Home मधुलिका यादव शची स्त्रियाँ बुद्ध नहीं हो सकती.

स्त्रियाँ बुद्ध नहीं हो सकती.

मधुलिका शची

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जम्बूद्वीप में कई हजार वर्ष पहले जब दीपांकर बुद्ध ने ऐसा ” सुमेधा ” से कहा तो सुमेधा चौंक गईं और उसने दीपांकर से प्रश्न किया.. क्यों आर्य मैं स्त्री हूँ इसलिए..!
दीपांकर बुद्ध मुस्कुराए फिर नम्र वाणी से बोले ; हां इसीलिए ..!
सुमेधा : मगर क्यों..? क्या स्त्री होना पाप है ..!!
क्या स्त्री को मुक्त होने का अधिकार नहीं है आर्य..?
दीपांकर बुद्ध : नहीं..! नहीं..! देवी, स्त्री होना पाप नहीं है परंतु यह सत्य है कि यदि स्त्रियाँ स्त्री योनि में ही बोधिसत्व को प्राप्त होने लगीं तो इस संसार से बुद्धत्व को प्राप्त होने वाले मनुष्यों का आगमन सदा सर्वदा के लिए ठहर जाएगा…!
ये सृष्टि स्वयं ही नष्ट हो जाएगी ।
इस संसार को चलायमान रखने वाले सारे तत्व नष्ट हो जाएंगे जिससे यह सृष्टि निर्जीव हो जाएगी…!
इतना कहकर जैसे ही दीपांकर बुद्ध चलने को उद्धत हुए वैसे ही उनके मार्ग में आने वाले कीचड़ में सुमेधा लेट गयी और सम्पूर्ण आत्मविश्वास के साथ बोली; मैं अवश्य ही बुद्धत्व को प्राप्त होउंगी..!
मैं अवश्य ही मुक्त हो जाऊंगी इन माया के बंधनों से,
मैं प्रण लेती हूँ..!
दीपांकर बुद्ध मुस्कुराते हुए पुष्पों को अपने हाथ मे लेकर सुमेधा को पुष्प अर्पित करते हुए बोले : जय हो ..! जय हो…!
ऐसा ही हो..
ऐसा ही हो..!
दीपांकर बुद्ध को इस तरह कहते सुन उनके शिष्य ने उनसे पूछा: भगवन, अभी आपने कहा कि स्त्री बुद्ध नहीं बन सकती परंतु अभी आप कह रहे , ऐसा ही हो..!
मैं भ्रमित हो गया हूँ देव..!
दीपांकर बुद्ध ने संयत वाणी में मुस्कुराते हुए कहा : हे भद्र..! यह स्त्री अपने अगले जन्म में पुरुष सुमेधा के रूप में जन्म लेगी और फिर जैसे अभी घटना घटी है वही फिर से घटेगी, तब इसे कई जन्म और भटकने के बाद बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाएगी।
सुमेधा का पुरुष रूप में जन्म हो चुका था वह दीपांकर बुद्ध को अपने समक्ष देखकर उत्साहित हो जाता और फिर अपनी महिला मित्र सुमिति से कहता है : मुझे ये पुष्प दे दो..?
वो देखो दीपांकर बुद्ध आ रहें हैं मुझे उनके स्वागत के लिए उनके मार्ग में पुष्प बिछाने हैं..!
सुमिति बोली ; पुष्प दे तो दूँ लेकिन वचन दो जब भी दीपांकर से तुम कुछ मांगोगे तो उसमें मेरी भी सहमति लोगे…!
सुमेधा कुछ क्षण सोचता है फिर कहता है ठीक है..!
सुमेधा ने देखा कि दीपांकर के मार्ग में कीचड़ है तो वह उनके मार्ग में लेट गया और बोला: हे बुद्ध ..! आप मुझे मार्ग समझकर मेरे ऊपर से चलें जाएं,
दीपांकर बुद्ध सुमेधा के पूर्व जन्म को स्मरण कर मुस्कुराते हुए बोले: आखिर तुमने अपनी जिद को पूरा कर ही लिया बोलो क्या कहना चाहते हो..?
सुमेधा के मुँह से सहसा निकल पड़ा : बुद्धत्व प्राप्त करने का आशीर्वाद ..!
दीपांकर बोले: यह तो तुम्हारी नियति है जिसे तुम अवश्य प्राप्त करोगे.!
तभी सुमिति बोल उठी ; रुको सुमेधा अपने वचन का पालन करो,
सुमेधा ने हाँ में सिर हिलाया: सुमिति बोली ..ठीक है मैं भी
अगले जन्म में तुम्हारी सहभागिनी बनूँगी, यही मेरा भी प्रण है।
दीपांकर बुद्ध वहां से मुस्कुराकर अपने मार्ग की ओर चल दिये।
सुमेधा और सुमिति जीवन मरण का चक्कर लगाते हुए कई जन्मों के बाद आखिर एक दिन सिद्धार्थ और यशोधरा के रूप में मिल ही गए।

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