Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय गोरखपुर कथा -3 : सौभाग्यवती भव

गोरखपुर कथा -3 : सौभाग्यवती भव

147 views
अम्मा की सहेलियों की एकाध सिसकी, बाहर बाँस की टिकठी बनाने की ठक-ठक आवाज और बीच-बीच में ठेठ पूरबी अन्दाज में कुसुमी का “अरे मोर भउजी” का स्वर भीड़ भरी निस्तब्धता को भेद रहा था। नीरा ने अम्मा के
अँकड़े पैरों में महावर लगाते हुए आँखों को रगड़ लिया था सम्भवतः जबरन आँसू लाने के प्रयास में, महावर लगी आँखें लाल टुहठुह अड्हुल के फूल के समान दिख रही थीं-कुसुमी ने सब कुछ भुलाकर नीरा को दढुलराया, ‘जाव
दुलहिन, आँख धो आव, सवेरे से रोअत-रोअत का हाल भइल…”
तभी किसी ने पूछा था, “सिंधौरा कहाँ है?”
दुछत्ते पर रखे कबाड़ वाले काठ के बक्से में पड़े अम्मा के सिंधौरा की जानकारी केवल मुझे थी। बचपन में आले में रखा कलावे से बँधा चमकीले लाल रंग का सिंधौरा मेरी दृष्टि को चिपका लेता था, एक दिन उसे ही बेरहमी से उठा कर अम्मा को दुछत्ती पर फेंकते देखा था-बाद में न जाने कब उसे कबाड़ के बक्स में स्थान मिल गया। कबाड़ वाले बक्से में ज्यादा ढूढ़ना नहीं पड़ा। समय की मार ने सिंधौरा को भी भदरंग बना दिया था। तब तक मौसी बाबू जी को बुला लाई थीं।
“जीजा जी, अपने हाथ से दिदिया की माँग भर दो।
बाबू जी का चेहरा तमतमा गया। काँपते हाथों से सिंधौरा के इर्द-गिर्द चिपके सिन्दूर को उन्होंने अम्मा की माँग में भरा तो बरसों की सूनी माँग जगमगा गई। माँग में सिन्दूर भरना अम्मा ने न जाने कब से छोड़ दिया था। किसी ने कभी टोका तो कहती, सिन्दूर लगाने से माँग में जलन पड़ती है।
लाल चुनरी में लिपटी प्राण विहीन देह में न जाने कहाँ का सौन्दर्य उमड़ पड़ा था। वैसे पहनने ओढ़ने की अम्मा शौकीन थीं। कड़कड़े कलक की रंगीन सूती साड़ी पहन कर मुख में पान दबा कर अपनी सहेलियों में जब वह बैठती तो अपने गरिमापूर्ण व्यक्तित्व से सबसे अलग-धलग दिखती थीं-परन्तु इस समय तो वे बीरबधूटी से दबी जूही की मुरझाई पंखुरी जैसी लग रही थीं।
बाहर अर्थी तैयार हो चुकी थी-अनुपम अम्मा के पैरों को पकड़ कर फूट-फूट कर रो पड़ा…कैंसर-मौत की सच्चाई-निरन्तर समीप आती यमदूतों की मुखरित पगचाप, अम्मा का पल-पल छीनता शरीर और असहूय पीड़ा को झेलने
का उनका अनथक प्रयास, कितना तराशने वाला अनुभव था। इसे मुझसे अधिक कौन जान सकता है? क्या बाबू जी और अनुपम जो नित्य निकल पहुँचती हुई मृत्यु की प्रतीक्षा में ऊबे हुए थे? फिर अब यह रोना धोना कैसा? अपने इस बेपनाह झरते हुए आँसुओं के बीच मेरा मन इतना क्रूर शल्य चिकित्सक क्यों होता जा रहा है-क्या अन्तिम यात्रा के समय सारे राग-द्वेष गर्भगृह में बंद हो जाते हैं। रह जाती है विशुद्ध रागात्मक अनुभूति…’बबुआ मत रोवो, भउजी भरल पुरल गइलीं, रोइले से उन कर आतमा के कष्ट होई। कुसुमी ने लम्बे चौड़े अनुपम को अँकवार में समेटना चाहा….
