Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय अपने अपने युद्ध (भाग एक)

अपने अपने युद्ध (भाग एक)

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तो क्या अलका के साथ भी तुम्हारा लफड़ा चला ?’’ उस की जिज्ञासा जागी। “नहीं।

तो क्या अलका के साथ भी तुम्हारा लफड़ा चला ?’’ उस की जिज्ञासा जागी।
‘‘नहीं।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘वह मेरे दोस्त की बीवी थी आखि़र। और इतनी नैतिकता तो मुझ में हमेशा शेष रहेगी।’’
‘‘ओह ! लवली।’’ वह बोली, ‘‘पर रजनीश तो फिर यहां फेल हो गए।’’
‘‘कैसे ?’’
‘‘तुम ने अलका को चाह के भी जो नहीं गहा।’’
‘‘कहा न नैतिकता।’’ वह बोला, ‘‘ऐसा भी नहीं था। चाहता तो गह सकता था। पर कहा न फिर वही नैतिकता।’’
‘‘पर रजनीश के सेक्स दर्शन में नैतिकता का बखान तो है नहीं।’’
‘‘तुमने रजनीश को पढ़ा है ?’’
‘‘हां, थोड़ा बहुत।’’
‘‘तभी !’’ वह रुका और बोला, ‘‘अच्छा रजनीश ने यह कहां लिखा कि सेक्स में नैतिकता नहीं बरतनी चाहिए।’’
‘‘मैं ने यह तो कहीं नहीं पढ़ा। पर यह भी कहां लिखा है कि सेक्स में नैतिकता बरतनी चाहिए।’’
‘‘पता नहीं।’’ वह रीना के तर्क से लाजवाब होता हुआ बोला, ‘‘देखो कायदे से सेक्स न तो नैतिक होता है न अनैतिक। सेक्स सिर्फ सेक्स होता है। और जो आफर ख़ुद अलका का होता तो मैं नहीं, नहीं कहता।’’ वह उस के बालों में अंगुलियां फिराता हुआ बोला, ‘‘जैसे तुम्हें नहीं, नहीं कहा।’’
‘‘बड़े मुहफट हो।’’
‘‘बट कम आन द प्वाइंट कि सेक्स में नैतिकता बरतनी चाहिए। मैं ने भी अक्षरशः यह कहीं नहीं पढ़ा। पर रजनीश का सारा दर्शन ही संभोग से समाधि का है। संभोग यानी सम-भोग, वह उस की छातियां मसलता हुआ बोला, ‘‘जो हम यहां भोग रहे हैं।’’
‘‘स्टाप योर नानसेंस।’’ वह कुढ़ती हुई बोली।
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘सम-भोग का दर्शन बखान रहे हो। और मुझे पीड़ा भी दे रहे हो।’’ वह उस की ओर मुड़ी, ‘‘कितनी बार कहा कि कस के मत दबाया करो दुखता है।’’
‘‘सॉरी !’’ वह बोला, ‘‘दबाया तो अनायास ही था पर रेफरेंस अच्छा मिल गया। अलका के साथ सेक्स संबंध मैं कायम करता तो शायद उसे पीड़ा होती। उसे तो भर आंख देख लेना ही पीड़ा दे गया था। फिर सम-भोग कैसे हो सकता था भला ?’’
‘‘चलो मान गई रजनीश बाबा !’’
‘‘मैं रजनीश नहीं, संजय हूं।’’ उस ने रीना के गाल पर चिकोटी काटी।
‘‘उफ् ! तुम्हारी यह आदत कब जाएगी ?’’
‘‘जब तुम चाहो !’’ कहते हुए वह उस की देह पर चढ़ गया।
‘‘तुम्हारा पेट जल्दी से नहीं भरता ?’’
‘‘किस चीज से ?’’
‘‘सेक्स से।’’
‘‘पेट सेक्स से नहीं, भोजन और पानी से भरता है।’’
‘‘आई मीन दिल नहीं भरता ?’’
‘‘किस से ?’’
‘‘सेक्स से ?’’
‘‘गाना नहीं सुना है अभी न जाओ छोड़ के, कि दिल अभी भरा नहीं।’’
‘‘यह तो मुहम्मद रफी ने गाया है देवानंद के लिए, तुम्हारे लिए नहीं।’’
‘‘यह तुम्हें किस ने बताया ?’’ बुदबुदाता हुआ वह हांफने लगा। थोड़ी देर बाद फिर बुदबुदाया, ‘‘मतलबवा एक है नैनन पुकार का।’’ उस की देह पर से उतरते हुए वह धीरे से बोला, ‘‘मुकेश ने यह तो मेरे लिए गाया है।’’
‘‘तुम भी !’’ कह कर रीना हंसी और तकिए में मुंह धंसा लिया। थोड़ी देर बाद संजय उठा, बाथरूम गया, आ कर पानी पिया और आ कर रीना जो चादर ओढ़ कर पेट के बल लेटी हुई थी, चादर हटा कर उस की पीठ पर लंबा लेट गया।
‘‘तुम भी अजीब शै हो।’’ तकिए पर सिर मोड़ती हुई बोली, ‘‘कहां से ट्रेनिंग ली?’’
‘‘किस चीज की?’’
‘‘इसी चीज की।’’
‘‘किस चीज की।’’
‘‘अरे, यही।’’ वह फुसफुसाई।
‘‘क्या यही।’’ वह बुदबुदाया। वह समझ तो गया था। पर उस से स्पष्ट कहलवाना चाहता था।
‘‘क्या रजनीश आश्रम हो आए हो ?’’
‘‘नहीं तो।’’
‘‘फिर कहां से ट्रेनिंग ली ?’’
‘‘क्या इस की भी ट्रेनिंग ली जाती है ?’’ कहते हुए वह उस के बालों से खेलने लगा।
‘‘क्या पता ?’’
‘‘तुम ने ली है क्या ?’’ संजय फुसफुसाया।
‘‘ली तो नहीं थी, पर आजकल ले रही हूं।’’
‘‘किस से ?’’ उस ने छेड़ा।
‘‘है एक आदमी !’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘कोई और भी है इस समय तुम्हारी जिंदगी में ?’’ वह जैसे चौंका।
‘‘बस !’’ वह खुश होती हुई बोली, ‘‘इतने में ही रजनीश दर्शन धूल चाट गया ?’’
‘‘नहीं तो, नहीं तो !’’ संजय जैसे सफाई पर उतर गया। वह रीना की देह पर से भी उतर कर औंधा लेट गया।
‘‘सारा सेक्स दर्शन एक क्षण में भहरा गया ?’’ वह संजय को चिकोटती हुई बोली, ‘‘एक छोटा सा छेद नहीं बर्दाश्त कर पाया तुम्हारा सेक्स दर्शन। तिस पर कहते हो सम-भोग।’’ कहती हुई वह उस की पीठ पर लद गई। बोली, ‘‘तुम्हारा दोष नहीं, पुरुष मानसिकता का ‘‘प्रताप’’ है यह। जो औरत को एकाधिकार की वस्तु मानता रहता है। पुरुष जिस-तिस औरत के साथ सोए तो वह ‘‘सम-भोग’’ है। पर स्त्री जो कहीं गलती से भी किसी और के बारे में सोच ले तो, और न भी सोचे तो भी, वह ‘‘सम-भोग’’ नष्ट हो जाता है। ऐसा क्यों होता है ?’’ वह जैसे चिरौरी करती हुई बोली, ‘‘सच-सच बताना संजय। ठीक वैसा ही सच जैसा महाभारत में धृतराष्ट्र को संजय ने सच-सच बताया था। ठीक वैसा ही सच संजय ! वैसा ही सच !’’
संजय निरुत्तर था।
‘‘बोलो संजय !’’
‘‘ऐसा नहीं है।’’ वह कुछ रीना के सवाल के बोझ से, कुछ रीना की देह के बोझ से कसमसाता हुआ बोला, ‘‘ऐसा ही नहीं है।’’
‘‘ऐसा ही नहीं तो कैसा है ?’’
‘‘सच बताऊं।’’
‘‘बिलकुल सच !’’ वह बोली, ‘‘और तुम अब यह मत पूछना कि बुरा तो नहीं मानोगी। सच मानो मैं बुरा नहीं मानूंगी। बुरा मानने की बात भी नहीं है। यह तो जस्ट ए डिवेट !’’
‘‘तो सुनो।’’ संजय रीना को अपने ऊपर से हटाता हुआ बोला, ‘‘मेरे पास उस संजय सी दिव्य दृष्टि तो नहीं है पर एक सोच है, एक समझ है एक साधारण सी दृष्टि है उस के हिसाब से पुरुष मानसिकता एक सच है, सम-भोग दूसरा सच !’’ अब की उस ने न तो रीना के गाल में चिकोटी काटी, न छाती मसली, न जांघ में चिकोटी काटी बल्कि उस ने एक हाथ से उस की हिप पर थपथपाया दूसरे हाथ से उस के बालों को सहलाया और बोला, ‘‘पर सारा सच यह है कि पुरुष मानसिकता का सच एक हद के बाद छद्म है, छद्म सच है, शीशे में दिखने वाला सच है, शीशे के पार का सच नहीं है, शीशा टूटने के बाद का सच नहीं है।’’ संजय बोलता गया, ‘‘एक गढ़ा हुआ सच है पुरुष मानसिकता, जिस को आज कल सुविधा के तौर पर ह्यूमन बीइंग मान लिया गया है, बना लिया गया है। पर सम-भोग का सच पार ब्रह्म है, अलौकिक और अनूठा। पुरुष मानसिकता का सच शायद कोई ऐसा समय आए जिस में वह भस्म हो जाए। पर संभोग का सच तो अमिट है, अतुलनीय है, चाहे जितना समय आए-जाए, सृष्टियां बदल जाएं पर सम-भोग का सच नहीं बदलेगा, कभी नहीं बदलेगा।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘और सम-भोग कोई सिर्फ सेक्स ही नहीं है। सम-भोग बराबर का आनंद। चाहे वह जिस भी क्रिया में हो। सम-भोग का विस्तार बहुत है। पर एक सच यह भी है कि हमारे यहां सम-भोग को सिर्फ देह और उस के भोग से जोड़ कर उस का सतहीकरण कर लिया गया है। बस दिक्कत यही है। सतहीकरण की दिक्कत।’’
‘‘तो तुम सचमुच संभोग को उस के विराट अर्थ में मानते हो ?’’
‘‘आफकोर्स, !’’
‘‘सच !’’
‘‘फिलहाल तो यही सच है। आगे की राम जानें।’’
‘‘कि रजनीश जानें ?’’
‘‘नहीं, अभी जो मैं ने कहा वह रजनीश के किसी प्रवचन का अंश नहीं है। रजनीश से अनुप्रेरित बात हो सकती है। पर सोच समूची मेरी है।’’
‘‘अच्छा ऐसा सोचने के बावजूद तुम्हारे साथ ऐसा क्या है कि तुम मुझ से मिलते ही शुरू हो जाते हो। और शुरू ही रहते हो ?’’
‘‘क्या मतलब ?’’
‘‘तो अब पूरा भाष्य समझाना पड़ेगा तुम्हें ?’’ कहते हुए उस का हाथ शरारतन संजय की जांघों के बीच पहुंच गया तो संजय छिटक गया।
‘‘अच्छा, अच्छा।’’ कहते हुए संजय बोला, ‘‘मैं ने कहा न सेक्स ही जीवन है।’’ अब की संजय का हाथ रीना की जांघों के बीच पहुंच गया। जिसे रीना ने दोनों जांघों में हलके से दबा लिया और बोली, ‘‘सेक्स और पत्रकारिता, पत्रकारिता और सेक्स। इस के अलावा भी तुम्हें कुछ आता है ?’’
