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वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड भाग 89

सुमंत विद्वांस

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फिर रावण के सेनापति प्रहस्त ने कहा, “महाराज! हम लोग देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पक्षी और नाग आदि सभी को पराजित कर सकते हैं, फिर उन दो मनुष्यों को हराना कौन-सी बड़ी बात है? हम लोग पहले असावधान थे क्योंकि हमें शत्रु के आने की कोई आशंका नहीं थी। इसी कारण हनुमान हमें धोखा दे गया, अन्यथा वह यहाँ से जीवित नहीं जा सकता था।”
इसके बाद दुर्मुखी राक्षस बोला, “राक्षसराज! उस वानर ने जिस प्रकार हम लोगों पर आक्रमण किया है, वह लंकापुरी का और स्वयं आपका भी पराभव है। आप मुझे आज्ञा दें, तो मैं अभी जाकर अकेला ही समस्त वानरों का संहार कर दूँगा।”
तब वज्रद्रंष्ट्र ने भी क्रोध में भरकर कहा, “राजन! राम, सुग्रीव और लक्ष्मण जैसे दुर्जय वीरों के रहते हुए हम उस बेचारे हनुमान के बारे में क्यों विचार करें? मैं अकेला ही जाकर आज राम-लक्ष्मण और सुग्रीव तीनों का काम तमाम कर दूँगा।”
“परन्तु यदि आप उचित समझें, तो मेरी एक बात सुनें। बुद्धिमान पुरुष यदि कोई उपाय सोचे व आलस्य त्यागकर प्रयत्न करे, तो वह शत्रुओं पर अवश्य ही विजय पा सकता है। अतः मेरी राय यह है कि इच्छानुसार रूप धारण करने वाले एक हजार अत्यंत भयानक राक्षस मनुष्य का रूप धारण करके राम के पास जाएँ और उससे कहें कि ‘हम आपके सैनिक हैं। हमें भरत ने आपकी सहायता के लिए भेजा है।’”
“तब राम की वानर-सेना तुरंत ही लंका पर आक्रमण करने के लिए उनके साथ चल देगी। उस समय हम लोग यहाँ से शूल, शक्ति, गदा, धनुष, बाण, खड्ग आदि लेकर उनकी ओर बढ़ेंगे और आकाश से उन पर अस्त्र-शस्त्रों व पत्थरों की वर्षा करके पूरी सेना को यमलोक पहुँचा देंगे।”
विशालकाय राक्षस वज्रहनु, महाबली सूर्यशत्रु, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, महापार्श्व, महोदर, अग्निकेतु, रश्मिकेतु, धूम्राक्ष, अतिकाय तथा कुम्भकर्ण के पुत्र निकुम्भ आदि अनेक राक्षसों ने एक के बाद एक लगभग ऐसी ही बातें रावण से कहीं। वे सब लोग क्रोध में अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर खड़े हो गए और वानर सेना पर आक्रमण की आज्ञा माँगने लगे।
उन सबको इस प्रकार लड़ने के लिए उतावला देखकर विभीषण ने उन्हें रोका और पुनः वापस बिठा दिया। फिर दोनों हाथ जोड़कर उसने रावण से कहा, “तात! बुद्धिमानों का कथन है कि पहले साम, दान और भेद से अपना कार्य सिद्ध करने का प्रयास करना चाहिए। यदि उसमें सफलता न मिले, तभी दण्ड का प्रयोग करना चाहिए। जो शत्रु असावधान हो या इस समय अपने किसी अन्य शत्रु से लड़ रहा हो अथवा किसी महामारी आदि से ग्रस्त हो, उसी पर इस प्रकार के आक्रमण सफल होते हैं। परन्तु श्रीराम इस समय बेखबर नहीं हैं। वे हम पर आक्रमण करने की योजना से ही आ रहे हैं। उनके साथ सेना भी है। उन्होंने क्रोध को भी जीत लिया है। ऐसे अजेय वीर को परास्त नहीं किया जा सकता।”
फिर विभीषण ने सब राक्षसों को संबोधित करते हुए कहा, “निशाचरों! जो हनुमान जी एक ही छलाँग में महासागर को लाँघकर यहाँ तक आ पहुँचे थे, उनकी गति का अनुमान लगाना असंभव है। शत्रु के बल और पराक्रम को भुलाकर उसके साहस की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। इस बात को तुम लोग मत भूलो।”
“श्रीराम ने राक्षसराज रावण का कौन-सा अपराध किया था, जिस कारण उनकी पत्नी का इन्होंने जनस्थान से अपहरण कर लिया? श्रीराम ने तो खर को भी केवल आत्मरक्षा के लिए मारा था क्योंकि उसने स्वयं ही उन्हें मार डालने के लिए उन पर आक्रमण किया था। अपने प्राणों की रक्षा करना हर प्राणी का अधिकार है।”
