Home लेखक और लेखस्वामी व्यालोक तू अपनी माँ में श्रद्धा खोता है…मेरे आँचल से स्वयं को दूर करता है।

तू अपनी माँ में श्रद्धा खोता है…मेरे आँचल से स्वयं को दूर करता है।

Vyalok Swami

by Swami Vyalok
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पूजा खत्म हुई, पर बैठा ही रहा। माँ की आँखों में आँखें डाल निहारता रहा। झपकी सी लग गयी। शायद निद्रा और जागरण के बीच की संधि थी। तभी सुगंधित समीर से मन थोड़ा सा जागा। पायल की आवाज और फिर माँ की मीटी बोली- क्यों रे, कल मैं नहीं आयी, इसलिए दुःखी है। या, बघवा ने कुछ कर दिया…हा हा हा
मैं बोला- नहीं माँ। मन थोड़ा सा थका है। क्लांत है, अवसन्न है। आखिर, यह युद्ध किनके लिए लड़ रहे हैं, हम? क्यों हमेशा खड्गहस्त रहें, सबसे अपने संबंध बिगाड़ें? क्या इस डालडा-पीढ़ी के लिए, जिसके लिए फोन का अगला मॉडल, पिज्जा की अगली डिलीवरी और ईद पर चकमक कपड़े पहनकर सेवई खाना ही सबकुछ है…जो दुर्गापूजा के आते ही दस तरह की बकवास करने लगता है, जैसे- यहाँ तो देवी की पूजा हो रही है, देश में लड़कियों से रेप, अत्याचार, आदि हो रहा है। तुझको भी नहीं छोड़ते माँ…दुर्गापूजा आर्य-आक्रमण है, महिषासुर मूल निवासी था जैसी घटिया बातें बोलते हैं, तुझे तो सब पता है।
माँ ने खप्पर में भरा कारण पान किया, फिर रक्ताभ आँखों से मेरी ओर देखा। माँ के होंठ जैसे अड़हुल के फूल। उसने अट्टहास किया तो लगा एक साथ हजारों तड़ितों की ध्वनि हुई हो। फिर, जैसे घंटियाँ बजने लगीं। माँ बोली- हा हा हा हा, मेरा पुत्र होकर और वह भी इस कलिकाल में, इतना संवेदनशील बनेगा तो कैसे चलेगा। अभी तो बहुत कुछ होगा तू भूल गया, जिसको तू बाबा कहता है, वही तेरा तुलसी बाबा, वह बालक मेरा कलिकाल के बारे में क्या लिख गया हैः
‘मारग सोई जा कहुं जोइ भावा, पंडित सोइ जो गाल बजावा,
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई, ता कहुं संत कहइ सब कोई
सोइ सयान जो परधन हारी, जो कर दंभ सो बड़ आचारी
जो कह झूंठ मसखरी जाना, कलिजुग सोई गुनवंत बखाना
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी, कलिजुग सो ग्यानी सो बिरागी…..’
उसने तो पुरोहिती को सबसे नीच कर्म भी बता दिया है–
‘….उपरोहित्य कर्म अति मंदा, बेद पुरान सुमृति कर निंदा…’
मेरे सिर से धुंध जैसे छँट रही थी। मैंने देखा कि बघवा फिर मूँछों से मुस्कुरा रहा है, जैसे कह रहा हो- कैसा घामड़ है तू, दो मिनट में शिथिल पड़ जाता है। यही बात उसकी अच्छी नहीं लगती मुझे…।
माँ की आवाज फिर गूँजी। खप्पर में इस बार रक्त था। आँखें और भी लाल हो गयी थीं, बिल्कुल शोणित की तरह…..वह बोलीं, – तेर अंदर श्रद्धा का दीप जब तक है, तू क्यों सोचता है कि मूर्ख, नराधम मेरे बारे में क्या बोल रहे हैं और क्यों बोल रहे हैं। वे बोल रहे हैं क्योंकि मेरी अकृपा है उन पर, तेरे भोलेनाथ ने भी त्याग दिया है उनको, वे एक दुर्गति के बाद रौरव नरक में जाएँगे और यह गौरवशाली मानव तन वैसे ही गँवा जाएँगे, यही उनका प्रारब्ध है। अरे, कभी तूने ही तो बताया था अपने लोगों को, उसे ही याद कर बच्चे….
मेरे मस्तिष्क में जैसे लहर से कौंधी और अपना ही लिखा याद आया…..बस्तर में 800 वर्षों से दुर्गापूजा हो रही है, वह भी 2 महीने से अधिक चलने वाली, हिमाचल, कर्नाटक से लेकर, उत्तर और पूर्व हरेक कोने में यह मनाया जाता है। नवरात्र हों या कोई भी सनातनी पूजन, नियम, व्यवहार…वह आदर्श है और जो बच्चियों के साथ हो रहा है, जो हमारे समाज में है, वह है व्यवहार। आपका व्यवहार अगर नारकीय है, तो क्या स्वर्ग की कल्पना भी छोड़ दें? आप अगर पाशविकता पर उतारू हैं, तो क्या मानवीय उच्चता की, आदर्शों की, विधान की ओर बढ़ना भी बंद कर दिया जाए, पूरे विश्व को बेहंगम करने की यह जिद क्यों है?