‘‘जिस को सेक्स की समझ हो, पत्रकारिता की समझ हो, समझो वह दुनिया जानता है।’’
‘‘कैसे ?’’
‘‘सेक्स दुनिया का सब से बड़ा सच है।’’ उस ने रीना की कमर पर हाथ फिराते हुए पूछा, ‘‘यह तो मानती हो ?’’
‘‘माना।’’ अभिनेत्री फा्रीदा जलाल की तरह गालों में गड्ढा डाल कर, आंखों में शरारत भर कर जबान पर कैंची रख कर वह फुदकती हुई बोली ‘‘माना।’’
‘‘तो जैसे सेक्स दुनिया का सब से बड़ा सच है वैसे ही पत्रकारिता दुनिया का सब से मासूम झूठ।’’ वह हंसा, ‘‘अब इस के बाद जानने को रह क्या जाता है ?’’ वह विस्तार में आ गया, ‘‘जैसे सेक्स के बिना सृष्टि नहीं संवरती, जैसे सेक्स के बिना जीवन नहीं चलता, सेक्स के बिना कोई घोटाला, कोई कांड नहीं होता वैसे ही दुनिया की कोई भी छोटी बड़ी घटना हो, घोटाला हो, सेक्स हो, खेल हो, व्यापार हो, फिल्म हो, रानजीति हो, कूटनीति और अपराध हो पत्रकारिता के ही कंधे पर बैठ कर देश दुनिया में उसे पहुंचना होता है।’’ संजय बिलकुल मजाक के मूड में था।
‘‘तुम तो खेलने लगे।’’ वह मायूस सी बोली।
‘‘झूठ, बिलकुल झूठ।’’ वह राजेश खन्ना स्टाइल में बोला, ‘‘अभी-अभी तो आऊट हुआ हूं। विश्वास न हो तो ‘इन से’ से पूछ लो।’’
‘‘क्या डबल मीनिंग वाले डायलाग बोलने लगते हो।’’ वह बोली, ‘‘मजा ख़राब हो जाता है।’’ वह जैसे नींद से जागी, ‘‘अच्छा सेक्स का सच बहुत हो गया अब पत्रकारिता के कुछ सच भी बता दो।’’
‘‘प्रश्न करो !’’ वह बिलकुल मजाक के मूड में था।
‘‘प्रश्न पुराना है गुरुदेव !’’ वह भी मूड में आ गई।
‘‘क्या ?’’
‘‘वही जिज्ञासा कि डेस्क और रिपोर्टिंग के लोग भारत-पाकिस्तान की तरह क्यों लड़ते हैं ?’’
‘‘क्या बेवकूफी का सवाल ले बैठी। वह भी बासी।’’
‘‘फिर भी जिज्ञासा तो जिज्ञासा !’’
‘‘अच्छा बताओ भारत-पाकिस्तान के बीच क्या झगड़ा है ?’’
‘‘मेरी समझ से तो कुछ नहीं। बस इगो का झगड़ा है ?’’
‘‘करेक्ट !’’ संजय बोला, ‘‘तुम ने ठीक पकड़ा।’’
‘‘क्या ?’’ वह चुटकी काटते हुए बोली, ‘‘फिर डबल मीनिंग ?’’
‘‘हद है !’’ संजय बोला , ‘‘मुझ पर आरोप लगाती हो और ख़ुद हरदम सेक्स ही सोचती रहती हो, वही करती रहती हो तो मैं क्या करूं ?’’ वह उस का हाथ पकड़ता हुआ बोला, ‘‘हटाओ नहीं, अच्छी आदत है। मुझे भी अच्छा लगता है।’’
‘‘स्टुपिड !’’ वह उस का बाल नोचते हुए बोली, ‘‘तो बार-बार प्वांइट आऊट करने की क्या जरूरत है।’’
‘‘मैं तुम्हारा भारत-पाकिस्तान के बीच इगो वाला प्वाइंट पकड़ने को प्वाइंट आउट कर रहा था।’’ उस के हाथों में से अपने बालों को छुड़ाता हुआ बोला, ‘‘एंड डोंट बी सिली, लेट मी कंपलीट ! इन फैक्ट डेस्क और रिपोर्टिंग क्या है ? अख़बार की दोनों दो भुजाएं हैं। पर जो इगो प्राब्लम भारत-पाकिस्तान के बीच, जो एक पट्टीदारी की लड़ाई है, मुझे ऐसा लगता है कि अख़बारों में डेस्क और रिपोर्टिंग के बीच भी जो झगड़ा है, वह यही इगो प्राब्लम है, यही पट्टीदारी है। एक कुंठा है जिस के तहत दोनों एक दूसरे से सुपीरियर मानते हैं और दिलचस्प यह कि दोनों एक दूसरे को गधा समझते हैं।’’ संजय रुका और बोला, ‘‘बाइ द वे चार महीने सही, तुम डेस्क पर थी कि रिपोर्टिंग में ?’’
‘‘बट नेचुरल डेस्क !’’
‘‘तब तो तुम ने यह भी देखा होगा कि अंततः इस लड़ाई में डेस्क ही जीतता रहता है।’’ वह बोलता रहा, ‘‘इस लिए नहीं कि डेस्क कोई सुप्रीमो होता है। बल्कि इस लिए कि बाई नेचर डेस्क पर जिम्मेदारियां ज्यादा होती हैं। पूरे अख़बार की जिम्मेदारी डेस्क की ही होती है। अख़बार ठीक छपा डेस्क की क्रेडिट, ख़राब छपा, कहीं कुछ गलत छपा तो डेस्क की रिस्पांसिबिलिटी। दूसरे कौन सी ख़बर कहां जाएगी, कितनी जाएगी यानी डमी, पूरा डिसप्ले डेस्क को ही तय करना होता है। यहां तक तो ठीक है। पर सिद्धांततः। व्यावहारिक पक्ष यह है कि अमूमन डेस्क अपनी रिस्पांसिबिलिटी की आड़ में रिपोर्टरों से पर्सनल हो जाती है। रिपोर्टर से कोई सिफारिश या काम कराने को कहा, रिपोर्टर ने नहीं किया, नहीं करवा पाया तो उस की ‘‘सेवा’’ शुरू। उस की ख़बरें कट पिट कर गलत जगह पेस्ट होने लगती हैं, या कोयरी लग कर संपादक की मेज पर पहुंच जाती हैं; बाद में भले छप जाए, पर उस दिन तो वह ख़बर रुक ही गई न ! रिपोर्टर की सब से बड़ी कमजोरी है बाई लाइन। मतलब कोई अच्छी ख़बर हो तो उस के साथ उस का नाम छपे। पर यहां भी डेस्क की मेहरबानी पर ही बाई लाइन मिलती है। इसी लिए तुम ने देखा होगा बड़ा से बड़ा रिपोर्टर जो बाहर फील्ड में तो बड़ा तोप बना फिरता है, तीसमार खां बनता है, डेस्क पर आते ही ख़ाली कारतूस बन जाता है, किसी पालतू कबूतर की तरह गुटर गूं करने लगता है। क्यों कि रिपोर्टर की कोर डेस्क से हमेशा दबी रहती है। एक प्राब्लम यह भी है कि ग्रेड, फेसेल्टी सब कुछ एक होते हुए भी डेस्क वाले जर्नलिस्ट और रिपोर्टिंग वाले जर्नलिस्ट की सामाजिक हैसियत में काफी फर्क रहता है। कभी-कभी आर्थिक भी। फील्ड में रहने के नाते रिपोर्टिंग के लोगों को दस लोग जानने लगते हैं, वह चार काम भी करा लेता है, कुछ तो दलाली पर भी उतर जाते हैं। उधर डेस्क के लोगों को कंपरेटिवली कम लोग जानते हैं। वह छोटा-छोटा काम कराने में भी असफल रहते हैं। तो फ्रष्स्ट्रेशन भी डेस्क वालों को खाए रहता है कि मेहनत हम करें और मजा यह लूटें। यह कुंठा भी कम नहीं होती।’’ संजय बोला, ‘‘पत्रकारिता की यह सब बड़ी पुरानी समस्याएं हैं। प्राचीनतम शब्द ज्यादा ठीक है। डेस्क अपने को सुपीरियर समझता है, रिपोर्टिंग वाले अपने को सुपीरियर समझते हैं। डेस्क वालों का तर्क है कि हम न हों तो अख़बार न निकले। वे जब-तब कहते ही रहते हैं कि लगा दो चार रिपोर्टरों को एक दिन डेस्क ड्यूटी पर, अख़बार निकल नहीं पाएगा। तो रिपोर्टिंग वाले कहते हैं, भिड़ा दो हफ्ते भर के लिए सारी डेस्क को रिपोर्टिंग में, छठी का दूध न याद आ जाए तो कहना, नौकरी छोड़ के भाग जाएंगे और जो पूरे देश की डेस्क लग गई रिपोर्टिंग में तो अख़बार ही नहीं निकल पाएंगे। क्यों कि डेस्क वाले कोई ख़बर ही नहीं भेज पाएंगे तो छपेगा क्या ?’’ संजय बोला, ‘‘ऐसे ढेर सारे तर्क, वितर्क और कुतर्क हैं जिन का कोई पार नहीं है। और यह लड़ाई न कभी ख़त्म हुई है, न कभी ख़त्म होगी। और यह कोई अकेले दिल्ली के किसी एक अख़बार, किसी एक भाषा की नहीं, सभी भाषाओं, सभी अख़बारों की देशव्यापी समस्या है।’’ वह बोला, ‘‘यह कभी ख़त्म न होने वाली लड़ाई है। डेस्क वाले रिपोर्टरों को और रिपोर्टस डेस्क वालों को गधा साबित करने का कोई मौका भले न चूकें। पर एक नंगा सच यह भी है एक रिपोर्टरों की कोर हमेशा डेस्क वालों के हाथ में रहेगी।’’ वह चद्दर ओढ़ता हुआ बोला, ‘अब मेरे ही अख़बार का मामला ले लो। जो समाचार संपादक है, महाजाहिल। अव्वल तो उसे ख़बर से कोई ख़ास सरोकार नहीं रहता। उस की सारी दिलचस्पी स्टोर से साबुन, फाइल, कागज वगैरह मंगाने में रहती है। न्यूज को आर्डिनेटर तो उसे न्यूज एडीटर स्टोर खुले आम कहता फिरता है। हफ्ते भर का एक ड्यूटी चार्ट बनाने में उसे चार दिन लग जाते हैं। जो बमुश्किल आधे घंटे का काम है। पर वही न्यूज एडीटर स्टोर कभी कभार रिपोर्टरों की ख़बर पास करने का काम पा जाता है तो पहला काम वह दांत किचकिचा कर रिपोर्टर का नाम यानी बाई लाइन काटने का करता है। नाम काट कर वह इस तरह खुश होता है जैसे कोई खुजली खुजा कर। फिर दूसरा काम वह यह करता है कि लाल पेन ले कर पूरी ख़बर रंग डालता है। रंगने के नाम पर भी करता यह है कि अगर कोई फिगर शब्दों में लिखा है तो उसे काट कर अंकों में लिखेगा, या फिर अंकों में लिखा है तो उसे काट कर शब्दों में कर देगा। पानी लिखा है तो उसे काट कर जल कर देगा। जल लिखा है तो उसे काट कर पानी कर देगा। पूरी ख़बर में वह ऐसा ही कुछ काट पीट मचाएगा और अंत में रिपोर्टर को बुलाएगा, उसे लाल रंगी उस की ख़बर दिखाएगा, सीना फुलाते हुए जताएगा कि उस की बाई लाइन काट दी गई है और फिर कहेगा, हेडिंग लगाइए। सजेस्टिव हेडिंग। हेडिंग लगाने तक में उसे पसीने आते हैं। पर जब कभी एकाध हेडिंग वह लगा लेगा, दूसरे दिन, दिन भर बैठा अपनी लगाई हेंडिंग को मंत्र मुग्ध निहारता रहेगा। जिस तिस को बताता रहेगा, मैं ने हेडिंग लगाई है। फोन कर-कर के लोगों को बताता रहेगा कि फला हेडिंग मैं ने लगाई है। अब उस उल्लू के पट्ठे से कौन बताए कि अगर अपनी लिखी हेडिंग छपी देख कर उसे इतनी खुशी होती है तो जिस ने वह ख़बर लिखी है, उस के साथ अगर उस का नाम भी छपे तो उसे कितनी खुशी होगी।’’
‘‘हां, मुझे भी अक्सर यही लगता था कि रिपोर्टरों को डेस्क वाले बिलकुल दरिद्रों की तरह ट्रीट करते थे।’’
‘‘रिपोर्टरों की भी गलती है। साले ज्यादा पढ़ते लिखते नहीं हैं। इसी लिए डेस्क वाले दौड़ाए रहते हैं।’’
‘‘तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे डेस्क वाले बड़ा लिखते-पढ़ते हैं। ?’’
