सुनीता का पति

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सुनीता का पति उसे घूरता, तरेरता चला गया। मुनक्का राय तब घर पर ही थे। सुनीता के पति के चले जाने के बाद वह मुनमुन से बोले, ‘बेटी क्या अपनी विपत्ति कम थी जो दूसरों की विपत्ति भी अपने सिर उठा रही हो?’

‘क्या बाबू जी आप भी!’

‘नहीं बेटी तुम समझ नहीं पा रही हो कि तुम क्या कर रही हो?’ मुनक्का राय बोले, ‘तुम बांसगांव को बदनामी की किस हद तक ले गई हो तुम्हें अभी इस की ख़बर नहीं है।’

‘क्या कह रहे हैं बाबू जी आप?’ मुनमुन चकित होती हुई बोली, ‘क्या बांसगांव के बाबू साहब लोग मर गए हैं क्या जो मैं बांसगांव को बदनाम करने लग गई?’

‘अरे नहीं बेटी बाबू साहब लोगों की दबंगई से वह नुक़सान नहीं हुआ जो तुम्हारी वजह से हो रहा है।’

‘क्या?’ मुनमुन अवाक रह गई।

‘हां, लोग अकसर हमें कचहरी में बताते रहते हैं कि तुम्हारी वजह से बांसगांव की लड़कियों की शादी कहीं नहीं तय हो पा रही। लोग बांसगांव का नाम सुनते ही बिदक जाते हैं। कहते हैं लोग अरे वहां की लड़कियां तो मुनमुन जैसी गुंडी होती हैं। अपने मर्द को पीटती हैं। उन से कौन शादी करेगा? लोग कहते हैं कि बांसगांव की लड़कियों के नाम से चनाजोर गरम बिकता है। ऐसी लड़कियों से शादी नहीं हो सकती।’

‘क्या कह रहे हैं बाबू जी आप?’

‘बेटी जो सुन रहा हूं वही बता रहा हूं।’ मुनक्का राय बोले, ‘बंद कर दो अब यह सब। तुम कंपटीशन की तैयारी करने वाली थी, वही करो। कुछ नहीं धरा-वरा इन बेवक़ूफ़ी की चीज़ों में। फिर तुम्हारे सामने तुम्हारी लंबी ज़िंदगी पड़ी है।’

‘कंपटीशन की तैयारी तो बाबू जी मैं कर ही रही हूं।’ मुनमुन बोली, ‘पर जो मैं कर रही हूं वह बेवक़ूफ़ी है, यह आप कह रहे हैं बाबू जी!’

‘हां, मैं कह रहा हूं।’ मुनक्का राय बोले, ‘यह बग़ावत, यह आदर्श सब किताबी और फ़िल्मी बातें हैं, वहीं अच्छी लगती हैं। असल जिंदगी में नहीं।’

‘क्या बाबू जी!’

‘ठीक ही तो कह रहा हूं।’ मुनक्का राय उखड़ कर बोले, ‘तुम्हारी बग़ावत के चलते तुम्हारे सारे भाई घर से बिदक गए। इस बुढ़ापे में बिना बेटों का कर दिया हमें तुम ने और तुम्हारी बग़ावत ने। हक़ीक़त तो यह है।’ वह ज़रा रुके और बोले, ‘हक़ीक़त तो यह है कि तुम्हारे चलते इस बुढ़ापे में भी संघर्ष करना पड़ रहा है। साबुन, तेल, दवाई तक के लिए तड़पना पड़ रहा है। लायक़ बेटों का बाप हो कर भी अभावों और असुविधा में जीना पड़ रहा है। तो सिर्फ़ तुम्हारी बग़ावत के चलते। तुम्हारी बग़ावत को समर्थन देने के चक्कर में।’

‘तो बाबू जी आप क्या चाहते हैं। कसाइयों के आगे घुटने टेक दूं? बढ़ा दूं अपनी गरदन उन के आगे कि लो मेरी बलि चढ़ा लो?’ मुनमुन बोली, ‘बोलिए बाबू जी, आप अगर यही चाहते हैं तो?’

मुनक्का राय कुछ बोले नहीं। चारपाई पर चद्दर ओढ़ कर लेट गए। मुनमुन बाबू जी के पैताने जा कर खड़ी हो गई। बोली, ‘ज़ाहिर है आप ऐसा नहीं चाहते। और मैं ऐसा करूंगी भी नहीं। आप चाहेंगे तो भी नहीं। मैं भले मर जाऊं इस तरह। पर हथियार डाल कर नहीं, लड़ते हुए मरना चाहूंगी। सारे कसाइयों को मार कर मरूंगी।’ अचानक वह रुकी फिर बोली, ‘और मरूंगी भी क्यों? मरें मेरे दुश्मन। मैं तो शान से जिऊंगी। जिस को जो कहना सुनना हो कहे सुने।’

फिर तैयार हो कर बाबू जी को सोता छोड़ वह स्कूल जाने के लिए बस स्टैंड पर आ गई। उधर सुनीता का पति घर जा कर सुनीता से तो कुछ नहीं बोला। पर शहर जा कर बेसिक शिक्षा अधिकारी के यहां मुनमुन की लिखित शिकायत कर आया। शिकायत में लिखा कि मुनमुन शिक्षामित्र की नौकरी करने के बजाय नेतागिरी कर रही है। और इस नेतागिरी की आड़ में तमाम औरतों को भड़का-भड़का कर उन के परिवार में विद्रोह करवा कर परिवार तोड़ रही है। नज़ीर के तौर पर उस ने अपना ही हवाला दिया था और लिखा था कि मुनमुन राय के हस्तक्षेप के चलते उस की बीवी भी नेता बनने की कोशिश कर रही है और मेरा घर टूट रहा है। उस ने यह भी लिखा था कि जिस औरत के नाम से चनाजोर गरम बिकेगा वह अपने स्कूल में भी क्या पढ़ाएगी? नेतागिरी ही करेगी। इस से बच्चों का भविष्य ख़राब होगा।

