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समाजवाद और नव-सामन्तवाद 2

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समाजवाद और नव-सामन्तवाद 2
पूँजीवाद क्या है?
यह कोई वाद नहीं है, कोई सिद्धांत नहीं है. हमारी आपकी आर्थिक स्वतंत्रता का नाम ही पूँजीवाद है. हम क्या उत्पादन करेंगे, किसे अपनी सेवाएँ बेचेंगे, अपनी आय को कहाँ और कैसे खर्च करेंगे, कहाँ निवेश करेंगे… इन निर्णयों के विकेंद्रीकरण का नाम ही पूँजीवाद है.
पूँजीवाद का अर्थ बड़ी बड़ी कम्पनियों द्वारा अर्थव्यवस्था का नियंत्रण नहीं है. पूँजीवाद में बड़ी कंपनियाँ बनती हैं क्योंकि यह उत्पादन का एक अधिक एफिशिएंट तरीका है. पर उनका स्वामित्व जनता के हाथ में ही रहता है, और उनका अस्तित्व हमारे लिए उनकी उपयोगिता पर निर्भर होता है. जब वे कम उपयोगी हो जाती हैं तो वे बन्द हो जाती हैं या उनका स्थान दूसरी कंपनियाँ ले लेती हैं और इसके लाभार्थी वे लोग होते हैं जिन्होंने उनमें पहले निवेश किया था.
फिर भी यह खतरा तो है ही कि बड़ी कंपनियाँ अर्थव्यवस्था पर नियन्त्रण कर सकती हैं. पर कैसे?
किसी कम्पनी के पास वह टूल नहीं है कि वह हमारी आपकी आर्थिक स्वतन्त्रता छीन सके, हमारे निर्णयों को नियंत्रित कर सके. वह टूल किसके पास है? सरकार के पास. तो अगर बड़ी कंपनियाँ हमारी आर्थिक स्वतंत्रता छीन सकती हैं, हमारे निर्णयों को नियंत्रित कर सकती हैं, हमें उनका प्रतिद्वंद्वी बनने से या उसके प्रतिद्वंद्वी एक नई कम्पनी में निवेश कर सकती हैं तो इसके लिए वे सरकार की शक्तियों का प्रयोग करती हैं. यानि बड़े बड़े कॉरपोरेट सरकार के साथ मिलकर अब वे नए पॉवर सेन्टर बनते हैं जो समाज के आर्थिक निर्णयों पर नियंत्रण कर सकें. कुछ लोग इसे क्रोनी-कैपिटलिज्म कहते हैं. पर क्रोनी-कैपिटलिज्म दरअसल कैपिटलिज्म है ही नहीं, यह सोशलिज्म ही है.. अगर कहना ही है तो इसे कॉरपोरेट-सोशलिज्म कहिए. क्योंकि जब सरकार, किसी भी बहाने से, जनता के आर्थिक निर्णयों को नियंत्रित करती है और संसाधनों को कंट्रोल करती है तो वह समाजवाद हो जाता है. चाहे लेनिन और माओ का समाजवाद हो, चाहे बिल गेट्स और जो बाइडेन का समाजवाद हो. यहाँ समस्या यह नहीं है कि बड़ी कंपनियाँ होती हैं, समस्या यह है कि सरकार के पास वे आर्थिक अधिकार हैं जो हमारा जीवन नियंत्रित कर सकती हैं. जब तक सरकार के पास ये अधिकार हैं इनका दुरुपयोग कोई ना कोई करेगा. हमारी लड़ाई हमारी आर्थिक स्वतंत्रता की है, जहाँ सरकार के पास ऐसे अधिकार नहीं हों. इसी आर्थिक स्वतंत्रता का नाम पूँजीवाद है.

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