भरा पूरा शब्द कितना रीता हो जाता है जब रेत को कस कर मुट्ठी में बंद किया जाए। अँगुलियों की दरारों से कब सारी रेत निकल जाती है पता ही नहीं चलता और मुट्ठी भरी पूरी जैसी बन्द रह जाती है।
‘राम नाम सत्य है” अर्थी उठ गई। अब अम्मा का मुख कभी नही देख पाऊँगी, उनके स्पर्श, गंध और स्वर से वंचित होने की कल्पना से वेग से फूटती रुलाई को दाँत भींच कर मैंने रोका-मुझे कुसुमी की लिजलिजीं सान्त्वना नहीं चाहिए। अपने प्रति मेरी इस घृणा से वह भलीभाँति परिचित है तभी ते अनुपम और नीरा पर अपने अतिरिक्त प्यार का प्रदर्शन मुझे दिखाती रहती है।
यह कुसुमी यहाँ क्यों रहती है? उस रात के बाद दूसरी रात मैंने अम्मा से पूछा था। “बुआ” न कह कर कुसुमी का नाम लेते सुन कर अम्मा चौंकी थीं किन्तु अपने स्वभाव के अनुरूप मुझे टोका नहीं था।
आज अम्मा का अस्तित्व सदा के लिए शून्य में मिल जाएगा किन्तु बचपन के खण्ड-खण्ड चित्र के प्रत्येक फ्रेम में वे जीवन्त है-सुबह सवेरे हाथ में पूजा की टोकरी लिए, हनुमानगढ़ी जाती हुई अम्मा, पड़ोसियों के संग बैठ कर चाय पीतीं हुई अम्मा, बाबू जी के आफिस से आने के समय पलंग पर चादर तान कर सोई अम्मा, हम लोगों के प्रति कभी घोर आसक्ति कभी कड़वी वितृष्णा।
गोरखपुर के दक्षिण पश्चिमी छोर पर राप्ती नदी के किनारे अवस्थित हनुमानगढ़ी मंदिर की विशाल हनुमान मूर्ति से अम्मा का न जाने कैसा लगाव था। नियमित रूप से वह वहाँ जाती थी। उनके साथ-साथ वहाँ जाना मेरे लिए रोमांचक अनुभव था। एक तो हनुमान जी की मूर्ति की कम रहस्यमयी नहीं लगती थी तिस पर अम्मा की बताई लोक गाथा कि कैसे एक बार राप्ती में भयंकर बाढ़ आई थी, लगता था बाँध अब दूटा तब टूटा फिर तो पूरा शहर ही बह जाएगा। आशंकित गढ़ी के महन्त को सपना आया था-डरने की बात नहीं है हनुमान जी के चरण-स्पर्श के बाद मैं अपनी धारा समेट लूँगी और वैसा ही हुआ। इतने शक्तिशाली हैं, हनुमान जी कि राप्ती मैया उनके चरण पखारने आई थी घर से अधिक दूर नहीं है हनुमान गढ़ी, अम्मा के साथ हम दोनों भाई-बहन भी वहाँ पहुँच जाते थे जितनी देर अम्मा पूजा करती हम दोनों गढ़ी के बायें ओर के छोटे द्वार की सीढ़ियों पर खेलते रहते। सीढ़ियाँ राप्ती के किनारे तक पहुँचा देती थी। उस दिन हम लोग खेलते-खेलते नीचे पहुँच गए, अनुपम तो वहीं ठिठक गया मैं दलदली किनारे पर पैर सँभाल-सँभाल कर रखती हुई पानी के पास पहुँची ही थी कि पैर फिसल गया। नदी में नहाते हुए चरवाहे ने बाँह पकड़ कर मुझे उठाया और मन्दिर में ले आकर अम्मा से कहा था, “आज तो बहिनी डूब ही जाती ।”