उस ने अपने लंबे से शिकायती पत्र के अंत में यह भी ख़ुलासा किया था कि इसी नेतागिरी के चक्कर में मुनमुन ने अपना परिवार भी तोड़ दिया है और कि अपने पति का घर छोड़ कर अपने बाप के घर रह रही है। यहां तक कि अपने गांव में रहने के बजाय बांसगांव में रहती है। स्कूल जाने की बजाय क्षेत्र की औरतों को भड़का कर नेतागिरी कर रही है। सो इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच करवा कर मुनमुन राय को शिक्षामित्र की नौकरी से तत्काल बर्खास्त करने की अपील भी की थी सुनीता के पति ने। उस ने शिकायती पत्र में यह बात भी जोड़ी थी कि मुनमुन राय अपने भाइयों के ऊंचे ओहदों पर बैठे होने की भी सब को धौंस देती रहती है कि मेरे भाई जज और कलक्टर हैं। वग़ैरह-वग़ैरह। और यह भी कि वह एक नंबर की चरित्रहीन भी है। बाप वकील है। इस लिए उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाता। लेकिन अगर शिक्षा विभाग ने उस की हरकतों पर अंकुश नहीं लगाया तो बांसगांव इलाक़े के समाज में किसी दिन ऐसा भूकंप आएगा कि संभाले नहीं संभलेगा।

सुनीता के पति के इस शिकायती पत्र ने रंग दिखाया और बेसिक शिक्षा अधिकारी ने ख़ुद ही इस प्रकरण की जांच करने की सोची। चूंकि मुनमुन राय शिक्षामित्र थी, नियमित शिक्षिका नहीं थी सो कोई नोटिस देने के बजाय उस ने पी.ए. से फ़ोन करवा कर मुनमुन राय को मिलने के लिए बुलवाया। मुनमुन गई तो बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उसे एक घंटा बाहर ही बैठाए रखा। फिर बुलवाया। तब तक मुनमुन इंतज़ार में बैठे-बैठे पक चुकी थी। दूसरे घर से खाना खा कर नहीं गई थी। सो भूख भी ज़ोर मार रही थी। वह अंदर जा कर खड़ी हो गई। और बोली, ‘सर!’

‘तो तुम्हीं मुनमुन राय हो?’

‘हूं तो!’

‘गांव में रहने के बजाय बांसगांव में रहती हो?’

‘जी सर, गांव वाला घर गिर गया है। बांसगांव में माता-पिता जी के साथ रहती हूं।’

‘शादी हो गई है?

‘जी सर!’ वह ज़रा रुकी और धीरे से बोली, ‘पर टूट चुकी है।’

‘क्यों?’

‘सर! यह हमारा व्यक्तिगत मामला है। आप इस बारे में कुछ न ही पूछें तो उचित होगा।’

‘अच्छा?’ बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उसे तरेरते हुए पूछा, ‘तुम्हारा व्यक्तिगत व्यक्तिगत है, और किसी दूसरे का व्यक्तिगत व्यक्तिगत नहीं हो सकता है?’

‘सर मैं समझी नहीं।’ मुनमुन बोली, ‘ज़रा इस बात को स्पष्ट कर के बता दें!’

‘तुम्हारे खि़लाफ शिकायत आई है कि तुम स्कूल में पढ़ाने के बजाय नेतागिरी करती हो। क्षेत्र की औरतों को भड़का कर उन का परिवार तोड़ती हो! अपनी नेतागिरी चमकाती हो!’

‘जिस भी किसी ने यह शिकायत की है सर, ग़लत की है। स्कूल मैं नियमित जाती हूं। हस्ताक्षर पंजिका मंगवा कर आप देख सकते हैं। विद्यार्थियों से, गांव वालों से और स्टाफ़ से दरिया़त कर सकते हैं। मैं नियमित और समय से स्कूल जाती हूं। और कि कहीं कोई नेतागिरी नहीं करती हूं। किसी का परिवार नहीं तोड़ा है। अगर कोई ऐसा कहता है तो उसे पेश किया जाए।’ मुनमुन राय पूरी सख़्ती से बोली।

‘सुना है तुम्हारे नाम से चनाजोर गरम बिकता है।’

‘मैं यह व्यवसाय नहीं करती सर!’

‘जो बात पूछी जाए उस का सीधा जवाब दो!’

‘किस बात का सीधा जवाब दूं?’

‘यही कि तुम्हारे नाम से चनाजोर गरम बिकता है?’

‘मैं ने आप को पहले ही बताया कि यह या ऐसा कोई व्यवसाय मैं नहीं करती!’ मुनमुन ज़रा रुकी और बेसिक शिक्षा अधिकारी को तरेर कर देखती हुई बोली, ‘अगर आप इजाज़त दें तो मैं बैठ जाऊं? बैठ कर आप के सवालों का जवाब दूं?

‘हां, हां बैठ जाओ!’

‘थैंक यू सर!’ कह कर मुनमुन बैठ गई। उस के बैठते ही बेसिक शिक्षा अधिकारी के फ़ोन पर किसी का फ़ोन आ गया। वह फ़ोन पर बतियाने लगा। इधर मुनमुन पशोपेश में थी कि आखि़र किस ने उस की शिकायत की होगी? कहीं भइया लोगों में से ही तो किसी ने शिकायत नहीं कर दी उस की? यही सोच कर वह शुरू से ही मारे संकोच के भइया लोगों का नाम भी नहीं ले रही थी। फ़ोन पर बेसिक शिक्षा अधिकारी की बातचीत संक्षिप्त ही थी। बात ख़त्म करते ही उस ने मुनमुन की ओर बिलकुल पुलिसिया अंदाज़ में देखा जैसे कि मुनमुन कितनी बड़ी चोर हो और कि उस की पकड़ में आ गई हो। देखते हुए ही वह बोला, ‘तो?’

‘जी?’ मुनमुन बोली, ‘क्या?’

‘तो तुम्हें इस शिकायत का क्या दंड दिया जाए?’

‘किस शिकायत का?’

‘जो मेरे पास आई है!’

