Home लेखकBhagwan Singh पुराणों का सच – 6

पुराणों का सच – 6

Bhagwan Singh

by Bhagwan Singh
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हम स्लेव कभी नहीं रहे। यह अवधारणा (कांसेप्ट) ऐसी है जिसके लिए हमारी भाषा में कोई शब्द नहीं है। इसलिए इस अमाननीय प्रचलन के लिए, इससे कुछ निकट पड़ने वाले शब्द, दास को इसका पर्याय बना दिया गया।
परंतु यह भी सच है कि दुनिया का कोई समाज यदि कभी स्वतंत्र रहा है तो आदिम अवस्था में ही। यह इतनी मूल्यवान है कि उस युग को मनुष्य सर्वोत्तम युग, सतयुग/कृतयुग/स्वर्णयुग, के रूप में याद करता रहा है। उसके बाद संपदा और मानस को नियंत्रित और यदि संभव हो तो पूरी तरह अपने वश में करने वाली युक्तियों और शक्तियों का उदय हुआ जिनमें सबसे प्रमुख मत/मजहब और विश्वास है। और दूसरा जीविका से स्रोतों पर अधिकार करके या दूसरों को आहार के बदले आज्ञापालन को विवश करना। और सबसे गर्हित है शत्रुओं को पराजित करके इतना सताना कि वे दुष्कर और गर्हित काम भी करने को विवश हो जाएं। इस अंतिम के लिए ही गुलाम या स्लेव संज्ञा का प्रयोग किया जाता है। इसमें व्यक्ति अपनी मानवीयता खो कर ढोर में बदल जाता है और इसमें उसका सब कुछ, यहां तक कि उसकी संतानें भी उसकी संपत्ति हो जाते हैं जिन्हें वह अपने लाभ के लिए कभी भी बेच सकता है।
इनसे भिन्न एक स्थिति होती है जिसमें आप कुछ पाने के लिए अपनी सेवाएं उस अवधि तक के लिए अर्पित करते हैं जब तक वांछित का मूल्य चुक नहीं जाता। इस अवधि में आप को स्वामी के ऐसे प्रत्येक आदेश का पालन करना होता है जो आपकी मानवीय गरिमा का हनन न करता हो। यह श्रम या सेवा के द्वारा भुगतान या ऋण की भरपाई जैसा है। इसे दासता कहा जाता रहा है और इसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं और इसके अनगिनत रूप हैं। कन्याशुल्क न दे पाने की स्थिति मेें युवक का ससुराल में एक निश्चित अवधि तक रह कर उसके परिवार की सेवा करना या बाजी में हार जाने के बाद जीतने वाले की आज्ञा का पालन करने, या ऋणमुक्ति के लिए ऋणदाता की एक निश्चित अवधि तक सेवा करने या कोई विद्या या कौशल प्राप्त करने के लिए गुरु की प्रत्यक आज्ञा का पालन, किसी को स्वामी मान लेने पर उसके प्रति समर्पण भाव इसी के रूप हैं। दासता शिष्यता से भिन्न और आज्ञाकारिता के निकट है। भारतीय समाज में इसी का चलन रहा है, इसलिए विदेशी पर्यटकों को भारत गुलामी की प्रथा से मुक्त दिखाई देता रहा है। यह प्रथा पुरानी है और इसकी पुष्टि वैदिक समाज से भी होती है। यह आज तक जारी है इसका गवाह पूरा अमलातंत्र है। अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए लोग विविध योग्यताएं अर्जित करके चाकरी पाने का प्रयत्न करते हैं। आर्थिक परनिर्भरता/ विषमता, या मताग्रही समाज में न तो व्यक्ति आत्मगौरव अनुभव कर सकता, न ही स्वतंत्र रह सकता है। जो स्वतंत्र नहीं है वह सत्यनिष्ट नहीं हो सकता, विश्वसनीय नहीं हो सकता। उसकी वस्तुपरकता भी आभासिक ही रहेगी। उसके विश्वास, प्रलोभन, पूर्वाग्रह वस्तुसत्य को देखने और समझने में और जो कुछ समझ में आया है उसकी प्रस्तुति में बाधा पैदा करते हैं।
इस निष्कर्ष पर यह देख कर पहुंचा कि ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में इतने अग्रणी, और अग्रणी से अधिक दंभी, समाज ने लाखों विद्वान पैदा किए और उन में से एक भी यह समझ नहीं सका कि चरवाहे अपने ढोर को हांकते हुए किसी देश आक्रमण नहीं करते रहे हैं, वे चारे और दाने की सुलभता के अनुसार बढ़ते रहे हैं और यह सोचे विचारे बिना कि किस देश में पहुंच चुके हैं, आज की परिभाषा से किसी दूसरे देश में पहुंच कर अपने ढोर चराते रहे हैं। चारे और दाने का प्राचुर्य रहा तो वापस लौटने का नाम तक भूल जाते हैं रहे हैं और स्थानीय चरवाहों से मेलजोल का प्रयत्न करते रहे हैं, जैसा गूजरों, अहीरों ने किया, या नई संभावनाओं के अनुरूप अपने को ढाल लेते रहे हैं, जैसा