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लक्ष्मी और सरस्वती के प्रतिरूप में एक अन्तर

by Swami Vyalok
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लक्ष्मी और सरस्वती के प्रतिरूप में एक अन्तर सबने देखा होगा। लक्ष्मी चंचला हैं, वह जाने को सदा तैयार खड़ी रहती हैं। सरस्वती का अनुग्रह जिस पर हो जाये, वहीं स्थिर हो जाती हैं। इसलिए वे बैठी रहती हैं। इसका निहितार्थ यही कि धन कितना भी अर्जित कर लें, वह कभी भी हाथ से निकल सकता है। एक बार यदि ज्ञानार्जन कर लें तो वह अस्थिर नहीं, स्थायी हो जाता है।
श्री आदिगुरू शंकराचार्य ने देश की चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना करने का पवित्र निश्चय किया। इसी क्रम में महर्षि विभाण्डक की तपोभूमि और ऋष्यश्रृंग की जन्मभूमि रहे तुंगा नदी तट के पवित्र क्षेत्र में दक्षिण पीठ की स्थापना करके वहां शारदा की मूर्ति को प्रतिष्ठित कर ज्ञानाराधना का केंद्र स्थापित करने का विचार किया।
इस निश्चय के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान करते समय एक विशेष घटना हुई। आद्य शंकराचार्य ने मण्डन मिश्र और उनकी सरस्वती स्वरूपिणी पत्नी को शास्त्रार्थ में पराजित किया ही था। तब सरस्वती अपने स्थान ब्रह्मलोक चली जाना चाहती थीं। देवी की इच्छा जान कर आचार्य शंकर ने वनदुर्गा मंत्र से प्रयासपूर्वक देवी को प्रसन्न कर लिया और उन्हें दक्षिण पीठ में विराजने के लिए मना लिया।
प्रसन्न होकर देवी ने आचार्य से कहा, ‘मैं आपके पीछे-पीछे चल रही हूँ। जहां आप मेरी प्रतिष्ठा करना चाहते हैं, वहां तक आपको मुड़कर नहीं देखना है। यदि मुड़कर देखा तो मैं वहीं ठहर जाऊंगी। आपके साथ आगे नहीं चलूँगी।’
इसे स्वीकार कर आचार्य दक्षिण की ओर चल पड़े। चलते-चलते वे तुंगा और भद्रा नदियों के संगम क्षेत्र में पहुँचे। इस पुनीत संगम के उपरांत नदी तुंगभद्रा हो जाती है। वसंत जाने को था, ग्रीष्म का आरम्भ हो रहा था। हरी-भरी वनश्री के बीच दोनों नदियां क्षीणकाय हो प्रवाहमान थीं। नदी का विस्तीर्ण तट दूर तक बालुकामय था। तप्त बालुका पर आचार्य तेज गति से चलने का प्रयत्न कर रहे थे। तभी वे अचानक रुके और पीछे मुड़ कर देख बैठे। उनका अनुगमन करतीं शारदा वहीं ठहर गयीं। मां शारदा को खड़ी देख कर आचार्य स्तम्भित हो गये।
मां ने मुस्कराते हुए पूछा, ‘क्यों पुत्र, मुझ पर विश्वास न था?’
आचार्य शंकर को तत्क्षण कोई उत्तर न सूझा। कुछ सोच कर बोले, ‘मां अविश्वास की बात नहीं। अब जो मुझसे हो गया, उसमें नियति की यही इच्छा रही होगी। यात्रा के आरम्भ से अब तक निरंतर माँ के नुपूरों की मधुर ध्वनि मेरा रक्षा कवच बनी रही। इस बालुकामय भूमि पर वह मधुर नाद अचानक रुक गया। अनायास ही यंत्रवत् मैं पीछे मुड़कर देख बैठा। अब देवी की जैसी इच्छा, आपके निश्चय के अनुसार मैं यहीं आपकी मूर्ति प्रतिष्ठित करूंगा।’
तब माँ शारदा ने कहा, ‘मेरी यहां रुकने की ऐसी कोई इच्छा नहीं थी। बालू में नुपूर-नाद सुनाई नहीं दिया तो मैं क्या करूँ?’
आदिगुरु ने कहा, ‘माँ आपके अनपेक्षित रुकने का मुझे कोई दुख नहीं। आप यहीं मेरा मन: संकल्प पूर्ण करने का अनुग्रह करें।’
उनके विनय निवेदन से देवी संतुष्ट हुईं और बोलीं, ‘दशहरे के समय पूरे नौ दिन, अपने संकल्प के अनुसार मेरी जिस स्थान पर प्रतिष्ठा करोगे, मैं अपने समस्त तेज सहित वहां विद्यमान रहूँगी।’
तभी से आचार्य शंकर के उस अनुभव के प्रतीक रूप में तुंगा और भद्रा संगम के पुण्यक्षेत्र में शारदा की खड़ी मूर्ति प्रतिष्ठित है। यह लक्ष्मी सम चंचल नहीं, वरन् ज्ञान भिक्षा देने को सदैव तत्पर माँ शारदा खड़ी हैं।
हे माता सरस्वती! हमें ज्ञान दो, प्राणिमात्र को ज्ञान का प्रसाद दो।
सभी को चैत्र-नवरात्रि की पंचमी तिथि की शुभकामनाएं!

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