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हमारा ब्रह्मास्त्र

Ranjana Singh

by रंजना सिंह
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सेकुलड़िता में सराबोर,जब हम अचेत और अज्ञानी थे, हमने खूब लुटाया इस भाँड़वुड पर पैसा, स्नेह सम्मान….परन्तु जब से चेतना आयी और इन हिन्दुद्रोहियों का षड्यंत्र, विद्रूप पाखण्ड दिखने लगा, हमनें स्वयं को ही वचन दिया कि अपने पापों का प्रायश्चित हम इनके पेट पर प्रचण्ड प्रहार कर करेंगे।
बहिष्कार मतलब पूरा बहिष्कार!!!
चाहे ये सुदर्शन बना लें,महाभारत रामायण बना लें या ब्रह्मास्त्र….
सचमुच ही प्रशंसनीय उत्कृष्ट कृति भी उतार दें,इतिहास रच दें तो भी हत्यारे गैंग को चोट देनी है,तो बस देनी ही है।
किन्तु मन में कहीं न कहीं यह आशंका भी जमी हुई थी,,या कहें बनी रहती है कि,,,हम जैसे कुछ लोग न इस प्रकार दृढ़प्रतिज्ञ हैं, सेकुलड़िता को प्रगतिशीलता मानने वाले अचेत लोग तो चले ही जायेंगे इनकी जेबें भरने।
लेकिन इतने वृहत्त स्तर पर बहिष्कारी मोड को देखकर आज जो हर्ष हो रहा है,उसे शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना दुष्कर है।छपाक से लेकर लालसिंह चड्डा हो या यह बड़का ब्रह्मास्त्र,,,सबकी दुर्गति कर आपने सचमुच इतिहास रचा है।
बस इसी तरह हम चैतन्य रहें,एकजुट रहें तो इनके अहंकार की यह अट्टालिका अधिक दिनों तक गर्वोन्नत विद्रूप अट्टहास करते बनी और तनी नहीं रह पाएगी।
बहुत बहुत भारी पाप किया है इन्होंने।पूरे समाज को, संस्कृति और संस्कार को ऐसे नष्ट भ्रष्ट किया है जिससे उबरना लगभग असम्भव है।हिन्दुत्व की छाती तो इन्होंने जैसे छलनी की है,इतिहास को ज्यों विकृत किया है,मानव मूल्यों की धज्जियाँ उड़ाकर,पापियों दुष्टों का महिमामंडन और सत्पुरुषों का मानमर्दन कर केवल फिल्मी संसार को नहीं व्यक्तिमात्र को भोगी कामी अविवेकी धनलोलुप विशुद्ध भौतिकवादी असुरत्व अपनाने को प्रेरित किया है,, किसी भी भाँति क्षमा योग्य नहीं ये।
इनको पोषित करने,फलने फूलने और विध्वंसक बनने देने में एक दर्शक रूप में हमारा जो योगदान/पाप रहा है,उसका प्रायश्चित तभी होगा,हमारे पाप का भार तभी उतरेगा जब हम भी बराबर का न्याय करें।जितनी हानि उन्होंने हमारे देश संस्कृति समाज और व्यक्ति को पहुँचायी है,जब वे आर्थिक रूप से उतने ही विपन्न होंगे,तहस नहस हो जायेंगे, तभी हम पापमुक्त हो पायेंगे।
कौन कैसा है,किसके साथ क्या करना है,इसका तो भ्रम भी नहीं रहा आज।सब सामने साफ साफ सुस्पष्ट हैं।
हो सकता है अपनी दुकान बचाने को जनमानस का मूड भाँपते वे ऐसे उत्पाद हमारे सामने परोसें जिसे देख हमें लगे कि चलो ये सुधर गए,,अब इसे देख लिया जाय……परन्तु स्मरण रहे कि सड़े हुए गन्धाते नाले में से कितना भी सजा सँवारकर चमचमाते प्रॉडक्ट वे निकालेंगे,उसकी आत्मा तो वही, सड़ी हुई ही होगी? बिल्कुल कजरुद्दीन के फ्री वाले वादों की तरह?
हाँ, एक बात और….
इतिहास साहित्य मीडिया राजनीति और भाँड़वुड का यह विद्रूप सत्य हम इसलिए देख जान पाए हैं क्योंकि सत्ता एक सत्यनिष्ठ राष्ट्रसेवक के हाथ है।नहीं तो सारा विध्वंस हमारे आँखों के सामने हो रहा था,संस्कृति समाज और व्यक्ति को नष्ट भ्रष्ट किया जा रहा था,,,हम कभी देख पाते थे क्या??
आमिर परफेक्शनिस्ट, शाहरुख शहंशाह, सलमान भाई,अमिताभ महानायक,नसीरुद्दीन शबाना जावेद आदि इत्यादि लगभग भगवान,, दिलीप साब(यूसुफ खान) का नाम लेने से पहले तो भूमि आकाश को दण्डवत करते,अपने कान छूते हम नाम उच्चारित करते थे।
