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हिंदू_सिनेमा बनाम इस्लामिक_सिनेमा

लेखक - देवेन्द्र सिकरवार

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सबसे पहले तीन बातें क्लियर कर दूँ।
1)मेरी समझ में मुझे सिनेमा की कोई समझ नहीं है।
2)मेरी समझ में दक्षिण के स्टार अपनी मूर्खता व हीनभावना में अनजाने में अपनी ही मूवीज के राष्ट्रवादी संदेश के विरुद्ध बयान दे रहे।
3)सोशल मीडिया पर भी इस तरह के मूर्खतापूर्ण नैरेटिव को अनजाने ही सही बल दिया जा रहा है।
तो जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि मुझे सिनेमा की समझ होने का कोई दावा नहीं है लेकिन सिनेमा के मूल संदेश को समझने का, उसके परिणामों को समझने की समझ सिनेमा विशेषज्ञों से ज्यादा है।
सालों पहले शाहरुख की दो मूवी आई थीं-‘डर’ और ‘मोहब्बतें’ उस समय भी मैंने अपने मित्रों के बीच डिबेट में कहा था कि इन फिल्मों की सफलता के विनाशकारी परिणाम होने वाले हैं।
जरा याद करें तेजाब फैंकने और कोचिंग इंडस्ट्री में इश्किया शायरी, सस्ते फिल्मी गीत सुनाने और डांस करने वाले नपुंसक शिक्षकों की संस्कृति कहाँ से शुरू हुई?
फिर आयी ‘जोधा-अकबर’ जिसने इलीट क्लास में वही प्रभाव पैदा किया सोलहवीं शताब्दी के इलीट क्लास में–‘लव जेहाद का ग्लोरीफिकेशन।’
संजय लीला भंसाली भी यही करना चाहता था लेकिन जाग चुके हिंदुओं के वर्ग ने उसे उन दृश्यों को हटाने पर विवश किया जो लव जेहाद और अनैतिकता का गलोरीफिकेशन करती है।
और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’?
टट्टी!
क्योंकि कोई भी आदमी बच्चों के साथ तो दूर बीवी के साथ भी बैठकर नहीं देख सकता।
इस मूवी ने समाज में गालीबाजी व अपराध का ग्लोरीफिकेशन किया और सस्ते रामाधीर व सस्ते सरदार खान पैदा किये जो वास्तव में गंदी नाली के कीड़े की माफिक तोतले परपेंडीकुलर से ज्यादा कुछ नहीं।
मेरा बस चले तो अनुराग कश्यप को ताजे गू में डुबोकर पूछूं कि क्यों बेटा मजा आ रहा है?
दूसरी ओर बाहुबली जैसी पीरियड फ़िल्म।
निःसंदेह अतिरेक और कई दृश्यों में हास्यास्पद स्तर तक के दृश्यों से भरी फ़िल्म।
लेकिन समाज पर प्रभाव क्या रहा?
1)कंधों पर शिवलिंग ले जाता नायक शक्तिशाली हिंदुत्व का एक आइकन, एक प्रतीक बन गया।
2)लड़कियों के हजारों पेजों व टिप्पणियों में नायक के कंधों पर गुजरती गर्व भरी नायिका के प्रति सम्मोहक भावों ने फेमनिस्टों के दुष्प्रभावों को हवा कर दिया।
3)भव्य महल, सैनिक प्रदर्शन, भारत की वूज स्टील के सामने दमिश्क इस्पात की औकात बताना, पारद शिवलिंग, धनुर्विद्या का प्रदर्शन आदि ने प्राचीन भारत की भव्य विश्वसनीय तस्वीर हिंदुओं के सामने रखी और वामी इतिहासकारों के अब तक के नैरेटिव पर कठोर प्रहार किया।
इसी क्रम में ‘केसरी’, ‘तानाजी’ व ‘आर आर आर’ आईं और नवीनतम कड़ी लेकर आये हैं डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी ‘पृथ्वीराज चौहान’ के रूप में।
-आपको अक्षय कुमार पृथ्वीराज के रूप में न जँच रहे,
-आपको उनकी हेयरस्टाइल न जँच रही,
-आपको युद्ध दृश्य उतने प्रभावी न लग रहे,
इन सबके बावजूद एक बात तय है कि इस फ़िल्म का निर्देशन डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी जी कर रहे हैं जिनके हाथ में कास्टिंग भले न हो लेकिन वह कथा और तथ्यों पर कोई समझौता नहीं करते और यह फ़िल्म पृथ्वीराज रासो के आधार से इधर उधर नहीं होगी। यह तय है।
ये मत सोचिये कि कौन पृथ्वीराज बना है बल्कि ये सोचिये कि नैरेटिव किसके पक्ष में बुना जा रहा है- पृथ्वीराज के पक्ष में या मुहम्मद गोरी के पक्ष में।
आप अगर अपने नैरेटिव के पक्ष में खड़े न होंगे तो कोई महानायकों पर, आपके पक्ष में दाँव लगाने की हिम्मत न करेगा और यही दाऊद गैंग चाहता भी है।
बकौल डॉ द्विवेदीजी, फ़िल्म अत्यंत भव्य है और मुझे उनके दावे पर पूरा भरोसा है।
इसलिये हंसी मजाक में जो भूल पृथ्वीराज के रोल में अक्षय कुमार के संदर्भ में मैंने की है उसके लिए आप सभी हिंदू भाइयों से क्षमाप्रार्थी हूँ।
अपने नैरेटिव के संदर्भ में ये चूक आप न करें।

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