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सरोकारनामा – अपने अपने युद्ध में। प्रारब्ध

Author - Dayanand Pandey

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सरोज जी झूठ गढ़ने और झूठ बोलने में भी महारत रखते थे। वजह बेवजह झूठ गढ़ना और झूठ बोलना जैसे उन की आदत में शुमार था। वो वि॰ प्र॰ सिंह की जनमोर्चा के दिन थे। बोफोर्स का घड़ा बस फूटा ही था। संजय ने एक ख़बर लिखी कि कांग्रेस के बाइस हरिजन विधायकों ने जनमोर्चा ज्वाइन करने का फैसला लिया। संजय ने यह ख़बर दिन ही में लिख कर संपादक को दे दी। शाम को वह चुपचाप बैठा था। सरोज जी ‘‘कुछ गड़बड़ है’’ यह भांप गए थे। कई बार, ‘‘आज का दे रहे हैं ?’’ पूछ-पूछ कर उन्हों ने सूंघने की कोशिश की। पर संजय हर बार मायूस हो कर ‘‘कुछ नहीं, सरोज जी’’ कह कर उन्हें टालता रहा। पर दूसरे दिन जब ख़बर छपी तो हमेशा की तरह सरोज जी हांफते हुए संजय से बोले, ‘‘ई का लंतरानी हांक मारे हैं ?’’ वह बिफरे, ‘‘और शाम को कहि रहे थे कुछ नहीं।’’
संजय चुप रहा।
‘‘घबराइए नहीं, शाम तक आप को प्रेम पत्र मिलि जाएगा।’’ सरोज जी गरदन तिरछी करते हुए बोले।
‘‘क्या मतलब ?’’ संजय हकबकाया।
‘‘टाइप होइ रहा है।’’ सरोज जी बोले, ‘‘इज्जत प्यारी होय तो इस्तीफा देइ डालिए।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘बाइसों विधायकों ने लिख के दइ दिया है कि जनमोर्चा से उन को कवनो वास्ता नाहीं। ख़बर मनगढ़ंत है।’’
‘‘पर बैठक में तो वह बाइसो थे। सब ने दस्तख़्त की है।’’ संजय सफाई में बोला।
‘‘आप के पास है दस्तख़त ? आप थे बैठक में ?’’ सरोज जी ठंडे स्वर में बोले।
‘‘नहीं।’’ संजय बोला, ‘‘पर ख़बर तो सौ फीसदी सही है।’’
‘‘ख़ाक सही है !’’ सरोज जी बोले, ‘‘ई दिल्ली नहीं, लखनऊ है।’’ संजय घबरा कर संपादक के पास गया। पूछा कि माजरा क्या है। सरोज जी तो ऐसा-ऐसा कह रहे हैं। संपादक ने बताया कि, ‘‘खंडन लिखित तो नहीं पर दो तीन फोन जरूर ऐसे आए हैं। पर निश्चिंत रहिए। ऐसी कोई बात मेरी समझ से नहीं है।’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘सरोज जी का परेशान होना लाजमी है। एक तो उन की कांग्रेस बीट पर हमला दूसरे, मुख्यमंत्री के यहां जी हुजूरी में बाधा।’’
संजय दफ्तर से बाहर आ गया। सिगरेट सुलगाए यहां वहां दिन भर घूमता रहा। कांग्रेस के प्याले में तो जैसे तूफान आ गया था। शाम को वह खुश-खुश दफ्तर आया तो सचमुच बाइस में से बीस विधायकों का लिखित खंडन आ चुका था। सरोज जी की बात सच निकली। संजय के पैर तले से जैसे जमीन खिसक गई। संपादक ने कहा, ‘‘खंडन आया है तो छपेगा भी।’’
‘‘पर साथ में मेरा पक्ष भी तो छप सकता है ?’’ संजय ने संपादक से कहा।
‘‘जरूर छप सकता है।’’ विधायकों की सारी खंडन वाली चिट्ठियां देते हुए संपादक ने कहा, ‘‘इन का खंडन बना कर अपना पक्ष भी लिख दीजिए। पर आज ही।’’
‘‘दो दिन का मौका नहीं मिल सकता ?’’
‘‘मुश्किल है।’’ संपादक ने कहा, ‘‘हमारे ऊपर भी मालिकों का दबाव है। कल खंडन नहीं छपा तो मेरी पेशी हो जाएगी। आखि़र कांग्रेस रूलिंग पार्टी है और बनिये के उस से पचास काम हैं।’’
‘‘फिर भी बस एक दिन !’’ संजय ने विनती की। संपादक मान गए और बोले, ‘‘एक दिन का मतलब एक दिन।’’
‘‘बिलकुल !’’
‘‘संजय दफ्तर से बाहर आ गया। और यह ख़बर देने वाले उस हरिजन आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी के घर जा पहुंचा जिस की बीवी भी विधायिका थी। सचिव स्तर के उस आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी ने विधायकों के खंडन वाले सारे पत्र देखे और मुसकुराया।
‘‘आप हंस रहे हैं और मेरी जान पर बन आई है।’’ संजय बिफरा।
‘‘कुछ नहीं संजय जी ! कुछ नहीं। आप बिलकुल फिक्र मत कीजिए।’’ वह बोला, ‘‘ख़बर आप की हंडरेड परसेंट सही है। घबराने की कोई बात नहीं।’’
‘‘पर सुबूत क्या है ?’’ संजय बोला, ‘‘ख़बर सही है यह तो मैं भी जानता हूं। पर अब तो सुबूत चाहिए। सुबूत !’’
‘‘सुबूत मिल जाएगा।’’ कहते हुए उस ने शराब की बोतल खोली और गिलास में ढालने लगा। दूसरी गिलास संजय को देते हुए बोला, ‘‘आज तक मेरी दी कोई ख़बर गलत साबित हुई है ?’’ वह जोर दे कर बोला, ‘‘बोलिए !’’
‘‘नहीं, हुई तो नहीं है।’’ संजय बोला, ‘‘पर अब की बात दूसरी है। क्यों कि अब की ख़बर एडमिनिस्ट्रेटिव नहीं पोलिटिकल है।’’
‘‘फिलहाल तो चिंता छोडिए और इंज्वाय कीजिए।’’ वह गिलास में बर्फ डालते हुए बोला, ‘‘कल सब ठीक हो जाएगा। चीयर्स।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘बीवी को विधायिका यूं ही नहीं बनवाया है।’’
‘‘चीयर्स !’’ बुझे मन से कह तो दिया संजय ने पर गिलास मुंह से नहीं लगाई।
‘‘आप शुरू कीजिए संजय जी !’’ वह अधिकारी बोला, ‘‘कल सब ठीक हो जाएगा। डोंट वरी !’’
‘‘कैसे वरी न होऊं ?’’ संजय शराब की चुस्की लेता हुआ ठंडे स्वर में बोला।
‘‘अब हुई न बात !’’ कह कर वह अधिकारी झूम गया। बोला, ‘‘संजय जी आज मजा आ गया। आप के इस स्कूप ने आज बोफोर्स की बहस को किनारे कर दिया। आज दिन भर लखनऊ से दिल्ली तक इसी की चर्चा होती रही। फोन में, प्लेन में, ट्रेन में हर कहीं यही चरचा कांग्रेस के बाइस विधायक जनमोर्चा में। और कांग्रेसियों का ख़ून सूखता रहा।’’
‘‘पर अभी तो मेरा ख़ून सूख रहा है।’’ संजय बोला।
‘‘क्यों सूख रहा है ?’’ उस अधिकारी का यह तीसरा पेग था। और वह तीसरे पेग में ही बहकने लगा। जाने उस ख़बर का नशा था कि शराब का नशा वह झूमता हुआ संजय का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘मजा आ गया।’’ वह बोला, ‘‘आप क्या समझते हैं मैं कच्ची गोलियां खेलता हूं।’’ और जैसे राजभरी आंखें फैलाता हुआ वह बोला, ‘‘मेरे पास सारा सुबूत है। क्या समझे ?’’ वह बहका, ‘‘एक-एक विधायक की सिगनेचर है।’’
‘‘सच !’’ संजय खुशी से छलक उठा, ‘‘तो दीजिए न !’’
‘‘यहां हो तब न दूं।’’ वह बहकते हुए बोला, ‘‘एक-एक दस्तख़्त हैं। पर यहां नहीं दफ्तर में हैं। कल दोपहर बाद आइएगा दे दूंगा। पर यह खंडन मत छपने दीजिएगा।’’
फिर वह अपनी बीवी से, ‘‘खाना लगवाओ’’ कह कर नया पेग बनाने लगा। उस की बीवी जो विधायिका थी, कांपती हुई आई और खाना लगवा कर बैठ गई। रात के साढ़े बारह बज रहे थे। वह बैठी-बैठी नींद में ऊंघ भी रही थी। दुबली पतली सी उस की पत्नी इस उम्र में भी सुंदर दिख रही थी।
‘‘एक पेग और हो जाए !’’ कह कर संजय ने अभी खाना नहीं खाने की इच्छा जता दी।
‘‘बिलकुल हो जाए !’’ उस अधिकारी ने जोड़ा, ‘‘आज के नायक आप हैं। आप का कहा कौन भला तोड़ सकता है ?’’
‘‘नहीं बात यह नहीं है।’’ संजय लजाता हुआ बोला, ‘‘असल में अब पीने का मन हो रहा है।’’
‘‘तो अब तक क्या कर रहे थे ?’’ वह हंसता हुआ बोला।
‘‘अभी तो बस बेस बना रहा था।’’ संजय बोला, ‘‘पीना तो अब चाहता हूं।’’
‘‘पांच पेग हो गए और आप कह रहे हैं कि पीना तो अब चाहता हूं।’’
‘‘कहा न अभी बेस बना रहा था।’’
‘‘ठीक है पर मैं तो अब नहीं लूंगा।’’
‘‘साथ तो दे सकते हैं ?’’
‘‘ओह श्योर !’’ कहते हुए वह अपनी बीवी से बोला, ‘‘तुम लोग खा लो भई। हम लोगों को अभी देर लगेगी।’’
उस की बेटियां भी खाने की मेज पर आ गईं। संजय ने गौर किया कि एक बार वह अपनी कार में एक लड़की बिठाए जा रहा था संजय ने उसे घूरा तो उस ने प्रदर्शित किया जैसे वह उस की बेटी हो। पर वह ‘‘बेटी’’ नहीं थी खाने की मेज पर। पहले उस ने सोचा कि वह नशे में है शायद इस लिए पहचान नहीं पा रहा है। पर जब उस ने पक्का कर लिया कि वह इन में से नहीं है तो पूछ ही बैठा, ‘‘आप की वो वाली बेटी नहीं है क्या ?’’
