Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय एक आवारा रात विमान में विचरते हुए

एक आवारा रात विमान में विचरते हुए

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
175 views
जाना था जापान , पहुंच गए चीन ! कल की रात मेरे साथ यही हो गया। बैंगलौर से कल रात दस बजे की फ्लाइट थी। लेकिन बैंगलौर के जालिम ट्रैफिक जाम और इंडिगो की मनमानी के चलते छूट गई। सवा नौ बजे रात एयरपोर्ट के लाउंज में दाखिल हो गया। लेकिन लंबी लगी लाइन के चलते रुकना पड़ा और अंतत: सब से निवेदन कर बोर्डिंग काउंटर तक पहुंचते -पहुंचते 9 – 30 हो गया। काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा कि अब आप लेट हो गए। फिर एक दूसरे काउंटर पर भेजा। वहां बैठी लड़की ने कहा कि अब अगली फ्लाइट का टिकट लीजिए। मैं ने प्रतिवाद किया कि अभी समय है। जाने दीजिए। लेकिन उस ने इंकार कर दिया। पूछा कि कोई सीनियर मैनेजर हो तो बताएं। बताया उस ने। मैं गया। युवा मैनेजर ने कहा , आप पांच मिनट पहले भी आए होते तो कुछ करता। अब नामुमकिन है। कह कर उस ने हाथ जोड़ लिया। मेरी दुबारा रिक्वेस्ट पर ए टी सी वगैरह से बात का टोटका किया और फिर मना कर दिया। मैं ने बताया कि सवा नौ बजे से ही तो यहां-वहां टहल रहा हूं। वह बोला , पर आप मेरे पास अब आए हैं। मैं ने पूछा , फिर ? उस ने कहा , आप मेरे पिता जैसे हैं , सो आप की मदद करना चाहता हूं। दो ऑप्शन है। एक अभी 12 – 10 पर वाया पुणे एक फ्लाइट है जो सुबह 6 – 20 पर लखनऊ पहुंचा देगी। दूसरी सुबह दस बजे के आस-पास है। दोपहर में डाइरेक्ट लखनऊ पहुंचा देगी। दोनों ही विकल्प में एक हज़ार रुपए का अतिरिक्त भुगतान करना था। मैं ने रात एयरपोर्ट पर बैठ कर गुज़ारने के बजाय जहाज में उड़ते हुए बिताने का फैसला लिया। कहां रात 12 – 30 तक लखनऊ आ जाना था , घर का खाना नसीब होना था , अब एयरपोर्ट पर दो की जगह बीस खर्च कर बासी-तिबासी भोजन नसीब में आया। मन खिन्न था सो कुछ ज़्यादा खाने का मन भी नहीं था। वैसे भी एयरपोर्ट पर सारे दुकानदार डाकू की भूमिका में होते हैं। खाने-पीने की तो खैर बात ही क्या। इन के दाम सुन कर फाइव स्टार होटल शर्मा जाएं। खैर , मजबूरी थी खाया-पीया।
थोड़ी देर में हवाई पट्टी पर पांव रखते ही खिन्नता भाग गई। सारा क्षोभ भस्म हो गया। यह मौसम का जादू था। सावन की झूमती हवा का कमाल था। वैसे भी बैंगलौर का ट्रैफिक जाम चाहे जितना बेहूदा हो , जितना जालिम हो लेकिन मौसम सुहाना और जादुई है। मस्ती भरी हवा , तिस पर सावन के गहराते बादर मौज से मिलवा ही देते हैं। अगस्त मास में ऐसा मस्त और दिलकश मौसम बैंगलौर की फिजा में ही चार दिन महसूस किया। लखनऊ , गोरखपुर , दिल्ली में तो सावन की फुहारों के बावजूद उमस का महीना है , अगस्त का महीना। लेकिन बैंगलोर में उमस नहीं , उमंग थी मौसम की। खनक थी सावन की। चहक और बहक में लिपटी हुई हवा थी। 