Home लेखक और लेखरंजय त्रिपाठी बस सोचा जनता को याद दिला दूँ …

बस सोचा जनता को याद दिला दूँ …

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नक्सलबाड़ी सशस्त्र आंदोलन के तीन जन्मदाताओं में से तीसरा था “जंगल संथाल” … वही “जंगल संथाल” जिसने सबसे पहले “सोनम वांगडी” नाम के पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या किया था और नक्सली आंदोलन की पहली हत्या किया था।
जंगल संथाल के जनता जोड़ने की कला के बिना चारु मजूमदार का नक्सलबाड़ी आंदोलन कभी खड़ा नहीं हो सकता था। चूंकि जंगल संथाल खुद ही एक आदिवासी था तो उसने आदिवासियों को जोड़ने में अपनी कुशलता दिखाई। वो चारु मजूमदार के गुरिल्ला लड़ाई को नहीं मानता था और सीधे लड़ाई के पक्छ में था। उसने भी चीन की यात्रा किया था और चीन के नेताओं को अपना अगुवा माना था।
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1979 जब वामपंथी सत्ता पा चुके थे तो नक्सलबाड़ी आंदोलन कमजोर कर दिया गया था। जंगल संथाल ने CPI – माओवादी लेनिनवादी पार्टी से 1957, 1962, 1967 में चुनाव लड़ा था लेकिन वो हार गया था ….
उसके बाद उसको कभी चुनाव लड़ने के लिए नहीं चुना गया कम्युनिस्ट गैंग द्वारा। 1979 जेल से छूटने के बाद वो अकेले रह गया था क्योंकि कलकत्ता के कम्युनिस्ट सत्ता पाते ही उसको अलग थलग कर चुके थे। वो शराबी बन चूका था और दिन रात शराब के नशे में रहता था। उसके गुर्दे सड़ चुके थे और वो अकेला पड़ा रहता था, कोई उससे मिलने तक नहीं आता था ……
उसको depression की बीमारी हो चुकी थी … वो और कानू सान्याल दोनों नक्सलबाड़ी से कलकत्ता में बैठे कम्युनिस्ट गैंग का विरोध करते थे … उनका मानना था कि नक्सलबाड़ी आंदोलन को चारु मजूमदार ने कलकत्ता के सत्ताधारी कम्युनिस्टों को बेंच कर धोखा दे दिया था … उसने 4 शादियां की थी। और 1987 में अलग थलग और बीमारियों में घिरा ये आतंकी कम्युनिस्ट अपनी 4 पत्नियों को बेवा बना के मर गया ….. उसके अंतिम क्रिया कर्म में कुल 7 लोग थे …. कोई भी कम्युनिस्ट नेता उसके मृत शरीर को झाँकने भी नहीं गया था।

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