‘‘है तो। यह बैठी तो है।’’ आंख मारता हुआ वह बोला, ‘‘वही न जो पढ़ने में बड़ी तेज है। जिस की चरचा मैं ने की थी। उसी को तो पूछ रहे हैं आप ?’’ कहते हुए उस ने फिर आंख मारी।
‘‘हां, हां।’’ संजय बात बदलता हुआ बोला। और समझ गया कि वह लड़की कोई और थी जिस की चरचा यह यहां नहीं करना चाहता।
संजय को अपने पड़ोसी आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी भाटिया की याद आ गई। जो उस के फ्लैट के नीचे वाले फ्लैट में रहता था। और उन दिनों समाज कल्याण विभाग का निदेशक था। संजय जब अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जाता तो भाटिया हाफ पैंट पहने कार से उतरता। वह बताता, ‘‘टहलकर आ रहा हूं।’’ उस की सेवा में चार पांच गाड़ियां और तमाम नौकर चाकर लगे रहते। सो जब वह कार से उतरता हुआ बोलता, ‘‘टहल कर आ रहा हूं।’’ तो संजय को हैरानी नहीं होती। पर एक रोज गजब हो गया।
वह इतवार का दिन था।
संजय सोया हुआ ही था कि किसी ने तेज-तेज काल बेल बजाई। दरवाजा खोला तो देखा गैराज के ऊपर बने क्वार्टरों में रहने वाले दो तीन कर्मचारी थे। वह सब हांफ रहे थे और कह रहे थे, ‘‘संजय जी जल्दी चलिए।’’
‘‘क्यों क्या बात है ?’’ आंखें मीचते हुए संजय बोला।
‘‘बहुत बड़ी ख़बर है।’’ वह एक साथ बोले, ‘‘कैमरा भी ले लीजिए।’’
‘‘कैमरा मेरे पास कहां है।’’ संजय बोला, ‘‘मैं फोटोग्राफर तो हूं नहीं।’’
‘‘तो कैमरा वाला बुला लीजिए।’’
‘‘पर पहले बात तो बताओ।’’
‘‘एक आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी है भाटिया। वह रोज अपने गैराज में सुबह-सुबह कार ले कर आ जाता है। मुंह अंधेरे। फिर आधे-एक घंटे तक गैराज बंद कर अंदर ही रहता है। तो हम लोगों को शक हुआ। आते-जाते कार के अंदर देखते तो वह अकेला ही रहता। एक दिन हम दो तीन लोगों ने पीछा किया। तो देखा गोमती बैराज के पास भाटिया ने कार रोकी। पीछे का फाटक खुला और एक लड़की कार से उतर कर आगे की सीट पर जा कर बैठ गई। हम लोगों को विश्वास नहीं हुआ। एक बार लगा कि आंखों को धोखा हुआ होगा। फिर दुबारा पीछा किया, तिबारा पीछा किया। हर बार यही ड्रामा। उस लड़की के बारे में पता किया तो मालूम पड़ा कि वह उस की पी॰ ए॰ है। और गोमती नगर में रहती है। वह भी सुबह-सुबह टहलने के बहाने निकलती है और यह कार ले कर समय पर पहुंच जाता। फिर वह कार में बैठ जाती। गोमती बैराज पर कार रुकती और वह आगे से पिछली सीट पर आ कर सो जाती। कार गैराज में आ जाती किसी को पता नहीं पड़ता। और गैराज क्या है पूरा बेडरूम है। हार्ड बेड, परदा सब कुछ है।’’
‘‘तो अब गैराज की फोटो खिंचवानी है ?’’ संजय खीझता हुआ बोला।
‘‘नहीं साहब।’’ उस में से दूसरा व्यक्ति बोला, ‘‘उन दोनों की फोटो खींचनी है।’’ वह बोला, ‘‘हम लोग बहुत दिनों से तड़े हुए थे। कि यह मुंह अंधेरे रोज क्यों आता है। और घंटे-घंटे भर अंदर क्या करता है। पर जब लड़की वाली बात पता पड़ी तो पूरी योजना बना कर आज बंद कर दिया साले को।’’ वह अभी यह बात बता ही रहा था कि नीचे से सीढ़ियां चढ़ता एक और व्यक्ति दौड़ा-दौड़ा आया। बोला, ‘‘वह भाटिया तो यहीं नीचे ही रहता है।’’
‘‘चलो उस के बीवी बच्चों को भी उस की कारस्तानी बताएं।’’ दूसरा व्यक्ति बोला। और सब के सब फट फट सीढ़ियां उतर गए। भाटिया की बीवी को बुलाया उन सब ने और सारा वाकया बताया। भाटिया की बीवी कुछ बोली नहीं और घर का दरवाजा नौकर से बंद करवा दिया। वह सब ऊपर आ कर फिर संजय के घर की कालबेल बजाने लगे। संजय अब तक वहां जाने का इरादा बदल चुका था। उस ने सोचा पड़ोसी के फच्चर में पांव फंसाना ठीक नहीं रहेगा। पर कालबेल बजती रही। दरवाजा खोल कर वह बेरूखी से बोला, ‘‘अब क्या बात है ?’’
‘‘बात तो वही है। आप चलिए न साहब।’’ वह बोला, ‘‘पेपर में निकलेगा तो मजा आ जाएगा। आप के पेपर की सेल बढ़ जाएगी।’’
‘‘सेल वेल की चिंता तुम लोग छोड़ो।’’ कहते हुए उस ने अपनी विवशता फिर ओढ़ी, ‘‘मेरे पास कैमरा नहीं है। और बिना फोटो के यह ख़बर बनेगी नहीं।’’
‘‘कैमरे वाले को फोन कर दो साहब।’’
‘‘पर फोटोग्राफर के पास फोन नहीं है।’’
‘‘तो हमें पता बता दीजिए। हम घर से बुला लाएंगे।’’
‘‘अच्छा।’’ कह कर संजय बड़े असमंजस में पड़ गया। उस ने फोटोग्राफर का पता देते हुए कहा, ‘‘काफी दूर रहता है ये।’’
‘‘कोई बात नहीं साहब।’’वह व्यक्ति बोला, ‘‘हम चले जाएंगे। पर आप अभी चलिए।’’
‘‘हम को अभी ले चल कर क्या करोगे ?’’ संजय टालते हुए बोला।
‘‘नहीं साहब आप का अभी चलना जरूरी है।’’ उस में से एक बोला।
‘‘नहाने धोने दोगे कि ऐसे ही चलूं ?’’ संजय ने फिर टाला।
‘‘वापस आ कर नहा धो लीजिएगा।’’ वह व्यक्ति बोला, ‘‘पर अभी वहां पहुंचना जरूरी है।’’
‘‘तुम लोगों ने गैराज में ताला तो बाहर से बंद कर दिया है न ?’’ संजय बोला, ‘‘फिर जल्दी किस बात की, वह भाग तो पाएगा नहीं।’’
‘‘वो तो ठीक है साहब। पर आप चले चलते तो ठीक था।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘हम लोग छोटे कर्मचारी हैं।’’
‘‘और वह आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी है। कभी कहीं हमारे ही विभाग में अफसर बन कर आ जाए तो हम लोगों की तो नौकरी खा जाएगा।’’ दूसरा व्यक्ति बोला, ‘‘इसी लिए हम लोग सामने नहीं आना चाहते।’’
‘‘पर उस की बीवी के सामने तो आ गए हो।’’ संजय बोला, ‘‘इस तरह डरना था तो ताला ही नहीं लगाना था।’’
‘‘अब तो साहब सांप के बिल में हाथ डाल दिया है।’’ पहला व्यक्ति बोला।
‘‘तुम लोग ऐसा करो कि पुलिस को ख़बर कर दो।’’ संजय सलाह देते हुए बोला, ‘‘वह लड़की समेत पकड़ा जाएगा। बेइज्जत होगा। और सारे अख़बारों में अपने आप ख़बर छप जाएगी।’’
‘‘पुलिस में भी आप ही ख़बर कर दीजिएगा साहब।’’ दूसरा व्यक्ति बोला।
‘‘जब सब हम ही कर दें तो तुम लोग क्या करोगे ?’’ संजय उकता कर बोला।
‘‘पुलिस हम लोगों की कहां सुनेगी ?’’ दूसरा व्यक्ति फिर बोला।
‘‘क्यों नहीं सुनेगी पुलिस ? बिलकुल सुनेगी।’’ संजय बोला, ‘‘बस तुम लोग यह मत बताना कि पुलिस से कि किसी आई॰ ए॰ एस॰ अफसर को बंद किया है। वरना थाने की पुलिस भी डर जाएगी। तुम लोग ऐसे ही कोई ड्राइवर वगैरह बताना।’’
‘‘ठीक साहब !’’ पहला व्यक्ति बोला।
‘‘ठीक-ठीक नहीं अब चले जाओ।’’ संजय ने कहा, ‘‘अब हमें भी नहा धो लेने दो।’’
नहा धो कर संजय गैराज पर पहुंचा तो पुलिस, फोटोग्राफर सभी आ चुके थे। पर वह आई॰ ए॰ एस॰ अफा्सर भाटिया भाग चुका था। हुआ यह कि जब इन आदमियों ने भाटिया की बीवी को किस्सा बताया तो उस ने तुरंत हथौड़ी दे कर एक नौकर को भेज दिया। उस ने बाहर से गैराज का ताला तोड़ कर भाटिया को लड़की समेत भगा दिया। वैसे गैराज की हालत देख कर लगता था कि भीतर से भाटिया ने भी गैराज का फाटक तोड़ने की कोशिश कार से धक्का मार-मार कर की थी। भाटिया वहां से निकला तो बाहर की भीड़ उसे देखते ही तितर बितर हो गई। उलटे उस ने वहां लोगों को गालियां दी और धमकी भी कि, ‘‘एक-एक को देख लूंगा।’’ और वहां से निकल भागा।
संजय पछता कर रह गया। उस ने ख़ुद से ही सवाल किया कि, ‘‘क्या उस ने ख़ुद नहाने धोने के बहाने भाटिया को बचने का मौका नहीं दिया ? पड़ोसी धर्म निभाने में लग गया ?’’
‘‘सो तो है !’’ उस ने खुद को जैसे जवाब दिया।
उस ने सोचा कि भाटिया के घर आज महाभारत मचेगा। पर उस की बीवी ने ऐसा कुछ नहीं किया। किसी को पता भी नहीं चला कि ऐसा कुछ हुआ है। पर उस के बाद से हुआ यह कि भाटिया की शक्ल काफी दिनों तक नहीं दिखी। उस का टहलना जैसे बंद हो गया था। नौकरों को सुबह-सुबह डांटने की भाटिया की आवाज भी गायब हो गई थी। उस की बीवी ऐसे चेहरा गिराए दिखती गोया यह हरकत भाटिया ने नहीं उसी ने किया हो। संजय को देखते ही वह आंखें नीची कर लेती। उस की बेटियों का भी यही हाल था। संजय ने भी किसी से कुछ नहीं कहा, न ही ख़बर लिखी। एक बार उस ने सोचा कि एक सटायर पीस या टिट बिट्स का एक पीस बिना नाम लिए लिख दे। पर नहीं लिखा। टाल गया। पर बाद में उस ने गौर किया कि भाटिया की बीवी उसे घृणा की नजरों से देखने लगी। शायद उसे लगा कि वह सब कुछ संजय ने ही कराया हो।
भाटिया अब फिर टहलने जाने लगा था। वह ऐसे मिलता जैसे कुछ हुआ ही नहीं। संजय ने उसे एहसास भी नहीं कराया। न ही कोई चरचा की। बात ख़त्म हो गई थी।
संजय ने उसी तरह यहां भी बात ख़त्म कर दी। और एक पेग ख़त्म होते न होते वह भी खाने की मेज पर आ गया और बोला, ‘‘हम लोग भी खा ही लें।’
खाना खाते-खाते पता नहीं कैसे बात ब्राह्मणों पर आ गई। और वह हरिजन आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारी जो खुद अपने को सिंह लिखता था ब्राह्मणों को गाली देने लगा। पहले तो संजय ने टाला। पर जब बहुत हो गया तो जैसे भीतर से उस का ब्राह्मण जागा और बोला, ‘‘इस तरह ब्राह्मणों को गालियां मत दीजिए !’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘इस लिए कि मैं भी ब्राह्मण हूं।’’ संजय बोला।
‘‘आप ब्राह्मण हैं ?’ वह बोला, ‘मैं नहीं जानता था। वेरी-वेरी सॉरी !’’ वह रुका और बोला, ‘‘फिर भी आप यह मानेंगे कि ब्राह्मणों ने हमारी जाति पर बड़ा जुल्म किया है।’’ वह थोड़ा रुका फिर बोला, ‘‘पर आप ब्राह्मण हैं, यह मैं नहीं जानता था। जानता तो आप के सामने ऐसे नहीं बोलता।’’ वह हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘व्यक्तिगत रूप से आप को कष्ट पहुंचाने का मेरा इरादा नहीं था। क्षमा चाहता हूं।’’
‘‘कोई बात नहीं ! पर आप अपनी बात बिना गाली दिए भी कह सकते हैं।’’ कह कर संजय चुप हो गया।
‘‘पर आप कौन से ब्राह्मण हैं ? वह बोला, ‘‘आई मीन आप अपने नाम के आगे तो कुछ लिखते नहीं ?’’
