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हनुमान : #इतिहास_की_दृष्टि_से

देवेन्द्र सिकरवार

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हिंदू धर्म की एक ऐसी विशेषता है जो पश्चिमी इतिहासकारों व थियोलॉजिस्टों को भ्रमित करती आई है और वह है धर्म व इतिहास का संगुम्फन।
पश्चिम के विपरीत हिंदू धर्म के देवमंडल का निर्माण मिथकों से नहीं हुआ है बल्कि वास्तविक एतिहासिक चरित्रों तथा लोकआस्था की मांग व प्रवृत्ति के कारण चामत्कारिक गाथाओं के उनके चारों ओर आच्छादित हो जाने से हुआ।
ऐसे ही अत्यंत लोकप्रिय ऐतिहासिक चरित्र हैं—हनुमान
हनुमान भारत ही नहीं बल्कि सुदूर पूर्वी एशिया से पश्चिम एशिया और यहाँ तक कि कैथोलिकों के गढ़ वैटिकन के कुछ चित्रों में उपस्थित हैं।
हनुमान की सबसे बड़ी विशेषताओं में है उनका #वानर होना।
इस विषय में दो मत हैं–
प्रथम मत के अनुसार वानर जाति ‘कपि’ व ‘मानव’ के बीच की इवोल्यूशनरी लिंक थी जिसमें कुछ ‘वानर लक्षण’ जैसे ‘पुच्छ’ व ‘आगे निकला जबड़ा’ उपस्थित थे और वह महाभारत काल तक आते-आते मानवों में ही समाहित हो गई।
इसके दो प्रमाण दिये जाते हैं-
1)पुच्छ सक्रियता जो हनुमान के संदर्भ में ही उल्लेखित है।
2)वर्तमान में कभी कभी पुच्छ सहित बच्चों का जन्म जिसे जेनेटिक्स में ‘एटाविज्म’ कहा जाता है।
इस संदर्भ में सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि किसी भी खुदाई में ‘वानर जाति’ के ऐसे जीवाश्म अभी तक नहीं मिले हैं।
दूसरे मत के अनुसार ‘वानर जाति’ वस्तुतः एक टोटम जाति थी जिसके सदस्य चेहरे पर वानरों का मेकअप या मुखौटा लगाते थे।
पुराणों में टोटम जातियों को #किंपुरुषवर्ग के नाम से वर्णित किया गया है जिसमें अश्वमुख, वराहमुख, सिंहमुख, गरुणमुख, मत्स्य, मकर, नाग आदि जातियां आती थीं।
अपनी पुस्तक ‘अनंसंग हीरोज’:#इंदु_से_सिंधु में मैंने दूसरे मत को ही माना है और इन टोटम जातियों का वर्णन ‘टोटम युग के यात्री’, ‘कुंभज’ और ‘प्रथम सागर अभियांत्रिक’ में बहुत विस्तार से सप्रमाण किया है जिससे आपके बच्चों की हिंदुत्व के प्रतीक पुरुषों के प्रति अटूट श्रद्धा का जन्म होगा।
अस्तु!
वास्तव में हनुमान पुलह कुल में उत्पन्न ‘वानर’ नामक #किम्पुरष समूह में ‘केसरी’ कुल में #किम्पुरुषवर्ष के गंधमादन पर्वत पर माता अंजना के गर्भ से उत्पन्न हुये थे जो आज पामीर के बगल में ‘तिएन शान’ कहलाता है। (रामायण, महाभारत, रघुवंशम, सभी पुराण)
दरअसल उस समय भारत की सीमाएं ऑक्सस नदी अर्थात वंक्षु नदी तक थीं जबकि उससे परे के क्षेत्र व त्रिविष्टिप देवलोक में सम्मिलित थे।(रामायण, महाभारत, सभापर्व, रघुवंशम, सभी पुराण)
कालांतर में जब अगस्त्य पीठ के तत्कालीन अगस्त्य ‘मैत्रावरुण’ ने विंध्यराज को सहमत कर विंध्यक्षेत्र को लांघा तो तमाम नृजातियाँ दक्षिण की ओर आईं जिनमें वानर टॉटेम के किंपुरुष भी थे।
ऋक्ष शाखा ने जांबवान के नेतृत्व में सौराष्ट्र के ऋक्ष पर्वत पर (भागवत में कृष्ण व जाम्बवान का द्वंद्वयुद्ध स्थल) और फिर ऋक्षराज जिनका वास्तविक नाम कुछ और रहा होगा दक्षिण में किष्किंधा पर अपना स्थान बनाया।
यह एक प्रकार का गणसंघ था जिसमें वानरों के बारहों कुल के यूथपतियों ने ऋक्षराज को अपना राजा चुना। बालि व सुग्रीव इन्हीं के पुत्र थे।
देवों विशेषतः विवस्वान के अनुरोध पर केसरी व नील कुल के वानर भी #पंचवटी अर्थात वर्तमान नासिक क्षेत्र में आ बसे परंतु सौराष्ट्र के ऋक्षराज जाम्बवान की तरह वे भी किष्किंधा के अधीन थे और युवराज हनुमान केसरीराज का प्रतिनिधित्व करते हुए किष्किंधा में गणसभा में उपस्थित होते थे।
इसी कारण आज भ्रम और लोभवश हनुमान जी का जन्म कर्नाटक या नासिक में बताने पर शास्त्रार्थ कर रहे हैं जबकि उनका संबंध दोनों से ही है और सबसे बड़ी बात दोनों स्थान भारत की सीमाओं में ही हैं तो झगड़ा किस बात का।
संक्षेप में हनुमानजी की विशेषताएं इस प्रकार हैं—
जन्मस्थान- सुमेरु पर्वत
वर्ग- किंपुरुष
गण – वानर
माता- अंजना (शापित पुंजिक्स्थला)
पिता- केसरी
मानस पिता- महारुद्र शिव(ग्यारहवें रुद्र)
संरक्षक पिता- मरुद्गण(पवनदेव)
कार्यस्थान- किष्किंधा व अयोध्या
लंबाई- सामान्य पुरुष की तुलना में लंबे
शरीर सौष्ठव– सुगठित, वज्रसमान कठोर
पहचान चिन्ह– वज्र प्रहार से टेढी ठोड़ी।
अतिरिक्त विशेषता– सक्रिय पूंछ।
शिक्षा– सम्पूर्ण वेदवेदांग, शस्त्र व शास्त्र।
गुरु — विवस्वान (सूर्य), शिव, मरुद्गण
प्रमुख शस्त्र– गदा
प्रमुख युद्ध–
1– देवलोक का युद्ध– विरुद्ध विवस्वान, राहु, इंद्र।
2– गुरुदक्षिणा का युद्ध — विरुद्ध शनि
3– अशोकवाटिका का युद्ध– विरुद्ध अक्षकुमार, इंद्रजीत
4– लंका का युद्ध– विरुद्ध रावण, कुंभकर्ण
5– वीरपुर का युद्ध– विरुद्ध महारुद्र शिव
6–सरयू तट का युद्ध– विरुद्ध श्रीराम
7– वाल्मीकि आश्रम का युद्ध– विरुद्ध लव-कुश

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