‘मुझे मालूम तो पड़े कि मेरे खि़लाफ शिकायत क्या है? शिकायतकर्ता कौन है?’ वह बोली, ‘फिर जो आरोप सिद्ध हो जाते हैं तो जो भी विधि सम्मत कार्रवाई हो आप करने के लिए स्वतंत्र हैं।’

‘क़ानून मत छांटो!’ बेसिक शिक्षा अधिकारी गुरेरते हुए बोला, ‘जानता हूं कि वकील की बेटी हो।’

‘वकील की बेटी ही नहीं, न्यायाधीश की बहन भी हूं। मेरे एक भाई प्रशासन में भी हैं।’ मुनमुन अब पूरे फ़ार्म पर आ गई, ‘आप अंधेरे में तीर चला कर कार्रवाई करना चाहते हैं तो बेशक करिए।’ वह ज़रा रुकी और बेसिक शिक्षा अधिकारी को उसी की तरह तरेरती हुई अपना हाथ दिखाती हुई बोली, ‘यह देखिए कि मैं ने भी कोई चूड़ियां नहीं पहन रखी हैं।’

‘अरे तुम तो सिर पर चढ़ती जा रही हो?’

‘सिर पर नहीं चढ़ रही, साफ़ बात कर रही हूं।’ वह बोली, ‘मेरे खि़लाफ जो भी शिकायत हो मुझे लिखित रूप में दे दीजिए। मैं लिखित जवाब दे दूंगी। फिर आप को जो कार्रवाई करनी हो कर लीजिएगा।’

‘तो अपने भाइयों का धौंस दे रही हो?’

‘जी नहीं सर!’ वह बोली, ‘मैं ने अपने भाइयों का ज़िक्र किया। वह भी तब जब आप ने मुझे वकील की बेटी कहा। तो मैं ने प्रतिवाद में यह कहा।’

‘अच्छा-अच्छा!’ बेसिक शिक्षा अधिकारी नरम पड़ता हुआ बोला, ‘जब तुम्हारे भाई लोग उच्च पदों पर आसीन हैं तो तुम शिक्षामित्र की नौकरी क्यों कर रही हो?’

‘इस लिए कि मैं स्वाभिमानी हूं।’ वह ज़रा रुकी और बोली, ‘आप तो शिक्षामित्र की नौकरी को ऐसे उद्धृत कर रहे हैं जैसे शिक्षामित्र न हो चोर हो।’

‘नहीं-नहीं ऐसी बात तो नहीं कही मैं ने।’ वह अब बचाव में आ गया।

‘सर, आप को बताऊं कि मेरे एक भइया बैंक में मैनेजर हैं और एक एन.आर.आई भी हैं तो भी मैं शिक्षामित्र की नौकरी कर रही हूं। और यह कोई आखि़री नौकरी नहीं है।’ वह ज़रा रुकी और बोली, ‘मैं कंपटीशंसन की तैयारी कर रही हूं। जल्दी ही किसी अच्छी जगह भी आप को दिख सकती हूं।’

‘यह तो बहुत अच्छी बात है।’ अधिकारी बोला, ‘तो फिर बेवजह के कामों में क्यों लगी पड़ी हो?’ अधिकारी का सुर अब पूरी तरह बदल गया था। सुनीता के पति का शिकायती पत्र दिखाता हुआ वह बोला, ‘कि ऐसी शिकायतों की नौबत आए!’

‘यह शिकायती पत्र मैं भी देख सकती हूं सर!’

‘हां-हां क्यों नहीं?’ कह कर उस ने वह शिकायती पत्र मुनमुन की तरफ़ बढ़ा दिया।

मुनमुन ने बड़े ध्यान से वह पत्र देखा फिर पढ़ने लगी। पढ़ कर बोली, ‘आप भी सर, इस पियक्कड़ की बातों में आ गए?’

‘नहीं आरोप तो है!’

‘ख़ाक आरोप है।’ वह बोली, ‘एक आदमी आपनी बीवी की कमाई से शराब पी कर उस की पिटाई करता है। बीवी उस पर लगाम लगाती है तो वह ऊल जलूल शिकायत करता है। और हैरत यह कि आप जैसे अफ़सर उस की शिकायत सुन भी लेते हैं!’

‘अब कोई शिकायत आएगी तो सुननी तो पड़ेगी।’

‘तो सर सुनिए!’ वह बोली, ‘एक तो यह शिकायत मेरे शिक्षण कार्य के बाबत नहीं है। शिक्षाणेतर कार्यों के लिए है। और आप को बताऊं कि मैं शिक्षामित्र हूं। और किसी शिक्षक का काम सिर्फ़ उस के स्कूल तक ही सीमित नहीं होता। समाज के प्रति भी उस का कुछ दायित्व होता है। और मैं इस दायित्व को भी निभा रही हूं। अपनी सताई हुई बहनों को स्वाभिमान और सुरक्षा का स्वर दे रही हूं कि वह अन्याय बर्दाश्त करने के बजाय उस का प्रतिकार करें, डट कर मुक़ाबला करें और पूरी ताक़त से उस का विरोध करें। और इस के लिए एक नहीं हज़ार शिकायतें आएं मैं रुकने वाली नहीं हूं।’

बेसिक शिक्षा अधिकारी हकबक हो कर मुनमुन को देखने लगा।

‘और सर, आप जो यह चाहते हैं कि मैं स्कूल में बच्चों को मिड डे मील के पकाने और बंटवाने में ज़िंदगी ज़ाया करूं तो क्षमा कीजिए यह नहीं करने वाली।’ वह बोलती रही, ‘अब तो अख़बारों में भी स्कूलों में बंटने वाले मिड डे मील के बारे में ही ख़बरें छपती हैं। कि मिड डे मील घटिया था। कि मिड डे मील किसी दलित महिला के बनाने से सवर्ण बच्चों ने नहीं खाया वग़ैरह-वग़ैरह। यह ख़बर नहीं छपती कि अब इन स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं। कि इन स्कूलों में अब पढ़ाई नहीं होती। कि इन स्कूलों में छात्र ही नहीं हैं। कि इन स्कूलों में पंद्रह-बीस बच्चों को मिड डे मील खिला कर सौ-दो सौ बच्चों को मिड डे मील खिलाना काग़ज़ों में दर्ज हो जाता है। कि शिक्षा विभाग और प्रशासन के अधिकारी स्कलों में यह जांच करने आते हैं कि मिड डे मील का वितरण ठीक से हो रहा है कि नहीं। और इस में उन का हिस्सा उन को ठीक से पहुंच रहा है कि नहीं? अधिकारी भूल कर भी यह नहीं जांचने आते कि इन स्कूलों में पठन-पाठन का स्तर क्या है और कि इस की बेहतरी में उन का क्या योगदान हो सकता है?’