‘‘अब काबुल में भी तो गधे होते हैं।’’ संजय बोला, ‘‘सच कहो तो जर्नलिस्टों में ज्श्यादातर गधे ही भर्ती हैं। पढ़े लिखे कम ही लोग हैं।’’
‘‘चलो तुम ने माना तो। नहीं, यही मैं कहती तो बुरा मान जाते तुम !’’
‘‘चलो बहुत घिसाई हो गई। अब सो लेने दो जरा देर।’’
‘‘तुम फिर डबल मीनिंग पर आ गए ?’’
‘‘क्या कह दिया भई ?’’
‘‘ये ‘‘घिसाई’’ क्या है ?’’
‘‘ओफ् मैं तो बात चीत के लिए घिसाई बोल रहा था।’’ वह हंसा, ‘‘पर तुम्हारा दोष नहीं है। रजनीश का वह संन्यासी और कपड़े वाला किस्सा पढ़ा है न तुम ने ?’’
‘‘हां, पढ़ा है। तो ?’’
‘‘तो यही कि ‘वस्त्र’ के बारे में कोई बातचीत नहीं। पर मैं क्या करूं जब तुम्हारे दिमाग में ‘वस्त्र’ ही घूम रहा है।’’ रीना को छेड़ते हुए संजय बोला, ‘‘वस्त्र जो ज्यादा घूम रहा हो तो बोलो वस्त्र उतार दूं ?’’
‘‘नहीं !’’ वह जोर दे कर बोली।
‘‘क्यों ?’’
‘‘तुम्हारी तरह कोई जानवर नहीं हूं। कि जब देखो तब वही।’’
‘‘तो देवी जी, फार योर काइंड इनफार्मेशन यह काम हरदम जानवर नहीं, आदमी ही करते रहते हैं जब-तब। जानवरों का तो कोई मौसम, कोई वक्त तय रहता है, प्रकृति की ओर से। यह जब-तब की छूट आदमियों को ही रहती है। अब कहिए तो ‘वस्त्र’ के बारे में बात चीत शुरू करूं ?’’
‘‘नहीं !’’ वह फिर जोर दे कर बोली और चादर को अपने चारों ओर कस कर लपेट लिया। बोली, ‘‘पता नहीं क्या करते हो, जलन हो रही है।’’
‘‘कहां ?’’ वह मजाक में बोला।
‘‘तुम्हारे मुंह में।’’ वह खीझ कर बोली।
‘‘डॉक्टर को तो नहीं दिखाना पड़ेगा ?’’
‘‘क्या पता ?’’ कह कर संजय की छाती से चिपटती हुई बोली, ‘‘क्यों तंग करते रहते हो ?’’
‘‘एक जोक सुनोगी ?’’
‘‘सुनाओ।’’ वह बोली, ‘‘पर घिसा पिटा न हो।’’
‘‘नहीं-नहीं, बिलकुल नया है। सेक्स और पत्रकारिता फील्ड का।’’
‘‘इंटरेस्टिंग।’’ वह बोली, ‘‘मींस नानवेज।’’ कह कर वह चहकी, ‘‘अलका से तुम्हारे कुछ नानवेज जोक सुन चुकी हूं।’’
‘‘अलका को तो कभी नानवेज जोक सुनाया नहीं, जरूर अजय के मार्फत….! बाई द वे अलका ने तुम्हें और क्या-क्या सुनाया है ?’’
‘‘बोर मत करो। बाद में अलका और अपने डिटेल ले लेना। अभी तो तुम वह ताजा जोक सुनाओ।’’
‘‘कौन सा ?’’
‘‘वही।’’
‘‘वही, मींस ?’’ उस ने भूलने का नाटक करना चाहा।
‘‘सेक्स और पत्रकारिता के फील्ड का।’’
‘‘अच्छा, अच्छा। बहुत मुख़्तसर सा है और तुम्हें मैं जानता हूं, बड़े में लुत्फ आता है।’’ वह उस की हिप में चिकोटी काटता हुआ बोला।
‘‘शैतानी नहीं। अच्छे बच्चों की तरह जोक सुनाओ।’’ वह उस का हाथ हटाती हुई बोली, ‘‘फटाफट।’’
‘‘तो सुनो।’’ एक हिंदी पत्रिका के नामी संपादक एक अंगरेजी अख़बार की नामी विशेष संवाददाता से संभोग के बाद बोले, ‘‘आज मेरी सेंचुरी पूरी हो गई।’’
‘‘मतलब ?’’
‘‘मतलब यह बालिके कि संपादक जी उन विशेष संवाददाता महोदया समेत सौ महिलाओं को भोगने का रिकार्ड बना गए थे।’’
‘‘इंटरेस्टिंग ! फिर तो यह सुन कर मोहतरमा नाराज हो गई होंगी।’’
‘‘इसी लिए कहा गया है कि जोक के बीच में नहीं बोलना चाहिए।’’
‘‘आल राइट !’’
‘‘तो जब संपादक जी ने बहुत विह्वल हो कर उन विशेष संवाददाता मोहतरमा को अपनी सेंचुरी बताई और बड़ी मासूमियत से पूछा, ‘‘तुम्हारा स्कोर क्या है ?’’ मोहरतमा ने ठंडी सांस छोड़ी। बोलीं, ‘‘कुछ याद नहीं।’’ संपादक जी की जिज्ञासा बलवती हुई, नहीं माने। पूछा, ‘‘फिर भी ?’’ मोहतरमा बोलीं, ‘‘जब सेंचुरी बनाई थी, तब से गिनना छोड़ दिया।’’
‘‘मजा आया ?’’ जोक सुना कर संजय ने रीना से पूछा।
‘‘बोर भी नहीं हुई। पर यह जोक है कि सच ?’’
‘‘लगता तो सच ही है।’’ वह बोला, ‘‘बुरा मत मानो तो तुम से एक बात पूछूं ?’’
‘‘अब क्या बाकी है जो बुरा मानूंगी ? पूछो।’’ वह एक झटके से बोली।
‘‘पूछूं ?’’
‘‘हां, पूछो।’’
‘‘सचमुच बुरा नहीं मानोगी ?’’
‘‘नहीं मानूंगी। कह तो दिया।’’
‘‘तो बताओगी, तुम्हारा स्कोर क्या है ?’’
‘‘तुम शैतानी से बाज नहीं आओगे ?’’ कहते हुए वह उस के ऊपर चढ़ गई।
‘‘मैं ने स्कोर पूछा था, बैटिंग करने को नहीं कहा था।’’
‘‘अभी बताती हूं स्कोर।’’ कह कर वह स्टार्ट हो गई।
‘‘पर अब की वह सिर्फ उधम मचा कर ही रह गई। संजय अभी उस की गुदाज देह का आनंद ले ही रहा था कि वह उचक कर बिस्तर से उतरी और खड़ी हो गई, माई गाड चार बज गए।’’ घड़ी देखती, गाऊन पहनती हुई बोली, ‘‘अब तुम जाने की तैयारी करो।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘पापा आज सुबह की फ्लाइट से आने वाले हैं।’’ वह घबराती हुई बोली, ‘‘अगर वह जान गए कि रात तुम यहीं रहे हो तो मुश्किल हो जाएगी।’’
‘‘क्यों, क्या खा जाएंगे ?’’
‘‘बहस नहीं, जल्दी से कपड़े पहनो और निकल लो।’’
‘‘हां, भई, रात गई-बात गई।’’
‘‘तुम हर बात को निगेटिव एप्रोच से ही क्यों देखते थे।’’ कहते हुए वह खूंटी से उस की टी शर्ट और कुर्सी पर से पैंट बिस्तर पर फेंकती हुई बोली, ‘‘बी क्विक।’’
‘‘अच्छा अगर सर्वेंटस ने बता दिया ?’’
‘‘उन्हें क्या मालूम कि तुम रात यहां रहे हो ?’’
‘‘क्यों रात आते समय देखा तो था।’’
‘‘ओफ, इस डिटेल्स में मत पड़ो। इट्स माई हेडेक। बट नाऊ यू प्लीज गो।’’
‘‘फिर कब मिलोगी ?’’ पैंट पहनते हुए उस ने पूछा।
‘‘आई विल कांटेक्ट यू।’’ वह बालों में क्लिप लगाती हुई बोली, ‘‘बट यू डोंट।’’
‘‘तुम्हारी यही अदा दुखी करती है।’’
‘‘इसी लिए शादी के लिए कहती हूं।’’
‘‘रह-रह कर तुम भी क्या रिकार्ड बजा देती हो।’’ वह उस की हिप पर हाथ मारते हुए बोला, ‘‘वो जो तुम्हें आज कल ट्रेनिंग दे रहा है, उस से क्यों नहीं कर लेती।’’
‘‘कौन सी ट्रेनिंग ? कौन दे रहा है ट्रेनिंग ?’’
‘‘तुम्हीं तो रात बता रही थी।’’
‘‘क्या ?’’
‘‘क्या कई चीजों की ट्रेनिंग ले रही हो आज कल ?’’
‘‘ओह !’’ वह फिर फरीदा जलाल की तरह शरारती हंसी हंसी। बोली, ‘‘तो तुम्हारी भी यही राय है !’’
‘‘हां, कर लो।’’ वह पैरों में जूते की जिप बंद करते हुए बोला।
‘‘तो पक्का रहा।’’ कहती हुई वह बोली, ‘‘पापा से बात करूं ?’’ वह खुश हो गई थी।
‘‘शादी का कार्ड हमें भी भेजना।’’
‘‘पर क्यों ?’’
‘‘अच्छा तो शादी में बुलाओगी भी नहीं ?’’ वह कंधे उचकाता हुआ बोला, ‘‘होता है, होता है !’’
‘‘बुलाऊंगी तो पर कार्ड दे कर नहीं।’’ वह उछल कर उस के गले से लटक कर झूल गई, ‘‘क्यों कि वो ट्रेनिंग मास्टर तुम ही हो।’’
‘‘क्यों फिल्मी स्टाइल का सतही सस्पेंस क्रिएट करती रहती हो ?’’ वह उसे बिस्तर पर पकड़ कर बैठाता हुआ बोला,‘‘ आखि़र क्या है ऐसा जो तुम मुझ पर इतना मेहरबान होना चाहती हो ?’’
‘‘तुम्हारा खुलापन। तुम्हारी साफगोई।’’ वह बोली, ‘‘तुम और मर्दों की तरह घाघ नहीं हो। बिस्तर पर भी औरत की चापलूसी नहीं करते हो। स्वाभिमानी हो।’’
‘‘बस, पढ़ चुकी कसीदा !’’ वह उठा और बोला, ‘‘अब चलूं ?’’
