Home हमारे लेखकसुमंत विद्वन्स वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड भाग 88

वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड भाग 88

सुमंत विद्वांस

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श्रीराम की आज्ञा पाकर सब वानर अपनी गुफाओं से निकलकर चल पड़े। वे हाथियों के समान विशालकाय और हृष्ट-पुष्ट थे। उनमें से कुछ वानर आगे बढ़कर सेना के लिए मार्ग बनाते जा रहे थे, कुछ सेना की रक्षा के लिए उसके चारों ओर चक्कर लगाते हुए चल रहे थे। कुछ मेघों के समान गर्जना कर रहे थे, कुछ सिंहों के समान दहाड़ रहे थे और कुछ युद्ध के उत्साह में किलकारियाँ भरते हुए आगे बढ़ रहे थे।
वे सुगन्धित मधु पीते और मीठे फल खाते हुए जा रहे थे। कुछ वानरों ने विशाल वृक्षों को कन्धों पर उठा लिया था, तो कुछ मनोविनोद के लिए एक-दूसरे को ही कंधे पर उठाकर चल रहे थे। कोई चलते-चलते उछल पड़ता था, तो कोई दूसरे को धक्का देकर नीचे गिरा देता था।
शुभ और अशुभ शकुनों को भली-भांति जानने वाले लक्ष्मण जी ने मार्ग में चलते-चलते श्रीराम से कहा, “रघुनन्दन! मुझे पृथ्वी और आकाश में अनेक शुभ शकुन दिखाई दे रहे हैं, जिससे स्पष्ट है कि आपका मनोरथ अवश्य ही सिद्ध होगा। शीघ्र ही रावण को मारकर आप सीताजी के साथ अयोध्या में पधारेंगे। यह देखिये, सेना के पीछे शीतल और मंद पवन बह रही है। ये पशु-पक्षी मधुर स्वर में अपनी-अपनी बोली बोल रहे हैं। जल स्वच्छ तथा निर्मल दिखाई दे रहा है। जंगलों में पर्याप्त फल उपलब्ध हैं। वृक्षों में ऋतु के अनुसार फूल लगे हुए हैं।”
“सूर्यदेव निर्मल दिखाई दे रहे हैं। भृगुनन्दन शुक्र (शुक्र ग्रह) भी आपके पीछे की दिशा में प्रकाशित हैं। सप्तर्षिगण (सप्तर्षि तारामण्डल) जिस ध्रुवतारे को अपनी दाहिनी ओर रखकर परिक्रमा करते हैं, वह ध्रुवतारा भी निर्मल दिखाई दे रहा है। वसिष्ठ और त्रिशंकु तारे भी हम लोगों के सामने की ओर प्रकाशित हैं। विशाखा नामक युगल नक्षत्र भी निर्मल है तथा मंगल आदि दुष्ट ग्रहों की दृष्टि से सुरक्षित है।”
“राक्षसों का मूल नक्षत्र, जिसके देवता निऋरुति हैं, इस समय धूमकेतु से आक्रान्त होकर संताप का भागी बना हुआ है। यह राक्षसों के विनाश का ही संकेत है क्योंकि जो लोग कालपाश में बँधे होते हैं, उन्हीं का नक्षत्र ऐसे समय पर ग्रहों से पीड़ित होता है। ऐसे शुभ नक्षत्र देखकर आपको बड़ी प्रसन्नता होनी चाहिए।”
इस प्रकार वानर-सेना लगातार आगे बढ़ती रही। श्रीराम की आज्ञा थी कि कोई वानर मार्ग में उपद्रव न करे और किसी को कष्ट न दे। मार्ग में उन लोगों को अनेक पर्वत, सरोवर और वन दिखाई दिए। कहीं चम्पा, तिलक, आम, अशोक, सिन्दुवार, तिनिश और करवीर के वृक्ष थे, तो चिरबिल्व, महुआ, वञ्जुल, बकुल, रंजक, नागकेसर, पाडर, कोविदार आदि थे। मुचलिन्द, अर्जुन, शिंशपा, कुटज, हिंताल, चूर्णक, कदम्ब, नीलाशोक, सरल, अंकोल और पद्मक आदि भी सुन्दर फूलों से सुशोभित थे। जलाशयों के किनारे उन लोगों को अनेक चकवे,जलकुक्कुट (मुरगाबी), जलकाक (पनकौआ), क्रौंच आदि पक्षी एवं रीछ, सूअर, हिरन, तरक्षु (लकड़बग्घे), सिंह, बाघ, हाथी आदि भी दिखाई दिए।