‘अरे तुम तो पूरा भाषण ही देने लग गई। वह भी मेरे ही खि़लाफ़। मेरे ही चैंबर में।’ बेसिक शिक्षा अधिकारी खिन्न हो कर बोला।

‘भाषण नहीं दे रही सर, आप को वास्तविकता बता रही हूं। कि प्राथमिक स्कूलों में अब दो ही काम रह गया है कि मिड डे मील पकवाओ और स्कूल की बिल्डिंग बनवाओ! मतलब येन केन प्रकारेण धन कमाओ! बताइए भला शिक्षक का काम है स्कूल बिल्डिंग बनवाना या इंजीनियर का? यह तो शासन प्रशासन को सोचना समझना चाहिए?’ वह बोली, ‘ट्रांसफ़र पोस्टिंग का धंधा तो आप भी जानते होंगे? सर आप ही बताइए हम अपने नौनिहालों को कौन सी शिक्षा दे रहे हैं?’

‘तुम तो बोले ही जा रही हो!’

‘हां सर, बोल तो रही हूं।’ वह बोली, ‘आप ने वह पुराना गाना तो सुना ही होगा कि इंसाफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के, यह देश है तुम्हारा नेता तुम्हीं हो कल के!’

‘ओह अब तुम जाओ!’

‘जा रही हूं सर, पर सोचिएगा कभी और पूछिएगा अपने आप से अकेले में कभी कि इस गाने का हम ने आप ने, हमारे समाज और सिस्टम ने क्या कर डाला? सोचिएगा ज़रूर सर!’ कह कर मुनमुन राय बेसिक शिक्षा अधिकारी के कमरे से बाहर निकल गई।

‘आप ने भी सर, किस को बुला लिया था? पूरा का पूरा बर्रइया का छत्ता है यह। चनाजोर गरम इस के नाम से ऐसे ही थोड़े बिकता है।’ बड़े बाबू कुछ फ़ाइलें लिए बेसिक शिक्षा अधिकारी के कमरे में घुसते हुए बोले।

‘हां, पर बात कुछ बहुत ग़लत कह भी नहीं रही थी।’ बेसिक शिक्षा अधिकारी बोले, ‘बड़े बाबू ध्यान रखिएगा यह लड़की कभी बहुत आगे निकल जाएगी!’

‘सो तो है साहब!’

‘हां, यह शिक्षामित्र ज़्यादा दिनों तक नहीं रहने वाली।’ अधिकारी बोले, ‘इतनी निडर लड़की मैं ने पहले नहीं देखी। सोचिए बड़े बाबू कि उस को जांच के लिए बुलाया था, उस की नौकरी जा सकती थी पर वह तो हमीं को लेक्चर पिला गई।’

‘अरे तो अनुशासनहीनता के आरोप में ससुरी की छुट्टी कर दीजिए। भूल जाएगी सारी नेतागिरी!’

‘अरे नहीं, भाई सब इस के उच्च पदों पर हैं। कहीं लेने के देने न पड़ जाएं। चनाजोर गरम वैसे ही बिकवा रही है, हम सब को भी बिकवा देगी।’

‘हां, साहब सब इस को बांसगांव की मरदानी-रानी भी कहते हैं।’

‘तो?’ बेसिक शिक्षा अधिकारी बोला, ‘जाने दो। जो वह कर रही है उसे करने दो।’

‘जी साहब!’

मुनमुन भी बेसिक शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से निकल कर बस स्टैंड आई। बस पकड़ कर बांसगांव आ गई। घर पहुंची तो पास के गांव के एक बाप बेटी आए हुए थे। बेटी को उस के पति ने शादी के ह़फ्ते भर में ही उस से किनारा कर लिया और मार पीट, हाय तौबा कर के छह महीने में ही घर से बाहर कर दिया था। उस का क़सूर सिर्फ़ इतना ही था कि उस के बाएं हाथ की दो अंगुलियां कटी हुईं थीं। बचपन में ही चलती चारा मशीन में खेल-खेल में हाथ डालने से अंगुलियां कट गई थीं।

‘तो शादी के पहले ही यह बात लड़के वालों को बता देनी थी।’ मुनमुन लड़की का हाथ अपने हाथ में ले कर उस की अंगुलियां देखती हुई बोली, ‘यह कोई छुपाने वाली बात तो थी नहीं।’

‘छुपाए भी नहीं थे।’ लड़की का पिता बोला, ‘शादी के पहले ही बता दिया था।’

‘तब क्यों छोड़ दिया?’

‘अब यही तो समझ में नहीं आ रहा।’ लड़की का पिता बोला, ‘अब वो लोग कह रहे हैं कि शादी के पहले अंधेरे में रखा।’

‘तो अब क्या इरादा है?’

‘यही तो बहिनी आप से पूछने आए हैं कि क्या करें?’

‘जो लोग शादी में मध्यस्थता किए थे, उन को बीच में डालिए। कुछ रिश्तेदारों को बीच में डालिए। समझाएं लोग उन सब को। शायद मान जाएं।’

‘यह सब कर के हार गए हैं।’ लड़की का पिता बोला, ‘हम यह भी कहे कि हम लोग ब्राह्मण हैं, लड़की की दूसरी शादी भी नहीं कर सकते। लड़के और लड़के के बाप के पैरों पर अपना सिर रख कर प्रार्थना की। पर सब बेकार गया।’ कह कर वह बिलखने लगा।

‘तो अब?’

‘हमारी तो कुछ अक़ल काम नहीं कर रही बहिनी! तो अब आप की शरण में आ गए हैं।’

‘फिर तो थाना पुलिस, कचहरी वकील करना पड़ेगा। बोलिए तैयार हैं?’

‘ई सब के बिना काम नहीं चलेगा?’ वह जैसे घिघियाया।

‘देखिए जिस की आंख का पानी मर जाए, समाज की शर्म को जो पी जाए, घर परिवार और रिश्तों की मर्यादा जो भूल जाए, ऐसी फूल सी लड़की के साथ जो कांटों सा अमानवीय व्यवहार करे उस के साथ क़ानून का डंडा चलाने में गुरेज़ करना, अपने साथ छल करना है, आत्मघात करना है।’

‘फिर भी वह लोग इसे न रखें तब?’