अम्मा ने न पुचकारा, न दुलारा उलटे कस कर एक चाँटा जड़ दिया था। कीचड़ से लिथड़ी फ्राक में अपमानित मैं वहीं मन्दिर के प्रांगण में खड़ी रह गई। अनुपम पहले तो मुझे चिढ़ा रहा था किन्तु अम्मा के आगे बढ़ जाने पर वह गम्भीर हो गया, “चल बिट्टो, अम्मा तुझे मनाने थोड़ी ही आएँगी उन्हें तो मारना आता है अभी कुसुमी बुआ होती तो तुझे गोद में उठा लेती।
मन्दिर के फाटक के पास पहुँच कर अम्मा ठिठकी फिर पीछे मुड़कर आई और मेरा हाथ पकड़ लिया मरना तो मुझे चाहिए तू क्यों जान देने पर उतारू है। ” अम्मा का यह अस्फुट वाक्य अपने रहस्य के साथ मेरे मस्तिष्क
पर अंकित हो गया यद्यपि इसका अर्थ बहुत बाद में समझ में आया था।
किन्तु उस समय तो अम्मा बुरी, बहुत बुरी लगीं थीं। घर आने पर आशा के अनुरूप कुसुमी ने मुझे गोद में भर लिया-उसकी स्नेह सिक्त बाँहों का आधार पाकर मैं फूट-फूट कर रो पड़ी थी।
“ ज़्यादे चोंचले करके इन बच्चों को मत बिगाड़ो। ” अम्मा ने रूख़ाई से कहा था। मैं और कसके कुसुमी की गोद में चिपट गई। उस समय वह मुझे सबसे अधिक अपनी लगीं थी। हम दोनों जुड़वाँ भाई-बहन का बचपन उसके लाड़ प्यार की धारा के साथ आगे खिसक रहा था-अम्मा का अपना रूटीन था। मंदिर से आ कर वह तब तक पूजा गृह में बैठी रहती जब तक बाबू जी आफिस नहीं चले जाते।
बाबू जी के जाने के बाद उनका दिन आरंभ लेता। कुसुमी उसका भोजन मेज पर लगा देती। मैं और अनुपम यद्यपि सुबह से तब तक न जाने कितनी बार क्या-क्या खा चुके होते। फिर भी अम्मा की थाली में हाथ बँटाने पहुँच जाते। अम्मा को गंदगी, अव्यवस्था एकदम नापसन्द थी। कुसुमी हम लोगों के लिए भी छोटी-छोटी थालियाँ रख जाती थी। मैं तो थोड़ा रुठ ठुनक कर अलग थाली में खा लेती किन्तु अनुपम अम्मा की थाली में खाने की जिद पकड़ लेता था। मैं देखती कि अम्मा उसे खिला देती परन्तु स्वयं कुछ न खाती। शायद उनका सफाई पसन्द मन इसमें बाधा डाल देता था। प्रायः कुसुमी अनुपम को बहला देती थी, अरे ऊ तुहार महतारी पुजेरिन है उनके थाली में मत खाव, तू तो हमार राजा बेटा हव हमरे संग खाव अनुपम ढिठाई से अम्मा को देखता, चिढ़ाता, कुसुमी की गोद में चढ़ जाता। अम्मा अपनी सफाई में हम बच्चों को साफ सुधरा रहना और सफाई से जीने का महत्व समझा देती थीं जिसे हम कुछ समझते, कुछ नहीं समझते।
खा पी कर जाड़े के दिन हुए तो आँगन में, गर्मी हुई तो कमरे में उनकी सहेलियों की मडली जुट जाती। उनके पास सभी के लिए कुछ-न-कुछ था। कढ़ाई बुनाई सिलाई सभी गृहकलाओं में वे पारंगत थी। स्वेटरों के नए के नए डिजायन उतरवाना हो अथवा गले बाँह की पट्टी की ठीक फिटिंग करानी हो अथवा क्रोशिए के कुशन कवर हो, अम्मा से सभी को कुछ-न-कुछ सीखना रहता था। जिनके पास बाल बच्चों के कारण समय नहीं था उनके स्वेटरों
