Home राजनीति रोने का वक़्त कहाँ से मिल जाता है | प्रारब्ध

रोने का वक़्त कहाँ से मिल जाता है | प्रारब्ध

लेखिका - मधुलिका शची

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रोने का वक़्त कहाँ से मिल जाता है ….?
आज जीवनचर्या कुछ ऐसी हो गयी है कि न हँसने का वक़्त है और ना ही रोने का और न ही कोसने का।
सोशल मीडिया के निर्माताओं ने भविष्य देख लिया होगा कि भविष्य में किसी के भी पास चौपाल लगाने का वक़्त नहीं होगा इसलिए सोशल मीडिया ही भविष्य का चौपाल होगा जिसमें व्यक्ति समय मिलते ही अपना रोना, हँसना, कोसना सब कुछ ही क्षणों में व्यक्त कर देगा…!
आज यदि आप ठहरे तो इतने में ही समस्याओं का अंबार लग जायेगा जिससे उबरना आपके लिए नित्य प्रति मुश्किल होता चला जायेगा।
उपनिषदों ने कहा चरैवेति चरैवेति..शायद वही आज भी लागू है कि चलते रहो ,चलते रहो और चलते हुए ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करते रहो।
किसी का भी जीवन सहज नहीं होता , मनुष्य का सारा जीवन स्वयं को सहज बनाने में गुजर जाता है पर सहजता सुख हाथ में रखी रेत की तरह फिसलती जाती है जैसे ही उसे मुठ्ठी में बंद करने का प्रयत्न करते हैं इसलिए उचित यही होगा हाथ खुले रखो और खुशियों के रेत को खुलेमन से स्वीकारो ।
यदि मैं हमेशा खुश दिखती हूँ तो इसका अर्थ यह नहीं है कि जो जो मेरी सारी इच्छाएं थी सब पूरी होती चली जा रही हैं ..नहीं..! ऐसा कभी नहीं होता । हमें खुश रहने के लिए विकल्प को तलाशना पड़ता है खुद को कहीं इन्वॉल्व करना पड़ता है……
मैं अपनी दिनचर्या की बात करूं तो रोज किताबें लिखना और चूँकि भारत सरकार के साथ मिलकर इतिहास पर रिसर्च के प्रोजेक्ट पर काम कर रही हूँ तो कुछ वक़्त उधर जाता है फिर कई सारी किताबें एक साथ लिख रही हूँ और जो लिख चुकी हूँ उनको फिर से एडिट कर रही हूँ…आवश्यक चीजों को जोड़ रही हूँ और अनावश्यक बातों को हटा रही।
अलग अलग विषयों को पढ़ना उनकी डिग्री लेना मेरा पहला शौक है, पहले प्राइवेट और रेगुलर कोर्सेस एक साथ चल रहे थे और अब जब से एकसाथ दो डिग्री की मान्यता सरकार दे रही है तब से उनपर भी काम कर रही।
यदि अपनी किसी महत्वकांक्षा के पूर्ण न होने को लेकर रोते हुये बैठी रहूँ तो क्या काम चलेगा.. नहीं ना…!!
जरूरी नहीं जो मैं कर रही वही करो बल्कि अपने परिवेश में देखो खोजो और रास्ता निकालो…..!
बैठकर रुदन या मौज मस्ती स्वयं को नष्ट करने की ओर अग्रसर करती है और स्वयं को नष्ट करने से बड़ा पाप कुछ नहीं होता।
इस संसार में कोई भी पूर्णतः सुखी नहीं है , किसी की भी सारी चाहतें पूरी नहीं होती पर कर्मशील मनुष्य अपने कार्य में इतना केंद्रित हो जाता है कि उसको बैठकर दुःखी होने का वक़्त ही नहीं मिलता।
मुझे थोड़ा वक्त मिला तुरन्त एक पोस्ट करके यहां लोगों से हँसी मजाक , दुःख , नफरत सब कुछ व्यक्त कर लिया।
मुझे नहीं पता कि मैं दुःखी हूँ या सुखी हूँ पर हाँ मुझे यह पता है कि मैं खुद को मानवीय संवेदनाओं के लिए हमेशा तैयार करने का प्रयत्न कर रही हूँ और सबको करना ही पड़ता है, जीवन बना बनाया नहीं मिलता बल्कि उसे बनाना पड़ता है।
समझौता ही जीवन का परम सत्य है.!
यह किसी न किसी रूप में आपके जीवन में शामिल रहता है और यदि आप किसी समझौते से इनकार करते हो तो दूसरा समझौता अजगर की तरह मुँह फाड़कर खड़ा मिलता है ।
निर्णय आपका है कि आप किस प्रकार के समझौते के लिए तैयार हो..!!!!!!
पर समझौते से मुक्त नहीं हो सकते आप…!!

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