Home लेखक और लेखदेवेन्द्र सिकरवार सपनों में बसी एक नदी

सपनों में बसी एक नदी

देवेन्द्र सिकरवार

227 views
जानते हैं यह कौन सी नदी है?
ये मेरे सपनों में बसी एक ऐसी नदी है, जिसके स्मरण मात्र से मेरी रोमावलियाँ खड़ी हो जाती हैं।
इस नदी का कोई महात्म्य पुराणों में वर्णित नहीं है, फिर भी मैं इसकी पूजा करता हूँ।
आज तक मेरी एक भी इच्छा, एक भी कामना कभी पूर्ण नहीं हुई लेकिन अगर ये इच्छा पूर्ण हो जाये तो मुझे मोक्ष प्राप्ति का अनुभव होगा।
मैं घोर अनीश्वरवादी,
मृत्यु से पूर्व, इस नदी के किनारे एक बार, बस एक बार, यज्ञ करना चाहता हूँ।
मैं इस नदी के तट पर वृत्रघ्न इंद्र, असुर वरुण, जातवेदा अग्नि का आह्वान करना चाहता हूँ।
इस नदी के तट पर यज्ञकुंड की ज्वालाओं में अपने महान ऋषियों से साक्षात करना चाहता हूँ।
मैं उस यज्ञकुंड से उठती पुण्यगन्ध से इस नदी की स्मृति का आह्वान करना चाहता हूँ।
मैं इस नदी के जल को अंजुरि में लेकर अपने देव और आर्य पूर्वजों का तर्पण करना चाहता हूँ।
एक सहस्र वर्ष हो चुके तुझसे बिछुड़े हुये।
क्या तुझे मेरे राम के चक्रवर्ती पूर्वज रघु की स्मृति नहीं जिनके धनुष की टंकार से विश्व कांप उठता था?
क्या महान धनुर्धर, पाण्डुपुत्र अर्जुन को भी भूल चुकी जिन्होंने यहाँ तुझे प्रणाम किया था?
क्या भूल गई अपने एक और पराक्रमी पुत्र चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को जो तेरी पुकार पर यहाँ दौड़े चले आये थे?
क्या तुझे अपने उन हिंदू तुर्क पुत्रों की याद नहीं जिन्होंने अरबों से तेरी रक्षा के लिए अपना खून पानी की तरह बहाया था?
क्या तुझे उस गरुड़ध्वज और विष्णुस्तंभ की याद नहीं आती जिसकी स्वर्णगैरिक परछाईं तेरी उत्ताल तरंगों में लहराती थी और आज महरौली में खड़ा, उदास सा तुझे याद करता है?
तुझे याद हो न हो, पर तेरी लहरों के स्नेहिल आँचल की स्मृति तेरे इस बिछड़े पुत्र की स्मृति में आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी सहस्र वर्ष पूर्व थी।
माता वंक्षु, क्या तुझे अपने इस बिछुड़े पुत्र की स्मृति का शोक नहीं होता?

Related Articles

Leave a Comment