को बुनने में हाथ बैँटाना हो अथवा ब्लाउज या बच्चों के कपड़े काटने सिलने हों अम्मा की आवश्यकता सभी की थी। बीच-बीच में चाय पिलाने के लिए कुसुमी बुआ तो थी ही। अनुपम और मैं खेल खेल में झगड़ कर अम्मा के पास फरियाद लेकर पहुँचते किन्तु उस समय यदि वे किसी को कुछ बताती या स्वयं कुछ बनाती रहती तो हम दोनों के झगड़े को एक सपाटे से झटक देती, “जाओ मिल मिल कर खेलो, मुझे काम करने दो, अच्छे बच्चे लड़ते नहीं ।’
चाय पहुँचाने अथवा चाय के जूठे कप उठाने कुसुमी बुआ वहाँ पहुँच जाती और हम लोगों को अपने गदबदी छाती में समेट लेती। मैं तो चुप रह जाती थी, अनुपम अपने को छुड़ा कर अम्मा से लिपटना चाहता किन्तु यह तो अम्मा के मूड पर रहता कि वे उसे प्यार करेंगी अथवा कुसुमी बुआ के हवाले करेंगी।
चार बजते-बजते जब अम्मा का दरबार खाली होता तो वे उठतीं सारे घर को सलीके से संभालती। अम्मा के जादुई स्पर्श से पूरा घर सिनेमा में देखे घरों के सेट जैसा लगने लगता। हम दोनों को भी तैयार करना चाहती किन्तु अनुपम तब भी रूठा रहता था। जैसे ही बाबू जी के आने का समय होता, वे अपने कमरे में जा कर लेट कर सो जाती बाबू जी आफिस से आते हम लोगों को प्यार करते। हमारी छोटी-छोटी बातों को ध्यान से सुनते तब तक कुसुमी बुआ उनके लिए नाश्ता ले आती। जब तक बाबू जी खाते रहते वह वहीं धरती पर बैठी रहती। घर की दैनन्दिन की आवश्यक वस्तुओं को भी वही बाबू जी को बताती उसके बाद बाबू जी बाजार चले जाते।
अनुपम और मैं अम्मा से कहानी सुनने की जिद करते किन्तु उस समय उनका मूड ठीक नहीं रहता था। लगता ही नहीं था कि ये वहीं अम्मा है जो दोपहर में अपनी सहेलियों से हँस विहँस कर बातें कर रहीं थी।
अम्मा हम लोगों को अपनी पहुँच, अपनी समझ से परे लगती थी। एक दिन की घटना तो मुझे पूरी तरह याद है। स्कूल से लौटने पर अम्मा का जमावड़ा हम लोगों को बहुत बुरा लगता धा-उस दिन अनुपम स्कूल से खेल में जीत कर आया था, रास्ते भर कहता आया था आज अम्मा मुझे खूब प्यार करेंगी। किन्तु सहेलियों के बीच बैठी अम्मा ने प्रतिदिन की भाँति बिना उठे कहा था जाओ कुसुमी से खाना ले लो |
अनुपम एकदम कुढ़ गया था। बस्ता वहीं पटक कर वह बिफर गया। अम्मा बिगड़ती हुई उसे मनाने को जब तक उठी कुसुमी लपकती हुई आई और उसे गोद में भर लिया, “अरे हमार राजा, तोहरे खातिर हम खीर बना के
रखले हई, चलो। खरी अनुपम की दुर्बलता अभी तक है। उसके नाम से उस समय वह चुप हो गया किन्तु उसकी भवें चढ़ी हुई थी। आग में घी डालने का काम कुसुमी की बड़बड़ाहट कर रही थी। ‘मरद खट-खट कर कमावत
है और ई चाय पानी में उड़ा देत हैं। लड़कन के दूध कम पड़ जात है पर इनके कुछ खियाल है?” अम्मा की आलोचना उस समय घाव पर रखे फाहे के समान शीतल लगी थी। अम्मा से टूटते और कुसुमी बुआ से जुड़ते हुए
बचपन उम्र की राह में पिछड़ गया। अम्मा की रूटीन को मैंने तो पहले ही स्वीकार कर लिया था अब अनुपम ने भी रोना मचलना छोड़ दिया था। हम लोग कुसुमी बुआ के कमरे में ही सोते थे। उस समय वह कितनी अपनी