‘‘आप बुरा न मानें तो आप से पूछूं ?’’
‘‘श्योर !’’
‘‘आप कौन से सिंह हैं ?’ संजय बोला, ‘‘आप तो अपने नाम के आगे सिंह लिखते हैं। तो क्या आप क्षत्रिय हैं ?’’
‘‘नहीं मैं क्षत्रिय नहीं हूं।’’ कहते हुए वह झेंपा।
‘‘तो फिर क्यों लिखते हैं आप सिंह ?’ संजय बोला, ‘अगर आप हरिजन हैं तो उस में शर्म किस बात की ? सिंह लिख कर अपने आप को छलने की क्या जरूरत है? हरिजन होना कोई शर्म की बात नहीं है। हरिजन होना अपराध नहीं है। जो आप छुपाते फिरें ! अगर आप का नाम भूसी राम है तो बी॰ आर॰ सिंह लिखने से क्या फर्क पड़ जाता है ?’’
‘‘पड़ता होगा तभी तो लिखते हैं।’’ वह बोला।
‘‘क्या फर्क पड़ता है ? यही तो मैं जानना चाहता हूं।’’ संजय बोला, ‘‘ख़ास कर तब जब आप आई॰ ए॰ एस॰ हैं और सभी जानते हैं कि आप रिजर्वेशन कोटे से आते हैं। फिर भी सिंह लिखते हैं। तो क्या आप का चमार होना छिप जाता है ?’’
‘‘मैं इस वक्त नशे में हूं। इस लिए ठीक-ठीक कुछ कह पाना मुश्किल है।’’ वह बोला।
‘‘नशे में हैं आप तभी सच कह पाएंगे। नहीं बिना नशे के तो आप आई॰ ए॰ एस॰ हो जाएंगे। आदमी नहीं रह जाएंगे। और कोई कुतर्क गढ़ ले जाएंगे। और विवश हो कर मुझे वह मानना पड़ेगा।’’ संजय बोला, ‘‘क्यों कि आज का ब्राह्मण मैं नहीं आप हैं।’’
‘‘क्या मतलब ?’
‘‘मतलब पानी की तरफ साफ है।’’ संजय बोला, ‘‘ब्राह्मण होने का मतलब अगर श्रेष्ठ होना है तो आज की तारीख़ में एकेडमिक तौर पर आई॰ ए॰ एस॰ होना ही श्रेष्ठ है। तो आज के ब्राह्मण आप हैं। क्यों कि आप आई॰ ए॰ एस॰ हैं।’’
‘‘ऐसा !’’ कह कर उस अधिकारी ने कंधे उचकाए।
‘‘एक्जेक्टली ऐसा ही है।’’ संजय ने कहा, ‘‘तो अगर मैं आई॰ ए॰ एस॰ न होते हुए भी अगर अपने नाम के आगे आई॰ ए॰ एस॰ लगाने लगूं तो क्या मैं आई॰ ए॰ एस॰ हो जाऊंगा ?’
‘‘आई॰ ए॰ एस॰ तो नहीं चार सौ बीस जरूर जो जाएंगे और जेल की हवा भी खानी पड़ जाएगी।’’ वह शराब के घूंट भरता हुआ बोला।
‘‘क्यों ?’’
‘‘फर्जी तौर पर आई॰ ए॰ एस॰ लिखने के जुर्म में।’’
‘‘क्यों आई॰ ए॰ एस॰ का मतलब कोई एक ही तो होता नहीं।’’ संजय ने कहा, ‘‘अपने देश में एक शार्ट फार्म के कई लांग फार्म बना कर लोग फ्राड करते हैं और चार सौ बीस होने से भी बच जाते हैं। मैं भी ऐसे ही कर लूंगा।’’
‘‘कैसे ?’
‘‘आई॰ ए॰ एस॰ का मतलब इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस के बजाय इंटरमीडिएट आर्ट साइड भी हो सकता है।’’ संजय बोला, ‘कुतर्क पर सिर्फ आप की बिरादरी का ही अधिकार तो नहीं है।’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘मेरा मतलब आप की आई॰ ए॰ एस॰ बिरादरी से है जो आज देश की भाग्य विधाता बनी बैठी है।’’ संजय बोला, ‘‘आप की हरिजन बिरादरी से मेरी मंशा नहीं थी।’’ वह रुका और बोला, ‘‘ पर जरा सा संकेत भी आप को बुरा लगा। यह अच्छी बात है। अपनी कौम, बिरादरी के प्रति कांशस रहना अच्छी बात है।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘पर व्यर्थ की ढाल कहिए, दिखावे की खाल कहिए ओढ़ना उतना ही गलत है।’’ संजय ने कहा, ‘‘अगर आज की तारीख़ में आई॰ ए॰ एस॰ होना श्रेष्ठ होना है और जो श्रेष्ठ होने का मतलब ब्राह्मण होना है तो मैं वह नहीं हूं। और अगर मैं आई॰ ए॰ एस॰ नहीं हूं तो इस का यह मतलब हरगिज नहीं है कि मैं हीनता से भर जाऊं, हीनता से मर जाऊं और नकलीपन का सहारा ले लूं। आई॰ ए॰ एस॰ न हो पाना कोई अपराध नहीं है। यह कोई शर्म की बात नहीं है।’’
‘‘तो आई॰ ए॰ एस॰ न हो पाने का कांपलेक्स आप के मन में है !’’ वह मुसकुराता हुआ बोला।
‘‘कतई नहीं।’’ संजय ने जोर से कहा, ‘‘मैं आई॰ ए॰ एस॰ हो ही नहीं सकता था।’’
‘‘क्यों ?’’ वह बोला, ‘‘बुद्धि तो है। मेहनत नहीं की होगी।’’
‘‘सच बताऊं ?’
‘‘आफकोर्स !’’
‘‘जब आई॰ ए॰ एस॰ बनने की उम्र थी तब यह जानता भी नहीं था कि आई॰ ए॰ एस॰ या पी॰ सी॰ एस॰ क्या बला होती है।’’ संजय रुका और बोला, ‘‘गांव से निकल कर शहर पढ़ने गया था यही बहुत बड़ा सुख था।’’ वह कहने लगा, ‘‘अगर ख़ुदा न खास्ता जान भी गया होता कि आई॰ ए॰ एस॰ किस चिड़िया का नाम है तब भी शायद उस ओर रुख़ नहीं करता।
‘‘क्यों ?’’
‘‘क्यों कि तब तो बस एक ही सपना था, एक ही तमन्ना और एक ही हसरत थी, कविता, क्रांति और समाज को बदलने की छटपटाहट।’’ संजय पुरानी यादों में खोता हुआ बोला, ‘अगर तब मेरी चली होती तो ग्रेजुएशन में ही पढ़ाई छोड़ दी होती। कम्युनिस्ट साहित्य, सोहबत और समाज की हालत बार-बार यही ललकारती थी कि इस एकेडमिक पढ़ाई लिखाई में कुछ नहीं रखा। व्यर्थ की चोंचलेबाजी है।’’ संजय बिना रुके बोला, ‘‘और मुझे आज भी यह एकेडमिक पढ़ाई वास्तव में बेमानी लगती है, फ्राड लगती है।’’ वह रुका और शराब देह में ढकेलता हुआ बोला, ‘‘मेरी सोच ही तब कुछ और थी, एप्रोच ही और थी तो आई॰ ए॰ एस॰बनना गाली होती मेरे लिए। मैं तब जानता भी नहीं था आई॰ ए॰ एस॰ के बारे में और जो जानता होता तब भी किक करता ऐसी आई॰ ए॰ एस॰ गिरी को। लानत है देश के आई॰ ए॰ एसों॰ को जो देश को दोनों हाथों से लूट और लुटा रहे हैं।’’
‘‘आप को चढ़ गई है।’’ वह अधिकारी बोला, ‘‘ऐसा तो नहीं है।’’
‘‘ऐसा ही है।’’ गिलास मेज पर पटकता हुआ संजय बोला।
‘‘खै़र छोड़िए, यह बहस फिर कभी।’’ वह बोला, ‘‘पुराने सवाल पर वापस आएं और बताएं कि आप कौन से ब्राह्मण हैं। आई मीन योर सरनेम क्या है ?’’
‘‘सच बताऊं भूसी राम जी कि झूठ ?’’ संजय नशे में झूमता हुआ बोला।
‘‘सच-झूठ दोनों ही बताइए।’’
‘‘श्योर ?’’
‘‘श्योर !’’
‘‘तो सुनिए मेरा पूरा नाम है संजय सिंह तिवारी।’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘क्यों मुलायम सिंह यादव हो सकता है, बलराम सिंह यादव हो सकता है, भूसी राम बी॰ आर॰ सिंह हो सकता है तो संजय सिंह तिवारी क्यों नहीं हो सकता ?’’ संजय बोला, ‘‘देखिए भूसी राम जी, सिंह, शर्मा, वर्मा और हो सकता हो कुछ और सरनेम भी हों, यह सब बड़े उदार सरनेम हैं। जो जब चाहे जहां चाहे लगा ले। सिंह, क्षत्रिय, यादव, चमार कोई भी लगा ले कोई रोक नहीं। शर्मा, बढ़ई, लोहार, ब्राह्मण कोई भी लिख ले, इसी तरह वर्मा, कायस्थ, कुर्मी, खटिक, सुनार कोई लिख सकता है, कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। तो मैं अगर संजय सिंह तिवारी हो जा रहा हूं तो आप को क्यों ऐतराज हो रहा है ?’’