17 अगस्त को दिन साढ़े दस बजे जब एयरपोर्ट पर उतरा था , तब ही से यह चहकी-बहकी हवा साथ हो चली थी। इस सनकी हवा का संग-साथ मन में सुरूर भरने के लिए बहुत था। लगातार निर्झर झरती और बहती रही यह हवा। अब यही मदमस्त हवा फ्लाइट छूटने के कारण मन के भीतर बसी तमाम खिन्नता और क्षोभ को भी धोती हुई अपने साथ बहाए लिए जा रही थी। सीट पर सिट डाऊन होते ही ग़ालिब याद आ गए। जगजीत सिंह की गायकी याद आ गई। आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक की तासीर ने मन को मगन कर दिया। तिस पर विंडो सीट। जगजीत की आवाज़ में ग़ालिब को सुनते-सुनते ही पुणे पहुंच गया। रात 1 – 35 पर वहां लैंड करते ही सावन की फुहार मिली। फुहार में भीजते हुए लाऊंज में आया और फिर लाउंज से भी बाहर आ गया। फुहार बाहर भी मिली। सड़क किनारे खुले एक रेस्टोरेंट में किसी की मेज पर थाल में रखा लाल , कुरकुरा डोसा दिखा। मन ललच गया। एक डोसा और काफी ले कर मैं भी बैठ गया। रात के दो बज रहे थे। कारें आ-जा रही थीं। एयरपोर्ट से बाहर के रेस्टोरेंटों पर चहल-पहल जारी थी। गोया कोई रेलवे स्टेशन हो। उस का कोई प्लेटफार्म हो। ऐसा माहौल किसी और एयरपोर्ट पर या उस के बाहर मैं ने कभी नहीं देखा है , जैसा पुणे के एयरपोर्ट पर देख रहा था। इसी रेस्टोरेंट में एक एयरलाइंस की कई सारी लड़कियां अपनी ड्रेस में बैठी अपने दो सीनियर से काम करने के टिप्स ले रही थीं। सीनियर लोग भी पूरे बासिज्म और आसक्ति के साथ लड़कियों के साथ मुखातिब थे। तभी बीस-बाईस बरस की एक लड़की खट-खट करती , मचलती उस खुले रेस्टोरेंट में बिलकुल खुली हुई आई। शार्ट हाफ पैंट में। घुटने से भी ऊपर आधी खुली जांघ। कोट-पैंट और टाई में उपस्थित आधा दर्जन लड़कियों को भी उस एक अकेली लड़की का यह लुक चौंका गया है । मेरी मेज के सामने ही एक कुर्सी पर आ कर वह धप्प से बैठ गई। चौंका मैं भी। फिर मुझे लगा कि यह पुणे है , क्या पता कोई फ़िल्म शूट हो रही हो। लेकिन बड़े ध्यान से इधर-उधर चेक किया। कहीं , कोई कैमरा , लाइट , डायरेक्टर नहीं था। अपने इस खुले लुक पर भटक रही , सब की निगाहों से बेख़बर वह लड़की काफी पीने लगी , सिगरेट का धुआं उड़ाती। उस के सिगरेट पीने की अदा देख कर मुझे भी सिगरेट पीने का मन हो आया। तलब लग गई। पर अफ़सोस कि सिगरेट आदि मैं कभी ख़रीद कर नहीं पीता। पीता नहीं हूं , पिलाई गई है वाली स्थिति होती है मेरे साथ सर्वदा। बहरहाल कुरकुरा डोसा और गरम काफी , बरसते सावन की इस फुहार में अब आलू के स्वाद में तब्दील हो रहा था। टाई , पैंट , कोट में उपस्थित लड़कियां भी इस एक लड़की को झुक-झुक कर , मुड़-मुड़ कर ऐसे देख रही थीं , गोया झूला झूल रही हों। इन लड़कियों के दोनों बॉस भी अब टिप्स देने के बजाय टिप्स ले रहे थे। आंखों-आंखों में। कम वस्त्र पहने एक लड़की इतना व्यस्त कर देती है एक साथ कई सारे लोगों को। अजब था यह देखना भी। लवकुश दीक्षित का एक गीत याद आ गया है :
रुपदंभा बड़ी कृपण हो तुम
अल्पव्यसना कसे वसन हो तुम।
