Home नया रामायण – कहानी दासी मंथरा की भाग 1

रामायण – कहानी दासी मंथरा की भाग 1

by Sharad Kumar
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अयोध्या में महारानी केकैयी के साथ उसकी दासी मंथरा भी उसके साथ ही रहती थी। मंथरा और केकैयी का संबंध इतना अट्टू इतना प्रबल था, कि वे दोनों एक दूसरे के बहुत ही करीब और हर एक बात एक दूसरे को

बताती थी और एक दूसरे की बात को मानती भी थी। इसलिए मंथरा के कहने पर केकैयी ने महाराजा दशरथ से उनके दिए गए वचनों में उलझा कर भगवान श्रीराम के लिए 14 वर्ष का वनवास और

भरत के लिए राजपाट माँगा था। तो आइए जानते हैं, कि आखिर में मंथरा कौन थी? जिसकी बातों में आकर महारानी केकैयी ने इतना बड़ा कदम उठा लिया कि उन्हें स्वयं अपने पुत्र और महाराज दशरथ के

साथ-साथ सारे अयोध्या नगरी और देशवासियों के द्वारा अपमानित होना पड़ा। वास्तव में मंथरा और केकैयी दोनों ही केकय देश की राजकुमारी थी, जहाँ के सम्राट थे अश्वपति (Ashvapati) उनकी पुत्री का नाम था

केकैयी, जबकि सम्राट अश्वपति के एक भाई थे, जिनका नाम था बृहद्रथ (Brihdrath) और उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम था “रेखा” रेखा बड़े-बड़े नैनो वाली स्त्री थी जो बाद में मंथरा के नाम से विख्यात हुई।

राजकुमारी रेखा को एक विचित्र प्रकार की बीमारी थी कि उसे अचानक इतना पसीना आता था कि वह पसीने से भीग जाती थी और प्यास लगने लगती थी, जिसके चलते एक दिन उसने इलायची, मिश्री और चंदन

से बना हुआ शरबत पी लिया इसके फलस्वरूप उसकी तबीयत खराब होने लगी और वह बीमार हो गई तत्पश्चात देश के कई वैद्यों को बुलाया गया और उस राजकन्या का उपचार करवाया गया

जिससे राजकन्या रेखा की जान तो बच गई लेकिन उसकी रीढ़ की हड्डी हमेशा के लिए टेड़ी होकर रह गई और वह कुबड़ी औरत बन गई इसलिए उसके शरीर के कारण ही वह अविवाहित (Unmarrid) रही

और जब केकैयी की शादी महाराजा दशरथ के साथ हुई तो वह केकैयी की अच्छी सहेली और बहन होने के नाते अयोध्या में आकर रहने लगी तथा केकैयी की अंगरिक्षका बन गई।

पौराणिक धर्म ग्रंथों के आधार पर बताया जाता है कि जो मंथरा रामायणकाल में राम को बनवास देने के लिए उत्तरदाई थी वास्तव में मंथरा कौन थी, इस मंथरा की क्या कहानी है यह जानना आपके लिए जरूरी है

कि मंथरा कौन थी दासी थी या राजकुमारी या फिर कोई और लोमस ऋषि के द्वारा बताया गया कि मंथरा भक्त प्रहलाद के पुत्र विरोचन की पुत्री थी। जब एक बार विरोभक्तचन और देवताओं के बीच में युद्ध हुआ था तो विरोचन ने देवताओं पर विजय प्राप्त की थी।

किंतु कुछ ही समय पश्चात देवताओं ने एक षड्यंत्र रचा तथा ब्राह्मण स्वरूप धरकर विरोचन से भिक्षा में उसकी आयु ही मांग ली इस प्रकार विरोचन की मृत्यु के पश्चात सभी दैत्य यहाँ-वहाँ भाग रहे थे

और उनका कोई सरदार भी नहीं था। ऐसे समय में मंथरा ने दैत्यों का नेतृत्व किया और देवताओं पर फिर से विजय प्राप्त की तथा देवता भी दैत्यों के डर से इधर-उधर भागने लगे तथा भगवान विष्णु के पास पहुंचे

तब भगवान विष्णु ने देवराज इंद्र (Devraj Indra) को मंथरा पर आक्रमण की आज्ञा दी तो देवराज इंद्र के बज्र के प्रहार से मंथरा पृथ्वी पर जाकर गिरी और उसकी मृत्यु हो गयी।

आगे जारी है….

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