लगती थी। यह तो वह चाँदनी से नहाई उजली रात की कालिमा थी जिसने मेरे सारे समीकरण बदल दिए।
किशोरावस्था की दूध धुली उम्र की बेसुध नींद जिसे कान पर बजते नगाड़े भी तोड़ने में विफल थे एक रात काँच की चूड़ी के समान चट से टूट गई। गहराई हुई रात के भारी सन्नाटे में बगल की खाट पर सोए अनुपम के लय बद्ध गति से सम पर आकर पल भर को थमते और पुनः गति पकड़ते। उसके खर्राटे मेरी देह में भय की अजानी सिहरन जगा देते। लगता जैसे कमरे में कोई धीमे-धीमे चल रहा है। डरते-डरते मैंने आँखें खोली। खिड़की से चाँदनी का छोटा-सा टुकड़ा टार्च के सीमित प्रकाश के समान कुसुमी की खाली खाट पर पड़ा था। शायद वह बाथरूम गई हैं, मेरा साहस लौट आया, मैं अपने बिस्तर से उठी। बाहर जाने वाला दरवाजा भिड़ा हुआ था, मैंने धीरे से उसे खोला-पिछले प्रहर की ज्योत्स्ना से स्नात नर मादा युग्म को देखकर मेरे नसों का रक्त जैसे बर्फीला पानी बन गया। प्रकृति के आदिम रहस्य को देखकर मेरा माथा घूम गया था। जैसे-तैसे बिस्तर पर आकर काँपते हाथों चादर को सिर से ओढ़ कर सारी दुनिया से अपने को छिपा लेना चाहा था। हिम के समान शीतल देह में रह-रह कर कँपकैंपी हो रही थी। शायद कुछ आहट कुसुमी को मिल गई थी। माथे का पसीना पोंछती हुई वह कमरे में आकर सीधे अनुपम के बिस्तर के पास गई। उसके खर्राटों से आश्वस्त हो वह मेरे पास आई। मैं साँस रोके पड़ी थी। आँख के कोने से बाबू जी की परछाई को अपने कमरे में जाते देख कर मैं ग्लानि के दलदल में धँसती चली गई थी।
दूसरी सुबह किसी की ओर देखने का साहस मुझ में नहीं था, लगता था जैसे मैंने ही कुछ गलत कर दिया हो…मुझे अच्छी तरह याद है उस दिन पहली बार मुझे कक्षा में सजा मिली थी। इतिहास की प्राध्यापिका प्रेमपूर्वक अपने सर्वप्रिय विषय अकबर के दीन इलाही के सम्बन्ध में लेक्चर दे रहीं थी-मैं उनकी प्रिय शिष्या थी, उन्होंने मुझसे कुछ पूछा था किन्तु मेरा ध्यान वहाँ था ही कहाँ, जो मैं कुछ सुन समझ पाती। सजा स्वरूप बेंच पर खड़े होकर मुझे
लगा जैसे मेरी देह पारदर्शी हो गई है और आत्मा नग्न। शायद सब ने मेरे विचारों के एक-एक बिन्दु को देख परख लिया है। उस दिन मैंने टिफिन भी नहीं खाया था। मेरे टिफिन को देखकर कुसुमी बुआ ने भी कुछ नहीं कहा था, ऐसे तो वह इस स्थिति में आशंकित प्यार की वर्षा कर देती थी।
रात हुई तो वह कमरा मुझे काटने लगा। मैं अम्मा के कमरे में जाकर उनसे चिपट गई, “मैं यहीं सोऊँगी।”
“क्यों क्या हुआ?” अप्रत्याशित प्यार पाकर अम्मा ने मीठे स्वर में पूछा था।
‘मुझे वहाँ डर लगता है।’ अम्मा से लिपट कर सुरक्षा का भरपूर अनुभव करते हुए मैंने प्रश्न किया था, “यह कुसुमी यहाँ क्यों रहती हैं?”