बहरहाल बेसिन में हाथ धोते हुए मैं ने शीशे में भी उसे भरपूर लुक किया। ख़ूब ध्यान से। लेकिन उसे किसी की परवाह नहीं थी। रेस्टोरेंट से चलते हुए मैं सोच रहा था कि इस का मतलब है , पुणे में क़ानून व्यवस्था बहुत बढ़िया है। कि एक अकेली जवान लड़की रात दो बजे भी ऐसे ड्रेस में निश्चिंत रह सकती है। यह अच्छी बात है। वापस लाउंज में आ कर बेमतलब इस दुकान , उस दुकान घूमने लगा। कभी किसी चीज़ का दाम देखते-पूछते , कभी किसी चीज़ का। खरीदना मुझे कुछ नहीं था , यह तो मैं जानता था। लेकिन ऊंघते , अलसाते यह दुकानदार भी क्या नहीं जानते थे कि मुझे कुछ नहीं ख़रीदना। कितना तो धैर्य होता है इन में। दाम भले दस गुना , बीस गुना हो हर चीज़ का लेकिन इन दुकानदारों का धैर्य तो सौ गुना होता है। फिर मैं ने सोचा कि आख़िर वह कौन लोग हैं जो सारा शहर , सारा बाज़ार छोड़ कर एयरपोर्ट पर इन डकैतों से लुटने खातिर खरीददारी करते हैं। लोग खरीदते तो हैं , तभी यह दुकानें हैं। हालां कि पुणे का एयरपोर्ट मुंबई एयरपोर्ट के आगे चूजा है। दिल्ली , लखनऊ , बैंगलौर , हैदराबाद आदि के आगे भी बौना है। बहुत ही छोटा। कुछ-कुछ गौहाटी जैसा। फिर भी रौनक है यहां। उदासी नहीं तारी है , गौहाटी या कोझिकोड [ कालीकट ] एयरपोर्ट की तरह। दुकानों के चक्कर मार कर एक कुर्सी पर बैठ गया हूं। बुद्धिनाथ मिश्र की कविताएं सुनते हुए। गीतों में माधुर्य , कंठ में मिठास मिल कर जैसे चंदन की खुशबू तिरती है बुद्धिनाथ जी के गीतों में। खेत की सरसो भेजती रोज पीली चिट्ठियां अनगिन जैसे बिंब और मनुहार , उस की पुलक और मादकता । एक बार और जाल फ़ेंक रे मछेरे जैसे आशावादी गीत। मन में जैसे पुकार भर देते हैं। उल्लास और मनुहार में नहला देते हैं। नहला ही रही है सावन की बरखा पुणे की हवाई पट्टी को। बिलकुल झूम कर। इधर बुद्धिनाथ जी गा रहे हैं ;
प्यास हरे, कोई घन बरसे
तुम बरसो या सावन बरसे
सावन ही नहीं बरस रहा , बादर ही नहीं बरस रहे , बुद्धिनाथ जी के गीत भी बरस रहे हैं , मेरे मन में। बहुत भीतर तक। मैं भी बरस रहा हूं किसी की याद में डूब कर। ब्रह्म वेला में इस बरखा की बहार में बुद्धिनाथ जी का गीत जैसे पावस को पावन करते हुए मुझ अकिंचन को अपनी मादकता में महका और बहका रहा है। चंदन के लेप की तरह। यह बरखा भी जैसे कितनों की प्यास हर लेना चाहती है। कितनों में प्यास बो देना चाहती है। बरखा ऐसी ही होती है। बुद्धिनाथ जी को संदेश भेज कर बता दिया है कि इस ब्रह्म वेला में आप को सुन रहा हूं। विमान उड़ने वाला है। आकाश भर आप का साथ। खैर , भीजने से बचने की आड़ में एक जोड़ा आपस में लिपटा जा रहा है। गोया दोनों , एक-दूसरे का छाता हों। जवानी ऐसी ही होती है। कभी छाता बन जाती है , कभी छाता उड़ा देती है। हमारे पास फ़िलहाल कोई छाता नहीं है। सो भीजते-भाजते हम भी सिट डाऊन हो गए हैं। विंडो से बरखा को निहारते हुए। यह सोचते हुए कि पुणे कभी फिर बुलाना ऐसे ही अचानक , औचक। जैसे बरखा को बुला लिया है। रमानाथ अवस्थी ने लिखा ही है :
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