‘‘अभी चले जाना।’’ कहती हुई उसे पास की बेंत वाली कुर्सी पर बिठा कर खुद उस की गोद में बैठती हुई बोली, ‘‘तुम्हारी तरह मुझ में वो एक्सप्रेशन पावर नहीं है। जिस से ठीक-ठीक शब्दों में अपनी बात कह सकूं।’’ वह संजय के बालों में उंगलियां उलझाती हुई बोली, ‘‘बस कुछ ऐसा है तुम में। नहीं, मेरे इर्द गिर्द घूमने वालों की कमी नहीं है। पर मैं किसी को लिफ्ट नहीं देती हूं।’’
‘‘ऐसा !’’ वह लापरवाही से बोला।
‘‘ऐसा !’’ वह भी उसी लापरवाही से बोली, ‘‘रही बात पोलिटिसियंस से तुम्हारी एलर्जी की तो तुम्हें मालूम है नैय्यर जैसे लोग भी राजनीति को गाली राजनीति की बैसाखी पर ही खड़े हो कर देते हैं ?’’ वह टेंस होती हुई बोली, ‘‘यू नो नैय्यर की तरक्की का राज क्या है ?’’
‘‘क्या है ?’’
‘‘उन के ससुर।’’ वह जैसे राज खोलती हुई बोली, ‘‘जो पंजाब गवर्मेंट में मिनिस्टर रहे हैं।’’ वह जैसे संजय को टेंस कर देना चाहती थी, ‘‘जिस देश में आदमी की पहली लड़ाई भी रोटी दाल हो और आखि़री लड़ाई भी रोटी दाल। वहां का आदमी कैरियर क्या ख़ाक बनाएगा ? वह भी पत्रकारिता में, बनियों की चाकरी कर के ?’’
‘‘ख़़ूब ! मेरा डायलाग, मुझी को सुना रही हो ?’’
‘‘कोई कॉपीराइट है इस डायलाग पर तुम्हारा ? यह तो एक नंगी सच्चाई है, जिसे कोई भी बयान कर सकता है।’’
‘‘नंगी सच्चाई जानना चाहती हो ?’’
‘‘हां।’’
‘‘सचमुच ?’’
‘‘बिलकुल।’’
‘‘तो नंगी सच्चाई यह है कि अपने देश में कोई एक भी पत्रकार नहीं है।’’ वह बोला, ‘‘मैं तो कहता हूं कि कोई एक पत्रकार तुम्हें मिले तो मुझे भी बताना !’’
‘‘क्या ?’’ वह जैसे चौंक पड़ी।
‘‘हां। क्यों कि पत्रकारिता के नाम पर अब सिर्फ दो प्रजातियां मुझे दिखती हैं। एक पूंजीपतियों के चाकरों की जिन में हमारे जैसे लोग शुमार होते हैं।’’
‘‘और दूसरी ?’’
‘‘दूसरी प्रजाति है भड़वों और दलालों की। बस ! जो पूंजीपतियों से लगायत राजनीतिज्ञों और अफसरों के आगे दुम हिलाते, तलवे चाटते फिरते हैं।’’ वह तमतमाता हुआ बोला, ‘‘और ये राजनीतिज्ञ, ये अफसर इन्हें कुत्तों से ज्यादा अहमियत नहीं देते।’’ वह बोलता रहा, ‘‘ज्यादा से ज्यादा कोई अल्सीसियन ब्रांड का कुत्ता होता है तो कोई गली वाला ! बस ब्रीड का फर्क होता है।’’ वह बोला, ‘‘किसी ‘कुत्ते’ के आगे वह पुचकार कर सुविधाओं की हड्डी फेंक देते हैं तो किसी के आगे हिकारत से। पर यह तय है कि इन राजनीतिज्ञों, अफसरों के आगे इन सो काल्ड पत्रकारों की हैसियत एक कुत्ते से ज्यादा की नहीं है।’’ उस ने फिर से जोड़ा जैसे हथौड़ा मार कर कील को पूरी तरह ठोंक देना चाहता हो, ‘‘क्या नेता, क्या अभिनेता सब पत्रकारों को कुत्ता ही समझते हैं। कुत्ते से ज्यादा कुछ नहीं। वह अपनी सुविधा और जरूरत के ही मुताबिक ‘पत्रकार’ को कोई ख़बर या सुविधा देते हैं।’’
‘‘बड़ी तल्ख़ी है तुम में अपने पेशे को ले कर !’’ वह ऊबती हुई बोली।
‘‘पेशा है न क्या करें ?’’ उस ने ‘पेशा’’ शब्द पर ज्यादा जोर दिया और बोला, ‘‘अभिशप्त हैं अश्वत्थामा की तरह इस पेशे को झेलने के लिए क्या करें ?’’ वह बोला, ‘‘नहीं तुम भी जानती हो कि पढ़ने-लिखने वालों के इस पेशे में पढ़ने-लिखने वालों की कितनी कदर है और दलालों भड़ओं की कितनी ?’’ उस ने जोड़ा ‘‘अख़बार मालिकों को भी अब एडीटर या रिपोर्टर नहीं पी॰ आर॰ ओ॰ चाहिए होता है। नाम भर एडीटर, रिपोर्टर का होता है !’’
‘‘हां, डिवैल्यूवेशन तो हुआ है !’’ वह बोली।
‘‘मैं नहीं कह रहा कि यह अवमूल्यन सिर्फ पत्राकारिता में हुआ है। हो तो हर हलके में रहा है। पर जितना यहां हुआ है इतना कहीं और नहीं !’’
‘‘ये तो है !’’
‘‘अब क्या करोगी यह इस देश का दुर्भाग्य ही है कि कोई सांसद संसद में अपनी परफार्मेंस के बूते वोट नहीं पाता। वोट पाता है तो जोड़-तोड़ से गुण-दोष से नहीं। कोई बहुत काबिल मंत्राी है और कहे कि मैं ने देश के लिए यह-यह और ऐसी-ऐसी योजनाएं बनाईं, यह-यह किया तो मुझे वोट दो ! तो कोई वोट नहीं देगा उसे। क्यों कि वोट तो अब हिंदू, मुसलमान, पिछड़ों और दलितों के खाने में बंट गया है !’’ वह कहने लगा, ‘‘तो देश में सही मायने में कोई एक नेता नहीं है !’’ वह बोला, ‘‘नेता ही क्यों मैं तो कहता हूं देश में कोई एक जज नहीं है, कोई एक वकील नहीं है ! कोई एक डॉक्टर, कोई एक शिक्षक नहीं है ! तो अगर देश में कोई एक पत्रकार नहीं है तो हम क्या कर सकते हैं ! क्यों कि सब कुछ तो गुण-दोष के बजाय जोड़-तोड़ में फिट हो गया है।’’
‘‘तो क्या अब तुम सब को सुधार लोगे ?’’ वह बोली, ‘‘नहीं न !’’
‘‘बिलकुल नहीं।’’ वह बोला, ‘‘और बंद कमरे में इस एकालाप से तो कतई नहीं।’’
‘‘चलो यह सब किसी सेमिनार के लिए संभाल कर रखो। काम आएगा !’’
‘‘तुम्हारी ऊब को मैं समझ सकता हूं। पर यह सारी चीजें अब सेमिनारों से तय नहीं होने वाली, न नपुंसक अख़बारों से।’’ वह बोला, ‘‘इस के लिए तो सिस्टम को ही तोड़ना होगा !’’
‘‘तो तोड़ो !’’
‘‘पर दिक्कत यह है कि सिस्टम टूटता दिखाई नहीं देता और मेरे जैसे इक्का दुक्का सिस्टम तोड़ने जो चलते भी हैं तो सिस्टम उन्हें तोड़ देता है। मान लिया गया है कि सिस्टम नहीं, सिस्टम तोड़ने वाला व्यक्ति ही टूटेगा !’’
‘‘यह तो है। पर कुछ क्रांति आगे की मुलाकातों के लिए छोड़ो।’’ कह कर वह मुसकुराई।
‘‘ओ॰ के॰ !’’ वह उसे गोद से उठाता हुआ बोला, ‘‘अब चलूं ? नहीं, तुम्हारे पापा आ जाएंगे।’’ कह कर वह खड़ा हुआ तो वह उसे पीछे से पकड़ कर लिपट गई। उस की बड़ी-बड़ी छातियां जैसे उस की पीठ को कुचल देना चाहती थीं। थोड़ी देर वह दोनों ऐसे खड़े रहे। फिर संजय ने उस का हाथ छुड़ाया, उसे आगे किया और पीछे से खुद लिपट कर खड़ा हो गया। जांघों, से उस के भारी हो रहे नितंबों को रगड़ते हुए, पीछे से ही उसे चूमते हुए बोला, ‘‘अच्छी सी रात साथ गुजारने के लिए शुक्रिया।’’ कह कर जब वह कमरे के दरवाजे पर आ गया तो रीना दौड़ कर फिर चिपट गई और उसे बेतहाशा चूमने लगी। संजय भी उसे चूमने लगा। इस चूमा चाटी में उस का फैंसी झुमका संजय की नाकों में खरोंच लगा गया। संजय खीझ गया, ‘‘कितनी बार कहा यह सब मत पहना करो।’’ वह झल्लाता हुआ बोला, ‘‘मेरे जाने के बाद भी पहन सकती हो।’’ तब तक वह ड्रेसिंग टेबिल से कोई क्रीम ट्यूब निकाल कर उस की नाक पर मलने लगी। क्रीम मल कर वह सेंट स्प्रे करने लगी। बोली, ‘‘तुम्हारी सिगरेट और पसीने की गंध मेरी देह में जैसे चिपक गई हैं।’’ वह सेंट उस पर भी स्प्रे करती हुई बोली, ‘‘कितनी बार कहा है मेरे पास आया करो तो सिगरेट सुलगा कर नहीं, बुझा कर आया करो।’’
‘‘अब चलूं ?’’ वह दरवाजा खोलते हुए बोला, ‘‘तुम्हारे कुत्ते तो बंधे होंगे ?’’
‘‘रुको, एक मिनट मैं चेक कर लेती हूं।’’
‘‘हां, नहीं कहीं साले दौड़ा लें तो सुबह-सुबह मुसीबत !’’
संजय पैर नीचे कर बिस्तर पर लेट गया। जरा देर बाद वह गाउन की बेल्ट बांधती हुई आई। बोली, ‘‘खुले थे, पर मैं ने बांध दिया है। पर तुम दबे पांव जाना माली जाग गया है।’’ फिर जब संजय चलने लगा तो बोला, ‘‘जरा झुमके और बालों की चिमटियां निकालो।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘निकालो तो सही।’’ उस के झुमके निकालते ही वह उसे आहिस्ता-आहिस्ता चूमने लगा। रीना ने भी उस का माथा धीरे से चूम लिया। संजय चल ही रहा था कि वह बुदबुदाई, ‘‘मेरे प्रपोजल पर मन करे तो एक बार फिर गौर करना।’’
‘‘ठीक है सोचूंगा। पर तुम एक बात अच्छी तरह नोट कर लो।’’ वह जरा सख्ती से बोला।
‘‘क्या ?’’