‘‘आप के इस व्यंग्य को मैं समझ रहा हूं संजय तिवारी जी।’’ वह ‘‘तिवारी’’ पर जोर दे कर बोला।
‘‘ख़ाक समझ रहे हैं।’’ संजय बोला, ‘‘मैं संजय सिंह तिवारी हूं और आप सिर्फ संजय तिवारी कह रहे हैं।’’
‘‘यही तो व्यंग्य है आप का मान्यवर !’’ वह बोला, ‘‘ऐसे ही ! ऐसे ही आप ब्राह्मणों ने हम दलितों पर जुल्म किए हैं।’’ वह जैसे तिलमिला कर बोला।
‘‘अब पता नहीं आप कब की बात कर रहे हैं। संजय बोला, ‘‘न तो मैं ने दलित उत्पीड़न का पूरा इतिहास पढ़ा है न ही ब्राह्मण उत्थान का धर्मशास्त्र, वेद, मनुस्मृति वगैरह पढ़ा है इस लिए आधिकारिक रूप से कुछ कह पाना कठिन है। पर मोटा-मोटी यह जरूर जानता हूं कि चाहे सदियों पूर्व की व्यवस्था हो चाहे आज की व्यवस्था ! सत्ता हमेशा ही से प्रजा को पीड़ित करती रही है। सत्ता हमेशा ही से प्रजा की देह छील कर इतिहास लिखती रही है, आज भी लिख रही है। ऐसे जैसे यह प्रकृति का नियम हो।’’ संजय बोला, ‘‘और मैं नहीं पाता कि ब्राह्मण जाति ने कभी इस तरह आधिकारिक रूप से सत्ता भोगी हो कि वह किसी पर अत्याचार कर सके। रही बात वर्ण व्यवस्था की तो क्या वह नियम आज भी नहीं लागू है कि जो जिस कार्य के लायक हो उसे वही कार्य दिया जाए। अब कि जैसे मैं आई॰ ए॰ एस॰ नहीं हूं तो क्या मैं डी॰ एम॰ या आप की तरह कहीं कमिश्नर नियुक्त हो सकता हूं ? मुझे छोड़िए पी॰ सी॰ एस॰ भी बेचारा बिना आई॰ ए॰ एस॰ में प्रमोट हुए डी॰ एम॰ नहीं बन सकता। तो क्या सिर्फ इस लिए कि आई॰ ए॰ एस॰ श्रेष्ठ है। जाहिर है कि नहीं। यह एक व्यवस्था है।’’ संजय बोला, ‘‘तो जिसे आप मनुवादी व्यवस्था बताते हैं वह भी कुछ ऐसी ही या वैसे ही रही होगीµव्यवस्था आधारित।’’ संजय बोला, ‘‘और जाहिर है कि लंबे समय तक उस में अपेक्षित सुधार या संशोधन नहीं हुए होंगे तो वह व्यवस्था बेमानी हो गई होगी, व्यर्थ हो गई होगी और अपना अर्थ खो कर धूल में मिल गई। और आज हम नई व्यवस्था में जी रहे हैं।’’ संजय बोला, ‘‘यह इस नई व्यवस्था की ही देन है कि जिसे समाज सब से नीचे की जाति मानता है वह भंगी जाति का व्यक्ति भी कलक्टर बन जाता है और जिसे समाज सब से श्रेष्ठ जाति का मानता है उस ब्राह्मण जाति का व्यक्ति उसी भंगी जाति के कलक्टर के यहां सफाई धुलाई करते दिखता है। तो क्या यह अन्याय है उस ब्राह्मण जाति के साथ ?’’ संजय बोला, ‘‘हरगिज नहीं। अगर आप पढ़ेंगे लिखेंगे नहीं तो यही नौकरी आप को मिलेगी चाहे आप जिस जाति के हों। तो ऐसा ही कुछ पहले की व्यवस्था में रहा होगा। अब चूंकि वह व्यवस्था पारदर्शी नहीं थी सो धूल में मिल गई। यह आज की व्यवस्था भी अगर पारदर्शी नहीं साबित होगी तो यह भी धूल में मिल जाएगी।’’
‘‘यह तो कुतर्क है।’’ वह अधिकारी बोला, ‘‘आप चाहे जो कहें। पर हकीकत यही है कि ब्राह्मणों ने हमारी जाति बिरादरी पर अत्याचार किया।’’
‘‘चलिए मान लिया !’’ संजय बोला, ‘‘किसी एक ब्राह्मण राजा का नाम बताइए जो बड़ा भारी राजा रहा हो और उस ने चमारों पर अत्याचार किया हो !’’
‘‘अब तुरंत तो किसी का नाम नहीं याद आ रहा।’’ वह अधिकारी माथे पर हाथ फेरता हुआ बोला, ‘‘पर मैं बाद में बताऊंगा। लेकिन आप यह तो मानेंगे कि ब्राह्मण हमेशा सत्ता के करीब रहे। ब्राह्मण ही हमेशा राजाओं के सलाहकार रहे।’’
‘‘हमेशा तो नहीं। पर रहे हैं।’’ संजय बोला, ‘‘अब चाणक्य की बात लीजिए। चाणक्य भी ब्राह्मण था। पर हिंदुस्तान के इतिहास को बदल दिया चाणक्य ने। आप चाहे उसे कुटिल कहिए पर सच यही है कि चंद्रगुप्त जैसे पिछड़ी जाति के व्यक्ति को सम्राट बनाना तब के समय में बहुत आसान नहीं था। यह चाणक्य के ही बूते की बात थी।’’
‘‘आप जो भी कहिए पर ब्राह्मणों ने हम पर अत्याचार किए हैं।’’ वह बोला, ‘‘आखि़र पूरे दो हजार साल तक देश में ब्राह्मणों ने राज किया है। ऐसा मैं ने कहीं पढ़ा है।’’
‘‘दो हजार साल क्यों आप फिर से इतिहास पढ़िए पूरे पांच हजार साल जिस को राज करना आप कह रहे हैं, वह ब्राह्मणों ने किया है।’’ संजय बोला, ‘‘पर आजादी के यानी 15 अगस्त, 1947 के पहले तक किसी एक ब्राह्मण का नाम बता दीजिए जो करोड़पति रहा हो। एक नहीं मिलेगा। क्यों कि ब्राह्मण ने लूट और अत्याचार को ठीक नहीं माना था। और बिना लूट, अत्याचार के कोई करोड़पति नहीं बन सकता। आजादी के बाद की बात मैं नहीं कर रहा। अब तो कई ब्राह्मण भी करोड़पति हैं और चमार भी कई करोड़पति, अरबपति हैं। क्यों कि लूट में, अत्याचार में अब हर जाति शामिल है।’’ संजय बोला, ‘‘आप ऐसा मत समझिए कि मैं ब्राह्मणों की कोई वकालत कर रहा हूं। क्यों कि मैं ब्राह्मण हूं। ऐसा नहीं है। मैं तो अब जनेऊ भी नहीं पहनता। नाम के आगे ब्राह्मण तिवारी भी नहीं लगता। क्यों कि मैं ब्राह्मण कहलाने योग्य नहीं। इस लिए नहीं कि ब्राह्मण होने को मैं पाप मानता हूं। बल्कि इस लिए कि ब्राह्मण होना बहुत बड़ी बात है। ब्राह्मण होना आसान नहीं है। ब्राह्मण होना एक तप है। जो तप मैं नहीं कर सकता। और अगर ब्राह्मण होने की मुझ में योग्यता नहीं है तो मुझे ब्राह्मण कहलाने का हक सिर्फ इस लिए नहीं मिल जाता कि मैं ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ हूं। दूसरे और महत्वपूर्ण यही है कि सही मायने में मैं इस तरह की जाति व्यवस्था में यकीन भी नहीं करता। इस लिए भी अपने नाम के आगे तिवारी नहीं लिखता।’’
‘‘पर संजय जी इस से फिर भी यह साबित नहीं होता कि ब्राह्मणों ने हमारी बिरादरी पर अत्याचार नहीं किया।’’ वह बोला, ‘‘हमारी बिरादरी को समाज में अछूत बनाने वाले ब्राह्मण ही हैं।’’
‘‘यह पूरी तरह सच नहीं है।’’ संजय बोला।
‘‘हम से ज्यादा अंतर्विरोध तो आप जी रहे हैं।’’ वह बोला, ‘‘हम सिर्फ सिंह लिखते हैं और आप हमें कटघरे में खड़ा कर देते हैं। और आप ब्राह्मण सूचक शब्द नहीं लिखते नाम के आगे, जनेऊ नहीं पहनते पर ब्राह्मणों की वकालत पूरी-पूरी करते हैं। यह आप का अंतिर्विरोध नहीं तो क्या है ?’’
‘‘यह अंतर्विरोध नहीं है। यह तथ्य है। और चीजें कोई अचानक नहीं बदल जातीं। फिर मैं कोई ब्राह्मणवाद की वकालत नहीं कर रहा। एक तथ्य रख रहा हूं। तर्क रख रहा हूं। जिसे आप तथ्य से, तर्क से काट भी सकते हैं। क्यों कि मैं कोई अकाट्य सत्य नहीं भाख रहा हूं।’’ संजय बोला, ‘‘सच को सच मान लेने में नुकसान नहीं होता। और मैं फिर यह बात दुहराना चाहता हूं कि सत्ता हमेशा प्रजा की देह छील कर इतिहास लिखती है चाहे वह सत्ता ब्राह्मण की हो, चाहे चमार की। सत्ता आखि़रकार सत्ता होती है। अंततः सत्ता होती है। और सत्ता का हमेशा यही चरित्र रहा है, यही चरित्र रहेगा। राज सत्ता में भी यही होता था और आज प्रजातांत्रिक सत्ता के दौर में भी यही हो रहा है।’’
‘‘यह सब ठीक है। पर अंतिम सच यही है कि ब्राह्मणों ने ही व्यवस्था बनाई और उस व्यवस्था में हमें अछूत बनाया।’’ वह नशे में टूट कर बोला।
‘‘क्या तभी से ब्राह्मण-ब्राह्मण लगा रखा है आप ने ?’’ संजय बोला, ‘‘तभी से ब्राह्मण और सत्ता का फर्क समझा रहा हूं आप की समझ में नहीं आ रहा है। लगता है किसी ने बचपन से ब्राह्मणों के खि़लाफ इतनी घुट्टी पिला रखी है कि आप खुले दिमाग से कुछ सोच ही नहीं सकते।’’
‘‘हो सकता है।’’ वह लड़खड़ाती आवाज में शराब की जगह पानी पीता हुआ बोला, ‘‘हमारी बिगड़ी हालत के लिए ब्राह्मण ही जिम्मेदार हैं।’’
‘‘सच !’’ संजय बोला, ‘‘अगर यही सच है तो कम से कम आप को व्यक्तिगत तौर पर ब्राह्मणों का शुक्रगुजार होना चाहिए।’’
‘‘क्यों ? वो क्यों ?’’ वह ऐसे बोला जैसे उस की समझ में कुछ आया ही न हो।
‘‘वह ऐसे कि अगर ब्राह्मण नहीं होते तो आप की चमार बिरादरी पर अत्याचार नहीं होते ! चमार अछूत नहीं हुए होते ! जैसा कि आप कह रहे हैं और यह सब जो नहीं हुआ होता तो आजादी के बाद आरक्षण नहीं लागू हुआ होता।’’ संजय बोला, ‘‘आरक्षण नहीं लागू हुआ होता तो आप आज आई॰ ए॰ एस॰ नहीं हुए होते।’’
‘‘नहीं, नहीं मैं आई॰ ए॰ एस॰ डिजर्व करता हूं।’’ वह घबरा कर बोला।
‘‘बिलकुल करते होंगे। पर आए तो आरक्षण कोटे से ही चुन कर !’’ संजय बोला, ‘‘आप की पत्नी भी बिना सुरक्षित सीट के जीत कर विधान सभा में आ पातीं भला ?’’
‘‘यह तो कोई तर्क नहीं हुआ ?’’
