा, “जिस प्रकार कोई निम्नकोटि का पुरुष न कहने योग्य ओछी बातें भी किसी स्त्री से कह डालता है, उस प्रकार आप मुझसे ऐसी अनुचित बातें क्यों कर रहे हैं? मेरे शील-स्वभाव को भूलकर आप किसी ओछे मनुष्य की भाँति मुझ पर आरोप लगा रहे हैं। मैंने रावण को स्वेच्छा से नहीं छुआ था। मेरी विवशता के कारण उसने मेरा अपहरण कर लिया था। हम दोनों इतने वर्षों तक साथ रहे, फिर भी यदि आपने मुझे नहीं समझा है, तो मेरा जीवन ही व्यर्थ है। लक्ष्मण! तुम मेरे लिए चिता तैयार कर दो। मैं इस मिथ्या कलंक के साथ नहीं जी सकती।”
(स्रोत: वाल्मीकि रामायण। युद्धकाण्ड। गीताप्रेस)
आगे जारी रहेगा…..

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