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लखनऊ बनाम हैदराबाद

Nitin Tripathi

by Nitin Tripathi
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हैदराबाद और लखनऊ ट्विन सिटी हैं. लगभग एक जैसी डेमोग्राफ़ी है, वैसी ही मुस्लिम जनसंख्या है. उधर निज़ाम थे तो इधर नवाब. उधर थोड़ा विकास लखनऊ से बेहतर हुआ क्योंकि नब्बे के दसक में चंद्रा बाबू नायडू ने वाक़ई हैदराबाद के विकास के लिए कार्य किया. शेष दोनो ही शहर लगभग एक जैसे हैं.
हैदराबाद के रियल इस्टेट विकास में रेड्डी परिवार और इन जनरल आंध्रा यूनाइटेड के सारे नेताओं, अधिकारियों के काले पैसे का मुख्य श्रेय रहा – सेम एज लखनऊ. उधर निज़ाम के महल हैं तो इधर नवाबों के मक़बरे. इधर के नवाब भगोड़े थे तो उधर के निज़ामों का भी इतिहास पीठ दिखाने में कम न रहा. इधर ओल्ड लखनऊ / न्यू लखनऊ है तो उधर ओल्ड हैदराबाद और न्यू हैदराबाद.
लेकिन लेकिन लेकिन अब बहुत बड़ा कल्चरल डिफ़्रेन्स आ चुका है. लखनऊ की राजनीति अखिलेश के शॉर्ट टर्म को छोड़ दिया जाए तो यहाँ की राजनीति मुस्लिम वादी न रही. मायावती की राजनीति दलित फ़ोकस्ड थी जिसमें मुस्लिम उतने ही मार्जिनल थे जितना गुलाब जामुन में जामुन. और भाजपा की राजनीति तो हिंदू वादी है ही. जबकि हैदराबाद की राजनीति सदैव एक ओर ओवेसी तो दूसरी पर कांग्रेस / TSR की वजह से प्योर मुस्लिम डॉमिनंट रही.
वर्तमान लखनऊ से निकल हैदराबाद में कदम रखते ही आपको लगेगा कि आप किसी मुस्लिम शहर में आ गए हैं. फ़ूड हो या कल्चर सब अब पूरी तरह से मुस्लिम डॉमिनंट है. जहां एक ओर लखनऊ शहर में साल भर बड़े मंगल से लेकर गणेश चतुर्दशी, नवरात्रि से होली पूरे साल हिंदू त्योहारों की धूम रहती है, तो हैदराबाद में उगाड़ी त्योहार छोड़ दिया जाए तो हिंदू त्योहारों की वह धूम नहीं रहती जो ईद बक़रीद की होती है. सारे नेता VIP और इनकी देखा देखी आम जनता भी अकस्टम्ड है शहर कोमुस्लिम डॉमिनंट मानते हुवे.
लखनऊ घूमने के पश्चात अब आप हैदराबाद जाइए तो आपको समझ आ जाएगा हैदराबाद / तेलंगाना में भाजपा सरकार आना क्यों ज़रूरी है.

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