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आनन्द एक व्यक्तिगत विषय | प्रारब्ध | त्रिलोचन नाथ तिवारी

लेखक : त्रिलोचन नाथ तिवारी

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कृपया मातायें, बहनें, और मेरे नकारात्मक छवि के पश्चात भी मुझे हृदय से प्रेम एवं सम्मान देने वाली महिला मित्र, प्रथम तो इसे पढ़ें मत, और पढ़ें भी तो प्रतिक्रिया न व्यक्त करें। कभी कभी सत्य लज्जाजनक होता है और मैं बड़ा बेशर्म हूँ फिर भी, लज्जा है मुझमें थोड़ी सी!

 

अतः क्षमा करें मुझे।

 

कुछ दिन अनुपस्थित था। बहुधा अनुपस्थित रहता हूँ क्योंकि लाइक्स से पेट नहीं भरता। किन्तु जब लौटा तो यहाँ मामला ही इतना वीभत्स हुआ पड़ा था कि मैं अवाक् था।
ऐसे भी विषय हैं विमर्श के? यही विषय रह गये हैं विमर्श के? किन्तु यदि समस्या है तो उन पर विमर्श तो होगा ही।
चलिये छोड़िये यह सब। यह सब चलता रहता है। बड़े बड़े देशों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं। आप तो एक कहानी सुनिये, जो कहानी नहीं, एक सत्य इतिहास है।
पंडित कामनाथ जो कश्मीर के निवासी थे और राजा के पार्षद भी थे, कालान्तर में कोका पंडित के नाम से प्रसिद्ध हुए।
प्रारम्भ में वे वात्स्यायन के शिष्य रहे एवं अपने गुरु वात्स्यायन के शोध में उनका शिष्यवत योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था।
एक बार पंडित कामनाथ सभा में बैठे थे तभी एक‌ युवती बहुत ही पतले पारदर्शी परिधान पहन कर राज्यसभा में आयी। उन पारदर्शी वस्त्रों से उसके शरीर का अङ्ग-प्रत्यङ्ग दिख रहा था।
वह युवती अपने हाव-भाव से भी वासना से परिपूर्ण एवं कामुक दिख रही थी।
भारतवर्ष में यौन-सन्तुष्टि के आग्रह कभी निंदनीय नहीं माने गये। आक्रमण से आक्रांत देश में जब विधर्मियों द्वारा बलात्कार का प्रचलन बढ़ा तब यौनेच्छा का दमन विवशता के रूप में उभरा अन्यथा यह वह देश है जहाँ रतिदान आग्रह एवं उस आग्रह की प्रतिपूर्ति के विषय सम्मानित रहे हैं। अनेकों उदाहरण हैं, किन्तु यहाँ उनके उल्लेख का अवकाश नहीं।
तो उस युवती ने राजा से कहा कि मेरी वासना को शांत करो।
देहयष्टि, भंगिमा, प्रगल्भता, वाणी, सभी यह इंगित कर रहे थे कि उस युवती की वासना एक ऐसी ज्वालामुखी है जिसके शमन में अनेकों शिलाखण्ड पिघला लावा बन जायें।
राजा ने पंडित कामनाथ से सलाह ली और कोका पंडित ने कहा कि यदि दुर्बल से दुर्बल व्यक्ति भी रतिक्रिया नियम पूर्वक करें तो वह ऐसी या इससे भी अधिक कामुक स्त्री के वासना की पूर्ति कर सकता है।
तब राजा ने कहा – पंडित! यह विधि सर्वज्ञात होनी चाहिये। तुम इस विषय पर एक ग्रंथ लिखो!
कामनाथ ने उत्तर दिया – महर्षि वात्स्यायन का कामसूत्रम् है न महाराज!
राजा ने कहा – होगा! किन्तु तुम भी लिखो! किन्तु प्रथम तो यह कहो कि इस युवती को कैसे सन्तुष्ट किया जाय?
पंडित कामनाथ ने कहा – यदि आपकी अनुमति हो तो इसकी लालसा मैं पूरी करूँ!
राजा की आज्ञा लेकर कोका पंडित उस युवती को अपने निवास पर ले गये और सत्ताईस दिनों तक उसे नियमित संतुष्ट किया।
अठाइसवें दिन वे उस युवती के साथ राज्यसभा पहुँचे तो वह युवती आपाद-मस्तक काशेय कौशेय से ढँकी, स्वर्णाभूषण अलंकृत, एक लज्जालु नववधू की भाँति प्रतीत होती थी।
आश्चर्य – चकित राजा ने कुछ देखा, कुछ समझा और पंडित कामनाथ से कहा – पण्डित! यह परिवर्तन?
कोका ने कहा – कामशास्त्र महाराज!
राजा ने कहा – अपना ग्रन्थ अतिशीघ्र प्रारम्भ एवं पूर्ण करो!
पंडित कामनाथ ने तदुपरांत कोक शास्त्र की रचना की और उसमें समस्त रति क्रियाओं का वर्णन किया। उन्होंने यौन क्रिया पर आधारित कोकशास्त्र की रचना की जिसमें उन्होंने संभोग क्रियाओं का वर्णन किया एवं बताया कि एक दुर्बल व्यक्ति भी किस प्रकार से संभोग करके स्त्री को संतुष्ट कर सकता है।
कोक शास्त्र के बारे में एक दोहा प्रचलित है –
पिंगल पढ़े बिन छंद रचे,
गीता बिन दे ज्ञान।
कोकशास्त्र बिन रति करे,
वह नर पशु समान।।
एक कहानी ख़त्म।
लेकिन एक कहानी और सुनिये –
एक किशोर फौजी था। युद्ध में उसके पास एक हैंड-ग्रेनेड फटा तो उस धमाके में वह जीवित तो बच गया लेकिन उसका दाहिना हाथ कुहनी से आगे उड़ गया।
अपाहिज बेचारा! फौज में अब उसका क्या काम? तो कम्पलसरी रिटायरमेंट।
अब लुल्ले से शादी कौन करे? तो बेचारा रेड लाइट एरिया जाया करता था।
एक बार,
एक जगह,
एक के साथ
उसने पूछा – कैसा लगा?
उत्तर मिला – ऊँहूँ।
फौजी ने मामला समझा और अपना टुण्डा दाहिना हाथ ……!
उसने फिर पूछा – अब कैसा लगा?
उत्तर मिला – ठीक ठाक है।
फौजी ने पूछा – इसके पहले कभी इस से अधिक?
उत्तर मिला – हाँ। एक फौजी आया था एक बार!
इस फौजी ने कहा – जरूर साले की टाँग किसी हादसे में घुटने पर से उड़ गयी होगी!
विमर्श का अंतिम उत्तर दूसरी वाली कहानी है।

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