सभी मुस्लिम शासक महान,ईमान वाले और पण्डित/साधु/ब्राह्मण- धूर्त पाखण्डी,
क्षत्रिय- अत्याचारी क्रूर भोगी
वैश्य- लोभी कृपण ठग
हाँ, शूद्र- उपर्युक्त तीनों द्वारा पीड़ित सताया हुआ।
हिन्दू हिंदुत्व बुरा और ईसाई इस्लाम पाक साफ परोपकारी देवतुल्य…..
यही स्थापित किया गया न विगत 60-65 वर्षों में???
इतिहास के पुस्तकों में जो कोरा झूठ हमें पढ़ाया गया,मस्तिष्क में वह अमिट हो जाय,इसके लिए दृश्य माध्यम द्वारा विध्वंसकों को नायक रूप में दिखाया गया।
और तो और बड़े बड़े गुण्डे मवाली हत्यारों आतंकवादियों का ऐसा महिमाण्डन किया गया कि उनके लिए हमारे हृदय में सॉफ्ट कॉर्नर बन गए।
संयुक्त परिवार, सनातनी परम्परा ही नहीं व्यक्तिमात्र का चरित्र संस्कार इन्होंने ध्वस्त किया।सारा कुछ गलत इन्हें मात्र हिंदुत्व में दिखा,बाकी किसी मज्जब पन्थ में कोई धार्मिक सामाजिक बुराई न दिखी।बड़े ही मजे से रच रचकर इन्होंने धर्महीन सेकुलड़ हिन्दू बनाये जिन्हें बस एक हल्के धक्के में इस्लाम या ईसाइयत के घेरे में असीमित भोग स्कोप हेतु लुढ़काया जा सकता है।नाम से यदि हिन्दू रह भी गए तो मन मस्तिष्क के कामी वामी तो व्यक्ति बन ही जाय, इस प्रयास में पर्याप्त सफल हुए ये।
विषम परिस्थिति में भी प्रेम प्यार वाली कविता कहानी शायरी करने वाले सेकुलड़ी लेखकगण, बड़े बड़े डिग्रीधारी बुद्धिजीवी कहते नज़र आते हैं “ओह नो, आई हेट पॉलिटिक्स”….
मुझे हँसी आ जाती है।भैये, आप लाख शतुरमुर्ग बन जाओ, पर क्या पॉलिटिक्स से बच जाओगे,,या बचे हुए हो??
यह जो इतिहास बदला,साहित्य समाज मूल्यों का सृजन या क्षरण हुआ, इसमें क्या सत्ता की कोई भागीदारी नहीं?
नमक तेल टैक्स अवसर न्यायघर और संविधान तक सीधे सीधे सत्ता के हाथों संचालित नियन्त्रित होती है कि नहीं? तो किससे निर्लिप्त हो आप?
सत्ता सत्ता में अन्तर भी तो स्पष्ट है।एक आपको अचेत,चारा,निःकृष्ट,पददलन को अपना भाग्य समझने वाला,एक गाल पर कोई थप्पड़ मारे तो दूसरा भी उसके सुख के लिए परोस देने वाला नपुंसक क्लीव बनाती है तो दूसरा यह समझने का अवसर देती है कि उठो,जागो,निज वैभव को पहचानों और गौरव की पुनर्स्थापना करो, सही गलत में भेद करना सीखो,सत्यनिष्ठ बनो,कर्तब्यनिष्ठ बनो,झूठ के जाल और प्रपञ्च पसारने वालों के सामर्थ्य को छिन्न भिन्न कर दो।
हम सैकड़ों वर्षों से अनवरत युद्ध में हैं।पहले हमारा सीधे सीधे नरसंहार होता था,तो हम भी सामर्थ्य भर प्रस्तुत रहते थे अपनी भूमि स्त्री धर्म की रक्षा हेतु।परन्तु अब युद्ध शस्त्रों द्वारा नहीं लड़ा जा रहा,यह वैचारिकी है।हमपर भीषण आघात हो रहे हैं।हमारी भूमि जा रही है,धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्मच्युतता मिल रही है और स्त्रियों का प्रगतिशीलता के नाम नैतिक चारित्रिक पतन तो ऐसा घाव है,जिसका कोई उपचार नहीं।और हमें चैतन्य होकर इन सबकी रक्षा करनी है।हमें भी महिषासुरमर्दिनि की तरह दस हाथ और दस पैर से युक्त होकर प्रत्येक दिशा में अपनी गति रखनी होगी।न केवल उनके प्रहार को निष्प्रभावी करना होगा बल्कि उन्हें ऐसी क्षति देनी होगी कि वे आर्थिक और मानसिक रूप से पूरी तरह टूट बिखर जाएँ।अतः सतत चौकन्ने रहकर प्रभावी प्रहार जारी रहे,जहाँ भी,जब भी,जो मौका मिले।

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