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वाल्मीकि रामायण सुन्दरकांड भाग 78

सुमंत विद्वांस

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लंका में प्रवेश करके हनुमान जी राक्षसों के घरों को देखते हुए आगे बढ़े। उनमें से किसी का आकार कमल जैसा था, किसी पर स्वास्तिक के चिह्न बने हुए थे। वे सभी घर चारों ओर से सजे हुए थे। एक से दूसरे घरों में जाते समय उन्हें मनोहर गीत-संगीत और नर्तकियों की पायलों की झनकार सुनाई दी। अनेक निशाचरों को उन्होंने मन्त्र जपते हुए सुना और बहुत-से राक्षसों को स्वाध्याय में तत्पर भी देखा। एक स्थान पर उन्होंने देखा कि निशाचरों की भीड़ राजमार्ग को रोककर खड़ी थी।
नगर के मध्यभाग में उन्हें रावण के अनेक गुप्तचर भी दिखे। उनमें कोई योग की दीक्षा लिया हुआ, कोई जटा बढ़ाया हुआ, कोई सिर मुंडाया हुआ, कोई गोचर्म (गाय की खाल) या मृगचर्म (हिरण की खाल) धारण किया हुआ, तो कोई बिल्कुल ही निर्वस्त्र था।
कुछ के हाथों में अस्त्र के रूप में केवल मुट्ठी भर कुश (घास) ही था, तो कुछ के लिए अग्निकुंड ही उनका आयुध था। किसी के हाथों में मुद्गर, तो किसी के हाथों में डंडा ही हथियार के रूप में था। कुछ राक्षसों के पास धनुष, खड्ग, शतघ्नी, मूसल, परिघ आदि भी थे। कुछ ने चमकीले कवच भी धारण किए हुए थे। कोई वृक्षों को शस्त्र के रूप में धारण किए हुए थे, तो कुछ के पास पट्टिश, वज्र, गुलेल और पाश आदि थे। कुछ के पास पैने शूल भी थे।
उन निशाचरों में से कोई बड़े कुरूप थे, तो कोई बहुत सुन्दर। किन्हीं के मुँह टेढ़े-मेढ़े थे। कोई बड़े विशाल थे, तो कोई बौने। किसी-किसी की एक ही आँख थी और कितनों के ही पेट बहुत बड़े-बड़े थे। कुछ ऐसे भी थे, जो न बहुत गोर थे न काले, न बहुत मोटे थे न दुबले, न बहुत लंबे थे न बौने। कुछ के गले में फूलों के हार थे और ललाट आदि पर चन्दन लगा हुआ था। कुछ ने श्रेष्ठ आभूषण पहने हुए थे। उन सब राक्षसों ने कई अलग-अलग प्रकार की वेशभूषा धारण की हुई थी।
उन्हें कई ऐसे राक्षस भी दिखाई दिए, जो नशे में धुत्त होकर बहकी-बहकी बातें कर रहे थे या आपस में लड़ाई-झगड़े कर रहे थे। उन्हें मधुपान में आसक्त कई सुन्दर रमणियाँ भी दिखाई दीं। कुछ अन्य घरों में उन्हें विवाहिता, धर्मपरायण स्त्रियाँ भी दिखीं, जो अपने घरों की छतों पर बैठी ही थीं। वे सब स्त्रियाँ आभूषणों से सजी हुई तथा अत्यंत प्रसन्न दिखाई दे रही थीं। कुछ घरों में उन्हें सोये हुए राक्षस स्त्री-पुरुष भी दिखाई दिए।
वहाँ से आगे बढ़ने पर उन्हें नगर की रक्षा के लिए नियुक्त एक लाख राक्षसों की रक्षक-सेना का विशाल भवन दिखाई दिया। वे सब सैनिक रावण के अंतःपुर की रक्षा के लिए नियुक्त थे।
उस आरक्षा-भवन के आगे हनुमान जी को त्रिकूट पर्वत के एक शिखर पर बना रावण का महल दिखा। उसके चारों ओर सुरक्षा के लिए खाई बनी हुई थी, जिसमें अनेक कमल खिले हुए थे। उस महल का परकोटा बहुत ऊँचा था। महल में उसमें संगीत के स्वर गूँज रहे थे। घोड़ों की हिनहिनाहट भी सुनाई पड़ रही थी।
