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विराट कोहली अब सन्त

Zoya Mansoori

by ज़ोया मंसूरी
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पहली तस्वीर में जो स्टेच्यू दिख रहा है वो हैं केरल के महान सन्त नारानाथ ब्रंथन। उन्हें अवतार भी माना जाता है। नारानाथ ब्रंथन का अर्थ है नारणम का पागल आदमी। नारानाथ ब्रंथन की कहानी केरल की लोककथाओं से आती है। उन्हें मैड मैन ऑफ केरला भी कहा जाता है।
नारानाथ ब्रंथन की कहानी शुरू होती है सम्राट विक्रमादित्य के दरबार से। विक्रम के दरबार मे एक विलक्षण विद्वान थे, वररुचि जो वेदों के महान ज्ञाता थे। नारानाथ ब्रंथन वररुचि की बारहवीं सन्तान थे। नारानाथ ब्रंथन की दिनचर्या एक पहाड़ी के ऊपर बड़ा पत्थर ले जाने से शुरू होती थी। वह कड़ी मेहनत के बाद एक बड़ा पत्थर पहाड़ी की चोटी तक ले जाते और फिर उसे नीचे धकेल देते। पत्थर को नीचे गिरते देख वह खुश होकर ताली बजाते और नाचते।
यह उनकी रोज की दिनचर्या थी और इसी दिनचर्या के चलते उन्हें पागल कहा जाता था। भूख मिटाने के लिए वो लोगों के घरों में जाकर भीख में कच्चा अनाज मांगते थे और जो कुछ भी मिल जाता उसे लेकर अग्नि की तलाश में निकल पड़ते। जहां भी अग्नि मिल जाती वहीं भोजन पकाते और खाकर सो जाते। अगली सुबह फिर उसी पहाड़ी पर पत्थर चढ़ाते और फिर उसे नीचे लुढ़का देते। ऐसी ही दैनिक क्रिया के बीच एक दिन नारानाथ ब्रंथन भिक्षा मांगने निकले। भिक्षा में अन्न मिलने के बाद उसे पकाने के लिए अग्नि की खोज शुरू हुई।
पूरा गाँव छान मारा, कहीं अग्नि न मिली। ढूंढते ढूंढते गाँव के बाहर आ गए। कुछ दूरी पर अग्नि जलती दिखाई दी। नज़दीक गए तो देखा श्मशान की अग्नि थी, चिता पर एक मुर्दा जल रहा था। नारानाथ ब्रंथन ने उसी अग्नि पर भोजन पकाया और मस्त होकर सो गए। रात गहराई तो भद्रकाली अपने साथियों के साथ आ धमकी। उन्हें वहां चुटलान्रिथा रिचुअल करना था। चुटलान्रिथा एक नृत्य है जिसे श्मसान स्थल पर देवी भद्रकाली अपने साथियों के साथ मध्यरात्रि में करती हैं।
देवी ने पहले तो नारानाथ ब्रंथन को डराने की कोशिश की ताकि वो वहां से चले जाएं लेकिन नारानाथ टस से मस न हुए। फ़िर देवी ने उनसे प्रेम से कहा कि यहां से चले जाओ, हमें यहाँ अपना धार्मिक अनुष्ठान करना है जिसे देखने की आज्ञा किसी मानव को नहीं है। नारानाथ ने कहा, आप कहीं और चली जाइए, मैं तो यहीं सोऊंगा आज रात। देवी ने उनसे वहां से जाने के बदले में कोई वरदान मांगने को कहा लेकिन नारनाथ ने कुछ भी वरदान लेने से मना कर दिया।
देवी ने जिद की तो नारानाथ ने कहा, ये बताइए मेरी उम्र कितनी है, कब तक जिंदा रहूँगा मैं। देवी ने बताया कि इस उम्र में इस दिन तुम्हारी मृत्यु होगी। नारानाथ ने कहा, ठीक है मेरी एक दिन उम्र बढा दीजिये। देवी ने कहा ऐसा करना सम्भव नहीं है तो नारानाथ ने कहा, मेरी उम्र एक दिन कम कर दीजिए। देवी ने इसे भी नियमों के विपरीत कह असमर्थता जता दी।
फिर नारानाथ ने कहा कि फ़िर मेरे बाएं पैर में हमेशासूजन और दर्द रहता है, उसे दाएं पैर में विस्थापित कर दीजिए। देवी ने हैरान होते हुए कहा कि तुम हमेशा के लिए दर्द से मुक्ति पा सकते थे लेकिन तुमने एक पैर का दर्द दूसरे पैर में विस्थापित करने का वरदान क्यों माँगा। नारानाथ ब्रंथन ने कहा क्योंकि मुझे आपसे कुछ चाहिए ही नही था।
कहानी बस इतनी ही है और इसमें जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वो ये है कि नारानाथ ब्रंथन ने वेदों को पूर्ण रूप से आत्मसात कर लिया था। वेदों का ज्ञाता होना और वेदों को आत्मसात करना अलग अलग बात है। वेदों को आत्मसात करने का अर्थ है अहंकार का त्याग। रावण हो या दक्ष प्रजापति, वेदों के ज्ञाता तो थे लेकिन उसे आत्मसात नही कर पाए इसलिए अहंकार से मुक्ति नही पा सके।
वेदों की शरण मे जाने का अर्थ है धर्म की शरण में जाना। धर्म कज शरण में जाते ही आप अहंकार से मुक्त होते हो जाते हैं। जब आप अहंकार से मुक्त हो जाते हैं तो आप सन्त हो जाते हैं। जब आप सन्त हो जाते हैं तो आपको किसी चीज़ की अभिलाषा नहीं रहती। ये जो दूसरा आदमी देख रहे आप तस्वीर में, यह बन्दा कुछ दिनों पहले तक धर्म कर्म से दूर था, होली दीवाली पर ज्ञान देता था। अहंकार, गालीबाजी, ट्रोलिंग, एग्रेशन इसकी पहचान थी।
फिर यह सनातन की शरण मे गया, ईश्वर की शरण मे, गुरु की शरण में। वृन्दावन जाने के बाद से इस आदमी ने अहंकार त्याग दिया है। आईपीएल में नवीन उल हक से उलझने वाले इस आदमी ने दिल्ली में दर्शकों से उसे ट्रोल न करने की अपील की। एग्रेशन अब इस आदमी के खेल में दिखता है, व्यवहार में नही। सफलता और उपलब्धियां वरदान बनकर इसके पास आ रही हैं। विराट कोहली अब सन्त हो गया है।

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