‘‘मैं नैय्यर नहीं हूं।’’ वह पूरी सख़्ती से बोला, और बाहर आ गया।
बहुत दिनों बाद वह ऐसी सुबह देख रहा था। पौ फटती सुबह। रीना के देह की मादक गंध, उस के सेंट की गमक, सड़क के दोनों ओर के बंगलों में लगे फूलों की दिल को बहका देने वाली सुगंध भी तिर रही थी इस सुबह में। सड़क पर आ कर संजय ने सिगरेट सुलगा ली थी।
पंडारा रोड पर।
तब वह दिल्ली में जंगपुरा एक्सटेंशन में रहता था। घर पहुंच कर संजय ने रगड़-रगड़ कर नहाया। पर रीना की देह गंध जैसे उस के अंग-अंग में समा गई थी, निकल ही नहीं रही थी।
‘‘रात भर कहां थे ?’’ होंठ गोल करते हुए उस के ऊपर रहने वाले श्रीवास्तव ने पूछा। श्रीवास्तव भी एक न्यूज एजेंसी में रिपोर्टर था। यह कमरा उसी ने संजय को दिलवाया था। श्रीवास्तव भी अजीब चीज था। एक से एक बेढब काम करता रहता। जैसे बिना रेजर के, बिना शेविंग क्रीम के हाथ में ब्लेड ले कर शेव बना डालता। जाने कैसे? गंजे सिर वाले श्रीवास्तव का नाम बहुत कम लोग लेते थे। सब उसे ‘‘लाला, लाला’’ बोलते। तो संजय लाला का सवाल पीते हुए बोला, ‘‘लाला, आज जरा मेरे दफ्तर फोन कर देना। कह देना तबीयत ठीक नहीं है, आज नहीं आऊंगा।’’ कहते हुए संजय सोने के लिए बिस्तर की चादर ठीक करने लगा।
‘‘पर रात थे कहां ?’’ लाला का सवाल उस के होंठों से अभी छूटा नहीं था।
‘‘बस ! वैसे ही रतजगा हो गया।’’
‘‘पर थे कहां ?’’ जैसे वह किसी रहस्य का पर्दाफाश कर देना चाहता था।
‘‘कुछ नहीं, माडल टाऊन वाले अंचल के यहां रह गया था।’’ वह झूठ को सच बनाते हुए बोला, ‘‘गपियाते-गपियाते रात ज्यादा हो गई तो उस ने कहा यहीं सो जाओ। सुबह चले जाना।’’
‘‘कौन अंचल ? वही दिल्ली प्रेस वाला ?’’
‘‘हां।’’
‘‘पर रात को तो वह तुम से मिलने यहीं आया था।’’ लाला उस पर रौब मारते हुए बोला।
‘‘हां, बता रहा था कि तुम ने कोई थर्ड क्लास रम भी पिला दी थी।’’ संजय यूं ही अंधेरे में तीर मारता हुआ बोला। पर निशाना ठीक लग गया था।
‘‘ओल्ड मंक भी अगर घटिया रम है तो बात ही ख़त्म !’’ कहता हुआ लाला मायूस सा कमरे से बाहर जाने लगा, ‘‘मैं ने तो तुम्हारे लिए बड़ा इंतजार किया। तुम्हारी भाभी ने चिकन भी बनाया था।’’
‘‘अच्छा !’’ संजय लाला का एहसान मानते हुए बोला, ‘‘कोई बात नहीं, मेरे हिस्से की बची तो होगी, इस समय खा लूंगा।’’
‘‘ख़ाक बचेगी !’’ लाला झल्लाया, ‘‘वो साला अंचल बचने देता तब न ! आधी बोतल ओल्ड मंक भी घसीट गया और चिकन की लेग पीसें भी।’’ वह हाथ नचाता हुआ बोला, ‘‘फिर भी घटिया रम बताया साले ने।’’
‘‘अरे नहीं, नहीं। वह तो बड़ी तारीफ कर रहा था।’’ संजय ने बात मोड़ते हुए कहा, ‘‘वो तो मैं ही जरा तुम्हें छेड़ने के लिए झूठ बोल गया।’’
‘‘तो रात कहां थे ?’’ लाला ने जैसे म्यान से तलवार निकाल ली।
‘‘अंचल के घर। और कहां ?’’ संजय फिर भी अडिग रहा। लाला जब मायूस जाने लगा तो संजय उसे बुलाते हुए बोला, ‘‘लाला, फोन जरूर कर देना। और, हां, एक इनायत और कर देना !’’
‘‘क्या ?’’
‘‘भाभी से कह देना, दिन का मेरा खाना भी बना देंगी। अब होटल जाने में आलस लग रही है।’’
‘‘ठीक है।’’ लाला उसी मायूसी से बोला। और दरवाजा बंद करता हुआ चला गया।
दूसरे दिन संजय जब आफिस पहुंचा तो रिसेप्शनिस्ट ने बताया रीना कल दो बार आई थी। संजय ने सोचा कि रीना को फोन करे। पर उस का काशन ‘‘यू डोंट’’ याद आ गया। दफ्तर में एडीटर वैसे ही भन्नाया पड़ा था।
दो हफ्ते बीत गए। रीना का कहीं पता नहीं था। एक शाम उस का फोन आया। हाल चाल पूछा तो बोली, ‘‘बाहर गई थी।’’ फिर, ‘‘दो दिन बाद भेंट होगी।’’ कह कर उस ने फोन रख दिया। एक दिन बाद उस का फोन आया, ‘‘कल का दिन मेरे लिए खा़ली रखना।’’
‘‘मिलोगी कहां ?’’
‘‘मैं फोन कर के बताऊंगी। और हां, फार गाड शेक कल सिगरेट मत पीना।’’ कह कर उस ने फोन रख दिया।
दूसरे रोज उस का फोन आया, ‘‘ओबेराय होटल आ जाओ। तुरंत।’’
‘‘ओबेराय में कहां ?’’
‘‘लॉबी में। और कहां।’’ वह बोली, ‘‘और हां, अगर लॉबी में न मिलूं तो हेयर ड्रेसर के पास आ जाना।’’
‘‘हेयर ड्रेसर ?’’
‘‘भूल गए ?’’ वह चहकी, ‘‘वही जिस का तुम ने इंटरव्यू लिया था।’’
‘‘अच्छा-अच्छा हबीब।’’
‘‘हां। वही।’’ और ‘‘ओ॰ के॰’’ कह कर उस ने फोन रख दिया।
हबीब ! जो कहता था कि राह चलते भी अगर औरतों के बालों की स्टाइल उसे बेढंगी दिखती है तो उस का मन करता है उसे वह वहीं ठीक कर दे। वह कहता अगर कुदरत ने ख़ूबसूरत घने और लंबे बाल दिए हैं तो उस के प्रति लापरवाही माफ नहीं की जा सकती। रीना को इंटरव्यू में छपी हबीब की बात क्लिक कर गई। और वह ओबेराय होटल में हबीब की शाप पर पहुंच गई। बन गई उस की परमानेंट क्लाइंट। रीना के बाल थे भी घने, ख़ूबसूरत और लंबे। जब वह कभी कभार जींस-टी शर्ट पहन कर निकलती तब जरूर उस के लंबे बाल उस का मजाक उड़ाते। एक बार संजय ने कहा भी कि, ‘‘थोड़े छोटे करवा लो।’’ तो वह बिदक गई, ‘‘क्यों ?’’
‘‘तो जींस-टी शर्ट मत पहना करो।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘क्यों क्या, पूरी कार्टून लगती हो।’’ संजय मुंह बिगाड़ते हुए बोला, ‘‘लंबी-लंबी काया, लंबे लंबे केश, तिस पर जींस-टी शर्ट और….।’’
‘‘और ?’’
‘‘कुछ नहीं बुरा मान जाओगी।’’ पर वह बुरा मान गई थी।
‘‘आज कह दिया, फिर कभी नहीं कहना।’’
‘‘क्या ?’’
‘‘बाल कटवाने को।’’ वह रुआंसी हो गई थी।
‘‘क्यों, क्या बात हुई ?’’
‘‘मेरी मां को मेरे बाल बहुत पसंद थे।’’ वह भावुक हो गई थी, ‘‘मां ने कहा था कि कभी कटवाना नहीं।’’
‘‘वेरी सॉरी !’’ संजय ने रीना को इतना भावुक पहले कभी नहीं देखा था। रीना मां-बाप की इकलौती थी। चार साल पहले उस की मां कैंसर से मर गई थी। तब से वह जब कभी भी मां की चरचा करती तो रो पड़ती।
रीना के घने, लंबे बाल संजय को भी अच्छे लगते। ख़ास कर जब वह शैंपू कर के बाल खोले मिलती तो गजब का कहर ढाती। बड़े-बड़े काले-काले बालों और कजरारे नयनों के बीच उस के गोरे-गोरे गाल ऐसे लगते जैसे कोई सी-बिच। संजय सोचता क्या वह फिर से कविताएं लिखना शुरू कर दे ?
आज ओबेराय होटल की लॉबी में चिकन की कलफ लगी बादामी साड़ी में बाल खोले रीना मिली तो संजय को वह बिलकुल किसी अप्सरा-सी लगी। लपक कर वह उस का हाथ थाम लेना चाहता था। उस के लहराते खुले बालों को प्यार कर लेना चाहता था। पर उस की कजरारी नशीली आंखों के जादू भरे संकेत ने उसे रोक दिया।
‘‘यहां कैसे ?’’ संजय ने पूछा।
‘‘आते ही डिटेल्स लेने शुरू कर दिए ?’’ वह अपनी आंखों में जैसे ढेर सारा नशा उडेलती हुई बोली, ‘‘रिपोर्टिंग के लिए नहीं बुलाया यहां तुम्हें।’’ वह पल्लू संभालती हुई बोली, ‘‘आओ पहले कुछ खा पी लेते हैं।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘तुम बड़ा भुखाए दिखते हो।’’
‘‘हां, पर तुम्हारी भूख भी नहीं देखी जा रही।’’
‘‘डबल मीनिंग डायलाग से मुझे कोफ्त होती है ! यू नो ?’’ कहती हुई वह चलने लगी।
‘‘देखो मैं चला जाऊंगा।’’ संजय तैश में आता हुआ बोला, ‘‘बार-बार इस तरह ह्यूमिलिएट मत किया करो।’’
रीना कुछ बोली नहीं और हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई।
‘‘चलो।’’ संजय पसीजते हुए बोला।
खाने के दौरान दोनों चुप रहे। यंत्रवत कमरे में आए। कमरे में भी देर तक दोनों चुप बैठे रहे। यह पहली बार हो रहा था कि दोनों कमरे में अकेले थे और अलग-अलग, चुप-चुप बैठे थे। रीना के खुले-खुले बाल, उस का रूठा-रूठा चेहरा, संजय को ऊब हो रही थी। आखि़रकार संजय उठा, रीना के पास गया और खड़े-खड़े ही उस ने रीना के बालों से खेलना शुरू किया। पर रीना कुछ नहीं बोली। उसे चूमा वह फिर भी कुछ नहीं बोली। उस ने उस के ब्लाऊज में हाथ डाल दिया वह फिर भी चुप रही। धीरे-धीरे संजय ने उस की साड़ी उतार दी, ब्लाउज उतार दिया, पेटीकोट पर उस ने हलका सा प्रतिरोध जताया। पर जब ब्रा और पेंटी पर उस ने हाथ लगाना चाहा तो उस ने दोनों हाथों से उस का हाथ पकड़ लिया। हालां कि संजय अब बेसब्र हो रहा था, पर रीना पूरी की पूरी उदासीन थी। संजय ने उसे उठा कर खड़ा कर दिया। कमरे में लगे आइने में वह अपनी देह घूरने लगी। उस का भरा-भरा बदन देख कर संजय जैसे बउरा गया। पर रीना ने कोई रिस्पांस नहीं दिया। संजय ‘‘रूपदंभा बड़ी कृपण हो तुम, अल्पव्यसना कसे वसन हो तुम’’ जैसी कविताएं भी पढ़ गया पर वह निश्चेष्ट खड़ी-खड़ी अपने आप को देखती रही। संजय उसे सिर से पांव तक अनवरत चूमता रहा, उसे बाहों में भरता रहा पर रीना तो जैसे बुत बनी खड़ी रही तो खड़ी रही। संजय ने आहिस्ता से उस के बांलों को कंधों पर से हटाया और गोद में उठाते हुए बिस्तर पर लिटा दिया। उस की बांहों को सहलाते हुए, ‘‘ये तुम्हारी कोपलों सी नर्म बांहें और मेरे गुलमुहर से दिन’’ वाला गीत पढ़ा तो रीना के होंठ हलके से मुसकुरा कर रह गए। क्षण भर ख़ातिर। पर वह बोली फिर भी नहीं। ‘‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं’’ और ‘‘गुलमुहर गर तुम्हारा नाम होता, मौसमे गुल को हंसाना भी हमारा काम होता’’ जैसे फिल्मी गीत भी उस की देह को सहलाता हुआ संजय सुना गया। पर रीना के मन में, रीना की देह में कहीं कोई स्पंदन नहीं हुआ। ‘‘मैं ने तुम्हें छुआ, और कुछ नहीं हुआ’’ कहने पर भी वह जब कुछ नहीं बोली, बर्फ की तरह ठंडी पड़ी रही तो संजय का धैर्य टूट गया। उस के भीतर का जानवर जैसे जाग गया। उस ने लगभग जबरिया रीना की पैंटी उतारी, उस की देह से ब्रा नोची उस की टांगें उठाई और हांफने लगा। रीना जैसा कि हमेशा करती थी उसे दबोच लेती थी, उस की पीठ दोनों बांहों से जकड़ लेती थी, सिर के बाल एक ख़ास स्टाइल में सहलाने लगती थी, ऐसा कुछ भी नहीं किया उस ने। हां, पर उस ने विरोध भी नहीं किया। अलबत्ता जब वह हांफता-हांफता उस की देह पर बेसुध होकर ढीला पड़ गया तो वह उसे अपनी देह पर से सरकाते हुए चिपट गई। चिपट कर सुबकने लगी। पर संजय कुछ नहीं बोला। थोड़ी देर बाद जैसे वह होश में आई तो उठ कर लिहाफ ओढ़ कर संजय से चिपट गई। पर अब बारी संजय के उदासीन रहने की थी। थोड़ी देर बाद रीना फुसफुसा रही थी, ‘‘संजय प्लीज, संजय प्लीज।’’ पर संजय लाख कोशिश के बावजूद उत्तेजित नहीं हो पा रहा था। उस का मन उचट गया था। और जब रीना ने उसे बहुत परेशान कर दिया तो वह उसे उलटा कर उस की पीठ पर लेट गया। वह फिर भी कसमसाती रही। रीना की पीठ पर लेटे-लेटे वह ऊब ही रहा था कि रीना की हिप कुछ अजीब ढंग से उछलने लगी। संजय सहसा उत्तेजित हो गया। फिर तो जैसे अनायास रीना की हिप और उठती गई और संजय बेकाबू हो कर उस पर सवार हो गया। संजय के लिए इस तरह का यह पहला अनुभव था। संजय जब थक कर बिस्तर पर गिरा तो रीना उसे चूमते हुए बोली, ‘‘फैंटास्टिक !’’