“श्रीराम बहुत धर्मात्मा और पराक्रमी हैं। उनके साथ वैर करना उचित नहीं है। इससे पहले कि वे हमारी समृद्ध लंका को नष्ट कर दें, हमें सीता को उनके पास लौटा देना चाहिए। अन्यथा इसमें कोई संदेह नहीं कि श्रीराम के पराक्रम से यह समस्त लंकापुरी नष्ट हो जाएगी व सब राक्षस भी मारे जाएँगे।”
फिर उसने रावण से कहा, “भैया! क्रोध से सुख और धर्म का नाश हो जाता है। धर्म का पालन करने से ही सुख और यश मिलता है। अतः आप क्रोध को त्याग दें और धर्म का पालन करें। आप मिथिलेशकुमारी सीता को लौटा दीजिए, ताकि हम सब लोग अपने पुत्रों और बन्धु-बान्धवों के साथ सकुशल जीवित रह सकें। अन्यथा लंका का विनाश अटल है।”
विभीषण की यह बात सुनकर रावण ने उन सबको विदा कर दिया और वह अपने महल में चला गया।
अगले दिन प्रातःकाल पुनः विभीषण अपने भाई रावण के घर गया। अनेक प्रासादों के कारण वह घर किसी पर्वत शिखर के समान ऊँचा दिखाई देता था। उसमें बहुत सुन्दर ढंग से अनेक बड़ी-बड़ी ड्योढ़ियाँ बनी हुई थीं। उसके फाटक तपे हुए सोने से बनाए गए थे। सुन्दर वस्तुओं से उस घर को सजाया गया था। अनेक राक्षस चारों ओर से उसकी रक्षा करते थे। सुन्दर युवतियों की वहाँ भीड़ लगी रहती थी।
वहाँ प्रवेश करने पर विभीषण को वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा रावण की विजय के लिए किये जा रहे पुण्याहवाचन का पवित्र घोष सुनाई पड़ा। उन ब्राह्मणों को प्रणाम करके विभीषण आगे बढ़ा। भीतर जाने पर राक्षसों ने उसका स्वागत किया। रावण के अनेक बुद्धिमान मंत्री वहाँ बैठे हुए थे। उनके बीच रावण भी अपने सिंहासन पर विराजमान था। रावण को देखकर विभीषण ने ‘विजयतां महाराजः’ (महाराज की जय हो) कहकर प्रणाम किया। फिर रावण का संकेत मिलने पर विभीषण ने भी अपना आसन ग्रहण किया।
इसके बाद विभीषण ने विनम्रतापूर्वक रावण से कहा, “महाराज! जबसे सीता यहाँ आई हैं, तभी से हम लोगों को अनेक प्रकार के अपशकुन दिखाई दे रहे हैं। मन्त्रों द्वारा विधिपूर्वक धधकाने पर भी आग अच्छी तरह प्रज्वलित नहीं होती है। उसमें से चिंगारियाँ निकलने लगी हैं और धुआँ उठने लगता है। रसोईघरों में, अग्निशालाओं में तथा वेदाध्ययन के स्थानों में भी साँप दिखाई दे रहे हैं और हवन-सामग्रियों में चीटियाँ पड़ जाती हैं। गायों का दूध सूख गया है, बड़े-बड़े गजराज मदरहित हो गए हैं और घोड़े नई घास खाकर संतुष्ट होने पर भी बड़े दीन स्वर में हिनहिनाते हैं।”
“गधों, ऊँटों और खच्चरों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनकी आँखों से आँसू गिरने लगते हैं। बहुत चिकित्सा करवाने पर भी वे स्वस्थ नहीं हो पाते हैं। कौए भी मकानों के ऊपर झुण्ड के झुण्ड एकत्र होकर कर्कश स्वर में काँव-काँव करते रहते हैं और गिद्धों के झुण्ड भी लंकापुरी के ऊपर बहुत ही कम ऊँचाई पर मँडराते रहते हैं। संध्या के समय सियारिनें नगर के बिल्कुल समीप आकर अमंगलसूचक स्वर में कोलाहल करती हैं। नगर के सभी फाटकों पर मांसभक्षी पशु जमा होकर जोर-जोर से चीत्कार करते रहते हैं।”
“वीरवर! यह सब बातें आपसे कहने में अन्य मन्त्रीगण संकोच करते हैं, किन्तु यह सब संकेत देखकर मुझे तो यही उचित लगता है कि श्रीराम को सीता लौटा दी जाए।”
विभीषण की ये हितकर वचन सुनकर भी रावण ने उसकी बात नहीं मानी। उसने विभीषण से कहा, “विभीषण! मुझे तो ऐसा कोई भय नहीं दिखाई देता। राम को यदि इन्द्र से भी सहायता मिल जाए, तो भी वह रणभूमि में मेरे सामने नहीं टिक सकता। वह किसी भी प्रकार सीता को पुनः नहीं पा सकता।”
ऐसा कहकर रावण ने अपने यथार्थवादी भाई विभीषण को तत्काल वहाँ से विदा कर दिया।
आगे जारी रहेगा….
(स्रोत: वाल्मीकि रामायण। युद्धकाण्ड। गीताप्रेस)

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