‘‘तो फिर ब्राह्मणों को लगातार गाली देते रहना तर्क हुआ ?’’
‘‘नहीं, यह भी तर्क नहीं हुआ।’’
‘‘बस यही मैं तब से आप को समझा रहा हूं।’’ संजय बोला, ‘‘ब्राह्मण हो या चमार सभी के समान विकास से ही देश और समाज का कल्याण है। न कि एक दूसरे को गाली दे कर।’’
‘‘चलिए यह बहस फिर कभी !’’ वह बोला, ‘‘अब खाना खा लिया जाए।’’
‘‘हां, देख रहा हूं बड़ी देर से आप शराब की जगह पानी पी रहे हैं।’’ कह कर संजय ख़ुद पानी पीने लगा।
‘‘ज्यादा शराब पी लेने के बाद पानी पीते रहने में ही भलाई है।’’
‘‘वो तो है।’’
खाना खाते-खाते रात के दो बज गए। वह घर पहुंचा ढाई बजे। सोते-सोते तीन बज गए। दूसरे दिन वह देर से सो कर उठा। नहा धो कर उस अधिकारी के दफ्तर गया। वह नदारद !
संजय का दिमाग ख़राब हो गया।
वह वापस घर आ कर उसे लगातार फोन करता रहा। न तो वह घर में मिलता, न दफ्तर में। संजय परेशान हो गया। उधर संपादक भी रह-रह कर संजय के घर फोन करते रहे। और संजय पत्नी से यही कहता रहा कि, ‘‘कह दो नहीं हैं।’’ कई बार कहते-कहते उस ने सोचा कि कहीं जनाब भूसी राम भी तो यही नहीं कर रहे, ‘‘कह दो नहीं हैं।’’ यह ख़याल आते ही वह भूसी राम के दफ्तर की ओर चल दिया। वह दफ्तर में नहीं मिला तो संजय उस के घर पहुंचा। वह वहां भी नहीं था। उस का कोई मेसेज भी नहीं।
संजय की परेशानी की कोई सीमा नहीं थी।
शाम हो गई। संजय बैठा-बैठा खीझ रहा था कि फोन की घंटी बजी। वह पत्नी से बोला, ‘‘कह दो नहीं है।’’ पर पत्नी बोली, ‘‘होल्ड कीजिए।’’
‘‘बी॰ आर॰ सिंह बोल रहा हूं।’’ उधर से आवाज आई।
‘‘आप कहां गायब हो गए प्रभू !’’
‘‘गायब नहीं हूं।’’ वह बोला, ‘‘बचता-बचाता घूम रहा हूं।’’ वह घबराया हुआ बोला, ‘‘आप नहीं जानते, मुझे सुबह से ही वाच किया जा रहा है।’’
‘‘क्या ?’’
‘‘हां।’’
‘‘पर कैसे ?’’ संजय बोला, ‘‘मैं ने तो कहीं लीक नहीं किया। आप को प्वाइंट आऊट नहीं किया।’’
‘‘मैं ने पता किया तो चला कि रात को आप को फालो किया इंटेलीजेंस वालों ने।’’ वह बोला, ‘‘कल रात आप को मेरे घर नहीं आना चाहिए था।’’
‘‘हां, गलती तो हो गई।’’ संजय बोला, ‘‘पर क्या फर्क पड़ता है। कोई कहीं भी आ जा सकता है।’’
‘‘वो तो है।’’ वह बोला, ‘‘पर मेरी पोजीशन थोड़ी आकवर्ड हो रही है।’’ वह रुका और बोला, ‘‘पर चिंता की बात नहीं। मैं सब ठीक कर लूंगा।’’
‘‘आप बोल कहां से रहे हैं ?’’
‘‘बोल तो मैं सचिवालय से ही रहा हूं। पर अपने आफिस से नहीं ।’’
‘‘क्या हुआ उस सुबूत का ?’’
‘‘थोड़ी देर में मैं भिजवाता हूं।’’ वह बोला, ‘‘आप के दफ्तर भेज दूं ?’’
‘‘नहीं भई, मैं घर पर हूं।’’ संजय बोला, ‘‘बिना उस के मैं दफ्तर कैसे जा सकता हूं।’’
‘‘राइट-राइट।’’ वह बोला, ‘‘मैं खुद तो आ नहीं पाऊंगा। आप भी मुझे कांटेक्ट मत करिएगा। पर एनी वे मैं एक आदमी से मौका देख कर भिजवाता हूं।’’
‘‘भिजवा दीजिए।’’ संजय बोला, ‘‘अगर आज सुबूत नहीं मिला तो कल खंडन छपा मिलेगा।’’
‘‘राइट-राइट।’’ वह बोला, ‘‘मैं जल्दी भिजवाता हूं। पर खंडन किसी सूरत में नहीं छपने पाए।’’
‘‘आप सुबूत भेजिए तो सही !’’
‘‘राइट-राइट।’’
‘‘ओ॰ के॰।’’ कह कर संजय ने फोन रख दिया।
थोड़ी देर बाद एक निरीह सा आदमी सीलबंद लिफाफा ले कर आया। और काफी दरियाफ्त के बाद वह लिफाफा उस ने संजय को दिया। लिफाफा खोलते हुए संजय की आंखों में चमक आ गई। कांग्रेस के जिन बाइस हरिजन विधायकों ने जनमोर्चा ज्वाइन करने की बात कही थी उन विधायकों की दस्तख़त समेत उस प्रस्ताव की फोटो कापी अब उस के हाथ में थी। उस ने खंडन वाली चिट्ठियों की दस्तख़त मिलाए। दस्तख़त हूबहू वही थे।
संजय ने दफ्तर जा कर संपादक को प्रस्ताव के दस्तख़त और खंडन के दस्तखत दिखाए। संपादक जी की जान में जैसे जान आ गई। बोले, ‘‘आप सुबह से गायब थे। मेरे तो हाथ पांव फूल गए थे।’’ वह बोले, ‘‘फटाफट ख़बर लिखिए।’’
दूसरे दिन जब बैनर बाक्स बन कर दोनों दस्तख़तों की फोटो स्टेट सहित ख़बर छपी तो तहलका मच गया। सरोज जी उस दिन सुबह रिपोर्टर्स मीटिंग में नहीं आए। शाम को संजय को देखते ही वह बिसूरते हुए बोले, ‘‘मार लिया मैदान !’’
संजय कुछ बोला नहीं। फीकी मुसकान फेंक कर रह गया। सरोज जी की तकलीफ का अंदाजा उसे था। क्यों कि जब एक दिन पहले वह सुबह रिपोर्टस मीटिंग में नहीं आया तो सरोज जी ऐलान कर चुके थे कि ‘‘संजय तो गए !’’ इस लिए वह चुप ही रहा। दूसरे मुख्यमंत्री और कांग्रेस पर ख़बर ! सरोज जी को यह कभी नहीं सुहाता था। आज इस ख़बर के साथ उन्हें अपने एम॰ एल॰ सी॰ बनने का सपना एक बार फिर टूटता नजर आया।
थोड़ी देर बाद चपरासी ने संजय को आ कर कहा, ‘‘सरोज जी बुलाय रहे हैं।’’
संजय उन की केबिन में गया और कुर्सी पकड़ कर खड़ा हो गया। सरोज जी ने उसे देखा पर कुछ बोले नहीं। लिखने में लगे रहे। जब पांच मिनट बीत गए तब संजय बोला, ‘‘जी, सरोज जी !’’
‘‘हां, बैठिए !’’ ठंडी सांस खींचते हुए वह बोले।
‘‘जी।’’ बैठते हुए संजय बोला।
‘‘अब हम का बताएं। !’’ वह बड़े ठंडेपन से बोले, ‘‘मुख्यमंत्री आप से बहुत नाराज हैं। कहि रहे थे बताइए इन को मकान दिया। हेन किया, तेन किया। पर यह हमारे जिले के हो कर भी हमारे खि़लाफ ख़बर लिख रहे हैं। पार्टी में बगावत करवा रहे हैं।’’ कहते हुए सरोज जी ठंडी सांस खींच कर फिर बोले, ‘‘बहुत नाराज हैं आप से मुख्यमंत्राी।’’
‘‘क्या कह रहे हैं आप ?’’ सवाल उछाल कर संजय ने भांपने की कोशिश की कि सरोज जी के इस कहने में कितना सच है और कितना झूठ !
‘‘अब मुख्यमंत्री नाराज तो हई हैं आप से !’’ कहते हुए सरोज जी की आवाज थोड़ी हलकी हुई। दूसरे हमेशा की तरह वह हांफे भी नहीं। संजय समझ गया सरोज जी पूरा-पूरा झूठ गढ़ रहे हैं। संजय को चुप देख कर सरोज जी ने फिर अपनी बात दुहराई, ‘‘मुख्यमंत्री बहुत नाराज हैं आप से !’’
‘‘पर हम से तो मुख्यमंत्री कह रहे थे कि ऐसे ही आंखें खोले रखिए। पता तो चले कि कौन किस के साथ है !’’ संजय ने भी सरोज के झूठ को दूसरा झूठ गढ़ कर खाने की कोशिश की।
‘‘हईं !’’ सरोज जी का गप सचमुच भहरा गया। उन की आवाज का ठंडापन गायब हो गया। वह सहज होते हुए बोले, ‘‘ऊ जो मुख्यमंत्री का सूचनाधिकारी मेहता है वही हम से कहि रहा था कि मुख्यमंत्री जी नाराज हैं।’’ सरोज जी अब दूसरा झूठ गढ़ गए थे।
‘‘पर मेहता तो आज हमारे घर आया था।’’ संजय ने फिर झूठ बोला, ‘‘बल्कि वही हमें मुख्यमंत्री के पास ले गया। बताया कि मुख्यमंत्री जी ने बुलाया है।’’ संजय ने देखा कि सरोज जी के झूठ पर उस के झूठ का निशाना सही-सही लग गया था। वह बोला, ‘‘अभी थोड़ी देर पहले वहीं से तो आया हूं।’’
‘‘कहां से ?’’ सरोज जी अचकचाए।
‘‘मुख्यमंत्री के यहां से।’’ संजय बोला।
‘‘हमारे बारे में कुछ नहीं पूछ रहे थे ?’’ सरोज जी पानी बन कर पूछ रहे थे।
‘‘कौन मेहता ?’’ संजय ने सरोज जी को छेड़ा।
‘‘अरे नहीं। किस बेवकूफ की बात कर रहे हैं।’’ सरोज जी लपक कर बोले, ‘‘मुख्यमंत्री जी ! हमारे बारे में तो पूछ नहीं रहे थे।’’
‘‘चरचा तो चली थी सरोज जी आप की !’’ संजय बोला, ‘‘मेहता ने ही बात चलाई थी।’’
‘‘हां, मेहता अच्छा आदमी है !’’ क्षण भर में ही मेहता के बारे में सरोज जी की राय बदल गई थी। अभी-अभी वह उसे बेवकूफ बता रहे थे। और अब अच्छा आदमी बता रहे थे। उन की उत्सुकता अभी बनी हुई थी, ‘‘तो का कह रहे थे मुख्यमंत्री हमारे बारे में ?’’
‘‘यही कि कैसे हैं ?’’
‘‘और ?’’
‘‘और हाल चाल पूछ रहे थे।’’
‘‘और ?’’