अम्मा चौंक गई थीं, उन्होंने बात टालनी चाही किन्तु मैं भी कोई कम जिद्दी थोड़े ही थी। हार कर अम्मा ने बताया था-दादी के मायके के गाँव की हैं कुसुमी। विधवा हो जाने के बाद ससुराल वालों ने निकाल दिया था। इसका भाई स्वयं गरीब था, वह क्या कर सकता था। उन्हीं दिनों हम दोनों अम्मा के गर्भ में थे। दादी से संभाल हो नहीं सकती थी, तो दादी के भाई ने कुसुमी को यहाँ के काम के लिए भेज दिया था। हम दोनों जुड़वाँ भाई-बहन ने आपरेशन से जन्म लिया था, अम्मा की हालत बचने लायक नहीं थी। ऐसे में कुसुमी ने सब संभाल लिया अम्मा तो पूरे वर्ष भर बिस्तर से लगी रहीं, हम लोगों का पालन-पोषण, घर के सारे कार्य, साथ में दादी की सेवा टहल। कहीं कोई कमी नहीं। दादी के लिए तो उसकी जान भी हाजिर थी। दादी मरने लगीं तो अम्मा से वचन ले लिया, ‘इस अनाथ विधवा को कभी घर से बेघर न करना…और सच में अम्मा स्वयं घर से बेघर होती चलीं गई किन्तु अपने वचन को तोड़ा नहीं…किन्तु इतनी समझ तो बहुत बाद में आई थी उस समय तो मुझे लगता-कहाँ काली कलूटी कुसुमी और कहाँ मेरी गोरी-गोरी अम्मा।
बाबू जी भी-छिः छिः, उनके सामने आते ही मैं कुंठित होकर हट जाती थी-उन दिनों कुसुमी को मैं नए-नए कोणों से देखने लगी थी। विकसित होता हुआ मेरा अविकसित मन सहेलियों द्वारा लाए गए सस्ते रूमानी उपन्यासों को पढ़ कर जब नारी सौन्दर्य को मापने लगा तब कुसुमी की अजंता की मूर्ति जैसी गठीली देह यष्टि का रहस्य परख सकी थी।
मैं कुसुमी को देखते ही मानसिक सन्तुलन खो बैठती थी, उसका प्रत्येक काम मुझे बुरा लगता था। बहाने-बहाने मैं उस से लड़ती रहती थी। एक दिन रात को खाते समय सब्जी के रस को लेकर मैं बुरी तरह बिगड़ गई थी। कुसुमी ने चिढ़ कर कहा था, ‘ज्यादे तेजी न दिखाओ। ससुराल में अपने से काम करे के पड़ी तब पता चली, सब जगह हमरे ऐसी करे वाली ना मिली ।
“नहीं चाहिए तुम्हारे जैसी करने वाली, तुम अभी चली जाओं यहाँ से। तुम्हारी कोई जरूरत नहीं है यहाँ। मैं क्रोध से पागल हो रही थी, तभी बाबू जी ने आ कर एक तमाचा मेरे गाल पर मारा, “बड़ों से जबान चलाती है। यही माँ
से सीख रही हो। खबरदार जो आज से ऐसी ऊटपटाँग बातें की….”