इस प्रकार लगातार आगे बढ़ती हुई वानर-सेना अंततः सागर के तट पर आ पहुँची।
तब सुग्रीव और लक्ष्मण को साथ लेकर श्रीराम सागर-तट के पास एक शिला पर बैठ गए। वहाँ उन्होंने सुग्रीव से कहा, “सुग्रीव! हम सब लोग समुद्र के किनारे तक तो आ गए, किन्तु अब मेरे मन में वही चिन्ता उत्पन्न हो गई है, जो पहले थी। समुचित उपाय के बिना इस विशाल सागर को पार करना असंभव है। इसलिए अब सेना को यहीं पड़ाव डालना चाहिए तथा हम लोग यहाँ बैठकर इस पर विचार करें कि सेना उस पार कैसे पहुँच सकती है।”
फिर श्रीराम ने सेना को संबोधित करके कहा, “कपिवरों! समस्त सेना अब समुद्र के तट पर ही ठहरे। अब हम समुद्र के पार जाने का उपाय सोचेंगे। राक्षसों की माया से हम सब पर संकट आ सकता है। अतः कोई भी सेनापति किसी भी कारण अपनी सेना को छोड़कर कहीं न जाए। सभी लोग अपने-अपने निर्धारत स्थान पर ही रहें।”
उस आदेश के अनुसार वानर-सेना ने सागर के निकट ही वन में डेरा डाल लिया।
उस समय दिन समाप्त हो रहा था और रात आरंभ हो रही थी। प्रदोष के समय चंद्रोदय होने पर समुद्र में ज्वार आ गया था और वह फेन (झाग) से भरी ऊँची-ऊँची लहरों के कारण नृत्य करता हुआ प्रतीत हो रहा था। उसमें बड़े-बड़े ग्राह और तिमि नामक महामत्स्य (बहुत बड़े आकार वाली मछलियाँ) थे। अनेक सर्पों, जलचरों और पर्वतों से वह समुद्र भरा हुआ था। दूर-दूर तक फैला हुआ समुद्र और आकाश दोनों ही उस समय एक समान दिखाई दे रहे थे।
उधर सागर के उस पार लंका में रावण ने भी अपने राक्षस मंत्रियों को बुलवाया। जब से हनुमान जी ने अकेले ही लंका में प्रवेश करके भीषण उत्पात मचाया था, तभी से रावण बहुत लज्जित था। अपने मंत्रियों से उसने कहा, “निशाचरों! वह हनुमान केवल एक वानर है, किन्तु वह अकेला ही इस दुर्जय नगरी में घुस गया और इसे तहस-नहस कर डाला। उसने सीता से भेंट भी कर ली। इतना ही नहीं, उसने चैत्यप्रासाद को धराशायी कर दिया, अनेक प्रमुख राक्षसों को मार गिराया और पूरी लंकानगरी में खलबली मचा दी।”
“मंत्रियों! संसार में उत्तम, मध्यम और अधम प्रकार के प्राणी होते हैं। जो अपने बुद्धिमान व सक्षम मित्रों, बन्धुओं तथा हितैषियों से सलाह लेकर कार्य आरंभ करता है, वह पुरुष उत्तम है। जो अकेला ही सब विचार करता है और अकेला ही सब कार्य करता है, वह मध्यम श्रेणी का है तथा जो बिना सोचे-समझे ही कार्य आरंभ कर देता है व बीच में ही छोड़ देता है, वह अधम श्रेणी का पुरुष है।”