‘‘हां, उन्हों ने मेहता से कहा कि सरोज जी से मिले बहुत दिन हो गए। कभी खाने पर बुलाओ।’’
‘‘ऐसे कहि रहे थे मुख्यमंत्री !’’ सरोज जी खुश हो गए थे। शायद एम॰ एल॰ सी॰ बनने का सपना उन की आंखों में तैर गया था।
बाइस हरिजन विधायकों के कांग्रेस से जनमोर्चा जाने से कांग्रेसी सरकार को कोई ख़तरा नहीं था। सरकार गिरने वाली नहीं थी। मुख्यमंत्री की कुर्सी को भी कोई आंच मोटा मोटी नहीं लगती दिखती थी। पर प्रधानमंत्री दरबार में मुख्यमंत्री की क्लास तो हो ही सकती थी। क्यों कि इस तरह सारे हरिजन विधायकों के कांग्रेस से जनमोर्चा जाने की यात्रा सिर्फ पार्टी स्तर की बगावत भर नहीं थी। यह जनमोर्चा द्वारा कांग्रेस का हरिजन आधार काटने का संकेत था। हरिजन वोट बैंक के टूटने की घंटी थी। ख़तरे की घंटी। मुख्यमंत्राी, उन के सहयोगी और उन का स्टाफ इसी नाते इस ख़बर से भीतर-भीतर तबाह थे। पर बाहर-बाहर यही जताते रहे कि कुछ नहीं हुआ है। और सचमुच ख़बर छपने के चौथे दिन विधान परिषद में जो नजारा देखने को मिला संजय एक क्षण को तो सकते में आ गया। विधान परिषद में संजय के खि़लाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव पेश हो गया था। क्यों कि जनमोर्चा प्रस्ताव पर दस्तख़त करने वाले विधायकों में से कुछ विधान परिषद सदस्य भी थे। संजय का कयास था कि वह सारे विधायक सिर्फ मंत्री पद पाने भर के लिए यह दबाव बनाए हुए थे। पर इस का भंडाफोड़ सार्वजनिक रूप से हो जाएगा इस का उन्हें तनिक भी आभास नहीं था।
विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश करने वाले विधायकों की जिद थी कि तुंरत प्रस्ताव मंजूर कर लिया जाए। और संबंधित संवाददाता को सदन में बुला कर दंडित कर जेल भेजा जाय। पर पीठासीन अधिकारी ने तुरंत मतदान करा प्रस्ताव मंजूर करने से इंकार कर दिया। पर लंच बाद यह सारे सदस्य वही मांग ले कर विधान परिषद सभापित के आसन के निकट पहुंच गए। सवाल व्यवस्था का उठ गया। परिषद की बैठक दूसरे दिन के लिए स्थगित हो गई।
दफ्तर में संजय परेशान इधर उधर घूमता रहा। मनोहर बोला, ‘‘जेल तो डियर तुम्हें हो ही जाएगी। भले तीन दिन की हो। पर होगी जरूर। और इस में कोई जमानत भी नहीं होगी। हाईकोर्ट क्या सुप्रीम कोर्ट भी जमानत नहीं देती।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘पर तुम हीरो हो गए आज। और खुदा न खास्ता जो जेल चले गए तो देश भर के अख़बारों में पब्लिसिटी अलग।’’ वह टांट करता हुआ बोला, ‘‘चांदी है अब तो।’’
‘‘पर मेरा कुसूर क्या है ?’’ संजय बोला, ‘‘सही ख़बर लिखना गुनाह है ? फिर मैं ने तो सुबूत सहित लिखा है !’’
‘‘सही गलत का फैसला तो बाद में होगा। पहले तो तुम्हें जेल होगी।’’ मनोहर बोला, ‘‘पर अगर आज का ‘‘प्रबंध’’ करवा दो तो मैं जेल जाने से तुम्हें बचवा सकता हूं।’’
‘‘प्रबंध मतलब ?’’ संजय बिफरा।
‘‘आज की दारू !’’ मनोहर बोला, ‘‘बड़ी सीधी सी बात है।’’
‘‘मैं ने कभी पिलाई है ?’’
‘‘तभी तो कह रहा हूं, आज पिला दो।’’
‘‘सवाल ही नहीं उठता।’’ संजय सिगरेट सुलगाता हुआ बोला, ‘‘मैं ने कभी खुद तो ख़रीद कर पी नहीं। पिलाने का तो सवाल ही नहीं उठता।’’
‘‘जेल जाने के सवाल पर भी नहीं ?’’
‘‘हरगिज नहीं।’’
‘‘सोच लो !’’ मनोहर बोला, ‘‘एक मैं ही हूं जो तुम्हें जेल जाने से बचा सकता हूं।’’
‘‘तो भी नहीं।’’ संजय बोला, ‘‘शराब तो मैं हरगिज-हरगिज नहीं ख़रीद सकता।’’
‘‘जेल जा सकते हो ?’’
‘‘चला जाऊंगा।’’
‘‘पर शराब ख़रीद कर नहीं पिलाओगे ?’’
‘‘सवाल ही नहीं।’’
‘‘और मुफ्त की मिले तो टैंकर की तरह पी जाओगे ?’’
‘‘हां, यह तो आप जानते ही हैं।’’
‘‘तो चलो आज तुम्हारा टैंकर भी फुल करवा देता हूं।’’ मनोहर बोला, ‘‘और तुम्हारा जेल जाना भी मुल्तवी करवा देता हूं।’’
‘‘कहां ?’’ संजय हैरत से बोला।
‘‘है मेरा दोस्त !’’ मनोहर बोला, ‘‘क्या समझते हो तुम रिपोर्टिंग वालों के ही पास काम के लोग होते हैं। चलो आज तुम्हें दिखाता हूं कि मेरा क्या जलवा है ?’’
‘‘कहीं सरोज जी की तरह तो नहीं ?’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘उस बार सरोज जी ने भी यही कहा था कि चलिए दिखाऊं कि लखनऊ में मेरी क्या प्रतिष्ठा है !’’
‘‘अरे नहीं।’’ मनोहर बोला, ‘‘सरोज जी और मुझ में तुम्हें कोई फर्क नजर नहीं आता ?’’ वह अपनी लंबी-लंबी टांगें फैलाता हुआ बोला, ‘‘कम से कम इस बार तो मान ही लो।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘क्यों कि इस बार सरोज जी तुम्हें जेल भिजवाने में लगे हैं और मैं तुम्हें बचाने में।’’ वह बोला, ‘‘और सरोज जी से मोर्चा लेना कितना ख़तरनाक होता है, तुम से बेहतर कौन जानता है।’’ वह पैंट खींचता, नाखून चबाता हुआ खड़ा हो गया। बोला, ‘‘पर सरोज जी तुम्हें जेल नहीं भिजवा पाएंगे।’’
‘‘पर सरोज जी हमें क्यों जेल भिजवाएंगे ?’’ संजय हैरान हुआ।
‘‘तुम क्या समझते यह सब कुछ अपने आप हो रहा है।’’ वह पैंट खींचता हुआ कमर पर हाथ रखता हुआ बोला, ‘‘इस आग में घी वही डाल रहे हैं।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘और मुझे तो लगता है आग भी उन्हीं की है, लगाई भी उन्हों ने है और घी भी वही डाल रहे हैं। तुम सरोज जी को जानते नहीं कि वह क्या चीज हैं !’’
‘‘मुझे तो किसी मुगलिया दरबार के मिरासी लगते हैं। और साफ कहूं तो एक कस्बाई भांड़ से ज्यादा कुछ नहीं लगते।’’
‘‘यह उन का बाहरी रूप है।’’ मनोहर बोला, ‘‘भीतर से वह औरंगजेब हैं। खूंखार भेड़िया हैं।’’
‘‘मुझे तो गीदड़ लगते हैं। हरदम रंग बदल लेने वाले।’’ संजय बिदकता हुआ बोला, ‘‘हरदम उगते हुए सूरज को प्रणाम करने वाले भांड़।’’
‘‘पर यही भांड़ अब की सांड़ बन कर तुम्हारी बत्ती बनवाने में लगा हुआ है।’’ मनोहर बोला, ‘‘विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश करने की सलाह इसी भांड़ की है।’’
‘‘क्या बकते हैं आप ?’’
‘‘बक रहा हूं ? चलो अभी पता चल जाएगा।’’ वह बेचैन होता हुआ बोला, ‘‘चल रहे हो कि मैं जाऊं ?’’
‘‘चलना कहां है ?’’
‘‘चलो तो सही !’’
‘‘क्या विधान परिषद सभापति के यहां ?’’
‘‘अरे नहीं।’’
‘‘पर कहां ?’’
‘‘चलो।’’ वह बोला, ‘‘गलत जगह नहीं ले जाऊंगा।’’
‘‘ठीक है चलिए !’’
‘‘वहां ज्यादा चूं चपड़ मत करना। न ही रिपोर्टरी झाड़ना।’’ दफ्तर के बाहर अपनी लंबी-लंबी टांगों से स्कूटर में किक मारता हुआ मनोहर बोला।
‘‘अब अगर ऐसी बंदिश है तो मुझे मत ले चलिए।’’
‘‘चलो भी।’’ मनोहर बोला, ‘‘अब लौंडियों की तरह नखरे मत चोदो।’’
‘‘मैं नहीं जाऊंगा।’’ संजय ठंडे स्वर में बोला, ‘‘जेल होती है तो हो जाए। पर मैं कहीं घुटने टेकने नहीं जाने वाला।’’
‘‘भाव मत बनाओ। चलो !’’
‘‘मैं नहीं जाऊंगा।’’
‘‘श्योर ?’’
‘‘श्योर !’’
मनोहर भनभनाता हुआ चला गया। पर रात कोई पौने एक बजे उस ने घर पर फोन किया। संजय सोया था। उठ कर फोन उठाया। मनोहर की आवाज नशे में लड़खड़ाई हुई थी। पर वह भावुक हो रहा था। वह कह रहा था, ‘‘घबराओ नहीं। सब इंतजाम हो गया है! सरोज जी समेत सब की काट ली गई है !’’ लड़खड़ाती आवाज में वह बोला, ‘‘त्रिपाठी से बात करो।’’ त्रिपाठी की आवाज मनोहर से भी ज्यादा नशे में लड़खड़ा रही थी। वह बोला, ‘‘बुद्धू तुम जेल नहीं जाओगे। निश्चिंत हो कर सो जाओ। पूरी लॉबिइंग हो गई है। निश्चिंत हो कर सो जाओ।’’
‘‘सो तो रहा ही था। आप लोगों ने जगा दिया।’’ संजय बिफरा।
‘‘अरे पागल तुम सचमुच बुद्धू हो।’’ त्रिपाठी बोला, ‘‘तुम्हारे लिए हम लोग यहां जाग रहे हैं और तुम सो रहे हो।’’ त्रिपाठी नशे में भी मक्खन लपेटने से बाज नहीं आ रहा था।
‘‘आप लोग मेरे लिए जाग रहे हैं कि पीने के लिए।’’
‘‘पगलू तुम्हारे लिए !’’