मैं स्तम्भित अवाक्‌ अपमानित सी थाली छोड़ कर उठ खड़ी हुई, एक दम से मुझे बचपन में हनुमान गढ़ी के प्रांगण में अम्मा के चाटें की याद आ गई जिसनें मुझे कुसुमी और बाबूजी से जोड़ दिया था। अम्मा की बात का रहस्य समझ में आ गया। आज की मार ने मुझे अम्मा से जोड़ तो दिया किन्तु मैं भीतर से टूट गई थी, न पढ़ने में मन लगता न किसी काम में। छमाही परीक्षा में पहली बार असफल रही थी-अम्मा ने उस दिन बहुत दुलराया था ध्यान से मन लगा कर पढ़ो बेटी, इस वर्ष हाई स्कूल की परीक्षा देनी है तुम्हें। स्त्री का जन्म पाया है, अच्छी तरह पढ़ लिख लोगी तो किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा तेरा ही जीवन सुखी होगा। अम्मा की दर्द से गीली बातें मेरे अन्तस्तल में चिपक गई फिर मैं थी और मेरी किताबें।
पन्द्रह दिन पूर्व बाबू जी का पत्र मेरे पास आया था। यह उनका पहला पत्र था-अम्मा के कैंसरग्रस्त होने की सूचना के साथ-मेरी तो साँस जैसे रुक गई, इधर मेरी सास और पति मेरे मायके के नाम से चिढ़ते थे और उनके चिढ़ने का पर्याप्त कारण भी था-अच्छे खाते-पीते घर की इकलौती बेटी से सम्बन्ध जोड़ने जा रहे हैं यह सोचकर मेरी ससुरालवालों ने कुछ माँगा नहीं था तो बाबू जी ने कुछ दिया भी नहीं था, यहाँ तक कि बारात की आवभगत में भी कटौती की थी। मामा लाग भिन्नाए हुए थे-‘क्या दिदिया, इस तरह कहीं बेटी का ब्याह किया जाता है, बीच में पड़ कर हम लोग बेकार बदनाम हो रहे हैं! अम्मा की कसमसाहट स्पष्ट दिख रही थी। सच पूछो तो अम्मा ने मामा लोगों के हाथ पैर पड़ कर मेरा विवाह तय करवाया था। बाबू जी ने इसमें तनिक भी रुचि नहीं दिखाई थी। विदा के समय नाक में छोटी से नथ और कान में नन्हीं-नन्हीं बालिया पहन कर मैं तैयार हुई तब अम्मा ने अपने बाक्स से अपना हार और कंगन ला कर मुझे पहना दिए। अनुपम आँखों में आँसू भरे मेरे पास खड़ा था, घर के शीतयुद्ध में भी हम दोनों जुड़वां किसी बिन्दु पर एक थे। परन्तु जब कुसुमी ने दरवाजे के पास से स्वामित्व पूर्ण ढंग से कहा था, ‘सब कुछ बेटी को ही दे दी है कि कुछ बेटा के लिए भी है।’
तो अनुपम की आँख के आँसू ने चिन्गारी बन कर उस स्नेह तन्तु को जला दिया और फिर न कोई चिट्ठी, न पत्री, न कोई बुलावा, जैसे मुझे उस अनकिए अपराध का दंड मिला हो। फिर भी मैं अपने ससुराल वालों की कृतज्ञ हूँ कि
मुझे उन लोगों ने कोई कष्ट नहीं दिया-विवाह के बाद मैं केवल एक बार अनुपम के विवाह में आई थी। वह भी बेहद मिन्नतें खुशामद कर के, कि एक ही तो भाई है मेरा बस एक बार तो हो आऊँ फिर कभी नहीं कहूँगी जाने को।

Related Articles

Leave a Comment