Home विषयविदेश बात यूके की

बात यूके की

Rajeev Mishra

181 views

यहां एक बात की बहुत चर्चा होती है…और वह है रेसिज्म. अक्सर हर फोरम पर रेसिज्म पर दो चार बातें कह ही दी जाती हैं, और उसकी हां में हां मिलाना पोलाइट समझा जाता है. हर दो महीने में एनएचएस की ओर से एकाध मेल आ ही जाता है जो हमारे बॉसेज की रेसिज्म के विरुद्ध लड़ने की प्रतिबद्धता को दुहराता है. अक्सर इक्वालिटी और डाइवर्सिटी के सेमिनार या ट्रेनिंग सेशन्स होते रहते हैं. आपको ऐसा लगेगा कि पूरे इंग्लैंड में रेसिज्म की महामारी चल रही है और ये सोशल जस्टिस वॉरियर्स नहीं होते तो लोग चाकू छुरे लेकर निकलते और मौका मिलते ही दूसरी रेस के लोगों को देखते ही उनकी गर्दन रेत देते.

लेकिन बीबीसी मत देखिए, गार्डियन मत पढ़िए कर इंटेलेक्चुअल्स के साथ एक कमरे में मत बैठिए…बाहर निकलिए और दुनिया को देखें…यह रेसिज्म गायब हो जाता है. आपको रोजमर्रा की जिंदगी में कहीं भी रेसिज्म नजर नहीं आएगा, लेकिन इसे देश की सबसे बड़ी समस्या बना रखा है.

वहीं एनएचएस में किसी भी एक वार्ड का नजारा देखिए…35 वर्ष का युवा जिसे सिरोसिस हो रखा है, 24 वर्ष का लड़का जिसका ड्रग के ओवरडोज से कार्डियक अरेस्ट हो गया था और बचने के बाद ब्रेन डैमेज हो रखा है, 17 साल की लड़की जो दो महीने में पांचवीं बार सुसाइड अटेम्प्ट करके आई है, 14 साल की लड़की जो प्रेगनेंट है, तीन साल का बच्चा जिसकी तीन पसलियां टूटी हैं क्योंकि उसकी मां के नए बॉयफ्रेंड ने नशे में उसे एक लात जमा दी, 19 साल की लड़की जिसका वजन 29 किलो है क्योंकि उसको एनोरेक्सिया है, 16 साल का सैमुएल जिसने तय किया कि अब उसका नाम समांथा है और उसका जेंडर नॉन-बाइनरी है….83 साल की डॉरीन जो बाथरूम में फिसल गई और दो दिन फर्श पर पड़ी रही क्योंकि उसका कोई नहीं है, 78 साल का फ्रेडरिक जो डिप्रेस्ड है क्योंकि उससे बात करने वाला कोई नहीं, 86 साल की मैगी जो पिछले तीन सप्ताह से एक केयर होम बेड का इंतजार कर रही है…

इन सबमें में क्या कॉमन है? उनमें से किसी की फैमिली नहीं है. सबका तारणहार सिर्फ सरकार है. यह एनएचएस के कुल वर्क लोड का 60-70% तो जरूर होगा. लेकिन रेसिज्म पर छाती पीटते इस समाज को कहीं भी यह नहीं दिखाई देता कि टूटती हुई ब्रिटिश फैमिली एक समस्या है. आज तक किसी भी फोरम पर किसी को भी मैंने इस विषय पर चिन्ता व्यक्त करते नहीं सुना. स्कूल, यूनिवर्सिटी, एकेडमिया, मैगजीन, टीवी, सिनेमा, साहित्य, राजनीति…कहीं भी नहीं…

क्या यह एक्सीडेंटल हो सकता है कि आज तक किसी को यह समस्या दिखाई नहीं दी? या यह कि वे जानबूझ कर एक ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहां परिवार नाम की संस्था हो ही नहीं. लोग सरकार पर निर्भर हों, और उनकी लाइफ को कंट्रोल किया जा सके.

आज हमारे देश में मीडिया, सिनेमा और साहित्य, सभी डिवोर्स को ग्लैमराइज करने में लगे हैं. परिवार के टूटने को स्पॉन्सर किया जा रहा है. सिनेमा और टीवी सीरीज आज टूटते परिवार का विज्ञापन बने हुए हैं. बड़े बड़े फिल्म स्टार अपने डिवोर्स को एक फैशनेबल हैप्पी इवेंट की तरह प्रचारित कर रहे हैं कि देखो, डिवोर्स लेकर हम कितने खुश हैं और अब कितने अच्छे फ्रेंड हो गए हैं. डेढ़ सौ बिलियन पाउंड का एनएचएस बजट और उसके ऊपर डेढ़ सौ बिलियन का सोशल सर्विसेज बजट खर्च करके भी यह रायता समेटा नहीं जा पा रहा है जो वेलफेयर स्टेट ने पिछले 75 वर्षों में फैलाया है. जब कि पॉपुलेशन भारत का बीसवां भाग है. जब यह गंदगी हमारे यहां पहुंचेगी तो क्या होगा, सोचा है? और सरकार इसमें जितना हाथ लगाएगी, स्थिति उतनी खराब होगी… और इसका बिल भरेगा कौन?

लीडरशिप वह होती है जो समाज को दिशा दे. सिर्फ चुनाव जीतना लीडरशिप नहीं होती है. कभी कभी मेरे सपने में आता है कि प्रधानमंत्री ने पूरे देश को इस खतरे से चेताया है और लोगों से अपील की है कि इस जहरीले प्रचार से बचें…ऐसे कॉन्टेंट का बहिष्कार करें जिसमें भारतीय परिवार को तोड़ने वाला मैटेरियल हो.
पर फिर नींद खुल जाती है.

Related Articles

Leave a Comment