Home विषयकहानिया बिसोबा खेचर – बहुदेववादी सर्वेश्वरवाद Vsहिंसक एकेश्वरवाद

बिसोबा खेचर – बहुदेववादी सर्वेश्वरवाद Vsहिंसक एकेश्वरवाद

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“अरे बिठोबा! कितने सुंदर लग रहे हो तुम और कैसी मादक सुगंध आ रही है तुमसे।” प्रसन्न किशोरी पुष्पवाटिका में पुष्पों को देखकर ताली बजा रही थी।
“अरे विट्ठल! क्या अजीब स्वर निकालते हो तुम।” वही किशोरी गधे को रेंकते देखकर हंसे जा रही थी।
“छि: विट्ठल! कभी-कभी तुम कितने घिनौने और दुर्गन्धित वातावरण में बिलबिलाते रहते हो।” मार्ग में गंदे पानी के गड्ढे में बिजबिजाते कीटों को देखकर वह किशोरी चकित थी।
वह अपने भाइयों के लिए पूरनपोली बनाने के लिए कुम्हार से मिट्टी का तवा लेकर लौट रही थी कि उसे मार्ग के पानी के गड्ढे में कीट देख उत्सुकता में रुक गई थी।
उधर से वह ब्राह्मण आ निकला जो इस लड़की और इसके भाइयों से चिढ़ा हुआ था।
उसने दो चपत लड़की को लगाई।
“दुष्टा, नाली के कीड़ों में भी विट्ठल बता रही है।”
उसने किशोरी के हाथ से तवा लेकर तोड़ डाला।
बालिका रोती हुई अपने घर पहुंची।
इस घटना के कुछ समय बाद चढ़े दिन एक मस्तमौला साधु शिवलिंग पर पैर रखे सो रहा है और एक व्यक्ति उसे झिंझोड़ रहा है।
“क्या तुमने बिसोबा खेचर को देखा है?”
“बोलो, मैं ही बिसोबा खेचर हूँ।” बिना आँख खोले मस्त साधु बोला।
“तुम और बिसोबा खेचर?”
“क्यों बिसोबा खेचर के क्या सींग लगे हैं?” साधु ने जम्हाई लेकर करवट बदलते हुए कहा।
“बिसोबा जैसा पहुँचा हुआ साधु ब्रह्ममुहूर्त को छोड़ अब तक सोया रह सकता है और जरा देखो तो पैर कहाँ रखे हैं? शिवलिंग पर। ” आगुन्तक ने मजाक उड़ाया।
“मुझे नहीं पता रे कि ब्रह्म मुहूर्त कब होता है, मेरे लिए तो जब मैं आँख खोलूँ, वही ब्रह्म मुहूर्त है। और रही बात शिवलिंग पर पैर रखने की तो उठाकर रख दे मेरा पैर जहां तेरा शिव न हो।” अब आँखें खोलकर साधु मुस्कुराया।
आगुंतक मर्म समझकर संत के चरणों में झुक गया।
जानते हैं यह संत बिसोबा खेचर कौन थे?
यह वही ब्राह्मण थे, जिसने उस निर्दोष बालिका का तवा ही नहीं तोड़ा था बल्कि कई वर्षों तक उत्पीड़ित किया था लेकिन जब उसने जाना कि बालिका वस्तुतः कण-कण में ईश्वर की अनुभूति में मग्न थी तो पश्चाताप में वह उसका शिष्य बन गया
और अंततः स्वयं भी ‘बिसोबा चाटी’ से सर्वेश्वरवादी संत ‘बिसोबा खेचर’ बन गया।
और उसकी गुरु वह किशोरी थी संत ज्ञानेश्वर की छोटी बहन मुक्ताबाई।
कुछ शुचितावादियों का तर्क कि क्या घृणित वस्तुओं में भी ईश्वर हो सकता है, जिसका उत्तर कई बार वह स्वयं कभी वराह बनकर तो कभी मुक्ताबाई बनकर उनकी अंतर्दृष्टि के माध्यम से दे चुके हैं।
केवल जड़ शास्त्रवादी, महिषबुद्धि आडंबरवादी और हिंसक एकेश्वरवादी मु स्लिम ही करुणापूर्ण बहुदेववादी मूर्तिपूजक सर्वेश्वरवाद को वेद विरोधी ठहराते हैं।

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