टेक ऑफ़ हो गया है। जहाज जब किसी शहर से उड़ता है तो उड़ते ही उस शहर का वैभव , उस का सौंदर्य , उस की सामर्थ्य बता देता है। उतरते समय भी। ख़ास कर रात में। शहर की रौशनी , शहर का खाया-पीया-जीया बता देती है। समंदर , पर्वत सब। दिन हो तो उस की हरियाली , उस की गगनचुंबी इमारतें। अब अलग बात है कि आज तक कोई विमान तो गगन चूम नहीं पाया , बादल छू कर ही लौट आता है। तो इन मल्टी स्टोरी बिल्डिंग को गगनचुंबी आख़िर कहते क्यों हैं। बुद्धिनाथ जी का काव्यपाठ जारी है बीच आकाश में। कोंपलों सी नर्म बांहों में गुलमोहर के दिन के लिए भटकते हुए। जैसे ग़ालिब को जगजीत सिंह गा रहे थे बैंगलौर से पुणे के बीच। तब बैंगलौर की मदमाती हवा का संग-साथ था , अब पुणे की बरखा की बहक और महक है। वह मोंगरा था , यह चंदन है। सुगंध दोनों तरफ है। बस सुमन नहीं है। आंख मूंदे सुनते-सुनते नींद का एक मीठा झोंका आ गया है । वैसे भी मैं सुतक्कड़ बहुत बड़ा हूं। लेकिन कई बार रात में जागना अच्छा लगता है। जैसे आज की रात। बहुत सारी रातें लिखते हुए जगाती-जागती हैं तो कुछ रातें कुछ सुनते-देखते हुए। पर आज की रात तो हवा में , हवा से बतियाते हुए गुज़र रही है। कई बार रात में भी हवाई यात्राएं हुई हैं पर ऐसी आवारा रात हवा में नहीं मिली। ऐसी आवारगी नहीं मिली। आकाश में नहीं मिली। मदमाती हवा और बऊराई बरखा का ऐसा संग साथ हो और एक साथ , एक रात में तीन-तीन प्रदेश और तीन-तीन शहर की सरहद और उस की धरती को प्रणाम करने का यह दुर्लभ संयोग , यह आकाशीय आवारगी पहली बार नसीब हुई है। सड़कों पर पैदल , स्कूटर और कार से तो बहुतेरी बार आवारगी की है सूनी रातों में। अकारथ। पर किसी पूरी रात में ऐसी आकाशीय आवारगी तो बस अब की ही मिली । ग़ालिब , बुद्धिनाथ मिश्र , माहेश्वर तिवारी और रमानाथ अवस्थी का काव्य सुनते हुए ऐसी सुहानी यात्रा की सनक सर्वदा मिलती रहे। फ्लाइट ऐसे ही न छूटती रहे पर ऐसी यात्रा , ऐसी आवारगी तो मिलती रहे। यह लीजिए जैसे नींद का झोंका अचानक टूट गया था , उसी झोंके के साथ नींद अचानक खुल गई है। विंडो से देख पा रहा हूं कि बादलों के झुंड पर सूर्य की लाली पूरे सौंदर्य के साथ उपस्थित हो रही है। गोया कोई लाल नदी हो। कोई पर्वत हो। कोई लाल पठार हो। उगते हुए सूर्य को हाथ जोड़ कर , सिर झुका कर प्रणाम करता हूं। पंडित रमानाथ अवस्थी काव्यपाठ कर रहे हैं :
आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।
वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये
प्यास पथरा गई तरल बनिये।
जिसको पीने से कृष्ण मिलता हो,
आप मीरा का वह गरल बनिये।
जिसको जो होना है वही होगा,
जो भी होगा वही सही होगा।
किस लिये होते हो उदास यहाँ,
जो नहीं होना है नहीं होगा।।
आपने चाहा हम चले आये,
आप कह देंगे हम लौट जायेंगे।
एक दिन होगा हम नहीं होंगे,
आप चाहेंगे हम न आयेंगे॥
लखनऊ आ गया है। लखनऊ की धरती , लखनऊ की इस सुबह को प्रणाम !

Related Articles

Leave a Comment