‘वहां रखने की इसे अब कोई ज़रूरत भी नहीं है।’ मुनमुन बोली, ‘उन सब को सबक़ सिखाइए और इस की दूसरी शादी की तैयारी करिए।’

‘दूसरी शादी?’ पिता की घिघ्घी बंध गई। उस ने फिर दुहराया, ‘हम लोग ब्राह्मण हैं।’ वह ज़रा रुका और फिर बुदबुदाया, ‘कौन करेगा शादी? और फिर लोग-बाग क्या कहेंगे?’

‘कुछ नहीं कहेंगे।’ मुनमुन बोली, ‘बेटी जब आप की सुख से रहने लगेगी तो सब के मुंह सिल जाएंगे। हां, अगर रोज़ ऐसे ही छोड़-पकड़ लगी रहेगी तो ज़रूर सब के मुंह खुले रहेंगे। अब आप सोच लीजिए कि क्या करना है आप को?’ वह बोली, ‘जल्दबाज़ी में कोई निर्णय मत लीजिए। अभी घर जाइए। सोचिए-विचारिए। और घर में पत्नी से, बेटी से, परिजनों से विचार विमर्श करिए। ठंडे दिमाग़ से। दो-चार-दस दिन में आइए। फिर फ़ैसला करते हैं कि क्या किया जाए?’

‘ठीक बहिनी!’ कह कर वह बेटी को ले कर चला गया। दो दिन बाद फिर वह आया। बेटी को साथ ले कर। और मुनमुन से बोला, ‘हम ने फ़ैसला कर लिया है। अब आप जो कहिए, जैसे कहिए हम सब कुछ करने को तैयार हैं।’

‘अच्छी बात है।’ मुनमुन उस की बेटी की तरफ़ देखती हुई बोली, ‘क्या तुम भी तैयार हो?’

पर वह कुछ बोली नहीं। चुपचाप कुर्सी पर बैठी नीचे की ज़मीन पैर के अंगूठे से कुरेदती रही। ऐसे गोया कुछ लिख रही हो पैर के अंगूठे से।

‘पैर के अंगूठे से नहीं, हौसले से अपनी क़िस्मत लिखनी होती है।’ मुनमुन बोली, ‘अगर तुम तैयार हो तो स्पष्ट रूप से हां कहो और नहीं हो तो ना कहो। बिना तुम्हारी मंज़ूरी या मर्ज़ी के कुछ नहीं करने वाली मैं।’

वह फिर चुप रही। हां, अंगूठे से ज़मीन कुरेदना बंद कर दिया था उस ने।

‘तो तैयार हो?’ मुनमुन ने अपना सवाल फिर दुहराया।

‘जी दीदी!’ वह धीरे से बोली।

‘तो चलो फिर थाने चलते हैं।’ वह ज़रा रुकी और बोली, ‘पर पहले एक वकील पकड़ना पड़ेगा।’

‘वह किस लिए?’ लड़की के पिता ने अचकचा कर पूछा।

‘एफ़.आई.आर. का ड्रा़ट लिखवाने के लिए।’

‘तो वकील तो पैसा लेगा।’

‘हां लेगा तो।’ मुनमुन बोली, ‘पर ज़्यादा नहीं।’

‘पर मैं तो अभी किराया भाड़ा छोड़ कर कुछ ज़्यादा पैसा लाया नहीं हूं।’

‘कोई बात नहीं।’ मुनमुन बोली, ‘वकील को पैसे बाद में दे दीजिएगा। अभी सौ पचास रुपए तो होगा ही, वह टाइपिंग के लिए दे दीजिएगा।’

‘ठीक है!’

वकील के पास जा कर पूरा डिटेल बता कर, नमक मिर्च लगा कर एफ़.आई.आर. की तहरीर टाइप करवा कर मुनमुन बाप बेटी को ले कर थाने पहुंची। थाने वाले ना नुकुर पर आए तो वह बोली, ‘क्या चाहते हैं आप लोग सीधे डी.एम. या एस.एस.पी से मिलें इस के लिए? या थ्रू कोर्ट आर्डर करवाएं?’ वह बोली, ‘एफ़.आई.आर. तो आप को लिखनी ही पड़ेगी। चाहे अभी लिखें या चार दिन बाद!’

अब थानेदार थोड़ा घबराया और बोला, ‘ठीक है तहरीर छोड़ दीजिए। जांच के बाद एफ़.आई.आर. लिख दी जाएगी।’

‘और जो एफ़.आई.आर. लिख कर जांच करिएगा तो क्या ज़्यादा दिक्क़त आएगी?’ मुनमुन ने थानेदार से पूछा।

‘देखिए मैडम हमें हमारा काम करने दीजिए!’ थानेदार ने फिर टालमटोल किया।

‘आप से फिर रिक्वेस्ट कर रहे हैं कि एफ़.आई.आर. दर्ज कर लीजिए। मामला डावरी एक्ट का है। इस में आप की भी बचत ज़्यादा है नहीं। और जो नहीं लिखेंगे अभी एफ़.आई.आर. तो इसी वक्त शहर जा कर डी.एम. और एस.एस.पी. से मिल कर आप की भी शिकायत करनी पड़ेगी। आप का नुक़सान होगा और हमारी दौड़ धूप बढ़ेगी बस!’ थानेदार मान गया। रिपोर्ट दर्ज हो गई। लड़की के ससुराल पक्ष का पूरा परिवार फ़रार हो गया। घर में ताला लगा कर जाने कहां चले गए सब। रिश्तेदारी, जान-पहचान सहित तमाम संभावित ठिकानों पर छापा डाला पुलिस ने। पर कहीं नहीं मिले सब। महीना बीत गया। महीने भर बाद ही पारिवारिक अदालत में मुनमुन ने लड़की की ओर से गुज़ारा भत्ता के लिए भी मुक़दमा दर्ज करवा दिया। अब ससुराल पक्ष की ओर से एक वकील मिला बाप बेटी से। वकील ने लड़की के पिता से कहा कि, ‘सुलहनामा कर लो और वह लोग तुम्हारी बेटी को विदा करा ले जाएंगे।’

लड़की के पिता ने मुनमुन से पूछा कि, ‘क्या करें?’