संजय ने देखा बिस्तर की चद्दर, गद्दा तकिया सब कुछ अस्त व्यस्त हो गया था। पर उस ने नोट किया रीना सहज हो गई थी।
अब वह बोलने लगी थी।
‘‘होटल का कमरा लेने की क्या जरूरत थी ?’’ संजय ने पूछा।
‘‘मैं ने नहीं लिया।’’
‘‘तो ?’’
‘‘मेरे पापा के दोस्त राजस्थान में मिनिस्टर हैं। उन की फेमिली आई है।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘वही लोग यहां ठहरे हुए हैं। मैं जानती थी वह लोग घूमने जाएंगे। साथ मुझे भी जाना था। मैं ने प्रोग्राम तो बनाया पर ऐन वक्त पर दिमाग काम कर गया। मैं ने कल ही तुम से यहां मिलने का प्रोग्राम बना डाला। और जब सुबह आज वह लोग घूमने जाने लगे। मैं ने अचानक तबीयत ख़राब होने का बहाना बनाया। रुक गई। और तुम्हें बुला लिया।’’ कहते-कहते जैसे उस ने बात पूरी की, ‘‘एनीथिंग एल्स ?’’
ऐसे ही इस या उस बहाने रीना मिलती रही संजय से। बीच-बीच में वह अपनी शादी का जिक्र करती। बताती कि लड़के वाले देखने आ रहे हैं। कभी बताती कि लड़के वालों ने हां कर दी है। एक बार उस ने यह सूचना भी दी कि उस की शादी तय हो गई है। और जैसे अल्टीमेटम देती हुई बोली, ‘‘अभी कोई बात नहीं बिगड़ी है। तुम हां, कर दो तो मैं मना कर दूंगी।’’ वह यह और ऐसे कई किस्म के दबाव बनाती रहती। पर संजय हर बार या तो चुपचाप उस की ऐसी सूचनाएं पी जाता या फिर, ‘‘क्या फायदा ?’’ जैसे संक्षिप्त संवाद बोल कर बात टाल जाता। ऐसे ही एक बार वह बिलकुल चरम क्षणों में बुदबुदाई, ‘‘देख रही हूं तुम्हारे नसीब में मेरे लिए आह भरना ही लिखा है।’’
‘‘वो तो है।’’ संजय लापरवाही से बोला।
‘‘तो क्या तुम ने मेरे बच्चों का मामा बनने का फैसला कर लिया है ?’’ वह जैसे संजय को बिच्छू की तरह डंक मारती हुई बोली, ‘‘मामा बनना ही चाहते हो तो मैं क्या कर सकती हूं।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘पर मुझे अच्छा नहीं लगेगा।’’
‘‘क्या बेवकूफी की बातें करती हो ?’’ कहते हुए संजय ने बात टाल दी। पर इस वाकये के बाद वह रीना के बारे में गंभीरता से सोचने लगा।
शिद्दत से।
उन्हीं दिनों रमेश शर्मा की फिल्म ‘‘न्यू डेलही टाइम्स’’ की शूटिंग दिल्ली में हो रही थी। संजय ने उस शूटिंग पर सर्रे की शूटिंग रिपोर्ट लिखने के बजाय एक दिलचस्प रिपोर्ताज लिखा। साथ में फिल्म के हीरो शशी कपूर से एक बेलौस इंटरव्यू भी। इस इंटरव्यू में शशी कपूर ने बड़ी मासूमियत से उस बात का भी जिक्र किया था कि जब वह छोटे थे तो कैसे अपने पापा जी यानी पृथ्वी राज कपूर की एक हिरोइन को दिल दे बैठे थे। और संयोग देखिए कि शशी कपूर का एक बेटा भी छुटपन में ही उन की एक हिरोइन से प्यार कर बैठा था। इस पूरे प्रसंग को जिस मन से, जिस मासूमियत और मुहब्बत से शशी कपूर ने बयान किया था, लगभग उसी मन और पन से संजय ने लिखा भी था। इंटरव्यू में शशी कपूर की फिल्मों पर, उन की जिंदगी पर भी विस्तार से चरचा थी। उन्हों ने बताया था कि अपनी लगातार फ्लाप फिल्मों से वह एक समय बहुत परेशान हो गए थे। उन्हीं परेशानी के क्षणों में वह एक बार एस॰ डी॰ बर्मन से मिले। बर्मन दा ने उन्हें दिलासा दिलाया और कहा कि घबराओ नहीं हम कुछ करेंगे। और उन्हों ने किया। शर्मीली में बर्मन दा ने जो संगीत दिया उस ने शशी कपूर के गिरते कैरियर को थाम लिया। ‘‘खिलते हैं गुल यहां, खिल के बिखरने को, मिलते हैं दिल यहां’’ गीत जो शशी कपूर पर फिल्माया गया था, शशी कपूर ने उसे अपने कैरियर का महत्वपूर्ण पड़ाव माना था। ‘‘जुनून’’ ‘‘36 चौरंगी लेन’’ और ‘‘कलयुग’’ जैसी उन की महत्वपूर्ण फिल्मों की चरचा भी संजय ने विस्तार से और कई शेड्स में की थी। संजय ने शशी की यह बात भी हाईलाइट की थी कि अब उन्हें अपनी बेटी की उम्र के बराबर की लड़कियों के साथ झाड़ियों के आगे पीछे गाना गाते दौड़ना ख़ुद भी अच्छा नहीं लगता।
यह सब पढ़ कर रीना का दिमाग ख़राब हो गया। वह कहने लगी कि वह उसे भी क्यों नहीं साथ ले गया। उस ने लगभग जिद पकड़ ली कि वह उसे शशी कपूर से अभी चल कर मिलवाए।
‘‘क्या बंबई चलोगी ?’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘क्यों कि शशी बंबई जा चुके हैं।’’ संजय ने उसे बताया , ‘‘चलो अगली बार जब वह आएंगे तो जरूर मिलवा दूंगा।’’
‘‘जाओ मैं तुम से नहीं बोलती।’’ वह किसी छोटे बच्चे की तरह तुनक कर बोली।
‘‘क्या शशी कपूर की हिरोइन बनने की तमन्ना है ?’’ संजय ने उसे चिढ़ाया, ‘‘कि अब अगला प्रपोजल शशी कपूर को देना है ?’’
‘‘तुम से मतलब ?’’ वह फिर तुनकी।
‘‘नहीं, शशी कपूर को भी अगर अपने ‘‘स्कोर बोर्ड’’ में शुमार करने की तैयारी हो तो बताओ उन्हें फोन करके फौरन बुला दूं।’’ संजय रीना को छेड़ता हुआ बोला।
‘‘फौरन बुला दूं !’’ उस की बात दुहराती हुई वह मटकी, ‘‘शर्म भी नहीं आती यह कहते।’’ कहते हुए उस ने संजय की बांह में जोर से काट लिया। संजय जोर से चिल्लाया और लपक कर उस ने मुंह पर हाथ रख दिया और काटी हुई जगह पर फूंक मार-मार कर सहलाने लगी। बोली, ‘‘तुम ने ऐसी बात की ही क्यों ?’’ वह उसे घूरती हुई बोली, ‘‘तुम क्या मुझे करेक्टरलेस समझते हो ?’’
‘‘अच्छा चलो, तुम्हें ए॰ के॰ हंगल से मिलवा दूं।’’ संजय रीना को खुश करता हुआ बोला, ‘‘वह दिल्ली में अभी हैं।
‘‘मुझे नहीं मिलना।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘बस, कह दिया कि नहीं मिलना !’’