“उसी प्रकार निर्णय भी तीन प्रकार के होते हैं। जिसे शास्त्रोक्त दृष्टि से सब मंत्री एकमत होकर स्वीकार करते हैं, वह उत्तम मन्त्र होता है। जहाँ प्रारंभ में अनेक मतभेद होने पर भी अंत में सब मंत्री एक निर्णय पर पहुँच जाते हैं, वह मध्यम मन्त्र होता है और जहाँ हर कोई अपनी-अपनी बुद्धि के कारण व एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए बात करते हैं, वह मन्त्रणा अधम कहलाती है। उसमें एकमत हो जाने पर भी कार्य सफल नहीं हो पाता।”
“ज्ञानियों का कथन है कि मंत्रियों की अच्छी सलाह से ही राजा की विजय हो सकती है। अतः मैंने आप लोगों को सलाह लेने के लिए बुलाया है। आप सब लोग परम बुद्धिमान हैं, अतः उचित-अनुचित का विचार करके आप लोग मुझे योग्य सलाह दीजिए। उसी को मैं अपना कर्तव्य मानकर पालन करूँगा।”
“इसकी आवश्यकता इसलिए आ पड़ी है क्योंकि सहस्त्रों वानरों की विशाल सेना लेकर वह राम हमारी लंका पर चढ़ाई करने आ रहा है। यह बात स्पष्ट है कि अपने बल के कारण वह सेना या तो समुद्र को सुखा डालेगी अथवा कोई और उपाय करेगी, किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे लोग अवश्य ही समुद्र को पार कर लेंगे। अतः हमें भी अब उनसे निपटने का उपाय सोचना पड़ेगा।”
वे सब राक्षस बड़े बलवान थे, किन्तु न उन्हें नीति का ज्ञान था और न शत्रु-सेना की शक्ति का कोई अनुमान था। रावण की बात सुनकर उन्होंने हाथ जोड़कर उससे कहा, “महाराज! हमारे पास परिघ, शक्ति, ऋष्टि, शूल, पट्टिश और भालों से लैस बहुत बड़ी सेना है। फिर आप इस प्रकार विषाद क्यों करते हैं? आपने तो भोगवती में जाकर नागों को भी परास्त किया था, यक्षों से घिरे कैलास पर्वत के निवासी कुबेर को भी पराजित कर दिया था और उसका विमान आप छीनकर ले आए थे। आपके भय से ही दानवराज मय ने आपसे मित्रता करने के उद्देश्य से अपनी पुत्री आपको पत्नी के रूप में समर्पित कर दी। अपनी बहन कुम्भीनसी के पति दानवराज मधु का घमंड भी आपने युद्ध में चकनाचूर कर दिया। फिर इस राम पर विजय पाना आपके लिए कौन-सी बड़ी बात है!”
“आपको तो इस युद्ध में जाने की भी आवश्यकता नहीं है। महाबाहु इन्द्रजीत अकेले ही सब वानरों का संहार कर डालेंगे। उन्होंने परम माहेश्वर यज्ञ का अनुष्ठान करके वह वरदान प्राप्त कर लिया है, जो अन्य किसी के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है। देवताओं की सेना में घुसकर इन्होंने देवराज इन्द्र को ही कैद कर लिया था। फिर ब्रह्माजी के कहने पर इन्होंने उसे मुक्त किया। आप युद्ध के लिए सबसे पहले इन्हीं को भेजिए। ये रामसहित सारी वानर सेना को नष्ट कर डालेंगे। इनके हाथों राम का वध निश्चित है।”
(स्रोत: वाल्मीकि रामायण। युद्धकाण्ड। गीताप्रेस)
आगे जारी रहेगा….

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