Home महिला लेखकAkansha Ojha उत्तर भारत के लोग बेस्वाद खाना खाते हैं।

उत्तर भारत के लोग बेस्वाद खाना खाते हैं।

Akansha Ojha

by Akansha Ojha
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उत्तर भारत के लोग बेस्वाद, गरीबों जैसा खाना दाल रोटी खाते हैं। उत्तर भारत से उनका अभिप्राय मूलतः हम पूर्वांचली और बिहारियों से था। लिखा कोई कल्चर डैवलपमैंट नही है।आश्चर्य है ये महानुभाव कुछ दिन पहले काशी आकर हम गरीबों वाला खाना ही खा रहे थे और महादेव भगवती के क्षेत्र का अपमान कर रहे जहां अन्नापूर्णा स्वयं अन्न का दान महादेव को देतीं है।

फिर भी हमने इन दंभी व्यक्ति का वो पोस्ट किया इग्नोर किया जैसे फेसबुक पर फालतू के Ads और मूढ़मतियों के पोस्टस। विडंबना देखिये देव क्षेत्र पूर्वांचल के खानपान और पूर्वांचलियों का अपमान कर के ये व्यक्ति हिंदू एकता की बात करते हैं।

अब बात करते है इनके नये कारनामे की। शिव तांडव और शिव रूद्राष्टकम् की व्यंजनात्मक तुलना करने लगे Popularity के आधार पर। लिखते हैं शिव तांडव के छांदिक मीटर्स उच्च हैं इसलिए पापुलर है। शिव रूद्राष्टकम् पापुलर नही है।

इनका यह पोस्ट मैनें बस शिव संबद्ध देख कर शेयर कर दिया। फिर भी इनके लेखन पर कोई टिप्पणी नही की। एक मित्र Abhinav Vishwaksen Sharma द्वारा पूछे जाने पर क्या मैं इस पोस्ट से सहमत हूं कि शिव तांडव की रचना मुगल काल में की गयी थी।तब मैनें वहां मित्र को उत्तर दिया की हम काशी के शैव सम्मत हैं पापुलॉरिटी के आधार पर जाप नही करते।

शिव का आलंबन हृदय में कर हम समान भाव से शिवरूद्राष्टकम्-भुजंगप्रयात छंद, शिवाष्टकम्-पंचचामर छंद, शिव पंचाक्षर स्त्रोत- पंचचामर और भुजंग छंद, शिव तांडव स्त्रोत-पंचचामर छंद का जाप, और मानस स्मरण करते हैं। कोई Instagram reelers नही हैं जो पापुलिरिटि देखकर इस गाने पर नाचेंगे। अब ये महानुभाव इतने बड़े स्वघोषित ज्ञानविद् बनते हैं पर कोई वाद प्रतिवाद किये बिना और दूसरे पक्ष के मत की वैचारिक स्वतंत्रता को ताक पर रख ब्लाक कर के भाग गये। चलो भागे तो भागे हमें ऐसे दंभी अल्पज्ञानीयों की जरूरत भी नहीं, उल्टा अपनी वॉल पर जाकर 10 बीघा का पोस्ट लिखकर विक्टिम बनकर लोगों को बता रहे कि कैसे वो धर्म के प्रहरी हैं और हम Neo Hindu Keyboard warrior हैं और लोगों हमें ब्लाक करना चाहिए। और इनके ही कुछ चमचे चाटुकार जो स्वाध्याय से कोसो दूर रहते हैं इनकी बलायें ले रहे।

ये लोगों को शिव तांडव को मुगलकाल में लिखा हुआ बताते हुये बरगला रहे क्योंकि इनके हिसाब से पंचचामर मात्रिक छंद है जो ऊर्दू के साथ और ऊर्दू की वजह से विकसित हुयी। असल में मुगल चाटुकार। तो चलिए महोदय अभी तक तो हमने कुछ भी नही कहा था लेकिन अब कह रहे आप अल्पज्ञानी है जो संस्कृत छंद शास्त्र का अध्ययन किये बिना दंभ में आकर स्वयं को स्वयंसिद्ध स्वयंभू कर रहा।