माँ की खनखनाती हँसी फिर मुझे जैसे उनकी ओर ले गयी। बोलीं- ये अच्छा है, इतना बड़ा हो गया तू, तुझे गृहस्थ भी बना दिया, फिर भी तेरे लिखे का भी हिसाब मैं ही रखूँ?
मैं बोला- माँ, तू तो जानती है। कभी-कभार ही क्लांत होता हूँ। खासकर अपनों का पतन देखता हूँ तो। अब देखो न.. एक और चीज देखने को आती है। हिंदुओं के ही युवक-युवतियों की ओर से। कोई ऐन दुर्गापूजा को ही मटन की तस्वीर पेश कर देगा, कोई अपने गले में बकरी का कटा हुआ सिर डाल लेगा, कोई बड़े फख्र से दावा करेगा कि पितृपक्ष हो या दीवाली, वह तो नहीं मानता…वह तो नॉनवेज खाएगा ही, खाएगी ही। कोई ऐन पितृपक्ष पर कबीर की वह कहानी जरूर साझा करेगा, जिसमें वह मरी हुई गाय को घास खिलाकर उससे दूध मांगते हैं, ताकि इसे देखकर उनके गुरु को ज्ञान आ जाए कि मरे हुए पितरों को दान देने का अर्थ नहीं।
माँ ने अट्टहास किया। बघवा भी अब पूरा दाँत चियार रहा था। जैसे, मेरी दुर्दशा पर मौज ले रहा हो। माँ बोली- देख बेटे जो Science है, विज्ञान उससे अलग है, अध्यात्म उससे भी अलग और Metaphysics बिल्कुल अलदग। तुझे फिर तेरे ही पूर्वज जिसे तुमलोग स्वामी विवेकानंद कहते हो, उसी की एक कहानी सुना देती हूँ। वह तो बड़ा तार्किक था, मेरे बेटे रामकृष्ण से भी बहस करता था, लेकिन बाद में क्या हुआ…वह मेरे ही आँचल में तो समा गया न। अस्तु, किसी मूर्ख राजा ने मूर्तिपूजा पर इसी तरह उसके सामने वाहियात टिप्पणी की थी। बोला, ‘यदि मैं आपेक रामजी की मूर्ति को छड़ी से मारूं, तो क्या वे बच पाएंगे?’ क्या वे भाग सकेंगे…आदि-इत्यादि। विवेकानंद चुप रहा। शाम को जब वह राजा के महल पहुंचे और राजा ने उनको अपने पुरखों की तस्वीर दिखायी, तो विवेकानंद ने निकाली छड़ी और कहा—अभी मैं आपकी इस तस्वीर को डंडे लगाऊं, तो आपको कोई कष्ट तो नहीं?
राजा की आंखें लाल हो गयीं। बोला, ऐसा कैसे? विवेकानंद हंसा, बोला कि आप अपने बाप दादा को लेकर इतने संवेदनशील हैं, राम तो मेरे भगवान हैं, आप भगवान नहीं मानना चाहें तो समझ लीजिए, मेरे आदि पुरखे हैं। तो बेटे, मेरे उस बेटे जैसा बन…विवेकानंद बन। क्लांत मत हो, गौरवान्वित हो कि तू मेरे आँचल में है, गर्व से भर जा, समुन्नत हो जा और उद्घोष कर कि तू सनातनी है।
मैं मिमियाता बोला- पर, असर तो पड़ता है। देखता हूँ माँ कि कुएँ में ही भंग पड़ गयी है।
माँ विहँसीं- वह भी तो मेरी ही इच्छा से पड़ी है न। तू सब मुझ पर क्यों नहीं छोड़ता…सनातन स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा है, मूर्ति पूजा से निराकार की यात्रा है, भक्ति से ज्ञान की ओर चलना है और बड़ी बात यह है कि इसमें कुछ भी बड़ा या छोटा नहीं है, सब बस हैं। जब मुझे किसी का वध करना होगा या करवाना होगा, तो निमिष मात्र में हो जाएगा, तुझसे करवाना होगा तो तुझी से करवा दूँगी। अगर किसी नराधम की बातों से तू विचलित होता है, तो समझ ले कि तू अपनी माँ में श्रद्धा खोता है…मेरे आँचल से स्वयं को दूर करता है।
बाकी, जा…जाकर नींबू-पानी पी ले अपना।
बघवा ने विजय की हुंकार मारी…पूँछ फटकारी…….

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