थोड़ा निकट जाने पर हनुमान जी को आभूषणों की झनकार भी सुनाई दी। उन्हें अनेक प्रकार के रथ, पालकी, विमान, हाथी, अनेक पशु-पक्षी आदि भी दिखे। सहस्त्रों पराक्रमी राक्षस उस महल की रक्षा में नियुक्त थे। सबसे छिपकर आगे बढ़ते हुए हनुमान जी ने रावण के उस महल में प्रवेश किया।
वह महल चाँदी के मढ़े हुए चित्रों, सोने से जड़े हुए दरवाजों और अद्भुत ड्योढ़ियों तथा सुन्दर द्वारों से युक्त था। हाथी पर चढ़े हुए अनेक महावत और कई शूरवीर वहाँ उपस्थित थे। अनेक रथवाहक अश्व भी उन्हें दिखाई दिए। वे रथ सिंह और बाघ की खाल से बने हुए कवचों से ढके हुए थे। उनमें हाथी-दाँत, सोने तथा चाँदी की प्रतिमाएँ रखी हुई थीं। उनमें लगी छोटी-छोटी घंटियाँ रथ के चलने पर बजने लगती थीं। ऐसे अनेक रथ निरंतर वहाँ आ-जा रहे थे।
उस महल में अनेक प्रकार के रत्न, बहुमूल्य आसन और सहस्त्रों पशु-पक्षी थे। आगंतुकों के ठहरने के लिए उसमें अनेक विशाल भवन थे तथा रथों व घोड़ों के ठहरने के लिए भी निर्धारित स्थान बने हुए थे। वहाँ शंख, भेरी और मृदंग का स्वर गूँज रहा था। उस राजभवन को प्रतिदिन सजाया जाता था और पर्वों के दिन वहाँ हवन किया जाता था।
उस महल तथा वहाँ के बाग-बगीचों आदि को देखने के बाद हनुमान जी कूदकर प्रहस्त के घर में जा पहुँचे। वहाँ से निकलकर वे महापार्श्व के महल में गए थे। फिर उछलकर वे कुम्भकर्ण के भवन में और फिर वहाँ से विभीषण के महल में कूद गए। इसके बाद एक-एक करके उन्होंने महोदर, विरुपाक्ष, विद्युज्जिह्व, विद्युन्मालि, वज्रदंष्ट्र, शुक, सारण, इंद्रजीत, जम्बुमालि, सुमाली, रश्मिकेतु, सूर्यशत्रु, वज्रकाय, धूम्राक्ष, विद्युद्रूप, भीम, घन, विघन, शुकनाभ, चक्र, शठ, कपट, ह्रस्वकर्ण, द्रंष्ट्र, लोमश, युद्धोन्मत्त, मत्त, ध्वजग्रीव, द्विजिह्न, हस्तिमुख, कराल, पिशाच और शोणिताक्ष आदि के महलों को भी देखा और उन सबके घरों व समृद्धि का निरीक्षण कर लिया।
लेकिन सीता उन्हें कहीं भी दिखाई नहीं दी थी। इससे वे अत्यंत दुःखी और चिंतित हो गए। तब वे पुनः रावण के महल में लौटे। वहाँ उन्हें रावण के कक्ष की रक्षा करने वाली राक्षसियाँ दिखाई दीं, जिनकी आँखें बड़ी विकराल थीं। भवन में हर ओर उन्हें राक्षसियों के अनेक समूह दिखे, जिनके हाथों में शूल, मुद्गर, शक्ति, तोमर आदि अनेक अस्त्र-शस्त्र विद्यमान थे। उनके साथ-साथ वहाँ अनेक शस्त्रधारी राक्षस भी नियुक्त थे।
