Home लेखक और लेखदेवेन्द्र सिकरवार मनोविज्ञान_व_इष्टदेवता

मनोविज्ञान_व_इष्टदेवता

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मानव मन बड़ा विचित्र है। यह सदैव विपरीत की ओर आकर्षित होता है और होना ही है आखिर ब्रह्मांड का समस्त कारोबार इलेक्ट्रॉन-प्रोटोन, कणों-प्रतिकणों के पारस्परिक व्यवहार पर ही तो चलता है।
जब भारत की वैविध्यपूर्ण भूमि को देखता हूँ और बहुविधि छटाओं को तो कोई आश्चर्य नहीं होता कि ईश्वर ने हिंदुत्व जैसी उदार सनातन संस्कृति के जन्म व पोषण के लिए इस भूमि को चुना।
आर्य ऋषियों ने भी इस सत्य का साक्षात्कार किया और ऐसे अद्भुत विधान बनाये कि प्रत्येक मनुष्य को अपने परिवेश, देशकाल व प्रवृत्ति के अनुसार विकास के अवसर उपलब्ध हों चाहे वह आध्यात्मिक विकास ही क्यों न हो।
मनु की संतानें हिमालय के शीत वातावरण से उतरीं तो उनकी अग्नि उपासना का प्राधान्य कब जलाशयों, स्नान व अभिषेक से जुड़ गया हमें पता ही नहीं चला।
उपासना व आध्यात्म की यात्रा जारी रही और एकेश्वरवाद के सर्वोत्कृष्ट रूप सर्वेश्वरवाद ने इस सुंदर भूमि को मानव मन की प्रकृति के अनुसार देवपूजाओं से सजा दिया।
दौड़ाइये नजर अपने चारों ओर।
बहुविधि देवता, बहुविधि मनुष्य, बहुविधि वातावरण।
अलख निरंजन के मर्म को जानते हुए भी भारत के अलग अलग प्रांतों में अलग-अलग देवताओं का बाहुल्य।
कश्मीर- कठोर शीत में अगर सूर्यपूजा प्रचलित हुई तो क्या आश्चर्य? ठिठुरती शीत में भी निर्विकार घूमते महादेव को देख शैव दर्शन क्यों न पनपता।
हिमाचल व उत्तराखंड- एक दूसरे से दूर दूर बसे अपने में मस्त असंपृक्त गाँव तो जाहिर है हर गांव व क्षेत्र का कोई न कोई ठाकुर अपनी ठसक में विराजकर यात्रा पर निकलेगा ही।
पंजाब-उन्मुक्त और आजाद लोगों का प्रदेश और उन्हें जरूरत थी अनुशासन की तो पंच ककार में बंधा सिख संप्रदाय व पनपा आर्यसमाज।
उत्तरप्रदेश, बिहार- संसार का सबसे उपजाऊ डेल्टा। जाहिर है लोग आलसी होने ही थे और ऐसे लोगों ने दर्शन व पुस्तकों के ढेर लगा ही देने थे। ऐसे धनी क्षेत्र के सुसंस्कृत लोग महादेव, बुद्ध व महावीर की ओर आकर्षित हुये।
आह!कितने निस्पृह, कितने वीतराग कि दिगंबर बनकर घूमते हैं।
काश हम भी ऐसे हो पाते।
राजस्थान- दिनरात घोड़ों की पीठ पर सवार रहने वाले दुर्धुष योद्धाओं का प्रदेश। लेकिन लौह वक्ष वाले इन योद्धाओं के भीतर एक ह्रदय भी था जो पत्नी, प्रेयसी, बहिन, माँ के प्रेम के लिए तरसता था लेकिन परिस्थितियां तलवार को छोड़ने न देती थीं।
दुर्गा पूजा की ओर झुकाव स्वाभाविक था लेकिन बलि के साथ।
बंगाल: अत्यधिक आर्द्र जलवायु व अत्यधिक मछली सेवन के कारण कुशाग्र मस्तिष्क पर अपेक्षाकृत सुकोमल शरीर वाले पुरुष और सर्वाधिक आकर्षक रहस्यमय नयनों वाली स्त्रियों के देश में पंचमकार साधना वाली शक्ति पूजा होनी ही थी।
महाराष्ट्र: सह्याद्रि की दुर्गम पहाड़ियों में दो वक्त की भाखर के लिए ज्वार उपजाने का संघर्ष करते ठिगने पर चीते से फुर्तीले मर्द मराठाओं का इलाका।
मोदक का भोग लगाते तुंदिल गणपति कितना लुभाते होंगे।
दक्षिण भारत- सांवले सलोने मेहनती प्रायःद्वीपीय हिंदू। मेहनत तो थी पर समृद्धि भी।
प्राकृतिक सौंदर्य की अधिकता में अगर शैव व वैष्णव भक्ति आंदोलन को यहाँ नहीं तो फिर कहाँ जन्म लेना था। विवेकानंद के सबसे ज्यादा चेले यहीं बने।
उत्तरपूर्व- यह वह क्षेत्र है जहाँ संप्रदायों का विकास अभी भी आकार ले रहा है। उत्तरपूर्व का भोजन वसन वैष्णव सम्प्रदाय के अनुरूप नहीं था। अगर वहॉं शैव व शाक्त संप्रदाय विकसित होते तो ईसाई धर्म कभी जड़ न जमा पाता लेकिन यह भी उनकी प्रवृत्ति के अनुरूप नहीं।
मेरी भविष्यवाणी है कि अगर वहाँ शैव व शाक्तों ने प्रभाव विस्तार नहीं किया तो इस्लाम ईसाइयत को उखाड़ देगा।
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Note:- यह अवलोकन व्यक्तिगत नहीं क्षेत्रीय प्रवृत्ति के अनुसार है अतः व्यक्तिगत रुचि के अनुसार टिप्पणी न करें।

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