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भारतीय लोकतंत्र में हिन्दू अधिकार

by Jalaj Kumar Mishra
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भारत का संविधान हर किसी को यह आजादी देता है कि वह जब चाहे मुँह उठा कर हिन्दुओं की सभ्यता, संस्कृति या उनके आराध्यों को भला- बुरा कह सकता है। जब इससे भी मन ना भरे तो मनगढ़ंत व्याख्या करके कीचड़ भी उछाल सकता है और इसके लिए हिन्दू समाज उसका कुछ नही कर सकता है।
इसी आधार पर भारत में विदेशी चंदो पर पेड बुद्धिजीवी लोगों की सेना तैयार हुई, जो सिर्फ इस बात पर दिमाग लगाते हैं कि अब हिन्दुओं को किस- किस तरीके से जलील करना है, ताकि वे टूट सकें और धर्म परिवर्तन कर सकें! इस नाम पर करोड़ों के विदेशी चंदा समाज- सेवा के नाम पर आता है और उसका धर्म परिवर्तन कराने के नाम पर इस्तेमाल किया जाता है। भारत कानून इसको रोकने के लिए पसीने से लथपथ हो जाता है फिर थककर मदिरा के साथ निद्रासन में डूब जाता है।
भारतीय हिन्दू भोलेपन में भेड़ों से भी ज्यादा भोला होता है! वह आजतक इन पेड बुद्धिजीवी भेड़ियों को समाज में स्थापित करता आ रहा है! उनको मजबूत करके खुद कटने का पूरा प्रबंधन स्वयं करता है। इतना तक तो चलो चल‌ भी जाये, लेकिन उस समय मन खुशी से तृप्त हो जाता है, जब विश्व के तमाम समस्याओं के लिए देश का सुप्रीम कोर्ट हिन्दू प्रतीकों, हिन्दू कर्मकांडों, पुरा संस्कृति और परम्पराओं पर प्रश्न खड़े करने लगता है।
भारत का हिन्दू समाज भी गुलामी की मार से इतना मस्त रहने लगा है कि उसे अब इस बात का एहसास ही नही होता है कि उसे दबाते -दबाते उसका कचूमर निकाल दिया गया है। भारत के पेड बुद्धिजीवी समुदाय ने अपने मन में एक बात बैठा ली है कि इस भारत में जो भी अच्छा हुआ है, उसमें मार्क्स के चाचा और लेनिन के दामाद का हाथ है, इसके विपरीत जो भी बुरा हुआ है, उसमें यहाँ के ब्राह्मणों और यहाँ के दर्शन का हाथ है।
भारत के हिन्दुओं के पास अब अधिकार के नाम पर साँस लेने जैसी महत्वपूर्ण आजादी बची हुई है, यह क्या कम है! इसमें दोष तो भारत के हिन्दुओं का ही माना जाएगा, न कि लेनिन के दामादों का! वसुधैव कुटुम्बकम के नाम पर मुसलमानों को बुलाया, लेकिन इस्लामिक शरिया को अभी तक जगह नही दे पाये हैं।
क्या फर्क पड़ेगा अगर इस देश के भाग्यविधाता बाहर से आये लुटेरों के औलादों को बना दिया जाये! हिन्दुओं का गला तो अब भी रेता जाता है, तब भी रेता जाएगा! संविधान आज भी टुकुर- टुकुर देखा है, कल‌ भी देखेगा! अगर गलती से नजर पड़ भी गयी तो कुछ पैसों के साथ सिलाई मशीन भी उपहार स्वरूप मिल ही जाएगी।
हिन्दुओं का क्या! वे कल भी प्रभु श्रीराम के भरोसे थे और आगे भी रह ही लेंगे। अधिकार का क्या अचार डालना है! अधिकारों के नाम पर हिन्दुओं ने अपने महापुरुषों‌ को जाति में बाँटकर जयंती और पुण्यतिथि का जो सिलसिला शुरु किया है, वह अपने में ही लड़-कटकर मरने के लिए बहुत ज्यादा है। हिन्दू संगठन के नाम पर संगठित होकर क्या मिलेगा? जाति वाले संगठन के नाम पर अगर लह गया तो मंत्री पद भी पक्का है।
अनेक सभ्यताओं, संस्कृतियों,राजतंत्र और रियासतों के बाद अंग्रेजी हकुमत जब अपनी आखिरी साँसे गिन रही थी, हमारे बुजुर्गों ने लोकतंत्र का सपना देखा और भारत के टुकड़े कर के आजाद भारत में मजहब के नाम पर बंटवारे का घाव दे दिया,जो अभी ढंग से भरा नहीं था ।उस समय दुनिया मे जो भी समृद्ध संविधान थे, उसमें से अपने देशों की विविधताओं के हिसाब से शासन करने की पद्धति शायद इसीलिए विकसित किया कि हिन्दुओं का शोषण भरपूर होता रहे। हिन्दुओं के रक्त को‌ चूस कर, उनके मठ और मंदिरों की सम्पतियों को हड़प कर विधर्मियों के बच्चे हुनर हाट और प्रशासनिक सेवाओं में लगातार चमकते हुए दिख‌ रहें हैं, यह क्या कम है।
लोकतंत्र के हित और हिन्दू अधिकारों के नाम पर सरकार पाँच किलो राशन भी तो आखिर दे ही रही है, अब क्या जान दे दे !
कृपा शंकर मिश्र ‘खलनायक’ आप जैसे‌ है बने रहिए! आपका आशीष हम सभी पर बना रहे! आपका यश बढ़े! कीर्ति बढ़े! जन्मदिन की हार्दिक बधाई और मंगलकामना भैया।

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