‘करना क्या है?’ वह बोली, ‘मना कर दीजिए। और कोई बात मत कीजिए। अभी जब कुर्की की नौबत आएगी तब पता चलेगा। देखें, कब तक सब फ़रार रहते हैं।’

‘पर वह लोग बेटी को विदा कराने के लिए तैयार हैं।’

‘कुछ नहीं। यह मजबूरी की पैंतरेबाज़ी है। कुछ भी कर लीजिए वहां अब आप की बेटी जा कर कभी ख़ुश नहीं रह पाएगी।’

‘क्यों?’

‘क्यों कि गांठ अब बहुत मोटी पड़ गई है।’ मुनमुन बोली, ‘थोड़े दिन और सब्र कीजिए। और दूसरे विवाह के लिए रिश्ता खोजिए। इन सब को भूल जाइए।’

और अंततः सुलहनामा हुआ। मुनमुन के कहे मुताबिक़ लड़की के पिता ने दस लाख रुपए बतौर मुआवजा मांगा। बात पांच लाख पर तय हुई। दोनों के बीच तलाक़ हो गया। लड़की के पिता ने इस पांच लाख रुपए से लड़की की दूसरी शादी कर दी। लड़की के बारे में सब कुछ पहले से बता दिया। कटी अंगुली से लगायत पूर्व विवाह तक। कोई बात छुपाई नहीं। एक दिन लड़की अपने दूसरे पति के साथ मुनमुन से मिलने आई। लिपट कर रो पड़ी। मुनमुन भी रोने लगी। यह ख़ुशी के आंसू थे। बाद में लड़की बोली, ‘दीदी आप ने मुझे नरक से निकाल कर स्वर्ग में बिठा दिया। ये बहुत अच्छे हैं। मुझे बहुत मानते हैं।’ फिर उस ने धीरे से जोड़ा, ‘दीदी अब आप भी शादी कर लीजिए!’

मुनमुन चुप रह गई। कुछ देर तक दोनों चुप रहीं। और वो जो कहते हैं न कि इतिहास जैसे अपने को दुहरा रहा था। मुनमुन कुर्सी पर बैठे-बैठे पैर के अंगूठे से नीचे की मिट्टी कुरेद रही थी।

‘दीदी बुरा न मानिए तो एक बात कहूं?’ चुप्पी तोड़ती हुई लड़की बोली।

‘कहो।’ मुनमुन धीरे से बोली।

‘छोटा मुंह और बड़ी बात!’ लड़की बोली, ‘पर दीदी आप ने ही एक बार यहीं बैठे-बैठे मुझ से कहा था कि पैर के अंगूठे से नहीं, हौसले से अपनी क़िस्मत लिखनी होती है!’

‘अच्छा-अच्छा!’ कह कर मुनमुन धीरे से मुसकुराई।

‘तो दीदी आप भी शादी कर लीजिए!’ लड़की ने जैसे मनुहार की।

‘अब मेरे नसीब में जाने क्या लिखा है मेरी बहन!’ कह कर उस लड़की को पकड़ कर वह फफक पड़ी, ‘समझाना आसान होता है, समझना मुश्किल!’ कह कर वह उन दोनों से हाथ जोड़ती हुई, रोती हुई घर के भीतर चली गई। रोना घोषित रूप से छोड़ देने के बाद आज मुनमुन पहली बार ही रोई थी। सो ख़ूब रोई। बड़ी देर तक। तकिया भीग गया। जल्दी ही मुनमुन फिर रोई। चनाजोर गरम बेचने वाले तिवारी जी का निधन हो गया था। वह पता कर के उन के घर गई और तिवारी जी की विधवा वृद्धा पत्नी के विलाप में वह भी शामिल हो गई। फिर बड़ी देर तक रोई। तिवारी जी ने उस के नाम से चनाजोर गरम बेच कर जो मान, स्वाभिमान और आन बख़्शा था, वह उस की ज़िंदगी का संबल बन गया था, यह बात वह तिवारी जी के निधन के बाद उन के घर जा कर महसूस कर पाई। शायद इसी लिए उस का रुदन श्रीमती तिवारी के रुदन में अनायास मिल गया था। ऐसे जैसे छलछलाती यमुना गंगा से जा मिलती है। मिल कर शांत हो जाती है। फिर साथ-साथ बहती हुई एकमेव हो गंगा बन जाती है। और वो जो कहते हैं न कि पाट नदी का यमुना की वजह से चौड़ा होता है, पर नाम गंगा का होता है। तो यहां भी बाद में रोई ज़्यादा मुनमुन पर श्रीमती तिवारी का विलाप सब ने ज़्यादा सुना। गंगा के पाट और श्रीमती तिवारी के विलाप का यह एकमेव संयोग भी जाने क्यों मुनमुन का रुदन नहीं रोक पा रहा था। घर में तो तकिया भीग गया था। पर यहां क्या भीगा? क्या यह बहुत दिनों तक मुनमुन के नहीं रोने की ज़िद थी? कि सावन भादो में सूखा पड़ा था और क्वार कार्तिक में बाढ़ आ गई। इतनी कि बांध टूट गया! यह कौन सा मनोभाव था?

समझा रही हैं मुनमुन की अम्मा भी मुनमुन को कि, ‘अब तुम या तो अपनी ससुराल जाने का मन बनाओ और जाओ। और जो वहां न जाने की ज़िद है तो दूसरा विवाह ढूंढ कर कर लो। इस-उस के साथ घूमने से तो यही अच्छा है!’

‘क्या करें अम्मा!’ मुनमुन कहती है, ‘साथ घूमने-सोने के लिए तो सभी तैयार रहते हैं हमेशा! पर शादी के लिए कोई नहीं।’ वह जोड़ती है, ‘इस के लिए तो सब को दहेज चाहिए!’

‘तो दूसरों को दहेज बटोरने का टोटका बता सकती हो। दहेज का मुक़दमा लिखवा कर, गुज़ारा भत्ता का मुक़दमा लिखवा कर लाखों का मुआवज़ा दिलवा कर दहेज जुटा कर दूसरी शादी का रास्ता सुझा सकती हो तो ख़ुद अपने लिए यह रास्ता क्यों नहीं अख़्तियार कर सकती हो?’

‘इस लिए नहीं कर सकती अम्मा कि यह सब कर के मैं अपने तौर पर उस शादी को मान्यता दे बैठूंगी जिस को कि मैं शादी नहीं मानती!’ मुनमुन कहती है, ‘मैं यह नहीं करने वाली!’