‘‘पछताओगी।’’ संजय बोला, ‘‘हंगल साहब से मिलना एक अनुभव से गुजरना है। वह स्टार नहीं न सही, पर अभिनेता जबरदस्त हैं। बिरले ही होते हैं ऐसे अभिनेता। और आदमी वह अपने अभिनेता से भी अच्छे हैं।’’
‘‘ठीक है।’’ वह उठती हुई बोली, ‘‘फिर कभी।’’ वह ठीक वैसे ही बोली जैसे लाइफब्वाय प्लस साबुन के विज्ञापन में पसीने की बदबू से उकताई लड़की बोलती है, ‘‘फिर कभी।’’ और जैसे दूसरे दृश्य में वह तरल और मादक बन जाती है कुछ-कुछ वही हाल रीना ने किया। वह संजय से लिपट गई।
मंडी हाउस के श्री राम सेंटर में एक ड्रामा फेस्टिवल के दौरान रीना जब संजय से पहली-पहली बार अलका के साथ मिली थी तो संजय ने उसे भर आंख देखा भी नहीं था। अलका की उपस्थिति मात्रा से ही संजय की आंखें नत हो जाती थीं। तब से जब से अलका ने उसे पुरुष मानसिकता से संचालित होने वाला व्यक्ति बता कर राखी बांधने की मंशा जता दी थी।
उस रोज श्री राम सेंटर के गलियारे में रीना से बड़ा रूटीन सा परिचय इस तरह के संबंध में बदल जाएगा संजय ने सोचा भी नहीं था। गिरीश कर्नाड लिखित हयबदन नाटक की समीक्षा में संजय ने स्त्री-पुरुष संबंधों को जो नाटक में इंगित और वर्णित था, उस की एक नई व्याख्या, एक नया भाष्य भाखते हुए, उसे रेखांकित करते हुए कुछ दृष्टिगत बातें गौरतलब कराई थीं। रीना को वह सारी संभावनाएं और स्थापनाएं जो संजय ने बतौर बहस रेखांकित की थीं, इतनी भा गई थीं कि दूसरे दिन वह संजय से ऐसे लपक कर मिली, जैसे वह उसे कितने वर्षों से मिलती रही हो। पर संजय को तो यह भी ठीक से याद नहीं था कि यह रीना वही रीना है जो कल मिली थी। अलका ने उसे छेड़ा, ‘‘क्या रजनीश सिर से उतर गए जो लड़कियों की नोटिस लेना भी श्रीमान भूल गए ?’’ उस ने जोड़ा, ‘‘कि कहीं समाधि अवस्था में तो नहीं पहुंच गए ?’’ वह बोली, ‘‘अगर ऐसा है तो बड़ा बुरा हुआ। क्या होगा देश का, क्या होगा बेचारे रजनीश का ?’’ अलका लगातार चुटकी लेती जा रही थी। बात किसी तरह अजय ने संभाली, ‘‘क्यों परेशान करती हो बेचारे को।’’ पर रीना तो जैसे इन सारी चीजों से बेख़बर अपनी ही धुन में थी, ‘‘पहली बार किसी प्ले की रिव्यू इस तरह पढ़ने को मिली। रिव्यू में इस तरह की इमैजिनेशंस, प्ले से भी आगे की बात करना आसान नहीं है।’’
‘‘पर यह तो अक्सर ऐसे ही रिव्यू लिखता है।’’ अजय ने हस्तक्षेप करते हुए कहा, ‘‘शायद पढ़ा नहीं तुम ने ?’’
‘‘नहीं, रिव्यूज तो मैं अक्सर पढ़ती हूं।’’ रीना बोल रही थी, ‘‘पर हमेशा एक ही ढर्रा । कि स्टोरी सच एंड सच, फला-फला ने ठीक काम किया, फला-फला ने सो एंड सो। और कुछ ऐसी ही कील कांटे वाली बातें गोया रिव्यू नहीं किसी मशीन का नट बोल्ट कस रहे हों।’’ वह कंधे उचकाती हुई बोली, ‘‘बिलकुल रूटीन-रूटीन सी रिव्यू। बासी बासी बातें।’’ वह संजय की ओर मुख़ातिब होती हुई बोली, ‘‘पर आप की रिव्यू ने तो सोचने पर मजबूर कर दिया।’’ वह चहकी, ‘‘बाई गाड इस तरह की रिव्यू अब तक तो पढ़ने को नहीं मिली थी।’’
‘‘ज्यादा तारीफ मत करो।’’ अजय रीना से बोला, ‘‘इस से भी अच्छी रिव्यू भारद्वाज ने लिखी है।’’
‘‘आप अंगरेजी अख़बार पढ़ती हैं ?’’ संजय ने रीना से पूछा।
‘‘आफकोर्स !’’
‘‘तो अंगरेजी अख़बार पढ़ना बंद कर दीजिए।’’ संजय बोला, ‘‘अगर कचरा रिव्यू पढ़ने से बचना चाहती हों तो।’’
‘‘अच्छा ?’’ रीना सोच में पड़ गई।
‘‘क्यों कि एक प्रसिद्ध चित्रकार का कहना है कि सपने हमेशा मातृभाषा में आते हैं।’’ संजय ने जोड़ा, ‘‘और आप लाख कंधे उचकाएं, अंगरेजी में गिटपिटाएं, मैं समझता हूं आप की मां हिंदी ही बोलती होंगी। मतलब साफ है कि आप की मातृभाषा हिंदी होगी।’’ संजय ने कहा, ‘‘अगर हिंदी न सही कोई और भाषा सही, जो भी हो आप वह भाषा पढ़िए, बंगला, पंजाबी, असमी, तेलगु जो भी हो। वह पढ़िए।’’ उस ने लगभग चेताते हुए कहा, ‘‘पर अंगेरजी छोड़ दीजिए।’’
‘‘इस की बातों में मत आना।’’ अजय बोला, ‘‘यह तो लोहियावादी है।’’
‘‘सवाल सिर्फ लोहियावादी का नहीं है यहां।’’ संजय तुनका, ‘‘सवाल मातृभाषा का है, सवाल हिंदी का है, सवाल अपनी भाषा के प्रति सम्मान का है, अपने आत्म सम्मान का है, सवाल अंगरेजी की गुलामी से छुट्टी पाने का है। क्यों कि अंगरेजी में न तो कोई संभावनाएं हैं, न कोई सपने हैं हमारे लिए।’’
‘‘अच्छा चलो, रीना पर तुम्हारी इन बातों का इंप्रेशन नहीं जमने वाला।’’ अजय संजय को खींचते हुए बोला, ‘‘नाटक की घंटी बज गई है।’’
‘‘सॉरी !’’ कहते हुए संजय ने सिगरेट सुलगा ली थी।
नाटक के बाद रीना फिर संजय की ओर लपकी। ऐसे हिल मिल के बात करने लगी कि संजय खुद भी मुश्किल में आ गया था। दो ही संक्षिप्त मुलाकातों में कोई सुंदर सी लड़की किसी फंटूश के गले पड़ जाए, यह उस के लिए पहला अनुभव था। फिल्मों में तो ऐसे फ्रेम उस ने देखे थे, पर ख़ुद के साथ यह फिल्मी फ्रेम घटित होते हुए वह पहली बार महसूस कर रहा था। उस के भीतर ही भीतर एक अजीब-सी हलचल, एक अजीब-सी गुदगुदी हो रही थी, अजीब-सी रासायनिक क्रिया हो रही थी, उस के भीतर ही भीतर। यह क्या हो रहा था।?
तुरंत-तुरंत कोई निष्कर्ष वह नहीं निकाल पा रहा था।
इस सब के बावजूद संजय फिर संयत था। रीना की मादक और उत्सुक उपस्थिति उसे बहका तो रही थी पर अलका की उपस्थिति उसे ऊहापोह में डाले हुए थी। वह एक अजीब से संकोच में सकुचाया, रीना के खिंचाव में भकुआया, किसी बंद दरवाजे जैसा चुप-चुप था पर रीना जैसे अपने भीतर बाहर की सारी बात, ‘‘यू नो, यू नो ’’ कह-कह कर खोल कर रख देना चाहती थी। अजय जैसे संजय को चिढ़ाते हुए रीना से बोला, ‘‘बशीर बद्र का वह शेर सुना है कि, कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से। तो तुम इतना इस के गले में मत पड़ो।’’
‘‘स्साले।’’ संजय अजय को खींचता हुआ उस के कान में धीरे-से बुदबुदाया, ‘‘मेरी लाइन काटता है।’’
‘‘तुम क्या गंदे आदमी का शेर ले कर बैठ गए ?’’ अजय कुछ कहता, उस के पहले ही अलका अपना पुराना राग ले कर बैठ गई।
‘‘क्यों प्रोग्रेसिव शायर हैं बशीर बद्र तो।’’ रीना बोली, ‘‘और उन के शेर भी एक से एक होते हैं।’’
‘‘जैसे बबर शेर।’’ संजय ने टांट कर रीना की बात पूरी की।
‘‘एक्जेक्टली।’’ रीना चहकी।
‘‘पर वो आदमी मुझे पसंद नहीं।’’ अलका बोली, ‘‘जो आदमी किसी औरत के लिए अपने बीवी-बच्चों को यतीम बना कर सड़कों पर भीख मांगने के लिए छोड़ सकता है। वह आदमी, अच्छा आदमी कैसे हो सकता है।’’ वह बिफरी, ‘‘और जो अच्छा आदमी नहीं हो सकता वह अच्छी शायरी कैसे कर सकता है, अच्छा शायर कैसे हो सकता है ? प्रोग्रेसिव तो कतई नहीं।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘ऐसे लोगों का तो सोशली बायकाट होना चाहिए।’’
‘‘क्या अलका तुम भी ?’’ अजय उसे गुरेरता हुआ बोला।
‘‘देखो अलका, तुम चाहे जो कहो, बशीर बद्र का शायरी में जवाब है नहीं।’’ संजय भावुक होता हुआ बोला, ‘‘फिराक और फैज के बाद इतने बोलते हुए शेर, जिंदगी के बदलते हुए तेवर को शायरी में ढालने का काम जिस शऊर, संवेदनशीलता और शिद्दत से बशीर बद्र और हां, दुष्यंत कुमार ने किया है, मुझे कोई और नहीं दिखता।’’ संजय बोलता रहा, ‘‘रही बात निजी जिंदगी की, तो होगी कोई बात। क्या पता कहां और किस पक्ष से गलती हुई हो। और क्या पता, ‘कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, वरना यूं कोई बेवफा नहीं होता।’ जैसा शेर इन्हीं स्थितियों में लिखा गया हो।’’
‘‘जो भी हो, पर मैं ऐसे लोगों को माफ नहीं कर सकती।’’ अलका ने माहौल काफी गंभीर कर दिया था।
‘‘अच्छा, मैं चलूं ?’’ संजय बोला, ‘‘मुझे प्रेस भी जाना है।’’ अलका की ओर घूरते हुए उस ने कहा, ‘‘यह बहस फिर कभी।’’
‘‘फिर कभी !’’ वह ऐंठी, ‘‘आप घर भी आते हो कभी ?’’
‘‘आऊंगा, आऊंगा।’’ संजय चलने लगा।
‘‘मैं छोड़ दूं आप को ?’’ रीना फिर लपक कर बोली।
‘‘नो थैंक्यू ! मैं चला जाऊंगा।’’ संजय हाथ जोड़ते हुए बोला, ‘‘आप क्यों तकलीफ करती हैं।’’
‘‘नहीं, तकलीफ की कोई बात नहीं।’’ रीना बोली, ‘‘बहादुर शाह जफर मार्ग पर ही तो जाएंगे आप ?’’
‘‘जाहिर है।’’
‘‘तो आइए।’’ रीना अपनी फिएट का फाटक खोलती हुई बोली, ‘‘दो मिनट में पहुंचाती हूं।’’
‘‘सुनो !’’ संजय रीना की कार में बैठने लगा तो अजय धीरे से उस के कान में फुसफुसाया, ‘‘फिसल मत जाना राजा जी !’’
‘‘चुप्प स्साले !’’ संजय बुदबुदाया और रीना से झटके से बोला, ‘‘चलिए !’’
