Home सच्ची कहानियां वाल्मीकि रामायण सुन्दरकांड भाग 82

वाल्मीकि रामायण सुन्दरकांड भाग 82

सुमंत विद्वांस

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सीता जी ने देखा कि श्वेत वस्त्र पहना हुआ एक वानर वृक्ष की शाखा के बीच छिपा हुआ बैठा है। उसका रंग कुछ-कुछ पीला था और उसकी आँखों में तपे हुए सोने जैसी चमक थी। इस प्रकार सहसा प्रकट हुए उस वानर को देखकर वे भयभीत हो उठीं और ‘हा राम! हा लक्ष्मण!’ कहकर दुःख से विलाप करने लगीं।
उतने में ही वह वानर वृक्ष से नीचे उतरा और बड़ी विनम्रता से आकर उनके पास बैठ गया। उस विशाल और टेढ़े मुख वाले वानर को इतने निकट देखकर वे और भी व्यथित हो गईं।
तभी हनुमान जी ने उन्हें प्रणाम करके मधुर वाणी में कहा, “देवी! आप कौन हैं? किस शोक में हैं? रावण जिन्हें जनस्थान से बलपूर्वक उठा लाया था, क्या आप वही सीताजी हैं?”
तब सीताजी ने उत्तर दिया, “कपिवर! मैं महाराज दशरथ की पुत्रवधू, विदेहराज जनक की पुत्री और परम बुद्धिमान श्रीराम की पत्नी हूँ। मेरा नाम सीता है। विवाह के बाद बारह वर्षों तक मैं सुख से अयोध्या में रही। फिर तेरहवें वर्ष में जब श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी हो रही थी, तब दशरथ जी की भार्या कैकेयी ने अपने पति से वरदान माँगा कि श्रीराम को वन में भेज दिया जाए और भरत को राज्य मिले। तब श्रीराम के साथ मैं स्वयं भी वन में चली आई और उनके भाई लक्ष्मण ने भी उनका अनुसरण किया। वहाँ दण्डकारण्य में दुरात्मा रावण ने छल से मेरा अपहरण कर लिया था। उसने मेरे लिए एक वर्ष की अवधि निर्धारित की है, जिसमें से अब केवल दो मास शेष बचे हैं। उसके बाद मुझे अपने प्राणों का परित्याग करना पड़ेगा।”
यह सुनकर हनुमान जी ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, “देवी! मैं श्रीराम का ही दूत हूँ और आपके लिए उनका सन्देश लेकर आया हूँ। वे सकुशल हैं और उन्होंने आपका कुशल-क्षेम पूछा है। महातेजस्वी लक्ष्मण ने भी आपके चरणों में प्रणाम कहलाया है।”
इन शब्दों से सीता को अत्यंत हर्ष हुआ और उन्हें प्रसन्न देखकर हनुमान जी को भी बड़ी प्रसन्नता हुई। तब हनुमान जी उनके थोड़ा और निकट चले गए। लेकिन इससे सीता को शंका हो गई कि ‘कहीं यह रावण ही तो नहीं है, जो रूप बदलकर आ गया है। जनस्थान में भी वह संन्यासी का रूप धारण करके आया था।’
यह सोचकर वे पुनः दुःख से कातर होकर भूमि पर बैठ गईं। भयभीत होकर उन्होंने हनुमान जी की ओर देखे बिना ही कहा, “तुम यदि रावण हो और इस प्रकार रूप बदलकर मुझे कष्ट दे रहे हो, तो यह अच्छी बात नहीं है। वैसे मेरी यह शंका झूठी भी हो सकती है क्योंकि तुम्हें देखने पर मुझे प्रसन्नता भी हुई थी। तुम यदि सचमुच ही श्रीराम के दूत हो, तो श्रीराम और लक्ष्मण के कुछ चिह्न मुझे बताओ। उनकी आकृति का वर्णन करके मेरा संशय दूर करो। मुझे बताओ कि उनसे तुम्हारा संपर्क कहाँ हुआ तथा वानरों व मनुष्यों का यह मेल कैसे हुआ?”
