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महिषासुर का महाउग्र विनाशक महिष रूप का माँ ने कैसे किया संहार

by रंजना सिंह
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बलमद में उन्मत्त महिषासुर ने महाउग्र विनाशक महिष का रूप धारण कर चराचर जग को त्रास देना आरम्भ किया और क्रोधोन्मत्त होकर जगन्माता को धराशायी करने पहुँचा।अपने पाश से जब माता ने उसे बाँधकर विवश कर दिया तो उसने रूप बदलना आरम्भ किया।कभी हाथी,कभी सिंह ,कभी खड्गधारी पुरुष का तो कभी महिष का रूप धर वह विध्वंस मचाता।एक रूप के निष्फल प्रभावहीन होते ही वह दूसरा रूप धर लेता और चराचर को दारुण दुःख देता।जब परपीड़ा और विध्वंस ही किसी की प्रवृत्ति हो,इसे ही वह अपना धर्म मानता हो तो रूप नाम पहचान चाहे उसका जो भी हो,कर्म तो सदैव एकसे ही रहेंगे।अन्त में माता ने उसके रूपांतरण क्रम को बाधित करते जब उसके कण्ठ पर शूल से भीषण प्रहार किया, तभी उसके प्राण छूटे और उसके आतंक से तीनों लोक मुक्त हो पाए।
वे विध्वंसक भी नाम रूप बदलने में अत्यन्त कुशल हैं।उनके पास नामों की भी कोई कमी नहीं।एक रूप/नाम बाँधा(बैन) जाएगा, वे दूसरे रूप नाम से अपने एकमात्र उद्देश्य में सन्नद्ध हो जायेंगे।जबतक उनके शक्ति के मूल पर प्रहार कर पूरी तरह नष्ट नहीं किया जाएगा,,वे विध्वंस मचाते ही रहेंगे।विध्वंस उनका धर्म,संगठन उनकी शक्ति और अन्य अधर्मप्रेमी(वामी) उनके पोषक संरक्षक हैं।इस क्रूर समूह से ,इनसे क्रूर और मारक शक्ति ही निपट सकती है,इन्हें नियंत्रित रख सकती है।चीन के उइगर उतने ही शक्तिशाली, विध्वंस में सक्षम तथा क्रूर हैं जितने आईएसआईएस तालिबानी अलकायदा या इनके जैसे अन्य।पर वहाँ ये निर्बल भी हैं और पीड़ित भी,,क्योंकि इनको नियंत्रित करने वाला इनसे अधिक क्रूर और शक्तिशाली है,अमानवीयता उनकी भी प्रवृत्ति है।बौद्धों ने इनसे तंग आकर अपने अहिंसक नीति को थोड़े समय के लिए बगल में रखकर जब कठोरतापूर्वक इन्हें खदेड़ा तो अधनंगे भागते हुए ये भारत बांग्लादेश आदि की तरफ निकले।किन्तु आश्चर्य कि रूप इनका दीनहीन शरणार्थी वाला भले दिखता है, सोच समझ प्रवृत्ति में ये दीन नहीं।रहने खाने जैसे मूल सुविधाओं के प्रश्न/अभाव के बीच भी सम्पूर्ण समर्पित भाव से धर्मयुद्ध के लिए अपनी संख्या बढ़ाने में सनद्ध हैं, ताकि जैसे ही अवसर मिले विध्वंस कर्म में लिप्त हों।अपने पुस्तक का राज कायम करें।
इनकी आक्रामक प्रवृत्ति का दमन नियंत्रण केवल और केवल इनके प्रति कठोर आक्रामक रहकर ही किया जा सकता है।प्रेमप्यार से समझाते, धन पद देकर संतुष्ट शान्त करने का प्रयास करना कोरे भ्रम और मूर्खता से अधिक और कुछ नहीं।
किन्तु सरकार भी वह कठोरता तभी ला सकती है जब शान्ति सुव्यवस्था की अभिलाषी जनता पहले तो विध्वंसक समूह की ही भाँति एकजुट हो और फिर एकजुट वह बल और विश्वास सरकार को दे।जिन प्रदेशों में जनता ने यह बल सत्ता को दिया है,वहाँ के जनता और सत्ता के रँगरूप चालढाल कोई भी स्पष्ट रूप से देख सकता है।

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