वहाँ हनुमान जी को रावण का पुष्पक विमान भी दिखाई दिया। वह विमान विश्वकर्मा ने ब्रह्माजी के लिए बनाया था। बड़ी तपस्या करके कुबेर ने ब्रह्माजी से वरदान में उसे पाया था। फिर कुबेर को परास्त करके रावण ने वह विमान छीन लिया। वह अनेक रत्नों से सजा हुआ था और अत्यंत सुन्दर दिखाई देता था। उसका आधार सोने और मणियों के पर्वत जैसा बनाया गया था। उन पर्वतों में हरे-वृक्ष और केसर के फूल बने हुए थे। उसमें नीलम, चाँदी और मूँगों से पक्षी बनाए गए थे। अनेक प्रकार के रत्नों से विचित्र रंगों वाले सर्प और सुन्दर अश्व भी उसमें बने हुए थे। उस विमान के पंख मूँगे और सोने के बने हुए फूलों से सजे हुए थे। उसमें एक सरोवर भी बना हुआ था, जिसमें लक्ष्मी का अभिषेक कर रहे हाथी भी बने हुए थे। उस विमान को देखकर हनुमान जी को बड़ा ही विस्मय हुआ।
हनुमान जी उस दिव्य पुष्पक विमान पर चढ़ गए। उसमें सोने और स्फटिक के झरोखे और खिड़कियाँ लगी हुई थीं। सुन्दर मणियों की वेदियाँ रची गई थीं। उसका फर्श अनेक प्रकार के मूँगों, मणियों, मोतियों आदि से जड़ा हुआ था। उसमें अनेक प्रकार के पेय और खाद्यपदार्थ रखे हुए थे।
विमान को देखने के बाद हनुमान जी ने रावण के भवन में प्रवेश किया। उसमें मणियों की सीढ़ियाँ और सोने की खिड़कियाँ बनी हुई थीं। उसकी फर्श स्फटिक से बनी हुई थी और उसे हाथी-दाँत से बनी आकृतियों से सजाया गया था। उसके खंभे भी अनेक प्रकार के रत्नों से सजे हुए थे और भवन में हर ओर हीरे, मोती, मूँगे, चाँदी और सोने का उपयोग किया गया था। वहाँ बहमूल्य कालीन बिछे हुए थे और सुन्दर सुगंध फैली हुई थी।
वहाँ भी हनुमान जी को रंग-बिरंगे वस्त्र पहनी हुईं तथा आभूषणों व पुष्पों से सजी हुई अनेक सुन्दर स्त्रियाँ दिखाई दीं। उनमें से कुछ मधुपान के मद (शराब का नशा) तथा कुछ निद्रा के कारण सो गई थीं। नृत्य, गान, क्रीड़ा आदि के कारण कुछ के केश खुलकर बिखर गए थे, पुष्प कुचल गए थे और आभूषण भी खुल गए थे। किसी के वस्त्र खिसक गए थे, किसी के माथे का सिन्दूर फैल गया था और किसी के कानों के कुंडल गिर गए थे। कई स्त्रियों ने अपने हाथों को ही तकिया बना लिया था और कुछ तो इतनी बेसुध थीं कि एक-दूसरे की ही गोद में सिर रखकर सो गई थीं।
उन भवन में इधर-उधर देखते समय हनुमान जी को एक सुन्दर पलंग दिखाई दिया, जिस पर बहुमूल्य बिछौने बिछे हुए थे। हाथी-दाँत और सोने आदि से उसे सजाया गया था। उसके एक भाग में चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र था, जो सुन्दर मालाओं से सुशोभित था। उसके चारों ओर बहुत-सी स्त्रियाँ खड़ी होकर हाथों में चँवर लेकर हवा कर रही थीं। वहाँ कक्ष बहुत अच्छी सुंगध से व्याप्त था।
उस पलंग पर हनुमान जी ने दुष्ट रावण को सोया हुआ देखा। उसका पूरा शरीर भयंकर काला था। उसके अंगों में लाल चन्दन लगा हुआ था। अत्यधिक मदिरा पीने के कारण उसकी आँखें भी लाल-लाल थीं। उनके कानों में कुण्डल झिलमिला रहे थे और उसके वस्त्र सुनहरे रंग के थे।
