Home विषयजाति धर्मईश्वर भक्ति अक्षय तृतीया इन्दु महोत्सव और परशुराम का प्राकट्य दिवस | प्रारब्ध

अक्षय तृतीया इन्दु महोत्सव और परशुराम का प्राकट्य दिवस | प्रारब्ध

लेखक - त्रिलोचन नाथ तिवारी

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अक्षय तृतीया इन्दु महोत्सव और परशुराम का प्राकट्य दिवस तीनो एक दिन ही होते है किन्तु इन सबकी बातें क्या करना? और क्यों करना? इस पटल की समस्त दृश्य-अदृश्य चप्पा-चप्पा भूमि पर आज इन्ही तीन के ज्ञात, अल्पज्ञात अथवा अज्ञात विरुद के शिलालेख ही तो भरे पड़े हैं। एटाटूकू ज्ञान रे बाबा? आमी तो क्लांतो होस्चे गेलो। सब छेड़े दाओ। आपनी तो एक टु कोथा सुनो।

 

मूल कहानी में कौवे हैं, किन्तु मैंने उनको कबूतरों में बदल दिया है। विवशता है! विवशता यह है कि सन्दर्भ से कौवे जुड़ नहीं पायेंगे।
सन्दर्भ बाद में! पहले कहानी।
मुसलमान राजाओं के अन्तःपुरों में रहने वाले नपुंसक सेवक होते थे, जनखा, उन्हें खोज़ा कहा जाता था। इनका एक सरदार भी होता था, बादशाह का करीबी, वफ़ादार, और इन्तजाम ए हरम का जिम्मेदार!
अकबर के हरम में भी एक खोज़ा सरदार था जो बीरबल से बहुत चिढ़ता था। भैंगी आँखों वाला वह दारोगा ए हरम खोज़ा अकबर का बहुत मुँहलगा भी था सो वह अकबर के कानों में बड़ी शाइस्तगी और सफायी से कुछ न कुछ ऐसा डाल दिया करता था जिससे बीरबल को परेशानी का सामना करना पड़े।
एक बार उसने अकबर से कहा – हुजूर! आगरा में कौवे (अब आगे से इसे कबूतर लिखा जायेगा) बहुत बढ़ गये हैं। जैसे इन्सानों की मर्दुमशुमारी होती है वैसे ही इन कबूतरों की भी होनी चाहिये।
अकबर ने कहा – अबे! आगरा के सारे कबूतर कौन गिनेगा?
खोज़ा दर हरामी!
जानता था कि ये सवाल आयेगा ही आयेगा।
तपाक से बोला – हुजूर! बीरबल तन्खा किस बात की लेते हैं?
नशे में टुन्न अकबर को बात जँच गयी। दूसरे दिन दरबार में बीरबल को हुक्म हुआ – आगरे में कितने कबूतर हैं गिन कर बताओ!
बीरबल क्या कम काँइँयाँ?
बोला – हुजूर वक्त लगेगा गिनने में। दिन भर दरबार चलता है। सुबह-शाम में कितनी गिनती हो पायेगी?
अकबर बोला – दरबार की चिन्ता छोड़ो! दिन भर गिनो तो कितना वक्त लगेगा?
बीरबल ने कहा – परिन्दे हैं जहाँपनाह! कब किस डाली पर से उड़े, किस छत पर जा बैठे? कम से कम छह महीने तो लगेंगे। और एक दिन होती है तन्खा की, जो मैं लेने आऊँ तो जाने कितने इधर के उधर हो रहें?
तन्खा तुम्हारे घर पहुँच जाया करेगी बीरबल! तुम काम को अन्जाम दो!
बीरबल मूँछों में मुस्कराया और बोला – तो हुजूर इजाजत दीजिये! बन्दा कबूतर गिनने चला!
छह महीने बीरबल ठाठ से खाता पीता सोता घूमता रहा और उसकी तन्खा ब कायदे ब वक़्त उसके घर पहुँचती रही।
छह महीने बाद बीरबल दरबार में पहुँचा।
अकबर ने पूछा – गिन लिया?
बीरबल बोला – जी हुजूर!
अकबर ने पूछा – कितने हैं?
बीरबल बोला – सत्रह लाख छप्पन हजार सात सौ बत्तीस।
अब आप संख्या पर बहस न करना।
हो सकता है कि बीरबल ने कुछ और संख्या बतायी हो।
कौन सी उसने सच में गिनी थी जो ऐतिहासिक अभिलेख है? और कौन सा मैं वहीं खड़ा था जो ठीक ठीक सुन कर ठीक ठीक बताऊँ आपको?
मतलब सिर्फ इतना, कि बीरबल ने ऊटपटाँग कुछ हाँक दी।
खोजवा सार वहीं था। उसने लुत्ती लगायी – और जो कम या ज्यादा निकले तो?
अकबर दर चूतिया!
उसने भी कहा – येस! अगर कम या ज्यादा निकले तो?
बीरबल ने उत्तर दिया – हुजूर! कबूतरों की भी तो रिश्तेदारियाँ हैं! कुछ रिश्तेदारियों में आगरे से बाहर गये हो सकते हैं, कुछ रिश्तेदारियों में बाहर से आगरे आये हो सकते हैं। आगरे के क़ायम बाशिंदा – मूल निवासी कबूतर इतने ही हैं जितना मैंने बताया।
अब सन्दर्भ।
भाई इं. प्रदीप शुक्ला!
कबूतर आगरे में आते और आगरे से जाते रहते हैं।
तो,
एक तो आगरे का हर कबूतर आगरे का क़ायम बाशिंदा नहीं,
और दूसरे,
आगरे का हर कबूतर आपकी ही या आपके अगल-बगल वाली छत पर ही उतरे यह जरूरी नहीं जहाँपनाह!
आज ईद थी य्यार!
आये होंगे कुछ कबूतर बाहर से आज तुम्हारे आगरे में रिश्तेदारियाँ निभाने! सिवइयां खाने, या सिवइयां पहुँचाने!
रहा सवाल पड़ोसियों से निस्बत बढ़ाने का –
तो, बकौल बशीर बद्र –
यूँ ही बे-सबब न फिरा करो।
कोई शाम घर में रहा करो।
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है,
उसे चुपके चुपके पढ़ा करो।।
कोई हाथ भी न मिलाएगा
जो गले मिलोगे तपाक से!
ये नए मिज़ाज का शह्र है
ज़रा फ़ासले से मिला करो।।
अभी राह में कई मोड़ हैं
कोई आयेगा, कोई जायेगा।
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया
उसे भूलने की दुआ करो।।
मुझे इश्तिहार सी लगती हैं
ये मोहब्बतों की कहानियाँ!
जो कहा नहीं वो सुना करो!
जो सुना नहीं वो कहा करो!!
कभी हुस्न-ए-पर्दा-नशीं भी हो
ज़रा आशिक़ाना लिबास में!
जो मैं बन सँवर के कहीं चलूँ
मेरे साथ तुम भी चला करो!!
नहीं बे-हिजाब वो चाँद सा
कि नज़र का कोई असर न हो!
उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से
बड़ी देर तक न तका करो।।
ये ख़िज़ाँ की ज़र्द सी शाल में
जो उदास पेड़ के पास है!
ये तुम्हारे घर की बहार है!
उसे आँसुओं से हरा करो!!

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