तब हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा, “देवी! मैंने जिन चिह्नों को देखा है, वह मैं आपको बताता हूँ। श्रीराम के नेत्र विशाल और सुन्दर हैं, मुख चन्द्रमा के समान मनोहर है। उनके कंधे मोटे-मोटे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी और गला शंख के समान है। गले की हँसली मांस से ढकी हुई है और नेत्रों में कुछ लालिमा है। उनका स्वर गंभीर है। उनके मस्तक में तीन भँवरें हैं। पैरों के अँगूठे के नीचे तथा ललाट में चार-चार रेखाएँ हैं। वे चार हाथ ऊँचे हैं। उनके भाई लक्ष्मण भी श्रीराम के ही समान हैं। दोनों भाइयों में केवल इतना ही अंतर है कि लक्ष्मण के शरीर का रंग गोरा और श्रीराम का रंग श्याम है।”
“वानरों के राजा सुग्रीव श्रीराम के मित्र हैं। उनके ही आदेश पर मैं श्रीराम का दूत बनकर यहाँ आया हूँ। मैं सुग्रीव का मंत्री हूँ और मेरा नाम हनुमान है। जब वे दोनों भाई आपको खोजते हुए ऋष्यमूक पर्वत के निकट आए, तब सुग्रीव ने उनका परिचय पाने के लिए मुझे भेजा था। तभी मेरा उन दोनों से संपर्क हुआ था। श्रीराम ने अपने पराक्रम से वाली को मारकर सुग्रीव को वानरों का राज्य दिलवाया। उसी से हम वानरों और मनुष्यों का यह मेल हुआ है।”
“आपने अपहरण के बाद आकाश-मार्ग से लाए जाते समय वानरों को देखकर जो आभूषण फेंके, वे भूमि पर गिरकर बिखर गए थे। तब मैं ही उन्हें बटोरकर लाया था। जब वे हमने श्रीराम को दिखाए, तो उन्होंने तुरंत ही उन्हें पहचान लिया और आपका स्मरण करके वे दुःख से व्याकुल हो गए।”
“फिर आपकी खोज में सुग्रीव ने वानरों को चारों दिशाओं में भेजा। बहुत दिनों तक विंध्याचल में खोजकर हम हार गए और दुःख से पीड़ित होकर समुद्रतट पर विलाप करने लगे। तब जटायु के भाई सम्पाती ने हमें बताया कि आप समुद्र के इस पार लंका में हैं। इसी कारण मैं सौ योजन के समुद्र को लाँघकर कल रात में ही लंका आया हूँ। मैं सत्य कह रहा हूँ। आप मेरी बात पर विश्वास कीजिए।”
इस प्रकार हनुमान जी ने सीता को बहुत-सी बातें बताईं और फिर श्रीराम की अंगूठी उन्हें दिखाई। उसे देखकर सीता जी का संदेह दूर हो गया और उन्हें विश्वास हो गया कि ये श्रीराम के ही दूत हैं, कोई मायावी राक्षस नहीं।
तब सीताजी बोलीं, “कपिश्रेष्ठ! तुम निश्चित ही कोई असाधारण वानर हो क्योंकि तुम्हारे मन में रावण जैसे दुष्ट राक्षस का भी कोई भय नहीं है। स्वयं श्रीराम ने तुम्हें भेजा है, अतः तुम अवश्य ही इस योग्य हो कि मैं तुम पर विश्वास करूँ क्योंकि वे कभी किसी ऐसे पुरुष को नहीं भेजेंगे, जिसके पराक्रम तथा शील की उन्होंने परीक्षा न कर ली हो। तुम मुझे बताओ कि श्रीराम जी कैसे हैं? क्या वे मेरे लिए शोक संतप्त हैं? कहीं वे मुझे भूल तो नहीं गए? क्या वे मुझे इस संकट से उबारेंगे? वे अभी तक यहाँ आए क्यों नहीं हैं?”