‘‘ठीक है तो मैं सोऊं ?’’ कह कर संजय ने फोन का रिसीवर रख दिया।
दूसरे दिन विधान परिषद में संजय के खि़लाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव की नोटिस ले ली गई। प्रस्ताव का समर्थन करने वाले एक विधायक ने यहां तक कह दिया कि, ‘‘इस ख़बर को लिखने वाला संवाददाता ब्लैक मेलर है !’’ वह बोला, ‘‘यह ख़बर पढ़ कर मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है।’’
‘‘तो माननीय सदस्य को मनोरोग विशेषज्ञ को दिखाए जाने की व्यवस्था करवा दें मान्यवर !’’ कहते हुए एक विपक्षी सदस्य ने चुटकी ली, ‘‘इन्हें इलाज की जरूरत है। और इन का सदन में रहना हम लोगों के स्वास्थ्य के लिए अहितकर है।’’ वह सदस्य बोला, ‘‘माननीय सदस्य के मानसिक इलाज की फौरन व्यवस्था की जाए मान्यवर !’’
इस वाकये से पूरा मामला हंसी में बदल गया। और मत विभाजन हो जाने से यह विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव अपने आप गिर गया। कई कांग्रेसी विधायक ही इस प्रस्ताव के ख़िलाफ बोलने लग गए। पर इस पूरी कार्रवाई के दौरान प्रेस गैलरी में बैठे-बैठे संजय की धुकधुकी बढ़ती रही।
पर ऐसा कैसे हो गया ?
संजय ने जब इस की पड़ताल की तो पता चला कि दिल्ली से कांग्रेस हाई कमान का स्पष्ट निर्देश आ गया था कि प्रस्ताव को पास न होने दिया जाय। क्यों कि प्रस्ताव पास हो जाने से मामला तूल पकड़ जाएगा। और अंततः हरिजन वोटरों के बीच कांग्रेस की साख गिर जाएगी। इस पूरी पड़ताल की एक स्टोरी लिख कर संजय ने संपादक को दे दी। पर संपादक ने, ‘‘नाऊ दिस चैप्टर इस क्लोज्ड’’ कह कर वह स्टोरी देखने ही से इंकार कर दिया।
संजय बहुत आहत हुआ।
उसी रात मुख्यमंत्री के सूचनाधिकारी मेहता ने संपादक को फोन किया कि, ‘‘मुख्यमंत्री जी आज आप के साथ भोजन करना चाहते हैं। आप को बुलाया है।’’
‘‘भोजन आप के साथ करना हो तो जहां बताइए आ जाता हूं।’’ संपादक ने मुख्यमंत्री के सूचनाधिकारी से कहा, ‘‘पर भोजन अगर मुख्यमंत्री को करना हो तो कहिए वह ख़ुद बात करें।’’
सूचनाधिकारी मेहता घबरा गया। उस ने आनन-फानन यह बात सूचना निदेशक को बताई। सूचना निदेशक समझ गया कि मामला और बिगड़ गया है। सो वह भागा दफ्तर आया और संपादक से मिल कर सूचनाधिकारी की बात के लिए माफी मांगी और कहा कि, ‘‘मैं आप को लेने आया हूं।’’
‘‘क्या भोजन अब आप के साथ करना है ?’’ संपादक ने मुसकुरा कर पर ठस आवाज में पूछा।
‘नहीं सर ! मुख्यमंत्री जी के साथ !’’ सूचना निदेशक को यह उम्मीद नहीं थी कि संपादक इस सवाल को फिर दुहरा देंगे। सो वह भहरा गया।
‘‘तो मुख्यमंत्री से कहिए कि अगर उन को इस गरीब के साथ भोजन करने का शौक चढ़ गया हो तो पहले मैनर सीखें।’’ संपादक ने कहा, ‘‘और तरीका यह है कि अगर भोजन उन्हें कराना है तो खुद न्यौतें। कर्मचारियों से न न्यौतवाएं।’’
‘‘वेल सर !’’
‘‘हां, अगर आप के साथ भोजन करना हो तो कहिए मैं अभी चलता हूं।’’
‘‘राइट सर !’’ इस तरह सूचना निदेशक बड़ी देर तक सर-सर करता रहा। और संपादक उसे बताते रहे कि, ‘‘मैं उन कुत्ता संपादकों में से नहीं हूं जो मुख्यमंत्री के दरबार में हमेशा दुम हिलाते घूमते रहते हैं और मान अपमान कुछ नहीं समझते हैं।’’ वह बोले, ‘‘जाइए अपने मुख्यमंत्री से बता दीजिए कि हर पत्रकार हड्डी नहीं पसंद करता।’’
दरअसल लखनऊ में रिपोर्टरों ने तो राजनीतिक हलकों में काकटेली डिनर खा पी कर ऐसी ही रवायत बना दी थी। कई बार तो बिन बुलाए भी कई पत्रकार पहुंच जाते। बस उन्हें सूचना भर होनी चाहिए। और कई बार यह भी होता कि भोज पर बुला कर मेजबान राजनीतिज्ञ ख़ुद गायब रहता। क्यों कि उस का मकसद पत्रकारों की मेजबानी नहीं, उन्हें खिला पिला कर, ‘‘ओब्लाइज’’ भर करना होता।
पत्रकार भी भर पेट शराब पी कर, मुर्गा खा कर ओब्लाइज हो कर चले जाते। मान अपमान की उन्हें कोई परवाह नहीं रहती। मुख्यमंत्री या कोई मंत्री एक बार स्टेट प्लेन या हेलीकाप्टर में किसी पत्रकार को बिठा कर दो दिन घुमा लाता तो वह उस यात्रा का वर्णन तो चंदरबरदाई शैली में डट कर लिखता ही उस का आफ रिकार्ड ब्यौरा महीनों यहां वहां परोसता फिरता। पर यह सब मान अपमान तब सिर्फ रिपोर्टरों के हिस्से तक था। संपादक तबका तब तक इस नाबदान से बचा हुआ था।
पर जल्दी ही संपादकों का पतन भी शुरू हो गया। और उस बार तो हद ही तो गई। एक मुख्यमंत्री ने अपने मुख्यमंत्रित्व के एक साल पूरे हो जाने की पूर्व संध्या पर दो हिंदी और एक अंगरेजी अख़बार के तीन चुनिंदा संपादकों को भोजन पर आमंत्रित किया। तीनों संपादक समय से मुख्यमंत्री निवास पर पहुंच गए। वहां उन की बड़ी आवभगत हुई बिलकुल दामाद की तरह। तीनों संपादक गदगद ! जब बड़ी देर हो गई फिर भी मुख्यमंत्री नजश्र नहीं आए तो संपादक गण परेशान हुए। पूछताछ की तो पता चला कि मुख्यमंत्री जी नहीं आ पाएंगे पर आप सादर भोजन करिए। तीनों संपादकों ने बिना मुख्यमंत्री के सादर भोजन किया। और जब चलने लगे तो एक संपादक डकार ले कर आह भरते हुए बोले, ‘‘मुख्यमंत्री जी होते तो एक बढ़िया सा इंटरव्यू भी हो गया होता।’’
‘‘इंटरव्यू हो गया है न!’’ मुख्यमंत्री का एक सूचनाधिकारी अदब से बोला और बने बनाए इंटरव्यू की टाइप प्रतियां निकाल कर तीनों को एक-एक प्रति देते हुए बोला, ‘‘तीनों इंटरव्यू अलग-अलग हैं।’’ उस ने विनम्रतापूर्वक जोड़ा, ‘‘आई मीन तीनों इंटरव्यू तीन तरह के हैं। सेम-सेम नहीं हैं। तीनों के एंगिल और क्योश्चिन डिफरेंट-डिफरेंट हैं।’’ कहते हुए अंगेरेजी के संपादक जो अंगरेजों के जमाने से ही पत्रकारिता कर रहे थे, आजादी के तुरंत बाद एम॰ एल॰ सी॰ का सुख भी लूट चुके थे, जिन की अंगरेजी पत्रकारिता में बड़ी प्रतिष्ठा और धाक थी से वह सूचनाधिकारी बोला, ‘‘सर आप का आइटम अंगरेजी में ही है। हिंदी से ट्रांसलेशन वाली दिक्कत नहीं होगी।’’
मुख्यमंत्री निवास से चलते समय इन तीनों संपादकों को बने बनाए इंटरव्यू के साथ-साथ भारी डग्गा यानी भारी गिफ्ट से भी नवाजा गया और निवेदन किया गया कि ‘‘सर, कोई काम हो तो बिना संकोच आदेश करें।’’
तीनों संपादक मुख्यमंत्री निवास से खुशी-खुशी लौटे।
दूसरे दिन तीनों संपादकों के अख़बारों में मुख्यमंत्री का इंटरव्यू पहले पेज पर विथ बाइलाइन विस्तार से छपा था। वह इंटरव्यू जो इन स्वनाम धन्य संपादकों ने लिया ही नहीं था, वह इंटरव्यू जो मुख्यमंत्री ने दिया ही नहीं था, वह इंटरव्यू जो सूचना विभाग के कई सूचनाधिकारियों और संयुक्त निदेशकों ने मिल-जुल कर तीर पर तुक्का स्टाइल में तैयार किया था। वही इंटरव्यू अक्षरशः इन अख़बारों में उन के संपादकों ने अपनी-अपनी बाइलाइन के साथ खोंस दिया था।
जाहिर है संपादकों का भी अब पतन हो गया था।
अब ऐसे महौल में अगर कोई संपादक तन जाए, रीढ़ दिखाने लगे मुख्यमंत्री से तो सूचना निदेशक के लिए ‘‘मैनेज’’ कर पाना बहुत नहीं तो थोड़ा मुश्किल तो था ही। हालां कि वह सूचना निदेशक व्यवहार में शालीन, मिजाज में नफीस और ‘‘मैनेज’’ करने में ख़ासी महारत रखता था। वह था तो आई॰ ए॰ एस॰ कैडर का ही। और सीनियर भी। पर आई॰ ए॰ एस॰ अधिकारियों की ऐंठ और अपने आप को ख़ुदा समझने की अकड़ उसे छूती तक नहीं थी। कम से कम अपने व्यवहार में वह इस की गंध नहीं आने देता था। पर उसकी शालीनता, नफासत और कायस्थीय कमनीयता इस संपादक को मैनेरिज्म के बावजूद मैनेज नहीं कर पा रही थी। वह संपादक की केबिन में ‘‘सर-सर’’ कहता यहां वहां फोन घुमाता रहा और लगातार यह जताता रहा कि कहीं भी मुख्यमंत्री जी मिल जाएं तो कम से कम फोन पर ही मुख्यमंत्री से संपादक को भोजन का न्यौता दिलवा दे। हालां कि संपादक उसे बार-बार बताते जा रहे थे कि, ‘‘आज तो मैं फिर भी भोजन पर मुख्यमंत्री निवास नहीं आ पाऊंगा। क्यों कि मुझे कहीं और जाना है। और कम से कम इस तरह तो कतई नहीं।’’
‘‘कल का रख लें सर !’’ सूचना निदेशक विनम्रता पूर्वक बोला।
‘‘नहीं इस तरह तो नहीं।’’ संपादक बोले।
इस बीच जाने कैसे और कहां से सरोज जी को ख़बर लग गई कि मुख्यमंत्री ने संपादक को खाने पर बुलाया है और संपादक ने जाने से मना कर दिया है। वह भागे-भागे संपादक की केबिन में घुसे और बिना किसी इधर-उधर के सीधे-सीधे प्वाइंट पर आ गए, ‘‘कहौ तो हम चले जाएं।’’ सरोज जी की बात सुन कर सूचना निदेशक बिदका। पर सरोज जी जैसे बोरिया बिस्तर बांध कर आए थे, ‘‘प्रतिनिधित्व हम कर देंगे।’’ सुन कर संपादक का चेहरा लाल हो गया। पर सूचना निदेशक के वहां होने के नाते वह कुछ बोले नहीं। लेकिन सरोज जी फिर भी चालू रहे, ‘‘कहौ तो हम चलिए जाएं।’’
‘‘पर मुख्यमंत्री जी ने एडीटर साहब को बुलाया है।’’ सूचना निदेशक ने स्पष्ट किया।
‘‘तो क्या हुआ ?’’ सरोज जी बाल हठ पर आ गए, ‘‘एडीटर के बिहाफ पर हम चले चलते हैं। बात वही भई।’’
‘‘ठीक है हम बाद में तय कर लेंगे।’’ कह कर अदब से सिर झुका कर सूचना निदेशक चला गया। उस के जाने के बाद सरोज जी भी उस के पीछे-पीछे संपादक की केबिन से बाहर निकलने लगे तो संपादक को लगा कि कहीं सरोज जी सूचना निदेशक के साथ नत्थी हो कर सचमुच ही न एडीटर के बिहाफ पर मुख्यमंत्री का भोज खा आएं! सो उन्हों ने सरोज जी को रोकते हुए कहा, ‘‘सुनिए सरोज जी !’’