‘लोग बदल गए, चीज़ें बदल गईं। तुम्हारे सब भाई तक बदल गए। पर तुम और तुम्हारे बाबू जी नहीं बदले।’

‘ऐसे तो बदलेंगे भी नहीं अम्मा।’ वह बोली, ‘कि बेबात सब के आगे घुटने टेक देंगे। स्वाभिमान और आन गिरवी रख देंगे? हम इस तरह तो नहीं बदलेंगे अम्मा!’

क्यों नहीं बदलती मुनमुन? और उस के बाबू जी! यह एक नहीं, अनेक जन का यक्ष प्रश्न है! घनश्याम राय का भी यह प्रश्न है। भले ही वह इस प्रश्न का उत्तर भी साथ ले कर घूमने लगे हैं। जैसे कि कहीं बात चली कि, ‘आप का लड़का जब लुक्कड़, पियक्कड़ और पागल है तो मुनमुन जैसी लड़की कैसे रह सकती है उस के साथ?’ तो घनश्याम राय का जवाब था कि, ‘लड़का हमारा पागल और पियक्कड़ है। मैं तो नहीं। मैं रख लूंगा मुनमुन को। दिक्क़त क्या है?’

सवाल करने वाला शर्मिंदा हो गया पर घनश्याम राय नहीं। सवाल करने वाले ने टोका भी कि, ‘क्या कह रहे हैं राय साहब, बहू भी बेटी समान होती है।’

‘तो?’ घनश्याम राय ने तरेरा।

घनश्याम राय का यह जवाब बड़ी तेज़ी से सब तक पहुंचा। मुनमुन तक भी। सुन कर वह बोली, ‘मैं शुरू से ही जानती हूं कि वह कुत्ता है। अघोड़ी है।’

फिर उस ने घनश्याम राय को फ़ोन कर उन की जितनी लानत-मलामत कर सकती थी किया। और कहा कि, ‘आइंदा जो ऐसी वैसी बात कही तो तुम्हारे बेटे को तो अपने दरवाज़े पर जुतियाया था, तुम्हें तुम्हारे दरवाज़े पर ही जुतियाऊंगी!’

‘इतनी हिम्मत हो गई है तेरी!’ घनश्याम राय ने हुंकार तो भरी पर डर भी गए और फ़ोन काट दिया।

फिर एक वकील से मशविरा किया। और मुनमुन की विदाई के लिए मुक़दमा दायर कर दिया। मुनमुन को जब इस मुक़दमे का सम्मन मिला तो वह मुसकुराई। वकील की बेटी थी सो तुरंत जवाब दाखिल करने के बजाय तारीख़ें लेने लगी। तारीख़ों और आरोपों के ऐसे मकड़जाल में उसने घनश्याम राय को उलझाया कि वह हताश हो गए। मुनमुन कचहरी में घनश्याम राय और उस के बेटे राधेश्याम राय को ऐसे तरेर कर देखती कि दोनों भाग कर अपने वकील के पीछे छुप जाते। कि कहीं मुनमुन भरी कचहरी में पीट न दे। लेकिन मुनमुन का सारा जोश, सारी बहादुरी घर में आ कर दुबक जाती। अम्मा तो पहले ही कंकाल बन कर रह गई थीं, बाबू जी भी कंकाल बनने की राह पर चल पड़े थे। कंधा और कमर भी उन की थोड़ी-थोड़ी झुकने लगी थी। चेहरा पिचक गया था। एक तो मुनमुन की चिंता, दूसरे बेटों की उपेक्षा, तीसरे विपन्नता और बीमारी ने उन्हें झिंझोड़ कर रख दिया था। यह सब देख कर मुनमुन भी टूट जाती। इतना कि अब वह मीरा बनना चाहती थी। ख़ास कर तब और जब कोई अम्मा बाबू जी से पूछता, ‘जवान बेटी कब तक घर में बिठा कर रखेंगे?’

]वह मीरा बन कर नाचना चाहती है। मीरा के नाच में अपने तनाव, अपने घाव, अपने मनोभाव को धोना चाहती है। नहीं धुल पाता यह सब कुछ। वह अम्मा बाबू जी दोनों को ले कर अस्पताल जाती है। दोनों ही बीमार हैं। डाक्टर भर्ती कर लेते हैं। एक वार्ड में बाबू जी, एक वार्ड में अम्मा। वह चाहती है कि दोनों को एक ही वार्ड मिल जाता तो अच्छा था। डाक्टरों से कहती भी है। पर डाक्टर मना कर देते हैं कि पुरुष वार्ड में पुरुष, स्त्री वार्ड में स्त्री। अब उस के अम्मा बाबू जी पुरुष और स्त्री में तब्दील हैं। तो वह ख़ुद क्या है? वह सोचती है। सोचते-सोचते सुबकने लगती है। हार कर रीता दीदी को फ़ोन कर के सब कुछ बताती है। बताती है कि, ‘अकेले अब वह सब कुछ नहीं संभाल पा रही है। पैसे भी नहीं हैं अब।’

‘भइया लोगों को बताया?’ रीता ने पूछा।

‘मैं भइया लोगों को बताने वाली भी नहीं रीता दीदी। तुम्हें जाने कैसे बता दिया। और अब मेरे फ़ोन में पैसा भी ख़त्म होने वाला है। बात करते-करते कभी भी बात कट सकती है!’

‘ठीक है तुम रखो मैं मिलाती हूं।’ रीता बोली।

लेकिन फिर रीता का फ़ोन नहीं आया। मुनमुन ही अम्मा बाबू जी को ले कर वापस घर आती है। स्कूल के हेड मास्टर ने मदद की है। पैसे से भी और अस्पताल से आने में भी। घर आ कर बाबू जी पूछ रहे हैं आंख फैला कर मुनमुन से, ‘बेटी ऐसा कब तक चलेगा भला?’

