Home मधुलिका यादव शची मदन का पतन जैसे ही शिव की दृष्टि से

मदन का पतन जैसे ही शिव की दृष्टि से

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मदन का पतन जैसे ही शिव की दृष्टि से हुआ वैसे ही संसार से रति की माया का लोप हो गया,
कर्ता चिंतित हो उठा …!
क्या अब यह सृष्टि थम जाएगी..?
क्या सृष्टि अपनी आयु पूरी कर चुकी है और अब स्वयं जड़ बनने की ओर अग्रसर है ..!
कर्त्ता के मन में जब यह प्रश्न चल रहे थे तब सृष्टि के सभी तत्व परम पिता की ओर एकांकी भाव से निहारने लगे..!
रासायनिक क्रियाएं थम चुकी थी, यौगिकों का निर्माण स्थिर होना बता रहा था कि अब संसार में क्रियाओं का विलोपन हो चुका है …!
शिव शक्ति ने जिस विकार के संयोग से जिस आवेग को जन्म दिया था उसने सृष्टि के प्रति अपनी कर्तव्यनिष्ठा का जैसे त्याग कर दिया हो , जैसे वो क्रोधित हुए शिव के मौन के साथ वहीं कहीं उनमें अक्रिय हो चुका था।
सार्वभौमा ने जब कर्ता की ओर अपनी दृष्टि की तो उसने देखा कर्ता निराशा से शिव की ओर आशा से देख रहा था कि कब वैरागी उठे और सृष्टि चंचल हो,
अपनी संयुक्ता को त्याग कर बैठा ये शिव मनुष्यों की भांति हठी हो गया है , भूल गया है कि सृष्टि इसी में है , यदि ये अधिक काल तक ऐसे ही रहा तो यह सृष्टि मौन हो जाएगी…!
अयोनिजा कर्ता को इस तरह से चिंतित देखकर मुस्कुरा उठी जिससे प्रकृति की संतानें प्रसन्नता से झूम उठी, कुंदन पर बैठकर भवरे पराग का परिष्करण करने लगे , खगों और मृगों ने अपनी चंचलता दिखानी प्रारम्भ कर दिया..!
रचयिता अपनी रचना को जीवित देखकर शिवप्रिया को बारम्बार प्रणाम करने लगा ,
अपर्णा नंदी की ओर देखती हैं और कहती हैं..,
हे शिव के प्रिय जाईये और उस अगोचर योगी से कहिये “मैं” आयी हूँ…?
नंदी ने कहा.. क्षमा करें देवी यहाँ ” मैं” का स्थान नहीं है
यहाँ मैं को त्यागकर ही मनुष्य शिव के शिवत्व को प्राप्त कर सकता है .।
शर्वाणी मुस्कुराकर बोली.. हे शिव के प्रिय ऋषभ राज
“मैं” के लिए ” मैं” में स्थान नहीं रहेगा तो कहां रहेगा, “मैं” के अतिरिक्त कुछ है भी क्या…?
“मैं “का” मैं” से विलग होना ही ” हम ” को जन्म देता है पर हे भक्तराज ” हम” का विलय सृष्टि के अंत में “मैं” में ही हो जाता है ..!
पार्वती के शब्द सुनकर नंदी मौन हो गए और चिदानंद संदोह् के समीप जाकर बोले: हे देव बाहर प्रतीक्षा कर रही देवी का कहना है कि जाकर कह दो स्वयं से स्वयं मिलने आया है..!
मन्मथारी ने भृकुटि से नंदी को उस स्वयंभूता को आने देने के लिए कहा..
स्वयंभूता शिव के समीप पहुंचकर उनके चरणों पर अपना सिर रख देती हैं और अश्रुओं से निर्मित हुई गंगाजल की धारा से शिव के चरणों का अभिषेक करने लगती हैं,
मदन को जीतने वाले शिव द्रवीभूत होकर बोले;
उठो देवी ..!
मेरा आशीर्वाद है ..आपको ऐसा वर मिले जिसने कभी भी दूसरी स्त्री को न देखा हो।
शिव के मुख से जैसे ही यह वाक्य निकले जड़ हो रही सृष्टि पुनः चैतन्य होकर चहकने लगी, शिव जो कुछ काल बाद अपने निराकार स्वरूप में चला जाता वो पुनः आकार के संसार में आने लगा था, शिव अपने ही आशीर्वाद में बंध चुके थे ।
शिव पार्वती की सुंदरता को एकटक निहारने लगते हैं , शिव को अपनी ओर प्रेम भाव से देखते हुए पार्वती लज़्ज़ा से अपनी पलकों को झुका लेती हैं और मन्द मन्द मुस्कुराने लगती हैं।
रचयिता ब्रम्हा अपनी सृष्टि को पुनः जीवित होते देख प्रसन्न होकर जय जयकार करने लगते हैं।

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