‘‘हां।’’ कह कर वह ठिठक गए। बोले, ‘‘बोलौ !’’
‘‘आप मुख्यमंत्री के यहां आज एडीटर के बिहाफ पर भोजन पर मत चले जाइएगा।’’ संपादक ने जोर दे कर कहा, ‘‘और अगर जाइएगा तो इस्तीफा दे कर जाइएगा।’’
‘‘अरे, नहीं प्यारे।’’ सरोज जी बोले, ‘‘हम कवनो नादान हैं। इतनी बात तो हम भी समझते हैं। आखि़र इज्जत की बात है। और हम इस में बट्टा नाहीं लगावेंगे।’’ सरोज जी मौका नाजुक देख कर पट पैंतरा बदल गए थे, ‘‘ऊ तो हम एह मारे कहि रहे थे कि अफसर है, मुख्यमंत्री का ख़ास है, कहीं नाराज न होई जाए। और जानते ही हो प्यारे कि लाला को पचास काम पड़ते हैं मुख्यमंत्री से। इस लिए उस को खुश करने के लिए उतना कहि दिया। बस ! हम सचहूं थोड़े जाएंगे।’’ उन्हों ने जोड़ा, ‘‘आखि़र इज्जत हम हू को प्यारी है प्यारे !’’
‘‘कुछ नहीं। कोई इज्जत विज्जत नहीं प्यारी है आप जैसे लोगों को।’’ संपादक ने कहा, ‘‘आप ही जैसे लोगों ने पत्रकारों की छिंछालेदार करा रखी है। नहीं मुख्यमंत्री की इतनी हिम्मत के अपने चाकरों से भोजन के लिए हमें कहलाए !’’
‘‘घबराओ नहीं प्यारे !’’ सरोज जी उत्तेजित होने का अभिनय करते हुए बोले, ‘‘हम कल ही मुख्यमंत्री को टाइट करते हैं।’’
‘‘यह भी करने की जरूरत नहीं है।’’ संपादक बोले, ‘‘आप को तो बस मुख्यमंत्री से मिलने का बहाना चाहिए।’’
‘‘नहीं हम मुख्यमंत्री को अबकी टाइट करेंगे।’’ सरोज जी वीर रस में आ गए थे, ‘‘आखि़र हमारे संपादक की गरिमा का सवाल है प्यारे !’’
‘‘कुछ नहीं। कोई जरूरत नहीं।’’ संपादक ने कहा, ‘‘मुख्यमंत्री के एक मामूली से अफसर के आगे तो आप अभी मेरे सामने ही गिड़गिड़ा रहे थे। मुख्यमंत्री को क्या टाइट करेंगे ?’’
‘‘वह अब हम पर छोड़ौ।’’ सरोज जी बोले, ‘‘हम समझ लेंगे।’’
‘‘कहा न कोई जरूरत नहीं।’’ संपादक ने कहा, ‘‘सरोज जी किसी भी बहाने आप मुख्यमंत्री के पास नहीं जाएंगे।’’
‘‘पर संपादक की गरिमा का सवाल है प्यारे !’’ सरोज जी किसी घाघ मगरमच्छ की तरह अपनी बात पर डटे रहे।
‘‘संपादक मैं हूं। अपनी गरिमा की रक्षा करना मैं जानता हूं।’’ उन्हों ने कहा, ‘‘वह मैं कर लूंगा। आप अपनी गरिमा बचाइए। कुछ ग्रेस मेनटेन करिए सरोज जी !’’
उदास सरोज जी चुपचाप तब खिसक गए थे। सरोज जी जिन के लिए नरेंद्र जी अक्सर कहा करते थे, ‘‘सरोज जी की योग्यता कायदे से जिला संवाददाता बनने लायक भी नहीं है। पर वह किस्मत की खा रहे हैं और बरसों से राजधानी में विशेष संवाददाता बने बैठे हैं। विधान सभा, मुख्यमंत्री ‘‘कवर’’ कर रहे हैं तो कोई क्या कर लेगा ?’’ नरेंद्र जी जोड़ते, ‘‘क्या पता किसी दिन वह संपादक भी बन जाएं।’’ गरदन हिला कर वह कहते ‘‘सरोज जी की तमन्ना तो है ही संपादक बनने की।’’
एडीटर के बिहाफ पर बेहयाई और अपमानित होने की हदें लांघ मुख्यमंत्री का भोज खाने के लिए ललकने वाले वही सरोज जी एक्टिंग ही सही एडीटर बन गए थे। सरोज जी के तीन सपनों में से एक सपना आज पूरा हो गया था। सरोज जी कार्यवाहक संपादक बन गए थे और संजय से नाराज थे।
बेहद नाराज !
गंदी गोमती, गंधाते सरोज जी, विधान सभा मार्ग और ‘‘गंगा जी धीरे बहो’’ गुनगुनाता संजय। इन चारों का संयोग कहिए, दुर्योग कहिए, कोई अंतविर्रोध रच रहा था, कोई कंट्रास्ट कि कोई कोलाज गढ़ रहा था, कोलतार का बना विधान सभा मार्ग उस काली घुप अंधेरी रात में कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था। स्ट्रीट लाइट्स भी उसे ऐसा कुछ हेर पाने में मदद देने से जैसे इंकार कर रही थीं। पर संजय था कि गुनगुनाता ही जा रहा था ‘‘गंगा जी धीरे बहो, नाव फिर भंवर में है।’’ ठहरे हुए पानी वाली गंदी गोमती की बदबूदार गंध का आदी यह विधान सभा मार्ग ‘‘गंगा जी धीरे बहो’’ का मर्म तो नहीं समझ पा रहा था पर इस गीत के दूसरे मिसरे ‘‘नाव फिर भंवर में है’’ की आंच उसे जरूर मिल रही थी, महसूस हो रही थी। जाने कैसे ? अब जब कि गोमती भंवर बिसार चुकी थी। भूल चुकी थी भंवर का भाष्य !
ठहरे हुए पानी को भला भंवर का भाष्य क्या मालूम ? भंवर का भेद वह कैसे भेदे भला ? भंवर की भावना, भंवर के स्वाद, भंवर के भ्रम में कैसे भिंगोए किसी को वह। पर विधान सभा मार्ग भंवर की आंच में भींज रहा था। आंच में भी भींजता है कोई भला ? पर विधान सभा मार्ग तो भींज रहा था। यह भींजना आंच से उपजा पसीना तो नहीं था? कि बाढ़ आ गई थी गोमती में जो वह भंवर का भाव विधान सभा मार्ग को शेयर के भाव की तरह परोस रही थी, परोस-परोस उसे भिंगो रही थी, नाव को भंवर के लपेटे में ऐसे लपेट रही थी गोया वह आग की लपट हो !
हां, यह बाढ़ ही थी।
भंवर के भाव ऐसे उछल रहे थे गोया शेयर के भाव हों।
‘‘तो ऐसे में संजय महाराज क्या किसी डॉक्टर ने प्रेसक्राइब किया है कि जान बूझ कर आप अपनी नाव भंवर के भाव चढ़ा दें ?’’ वह ख़ुद ही से पूछता है। और ख़ुद ही जवाब भी देता है कि, ‘‘हां प्रेसक्राइब्ड तो किया है।’’ वह जरा अटकता है और जोड़ता है ‘‘नियति के डॉक्टर ने। और नियति से, नियति के नियंता से मैं लड़ना नहीं चाहता।’’ जवाब उस का लंबा होता जाता है, ‘‘दरअसल नपुंसकों, कायरों और जाहिलों के आगे मैं घुटने नहीं टेकना चाहता । भले ही आज इन्हीं का समय है। और समय से भला कौन लड़ा है ? जानता हूं कि समय बड़ा हरजाई है, निर्मम है। पर मैं एक बार समय से भी लड़ लूंगा। यह जानते हुए भी कि समय से हर कोई हारा है। हो सकता है मैं भी हारूं। हो सकता है मैं जीतूं भी। समय से न सही, इस समय के नपुंसकों, कायरों, जाहिलों, कुटिलों और धूर्तों से तो जीतूंगा ही। हो सकता है इन से भी हार जाऊं। हो सकता है मेरी नाव को भंवर लील ले, उबरने न दे। पर मैं उबर भी न पाऊंगा इस की गारंटी देने वाला भंवर भी कौन होता है ? ताकतवर भंवर होगा तो वह हमें लील जाएगा। मुझ में शक्ति होगी, युक्ति होगी तो मैं उबर जाऊंगा। और यह भंवर भी भला कौन बारहमासी है। ठहरे हुए पानी में भटक कर बाढ़ के सिर आया हुआ भंवर ! कितने देर रहेगा ? एक दिन पानी फिर ठहरेगा, भंवर का भाव भहरा जाएगा। हां, उस के बाद जो सड़न, बदबू और उस की बयार बहेगी वह जरूर मार डालने वाली होगी। बचने की जरूरत इसी से है।’’
‘‘पर वह बचे कैसे ?’’ वह खुद ही पूछता है, ‘‘कोई कार्य योजना है क्या ?’’
‘‘कोई कार्य योजना तो नहीं है।’’ वह ख़ुद को जैसे जवाब देता है, ‘‘पर एक सूत्र है। जिसे वह अपनी रिपोर्टिंग में अकसर आजमाता रहा है कि आंख, कान और दिमाग खुले रख कर पानी की तरह जाना और पानी की तरह आना, साथ में अमृत-विष, हीरा-मोती, कूड़ा-कचरा, अच्छा-बुरा जो भी तथ्य मिले बहा लाना और सब को सलीके से परोस देना। तो वह पानी बन कर लड़ेगा भी।’’ वह फिर जोड़ता है ऐसे जैसे ख़ुद को टोकते हुए, खुद को टटोल रहा हो, ‘‘और पानी ! पानी तो बड़े घमंड से खड़े पहाड़ की छाती भी चीर कर बहता हुआ जमीन पर आ जाता है सब को जीवन देने। और जीवन दे कर बहते-बहते नदी बन समुद्र में समा जाता है।’’
‘‘तो क्या वह भी समुद्र में समा जाएगा ?’’ उस का यह सवाल खुद उस में जाग जाता है। और इस सवाल का अर्थ, उस की ध्वनि गुम होने लगती है।

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