‘जब तक चल सकेगा चलाऊंगी। पर अगर आप चाहते हैं कि अन्यायी और अत्याचारी के आगे झुक जाऊं, तो मैं हरगिज़ झुकूंगी नहीं। चाहे जो हो जाए!’ कह कर वह किचेन में चली गई। चाय बनाने।

बिजली चली गई है। वह किचेन से देख रही है आंगन में चांदनी उतर आई है। वह फुदक कर आंगन में आ जाती है, चांदनी में नहाने। ऐसे जैसे वह कोई मुनमुन नहीं गौरैया हो! उधर किचेन में भगोने में चाय उबल रही है और वह सोच रही है कि सुबह सूरज उगेगा तो वह क्या तब भी ऐसे ही नहाएगी सूरज की रोशनी में, जैसे चांदनी में अभी नहा रही है। उधर चांदनी में नहाती अपनी बिटिया को देख कर श्रीमती मुनक्का राय के मन में उस के बीते दिन, बचपन के दिन तैरने लगे हैं किसी सपने की तरह और वह गाना चाह रही हैं मेरे घर आई एक नन्हीं परी, चांदनी के हसीन रथ पे सवार! पर वह नहीं गा पातीं। न मन साथ देता है, न आवाज़! वह सो जाती हैं। किचेन में चाय फिर भी उबल रही है!

और यह देखिए सुबह का सूरज सचमुच मुनमुन के लिए खुशियों की कई किरन ले कर उगा। अख़बार में ख़बर छपी थी कि सभी शिक्षा मित्रों को ट्रेनिंग दे कर नियमित किया जाएगा। दोपहर तक डाकिया एक चिट्ठी दे गया। चिट्ठी क्या पी. सी. एस. परीक्षा का प्रवेश पत्र था। मुनमुन ने प्रवेश पत्र चहकते हुए अम्मा को दिखाया तो अम्मा भावुक हो गईं। बोली, ‘तो अब तुम भी अधिकारी बन जाओगी?’ और फिर जैसे उन का मन कांप उठा और बोलीं, ‘अपने भइया लोगों की तरह!’

मुनमुन अम्मा का डर समझ गई। अम्मा को अंकवार में भर कर बोली, ‘नहीं अम्मा, भइया लोगों की तरह नहीं, तुम्हारी बिटिया की तरह! पर अभी तो दिल्ली बहुत दूर है। देखो क्या होता है?’

पीसीएस की तैयारी तो आधी अधूरी पहले ही से थी, उस की। पर मुनक्का राय की सलाह मान कर मुनमुन ने स्कूल से छुट्टी ले ली। लंबी मेडिकल लीव। और तैयारी में लग गई। दिन-रात एक कर दिया। वह भूल गई बाक़ी सब कुछ। जैसे उस की ज़िंदगी में पीसीएस के इम्तहान के सिवाय कुछ रह ही नहीं गया था। बांसगांव के लोग तरस गए मुनमुन की एक झलक भर पाने के लिए। बांसगांव की धूल भरी सड़क जैसे उसकी राह देखती रहती। पर वह घर से निकलती ही नहीं थी। वह अंदर ही अंदर अपने को नए ढंग से रच रही थी। गोया खुद अपने ही गर्भ में हो। खुद ही मां हो, खुद ही भ्रूण। ऐसे जैसे सृजनकर्ता अपना सृजन खुद करे। बिखरे हुए को सृजन में संवरते -बनते अगर देखना हो तो तब मुनमुन को देखा जा सकता था। वह कबीर को गुनगुनाती, ‘खुद ही डंडी, खुद ही तराजू, खुद ही बैठा तोलता।’ वह अपने ही को तौल रही थी। एक नई आग और एक नई अग्नि परीक्षा से गुज़रती मुनमुन जानती थी कि अगर अब की वह नहीं उबरी तो फिर कभी नहीं उबर पाएगी। जीवन जीना है कि नरक जीना है सब कुछ इस परीक्षा परिणाम पर मुनःसर करता है, यह वह जानती थी। अम्मा कुछ टोकतीं तो मुनक्का रोकते हुए कहते, ‘मत रोको, सोना आग में तप रहा है, तपने दो!’

जाने यह संयोग था कि मुनमुन का प्रेम कि मुनमुन की इस तैयारी के समय मुनक्का राय और श्रीमती मुनक्का राय दोनों ही कभी बीमार नहीं पड़े। न कोई आर्थिक चिंता आई। हां, इधर राहुल का भेजा पैसा आया था सो मुनमुन को वेतन न मिलने के बावजूद घर खर्च में बाधा नहीं आई। बीच में दो बार मुनमुन के स्कूल के हेड मास्टर भी आए ‘बीमार’ मुनमुन को देखने। पर वह उन से भी नहीं मिली। मुनक्का राय से ही मिल कर वह लौट गए।

कहते हैं न कि जैसे सब का समय फिरता है वैसे मुनमुन के दिन भी फिरे। समय ज़रूर लगा। पर जो मुनक्का राय कहते थे कि, ‘सोना आग में तप रहा है, तपने दो!’ वह सोना सचमुच तप गया था। मुनमुन पीसीएस मेन में सेलेक्ट हो गई थी। अख़बारों की ख़बरों से बांसगांव ने जाना। पर अब की इस ख़बर पर आह भरने के लिए गिरधारी राय नहीं थे। न ही ललकार कर मुनमुन के नाम से चनाजोर गरम बेचने वाले तिवारी जी। मुनमुन ने तिवारी जी को इस मौके़ पर बहुत मिस किया। बधाई देने वाले, लड्डू खाने वाले लोग बहुत आए बांसगांव में उस के घर। पर मुनमुन के भाइयों का फ़ोन भी नहीं आया। न ही घनश्याम राय या राधेश्याम राय का फ़ोन। दीपक को फ़ोन कर के ज़रूर मुनमुन ने आशीर्वाद मांगा। दीपक ने दिल खोल कर आशीर्वाद दिया भी। हां, रीता आई और थाईलैंड से विनीता की बधाई भी फ़ोन पर। बहुत बाद में राहुल ने भी फ़ोन कर खुशी जताई।

ट्रेनिंग-व्रेनिंग पूरी होने के बाद मुनमुन अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक तहसील में एसडीएम तैनात हो गई है। बांसगांव से आते वक्त उस ने अम्मा, बाबू जी को अकेला नहीं छोड़ा। बाबू जी से बोली, ‘छोड़िए यह प्रेक्टिस का मोह और चलिए अपनी रानी बिटिया के साथ!‘

[ बांसगांव की मुनमुन से। पूरा उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे कमेंट बाक्स में दिए गए लिंक को क्लिक कर सकते हैं । ]

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