कुछ दूरी पर छिपकर हनुमान जी ध्यान से उसका निरीक्षण करने लगे। उसकी दोनों भुजाएँ बहुत बड़ी-बड़ी थीं। उसके शरीर पर युद्धों के घाव के अनेक चिह्न थे। उसकी अंगुलियाँ और हथेलियाँ बहुत बलिष्ठ थीं। सुन्दर युवतियाँ धीरे-धीरे उसके हाथों को दबा रही थीं। उसके कुण्डलों से उसका मुख प्रकाशित हो रहा था और स्वर्ण का मुकुट पहना हुआ था। उसकी छाती पर लाल चन्दन लगा हुआ था और उसने गले में हार पहना हुआ था। उसकी कमर के निचे भाग एक ढीले-ढाले रेशमी वस्त्र से ढका हुआ था और उसने पीले रंग की बहुमूल्य रेशमी चादर ओढ़ रखी थी। उसके आस-पास ही हनुमान जी को उसकी अनेक पत्नियाँ भी सोई हुई दिखाई दीं।
उन सबसे अलग एकांत में बिछे हुए एक पलंग पर सोयी हुई एक सुन्दर युवती हनुमान जी को दिखाई दी। वह गोरे रंग की थी और उसका रूप बड़ा मनोहर था। वह रावण के अन्तःपुर की स्वामिनी थी। उसका नाम मंदोदरी था, लेकिन उसे देखकर हनुमान जी को लगा कि अवश्य यही सीता है। ऐसा सोचकर वे कुछ क्षणों के लिए अत्यंत हर्षित हो गए।
लेकिन फिर उन्होंने सोचा कि सीता जी तो इस समय अपने पति श्रीराम से बिछड़ी हुई हैं। ऐसी दशा में वे न तो श्रृंगार कर सकती हैं, न आभूषण धारण कर सकती हैं और मदिरापान तो किसी भी प्रकार नहीं कर सकती हैं। यह असंभव है कि वे अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष के निकट भी जाएँ। अतः अवश्य ही ये सीता नहीं, कोई और ही है।
उन सब स्त्रियों को देखते-देखते हनुमान जी के मन में सहसा यह विचार आया कि ‘गहन निद्रा में सोयी हुई परायी स्त्रियों को इस प्रकार देखना उचित नहीं है। यह तो अधर्म है। उन्हीं स्त्रियों के बीच मुझे उन सबका अपहरण करने वाले दुष्टात्मा रावण को भी देखना पड़ा। ऐसे पापी को तो देखना भी अशुभ है।’
लेकिन फिर उन्होंने सोचा कि ‘मैंने केवल सीता जी को ढूँढने की विवशता में ही इन सब स्त्रियों को देखा था। स्त्री को खोजने के लिए स्त्रियों के बीच ही देखना आवश्यक था, उसे वन की हरिणियों में नहीं खोजा जा सकता था। किसी भी स्त्री की ओर देखते समय मेरे मन में कोई विकार भी नहीं आया है। मेरा मन शुद्ध है, अतः इस कार्य में मुझसे कोई पाप नहीं हुआ है।’
यह सब सोचते हुए हनुमान जी उस भवन से बाहर निकलकर रावण के भोजनालय में पहुँचे। वहाँ बड़े-बड़े बर्तनों में दही और नमक मिलाकर हिरण, भैंसे, सूअर, मोर, मुर्गे, गेंडे, साही आदि का माँस रखा हुआ था। अनेक प्रकार के पक्षी, खरगोश, बकरे, भैंसे, मछली, भेड़ें आदि के माँस भी राँध-पकाकर रखे हुए थे। वहाँ कई प्रकार की चटनी, खटाई आदि भी रखी हुई थी।
वहाँ के मदिरालय में राग और खाण्डव (अंगूर और अनार के रस में मिश्री और शहद मिलाकर बनने वाली शराब), शर्करासव (चीनी से बनने वाली शराब), माध्वीक (शहद से बनने वाली शराब), पुष्पासव (महुए के पुष्प से बनने वाली शराब) आदि कई प्रकार की मदिरा भी रखी हुई थी।
लंका में अनेक स्थानों पर और उस महल में हर जगह खोजने पर भी जब सीता कहीं नहीं मिली, तो अब हनुमान जी अत्यंत चिंता में पड़ गए।
आगे जारी रहेगा…..
(स्रोत: वाल्मीकि रामायण। सुन्दरकाण्ड। गीताप्रेस)

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