जाटों ने किया। यदि चराते हुए ऐसे भूभाग में पहुंच जाते रहे हैं, जिनमें कुछ मौसमों में चारे से लेकर दाने तक का संकट उत्पन्न हो जाता रहा है तो वे वापस लौट आते रहे हैं जैसा कि ब्राहुई जनों के साथ पाया जाता है जो गर्मियों में अपने ढोर लिए दिए मद्ध्येशिया तक पहुंच जाते रहे हैं और जाड़े के मौसम लौट कर हिंदुस्तान के मैदानी भाग में उतर आते रहे हैं। उनका समाज मातृप्रधान था, स्त्रियों को तब भी अधिक स्वतंत्रता थी जब सभ्य भारतीय समाज पुरुष प्रधान हो चुका था, और इसलिए पहाड़ी क्षेत्र (स्वर्ग) से जाड़े के दिनों में उतर कर जैसे तैसे अपना जीवन निर्वाह करते थे। मेनका, मैनाक गिरि अर्थात् किरथार की वह शृंखला जो ढलती हुई सुतकागेन दोर से आगे समुद्र में उतर गई है, उससे उतरी हुई, तिलोत्तमाएं (अनिंद्य सुंदरिया) स्वर्ग से उतरती हैं और असाधारण तपस्या में लीन ऋषिगण अपनी तपस्या भंग करा लेते रहे हैं परंतु यदि वह गर्भवती हो गई तो उसकी जिम्मेदारी लेने तक को तैयार नहीं होते रहे हैं।
चरवाहों की एक अन्य विशेषता यह रही है कि वे किसी एक ही जानवर की को पालते हैं, भेड़ पालने वाला बकरी नहीं पालता, बकरी पालने वाला भेंड़ नहीं पालता। यही नियम गोरू, भैंस नहीं। कारण सबकी प्रकृति आलग होती है। जीवविज्ञान की आधिकारिक पुस्तकें लिखने वाले देश के केवल इतिहासकारों को इसका पता नहीं जिनके आर्य घोड़े पर सवार गायों को हांकते हुए खैबर दर्रे की दुर्गम चढ़ाई पार करके भारत पर हमला करते हुए शहरों और दुर्गों काे मटियामेट करके गोरू चराने और उस देश में जिसमें उसके अनुसार घोड़े होते ही नहीं थे, गायों और घोड़ों की लूट शुरू कर देता था। और जब पता चला कि 500 ई.पू. से पहले तो घोड़ों की पीठ पर सवारी की ही नहीं जाती थी, उनको रथों में जोता जाता था तो वे इस पहलू पर चुप्पी साधे रहे। भारतीय इतहासकारों का दिमागी कोलोनाइजेशन ऐसा कि किसी ने यह तक नहीं सुझाया कि हम आक्रमण कराने को तैयार हैं, पर इसका रास्ता तो बदल दो, खैबर के दर्रे से रथों पर सवार हो कर गाय-गोरू हांकते हुए उसे पार करना संभव नहीं। यदि यह सवाल करने की हिम्मत कोई जुटा भी पाता तो पश्चिमी विद्वानों का उत्तर होता, असंभव तो है पर वैदिक आर्यों के मामले में कुछ भी असंभव नहीं। और इस उत्तर से हमारा भारतीय इतिहासकार रोमांचित हो जाता। ऐसा ही तर्क मैक्समूलर ने पाणिनि के समय तक के जिनमें पाणिनि भी शामिल थे, निरक्षर सिद्ध करने के लिए दिया था और किसी भारतीय ने इसका विरोध नहीं किया था। यदि किया था तो गोल्डष्टर नेपाणिनि: संस्कृत साहित्य में उनका स्थान: कुछ साहित्यिक और कालानुक्रमिक प्रश्नों की एक जांच जो उनके काम के अध्ययन से तय हो सकती है के द्वारा, जिसमें उन्होंने मैक्समुलर की खाट खड़ी कर दी, पर जिसके कारण उनको यूरोपीय भाषाशास्त्रियों द्वारा इतनी गालियां दी गईं जिनका हिसाब नहीं। उन्हें पागल तक करार दिया गया। पागल तो वह सिद्ध होते ही हैं जिन्होंने निरे झूठ पर झूठ बोल कर पश्चिमी विद्वानों की सर्वसम्मति और पारस्परिक सहयोग से तैयार की कहानी का एक परखचा ही उड़ा दिया।
इतिहास की सही व्याख्या के लिए बहुत पैने और सही औजारों की जरूरत होती है। विख्यात से विख्यात पश्चिमी पश्चिमी विद्वानों ने दूसरी संस्कृतियों और सभ्यताओ को समझने के लिए स्लेज हैमर ( आक्रमण और विजय और विजितों के ) से अधिक परिष्कृत औजार का इस्तेमाल ही नहीं किया। इसलिए हम अकेले पार्जिटर को उस खटराग के लिए दोष नहीं दे सकते, जिनके लिए सबसे बोधगम्य शब्द धूर्तता है। याद रहे पार्पजिटर भी एक दूसरी दिशा से आर्यों के आक्रमण की बात तो करते ही हैं, यह भी दुहराते हैं कि विजय के बाद स्थानीय आबादी को स्लेव बना लिया। इसे प्रोत्साहन संस्कृत की अकर्मण्यता और जड़ता से मिलता रहा, जो पश्चिमी बौद्धिक अराजकता को सहने की आदत डाल ली जिसने इनको बौद्धिक श्रम से भी मुक्ति दिला दी।

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