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दिति तथा दनु पुत्रों के साथ अदिति पुत्रों के द्वादश देवासुर संग्राम

लेखक- त्रिलोचन नाथ तिवारी

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दिति तथा दनु पुत्रों के साथ अदिति पुत्रों के द्वादश देवासुर संग्राम हुए।
भृगु की एक पत्नी दैत्यपति हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या थी।
दिव्या से उत्पन्न भृगु पुत्र शुक्र मातुल कुल के प्रति अधिक नेह रखने के कारण दैत्यों एवं दानवों के याजक हो गये। इन्ही शुक्र का एक नाम उशना और एक अन्य नाम काव्य भी था। नीतिज्ञ शुक्र अथवा उशना ने और्शनस अर्थशास्त्र रचा था जिसे शुक्र-नीति के नाम से भी जाना जाता है। जय-कथा में इस ग्रन्थ का उल्लेख वेद व्यास ने भी किया है। इन्होंने धनुर्वेद भी रचा था जो अब अप्राप्य है।
भृगु की एक पत्नी पुलोमा दैत्य की पुत्री थी और पुलोमा की ही दूसरी पुत्री शची इन्द्र से व्याही गयी थी। अतः इन्द्र एवं भृगु रिश्ते में साढ़ू थे। बाद में इन्द्र ने शची से उत्पन्न पुत्री जयन्ती को शुक्र से व्याह दिया इस प्रकार शुक्र की पत्नी जयन्ती उनकी मौसेरी बहन थी।
यह विवाह शुक्र को दैत्यों से पराङ्गमुख कर अपनी ओर मिलाने की देवों की नीति थी किन्तु शुक्र ने दैत्यों एवं दानवों का पौरोहित्य नहीं छोड़ा और काबे में अपने नाम काव्य से एक मन्दिर निर्मित कराया जिसमें उनके उपास्य शिव के लिंग सहित वृहस्पति, मंगल आदि नवग्रहों, अश्विनी कुमारद्वय, गरुण तथा नृसिंह की मूर्तियाँ थीं। एक मूर्ति दानवेन्द्र बलि की भी थी जिसका दाहिना हाथ स्वर्ण निर्मित था। सोने का बना दाहिना हाथ बलि की दनशीलता का प्रतीक था। शुक्र का वही काव्य – मन्दिर अब काबा है और संग ए असबद है शुक्र का स्थापित शिवलिङ्ग! टूटी चाँदी की जलहरी उस संग ए असबद के चारों ओर आज भी एक छल्ले सी लिपटी है।
अल्लाह (अरबी: الله ، Allah) अरबी भाषा में ईश्वर के लिये प्रयुक्त होने वाला शब्द है जिसे मुख्यतः मुसलमानों, अरबों तथा ईसाइयों द्वारा “एक ईश्वर” का उल्लेख करने के लिये प्रयोग किया जाता है तथा फ़ारसी में इसी को ख़ुदा भी कहा जाता है। और सनातन संस्कृति में ईश्वर का एकमेव अर्थ है शिव महाकाल!
जाने वह मोहमदी जाहिली थी, या दानिशवरी, उसे शैव-दर्शन भा गया।
उसकी दानिशवरी ने उसे समझाया – ईश ही सर्वश्रेष्ठ है, एकमेव अनन्त एवं अविनाशी!
वह ईश्वर एक और अनुपम, सनातन, सदा से सदा तक जीने वाला है। न उसे किसी ने उत्पन्न किया और न ही वो किसी का जनक है एवं उस जैसा कोई और नहीं है।”
— (कुरआन, सूराह ११२, आयत १ से ४)
और यह गुण मात्र शिव का है।
उसकी जाहिली ने उसे समझाया – उसके अतिरिक्त अन्य की उपासना कुफ्र है, ईश्वर के अस्तित्व पर सन्देह है, नास्तिकता है।
और एक दानिशवर जाहिल ने या जाहिल दानिशवर ने, काव्य-मन्दिर के सभी मूर्तियों को तोड़ दिया सिवा शिवलिङ्ग के। उसने उस शिवलिंग को चूमा और जैसा उसके चचेरे भाई अब्द अल्लाह इब्न अब्बास ने कहा है कि मोहमदी ने कहा था – यह संग ए असबद स्वर्ग से उतरा है और जब यह उतरा तब दूध से भी अधिक श्वेत था किन्तु आदम की औलादों के पाप से यह काला हो गया।
Abd Allah Ibn Abbas – a cousin of Prophet Muhammad narrated that the Prophet said: “The Black Stone came down from Paradise and it was whiter than milk, but the sins of the sons of Adam turned it black.”
दानिशवरी और जहालत के इस तालमेल से सनातन की शैव परम्परा का अनुगमन करता एक नया धर्म विकसित हुआ जिसे अब इस्लाम कहते हैं। शिवलिङ्ग को अल्लाह कहने वाला, परमेश्वर कहने वाला जो कहता है – ला इलाहा इल्लल्लाह जिसका शाब्दिक अर्थ है “अल्लाह के अलावा कोई दूसरा ईश्वर नहीं है”। इसकी अगली पंक्ति है “मुहम्मदुर्रसूल अल्लाह” यानी मुहम्मद अल्लाह के पैगंबर हैं इसका एक ही अर्थ है – शिव के अतिरिक्त अन्य किसी का पर्याय ईश या ईश्वर नहीं है और मोह मद उस ईश का दूत है – मेसेंजर ऑफ शिव!
उस शिवलिङ्ग को जमीनदोज कर उसके ऊपर वजू और और तरह के आब ए नापाक गिराने वाले मुस्लमीनों से तो वह अल्लाह अर्थात् ईश्वर अर्थात् शिव कयामत के रोज़, जैसा कि उनका अक़ीदा है, समझेगा ही,
By Allah! On the Day of Qiyamah (judgement), Allah will present the Hajar al-Aswad in such a manner that it will have two eyes and a tongue to testify to the Imaan (faith) of all those who kissed it.”
लेकिन
वक़्ती तौर पर सियासत और जंग के मैदान में हारी एक कौम के उस अकीदे को, जो तुम्हारा भी अकीदा था, इस क़दर जिल्लत के हवाले कर देने का एक ही उत्तर है – प्रतिशोध!
किन्तु हमारे सामने महबूबा और ओवैसी का श्वान-रुदन है और जो हमारी सबसे बड़ी ताकत है और जो हमारी सबसे बड़ी कमजोरी भी है, वह भारत का सम्विधान है।
लेकिन, अगर उस सम्विधान का कौल इन्साफ है तो
ओवैसी
इंशा अल्लाह! ज्ञानवापी मन्दिर अब ताक़यामत मन्दिर ही हो कर रहेगा!
और वह हर फ़रेबी ढाँचा जो हमारी आस्थाओं को जमीन में गाड़ कर तामीर किया गया है, उसे टूटना होगा चाहे वह मथुरा हो, तेजोमहालय हो या भोजशाला!
एक मीठे और जाहिल अल आह के बंडे ने ताजमहल के फैसले पर कुछ दिन पहले कहा था – इन जाहिलों के साथ ऐसा ही होना चाहिये!
लेकिन
जो चुप रहेगी ज़बान ए खंजर,
लहू पुकारेगा आस्तीं का।।
शर्म करो जाहिलों! तुमने हमारे शिव का ही अपमान नहीं किया है, अपने अल्लाह का भी खाना खराब किया है।
शर्म उनको मगर नहीं आती!!

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