‘‘ओह, श्योर।’’ कहते हुए रीना ने कार स्टार्ट कर दी।
रास्ते में भी संजय शर्माया-शर्माया कनखियों से रीना को देख लेता। रीना की मादक देह से बिलकुल सनका देने वाले सेंट की खुशबू आ रही थी। पर संजय का मन नहीं डोला। क्यों कि रीना, अलका की सहेली थी। और अलका साइक्लॉजिकली संजय की पुरुष मानसिकता क्या सहज मानसिकता पर भी सांकल चढ़ाए खड़ी रहती। पर रीना पर कोई सांकल नहीं चढ़ी थी। वह इस छोटे से रास्ते में, ‘‘कहां रहते हैं, कहां के हैं, घर में कौन-कौन है, दिल्ली में कब से हैं ?’’ जैसे ढेरों सवालों में लगी रही। चलते-चलते उस ने अपने घर का पता बताया और कहा, ‘‘कभी फुर्सत से आइएगा। इट्स माइ प्लेजर।’’ और ‘‘बाय-बाय’’ कह कर चली गई।
पर वह नहीं गया। रीना के घर।
कुछ दिन बाद अलका का फोन आया। उस ने घर बड़े आग्रह से बुलाया।
‘‘बात क्या है ?’’ पूछने पर वह बोली, ‘‘एक खुशी सेलीब्रेट करनी है।’’
‘‘क्या हो गया ?’’ पूछा संजय ने।
‘‘आना, ख़ुद ही पता चल जाएगा।’’ कह कर उस ने फोन रख दिया।
संजय उस शाम जल्दी से काम काज निपटा कर जब अलका-अजय के घर पहुंचा तो देखा उपेंद्र सूद, वीना वगैरह एन॰ एस॰ डी॰ यन॰ तो थे ही रीना भी थी। पता चला टी॰ वी॰ से एक डांस कंसायनमेंट अलका को मिली थी, रीना के पापा के सौजन्य से, वही सेलीब्रेट हो रहा था।
संजय बहुत दिनों बाद अलका-अजय के घर आया था। पहुंचते ही उस ने गिलास, बर्फ और बोतल मांगी। अजय पहले ही से शुरू था। बना बनाया पेग ले कर संजय को थमा दिया। संजय ने मना कर दिया, ‘‘जूठी नहीं पीऊंगा।’’
‘‘साले अभी शुरू भी नहीं हुआ। और चढ़ गई ?’’ अजय बोला।
‘‘देखो, मैं अपना पेग ख़ुद बनाऊंगा।’’ संजय बोला, ‘‘एंड नो फरदर डिसकसन।’’
‘‘अंगरेजी बोल रहा है लोहियाइट। दे दो भाई।’’ अजय उपेंद्र से बोला।
संजय अभी पहले पेग पर ही था और रीना पर बराबर ध्यान दिए था। पर शो यही कर रहा था कि उस ने उस की नोटिस नहीं ली है। अभी वह कुछ इधर उधर की हांक रहा था कि उपेंद्र पेशाब करने चला गया और अजय फ्रिज से पानी निकालने लगा। इसी बीच रीना संजय के पास आई। और लगभग सट कर बैठती हुई धीरे से बोली, ‘‘आप आए नहीं ?’’ रुकी और बोली, ‘‘नाराज हैं क्या ?’’
‘‘नहीं तो।’’ वह रीना की देह से सेंट सूंघता हुआ बोला, ‘‘सॉरी आ नहीं पाया।’’ उसने जोड़ा, ‘‘पर आऊंगा।’’
‘‘कब ?’’ कहते हुए रीना उठने लगी।
‘‘जल्दी ही।’’
‘‘मैं इंतजार करूंगी।’’ वह आंखों में अजीब-सा इसरार उडेलती हुई बोली, ‘‘बहुत-सी बातें करनी हैं।’’ कह कर वह वहां से उठ गई थी।
‘‘क्या बातें हो रही थी ?’’ अजय पानी की बोतल रखता हुआ बोला।
‘‘कुछ नहीं बस यूं ही ।’’
‘‘वही रिव्यू, वही फिसलन, वही फसाना ?’’ अजय ऐसे बोल रहा था जैसे किसी नाटक का संवाद बोल रहा हो।
संजय अभी दूसरे पेग पर था कि उस ने देखा रीना जा रही थी। उस ने गौर किया रीना को उस की यह मयकशी अच्छी नहीं लग रही थी। और वह जैसे उकता सी गई थी। उसे जाते देख संजय बोला, ‘‘जा रही हैं ?’’
‘‘हां।’’ वह संक्षिप्त सा बोली।
‘‘आज हमें घर नहीं छोड़ेंगी ?’’
‘‘चलिए, अभी छोड़ देती हूं।’’ वह चहकी ऐसे जैसे उस की ताजगी लौट आई हो।
‘‘अभी नहीं, जरा देर रुकिए तो चलूं।’’
‘‘सॉरी, मुझे जल्दी घर पहुंचना है।’’
‘‘रीना तुम जाओ।’’ अलका किचन से हाथ पोंछती हुई आई, ‘‘इन शराबियों के चक्कर में मत पड़ो। नहीं रात भर तुम्हें घुमाते रहेंगे।’’
‘‘ओ॰ के॰।’’ कहती हुई रीना अलका के घर से ऐसे भागी जैसे वह दंगाइयों से बच कर भाग रही हो।
दूसरे दिन सचमुच संजय भरी दुपहरिया में रीना के घर पहुंच गया, पंडारा रोड पर।
उस ने बड़ी ख़ातिरदारी की। ख़ूब खिलाया पिलाया। अपने घर में भी वह मादक अदाएं बिखेरती रही।
अमूमन नौकर चाकर और एक बूढ़ी दाई के अलावा कोई उस के घर में नहीं होता था। उस के पिता कभी होते, कभी नहीं होते। ज्यादातर वह अपने राजनीतिक दौरों पर रहते। संजय जब-तब जाने लगा। उस ने देखा रीना कभी-कभी जान बूझ कर आते-जाते उस से सट जाती, पर अभिनय ऐसा करती जैसे वह अनायास ही छू गया हो। अनायास ही सही, संजय की देह में करंट सा दौड़ जाता। उस की पूरी देह में जैसे तनाव भर जाता। उस का चेहरा बिगड़ जाता। पर मारे संकोच के वह चुप ही रहता। फिल्म, थिएटर, राजनीति, कला और दुनिया की तमाम बातें वह बतियाता रहता। पर उस के भीतर क्या घट रहा है, कौन सा ज्वालामुखी भीतर ही भीतर दहक रहा है, वह उस के बारे में नहीं बतिया पाता। वह सोचता, क्या पता रीना खुले दिमाग की लड़की है, खुद ही प्रपोज करे! पर ऐसा हो नहीं रहा था। हो यह रहा था कि जब कभी रीना की देह से वह छू जाता उस की देह दहकने लगती। एक अजीब सी उथल-पुथल मच जाती, भीतर ही भीतर। ऐसे ही किसी क्षण में एकांत पा कर उस ने रीना से कह दिया, ‘‘अगर बुरा न मानिए तो एक बात कहूं।’’ संजय ने यह बात इतने संकोच, इतनी शिद्दत और नरमी से कही थी कि रीना शायद उस की बात का अर्थ समझ गई थी या क्या पता नहीं, पर मुंह से वह बोली कुछ नहीं, आंखों ही आंखों में सिर हिला कर होंठ गोल कर मानो पूछा कि, ‘‘क्या बात है ?’’
संजय चुप रहा। तो वह ‘‘ऊं’’ कर के फुसफुसाई। संजय कहना चाहता था कि आप के साथ सोना चाहता हूं। पर उस के मुंह से जो अस्फुट सा कुछ निकला यह था, ‘‘आप को चूमना चाहता हूं।’’
‘‘बस !’’ कह कर उस ने संजय को ख़ुद ही इतने कस कर चूमा कि क्षण के लिए वह स्तब्ध रह गया। फिर तो सहज ही वह सब कुछ घट गया जो संजय चाहता था। और इतना जल्दी घट गया कि वह कुछ समझ ही नहीं पाया। उस ने पाया कि उस से कहीं ज्यादा तो रीना आतुर थी उस के साथ संभोग के लिए। पर नारी सुलभ संकोच उसे विवश किए हुए था। और वह चाहती थी कि पहल संजय की ओर से ही हो। ऐसा उस ने बाद में बताया कि, ‘‘पर तुम वक्त इतना लंबा खींचते जा रहे थे कि उस दिन या किसी और दिन तुम नहीं प्रपोज करते तो मैं ही प्रपोज कर देती।’’ वह बोली, ‘‘तुम्हारी मासूमियत पर कभी तरस आता तो कभी गुस्सा।’’
हां, वह दोनों आप-आप से अब तुम पर आ गए थे।
पर यहां चेतना अभी आप-आप पर ही थी। जाने यह लखनऊ की नफासत थी, उस का सलीका था या वह उस से एक ख़ास दूरी बनाए रखना चाहती थी। चेतना के साथ-साथ लखनऊ में घूमते हुए संजय को एक दिक्कत यह भी महसूस होती कि लखनऊ दिल्ली नहीं था। दिल्ली में जहां-तहां आप को पहचानने वाले लोग नहीं मिलते। पर लखनऊ में कदम-कदम पर पहचानने वाले ‘‘भाई साहब, भाई साहब’’ कहने वाले मिल जाते। दिल्ली में भारी आबादी के बावजूद निर्जन और एकांत जगहों की लंबी फेहरिस्त थी। पर लखनऊ में निर्जन और एकांत जगहें थीं ही नहीं।
बुद्धा पार्क, नीबू पार्क, शहीद स्मारक, रेजीडेंसी, इमामबाड़ा से लगायत, चिड़ियाघर, कुकरैल तक वही भीड़, वही जान पहचान के चेहरे चहुं ओर घूमते मिल जाते। लखनऊ का छोटा शहर होना संजय को साल जाता। आखि़र कहां बैठे वह चेतना को ले कर ? उसे रह-रह दिल्ली, रीना, नीला और साधना की याद आ जाती। ऐसा भी नहीं था कि लखनऊ में इन जगहों पर जोड़े नहीं घूमते थे, बल्कि वह देखता चिड़ियाघर में तो सुबह-सुबह दस बजे ही स्कूली लड़कियां ड्रेस पहने ही अपने साथियों के साथ आ जातीं, दफ्तर जाने वाली लड़कियां दफ्तर बाद में जातीं, पहले वह अपने प्रेमी से मिलतीं। पर हर कोई उन्हें पहचानने वाला नहीं होता। क्यों कि उन की पहचान नहीं थी। पर संजय का सार्वजनिक जीवन जीने की एक पहचान थी। पुलिस से ले कर, मिनिस्टर्स, तक उसे पहचानते थे। चेतना के साथ रास्ते चलते तो कोई बात नहीं थी, पर किसी ऐसी जगह वह उस के साथ बैठता तो झेंप आती। ऐसे ही एक दिन नींबू पार्क में बैठे-बैठे संजय ने सोचा कि वह अब और समय ख़राब करने के बजाय चेतना को सीधे प्रपोज कर दे। उस ने आंखों में कुछ वैसा ही भाव भरा और बोला, ‘‘तुम से एक बात करनी है।’’
‘‘पर मैं अब चलना चाहती हूं।’’
‘‘क्यों ?’’
‘‘क्यों कि अंधेरा हो रहा है।’’
‘‘क्या अंधेरे से डर लगता है ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘तो क्या मुझ से डर लग रहा है ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘तो ?’’
‘‘बस चलिए।’’
‘‘चलो।’’ संजय थोड़ा नाराज होता हुआ उठ खड़ा हुआ।
‘‘नाराज क्यों हो रहे हैं ?’’
‘‘क्यों, नाराज क्यों होऊंगा ?’’
‘‘अच्छा बैठिए।’’ वह फिर से बैठती हुई बोली।
‘‘नहीं, अब चलो।’’ संजय बैठा नहीं।
‘‘कुछ कहना चाहते थे आप ?’’
‘‘नहीं।’’
‘‘कुछ कहना तो चाहते थे आप।’’ वह मायूस होती हुई, मनाती हुई सी बोली।
‘‘अब मूड ख़राब मत करो, चलो।’’ संजय का मूड सचमुच ख़राब हो रहा था।
वह उठ खड़ी हुई और पहली बार संजय से आगे-आगे चलने लगी। बाहर आ कर वह स्कूटर पर नहीं बैठी। संजय ने कहा भी कि, ‘‘बैठो।’’
‘‘नहीं, मैं चली जाऊंगी।’’ उस ने जोड़ा, ‘‘आप जाइए।’’
‘‘ड्रामा मत करो, चलो बैठो।’’ थोड़ा-सा ना-नुकुर के बाद वह बैठ गई। पर रास्ते भर दोनों चुप रहे।
संजय उस शाम दफ्तर नहीं गया।

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