Home महिला लेखकज़ोया मंसूरी दुर्योधन, महाभारत का एक नकारात्मक किरदार

दुर्योधन, महाभारत का एक नकारात्मक किरदार

by ज़ोया मंसूरी
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दुर्योधन, महाभारत का एक नकारात्मक किरदार जिसे मृत्यु पश्चात पांडवो के साथ स्वर्ग में जगह मिली। अधर्म के रास्ते पर चलने वाला दुर्योधन आखिर स्वर्ग का हकदार क्यों बना। महर्षि व्यास ने बहुत कूटरचित तरीके से इसका वर्णन किया है। एक विशाल साम्राज्य का राजकुमार दुर्योधन, जिसके पिता धृतराष्ट्र जन्म से अंधें थे और माँ गांधारी नेआँख में पट्टी बांध कर स्वयं अंधत्व को ग्रहण किया।
बालक दुर्योधन किस राह पर है ये देखने मे न माँ को रुचि थी, न पिता को। एक बालक की प्रथम गुरु उसकी मां होती है लेकिन दुर्योधन इससे वंचित रहा। उसे देखने वाला कोई नहीं था। मानव स्वभाव से अटेंशन चाहता है। बिना अटेंशन मानव के होने पर उसका मन सन्देह खड़ा कर देता है। दुर्योधन सनातन की मूल धारणा ‘दर्शन’ से वंचित रहा।
मन्दिर में हम दर्शन करने ही जाते हैं। देवी के ईश्वर के दर्शन करने। पूजा मन्दिर जाने का प्राथमिक उद्देश्य नहीं है, प्राथमिक उद्देश्य है ईश्वर के दर्शन। हर मन्दिर में देवी देवता की आंखें आम आंखों से बड़ी होती है, उनमे पलकें नहीं बनाई जाती है। यह दर्शन का प्रतीक है। तुम ईश्वर को देखो, ईश्वर तुम्हें देखेंगे। ईश्वर की अभय मुद्रा देखो, उनके हाथों के अस्त्र शस्त्र देखो, उनकी भंगिमा देखो, उनकी मुद्राएं देखो, उनके वस्त्र देखो, उनके आभूषण देखो।
विष्णु में हाथों में शंख चक्र देखो, दुर्गा के हाथों में त्रिशूल देखो, शिव के शीश का चंद्रमा देखो। शीश पर चन्द्रमा धारण करने वाले शिव सोम-सुंदर कहलाते हैं। भगवान विष्णु की तरह शिव अवतार नहीं लेते, शिव स्वरूप धारण करते हैं। शिव ने सोम सुंदर स्वरूप में माता पार्वती से विवाह किया था। सोम सुंदर अर्थात चन्द्रमा की तरह सुंदर। चन्द्रमा को समस्त देवताओं में सबसे सुंदर माना जाता है।
शिव पति के रूप में सोम सुंदर हैं। करवाचौथ पर चन्द्रमा के साथ पति का दर्शन इस बात का प्रतीक है कि आपका पति चन्द्रमा से भी सुंदर है। हो सकता है कद काठी पहनावा और चेहरा सुंदर न हो लेकिन एक पुरुष को पति के रूप में, पिता के रूप में उसके संघर्ष चांद से खूबसूरत बनाते हैं। एक पुरूष, जो पति के रूप में पत्नी के लिए, पिता के रूप में बच्चों के लिए जीता है और बेटे के रूप में मां बाप के लिए, वह हर हाल में चन्द्रमा से सुंदर है।
जिसके लिए अपनी खुशियों और अपनी जरूरतों से पहले पत्नी और बच्चों की जरूरतें प्राथमिकता है, वह पुरूष चांद से भी सुंदर हैं। करवाचौथ सनातन की मूल धारणा ‘दर्शन’ का एक मजबूत प्रतिविम्ब है। रिश्तों से जुड़ी ऐसी मजबूत परम्परायें धारण करने वाला सनातन स्वयं चाँद से सुंदर है।

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