यह सुनकर हनुमान जी ने कहा, “देवी! श्रीराम को अभी यह पता ही नहीं है कि आप लंका में हैं। अब यहाँ से लौटकर मैं उन्हें यह जानकारी दूँगा और तब वे शीघ्र ही वानर-भालुओं की विशाल सेना साथ लेकर निकलेंगे तथा महासागर पर सेतु बाँधकर लंका में पहुँच जाएँगे। फिर वे राक्षसों का संहार कर देंगे और आप पुनः उनके पास पहुँच जाएँगी।”
तब सीता बोलीं, “हनुमान! तुम उनसे जाकर कहना कि वे शीघ्रता करें। केवल एक वर्ष पूरा होने तक ही मेरा जीवन शेष है। अब उसमें केवल दो माह का ही समय बचा है। रावण के भाई विभीषण ने उसे बहुत बार समझाया है, किन्तु वह मुझे लौटाने की बात नहीं मानता। विभीषण की ज्येष्ठ पुत्री (बड़ी बेटी) का नाम कला है। उसकी माता ने एक बार उसे मेरे पास भेजा था। उसी ने मुझे ये सारी बातें बताई हैं। अविन्ध्य नामक एक और श्रेष्ठ राक्षस है, जो बड़ा बुद्धिमान, विद्वान तथा रावण का सम्मानपात्र है। उसने भी रावण को समझाया था किन्तु रावण किसी की बात नहीं मानता।”
यह सुनकर हनुमान जी बोले, “देवी! आप धैर्य रखिये। श्रीराम शीघ्र ही यहाँ आएँगे अथवा आप आज्ञा दें, तो मैं आपको अभी अपनी पीठ पर बिठाकर यहाँ से ले जाऊँगा और आज ही श्रीराम के पास पहुँचा दूँगा। मैं जिस प्रकार यहाँ आया था, उसी प्रकार आकाशमार्ग से आपको ले जाऊँगा।”
तब सीता बोलीं, “कपिवर! तुम्हारे साथ जाना मेरे लिए उचित नहीं है क्योंकि तुम्हारा वेग वायु के समान तीव्र है। उस वेग के कारण आकाशमार्ग से जाते समय मैं नीचे समुद्र में गिर सकती हूँ। तुम जब यहाँ से मुझे लेकर निकलोगे, तो तुम्हारे साथ स्त्री को देखकर राक्षसों को अवश्य ही संशय होगा। तब तुम मेरी रक्षा और उनसे युद्ध एक साथ कैसे करोगे? यदि तुमने वह कर भी लिया, तब भी श्रीराम का अपयश होगा क्योंकि लोग कहेंगे कि वे स्वयं अपनी स्त्री की रक्षा के लिए कुछ भी न कर सके। एक और कारण यह भी है कि रावण ने तो बलपूर्वक मुझे स्पर्श किया था, किन्तु स्वेच्छा से मैं श्रीराम के सिवा किसी पुरुष को स्पर्श नहीं करना चाहती। अतः यही सर्वथा योग्य है कि श्रीराम यहाँ आकर रावण का वध करें और मुझे अपने साथ ले जाएँ।”
यह सुनकर हनुमान जी ने कहा, “देवी! महासागर को पार करके लंका में प्रवेश करना सेना के लिए बहुत कठिन है। इसी कारण तथा आपको आज ही श्रीराम से मिलवा देने के विचार से ही मैंने आपको पीठ पर ले जाने का प्रस्ताव दिया था। अब आपकी आज्ञानुसार मैं वापस लौटकर उन्हें आपका सन्देश सुनाऊँगा, किन्तु आप अपनी कोई पहचान ही मुझे दे दीजिए, जिससे उन्हें विश्वास हो जाए कि मैं सचमुच आप ही से मिला था।”
तब सीता ने ऐसे दो-तीन निजी प्रसंग बताए, जो केवल उन्हें और श्रीराम को ही ज्ञात थे। साथ ही उन्होंने कपड़े में बँधी हुई सुन्दर चूड़ामणि भी हनुमान जी को दी। फिर सीताजी उनसे बोलीं, “हनुमान! अब तुम शीघ्र यहाँ से लौटकर श्रीराम को मेरा समाचार बताओ एवं मेरा दुःख दूर करो। इस पापी रावण ने मुझे यहाँ कैद कर रखा है व प्रतिदिन राक्षसियों द्वारा मुझे बहुत पीड़ा दी जाती है। यह पापी निशाचर बड़ा क्रूर है। मेरे प्रति कलुषित दृष्टि रखता है। फिर भी केवल श्रीराम से मिलने की आस में ही मैं किसी प्रकार जीवित हूँ। तुम श्रीराम से कहना कि वे शीघ्रता करें और यहाँ आकर मुझे ले जाएँ। उन्होंने तो मेरे लिए एक साधारण-से कौए पर भी ब्रह्मास्त्र चला दिया था, फिर वे इस नीच रावण द्वारा मेरा अपमान होने पर भी मौन क्यों हैं? अब मैं इन कष्टों को सहते हुए अधिक काल तक यहाँ जीवित नहीं रह सकती।”
यह सुनकर हनुमान जी ने पुनः उन्हें सांत्वना दी और उनसे विदा लेकर उत्तर-दिशा की ओर प्रस्थान किया।
(स्रोत: वाल्मीकि रामायण। सुन्दरकाण्ड। गीताप्रेस)
आगे जारी रहेगा….

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