इनके हिसाब से वैदिक काल में छंद का उद्भव हुआ ही नही। अच्छा हुआ महोदय आपका पाला काशी की संपूर्ण शास्त्रोक्त पांडित्य परंपरा से नही पड़ा वरना आप जैसे दंभी को निरूत्तरित कर बाहर का रास्ता दिखाने में क्षण भर नही लगाते। और मुझे जिसे आप कह रहे छंद का ज्ञान नहीं और Idiot कह कर संबोधित कर रहे इसी वेदसम्मत पांडित्यपरंपरा से आती हूं। जिनसे लोग वेद कर्मकांड मीमांसा की दीक्षा लेने आते थे उस बीएचयू के धर्म संकाय के डीन की प्रपौत्री हूं

जिस काशी से वेद, सूत्र, श्रौत, मीमांसा, वेदांग का उद्भव हुआ, जहां संस्कृत के ही विद्वान विराजते हैं, जहां काशी हिंदू से लेकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय शोभित है वहां के लोंगों को आप कुछ भी गलत स्वयं लिख कर बोल रहे छंद ज्ञान नही। चलिए मैं तो Idiot हूं या नहीं ये तो समय बतायेगा। मैं निरंतर अध्ययनरत रहती हूं। प्रश्न करती हूं, आत्मविवेचन करती हूं। आप जैसी नही। कालिदास को भी विद्योतमा ने मूर्ख कहा था और उन्होनें अभिज्ञान शाकुतंलम् जैसे ग्रंथ की रचना कर डाली। आप दूसरों को Neo Hindu बोल रहे और खुद गलत लिखकर लोंगों को दिग्भ्रमित कर रहे। और आप जैसे ही अल्पज्ञानी आप पर वाहवाही कर रहे।

सर्वप्रथम आपको ये ही ज्ञात नही शिवरूद्राष्टकम् का प्रकल्प क्या है। आप लिख रहे प्रभु राम ने शिव स्तुति की जिसको महाकवि तुलसीदास जी ने लिखा जबकि सत्य ये है कि महाकवि तुलसीदास ने इसी काशी विश्वनाथ मंदिर में बाबा विश्वनाथ के सानिध्य में शिव रूद्र अवतार की उपासना और स्तुति को आत्मबद्ध कर उत्तरकांड रामायण के रामचरित मानस में लिखा।

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।
बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥107ख॥

प्रेम सहित दण्डवत्‌ करके वे ब्राह्मण श्री शिवजी के सामने हाथ जोड़कर मेरी भयंकर गति (दण्ड) का विचार कर गदगद वाणी से विनती करने लगे-हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्री शिवजी मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित अर्थात्‌ मायादिरहित, मायिक गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाश रूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर अथवा आकाश को भी आच्छादित करने वाले आपको मैं भजता हूं।

जब रूद्राष्टकम् का मूल प्रकल्प ही नही पता आपको और आप प्रश्नचिन्ह लगा रहे पॉपुलिरिटी पर।
काशी भ्रमण पर गये तो मानस मंदिर में सरंक्षित रामचरित मानस पढ़ जरूर लेनी चाहिये थी आपको।
अब चलिए आपके मूल पोस्ट का अवलोकन करते हैं। सबसे पहले तो आप और आपके फैंस और फैन क्लब दोनों के लिए बता दूं शिवतांडव का पंचचामर छंद और शिवरूद्राष्टकम् का भुजंगप्रयात छंद दोनों ही मात्रिक नही अपितु वर्णिक छंद है। वर्णिक छंद उसे कहा जाता है जिसके प्रत्येक चरण में वर्णों का क्रम तथा वर्णों की संख्या नियत रहती है। जब लघु गुरु का क्रम और उनकी संख्या निश्चित है तो मात्रा स्वयंमेव सुनिश्चित है। वर्णिक छंद की रचना में उस के वर्णों के क्रम का सम्यक ज्ञान और पद के मध्य की यति या यतियों का ज्ञान होना ही पर्याप्त है। वर्णिक छंदो में रचना करने के लिए ह्रस्व या दीर्घ मात्रा के अनुसार केवल शब्द चयन आवश्यक है। जैसे – मेरी “सुमति छंद” की रचना का एक उदाहरण देखें जिसका वर्ण विन्यास- 111 212 111 122 है।


“प्रखर भाल पे हिमगिरि न्यारा।
बहत वक्ष पे सुरसरि धारा।।
पद पखारता जलनिधि खारा।
अनुपमेय भारत यह प्यारा।।”

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