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तथागत बुद्ध की भारत को देन

लेखक - देवेन्द्र सिकरवार

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1) ध्यान की नवीन पद्धति:- यूँ तो ध्यान वैदिक काल से ही प्रचलित था लेकिन बुद्ध ने ‘द्वार सुपर्णा सयुजा सखाया…” को ध्यान से जोड़कर सहस्त्रों व्यक्तियों को मुक्ति का मार्ग दिखाया।
2) शून्यवाद:- बुद्ध के ध्यान के लक्ष्य को नागार्जुन ने शून्यवाद के रूप में प्रस्तुत किया जो भगवद्गीता के उपरांत क्वांटम मैकेनिक्स की सबसे बड़ी आधारशिला बनी।
3) व्यवहारिक अहिंसा:- जैनों के विपरीत मांसाहार के विरुद्ध अहिंसा को व्यवहारिक जामा पहनाया जिससे बौद्ध धर्म का इतना विस्तार हुआ।
4) धार्मिक संगठन:- यूँ तो बुद्ध से पूर्व पार्श्वनाथ के जैन संघ के रूप में संगठन शुरू हो गया था लेकिन बुद्ध ने गणतांत्रिक पद्धति के आधार पर उसे ठोस आधार प्रदान किया।
5) मठ वाद:- बुद्ध ने चेलों की बढ़ती संख्या के कारण उनके भोजन वस्त्र व चातुर्मास हेतु संघारामों व विहारों की शुरूआत की जिसे बाद में शंकराचार्य ने भी अपनाया। इसीलिये जो बुराइयां बौद्ध मठों में आईं वही शंकराचार्यों के मठों में आ गईं।
6)अंतर्राष्ट्रीयता वाद:- बुद्ध ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को वास्तविक क्रियात्मक रूप प्रदान किया। बौद्ध भिक्षु सुदूर यूरोप तक धर्म प्रचार हेतु गये। ईसाइयों ने अपने शांतिपूर्ण वाले धर्मप्रचार की पद्धति बौद्धों से ली।
**बौद्ध धर्म की भारत को देन
1)मठाधीश:- लोकतंत्र के कारण मठों में गुटबाजी बढ़ी और मठाधीशी राजाओं पर प्रभाव जमाने का साधन बन गई।
2)मठों में व्यभिचार:- राज्याश्रय व दान के कारण अपार संपत्ति मठों में एकत्रित होने लगी जिंसने बौद्ध भिक्षुओं में विलासी जीवन की लत पड़ी। स्त्री भिक्षुणियाँ व्यभिचार का शिकार होने लगीं।
3)राजाओं की चाटुकारिता:- धन व राज्याश्रय के लिए राजाओं का उचितानुचित समर्थन बल्कि चापलूसी होने लगी जबकि वैदिक पद्धति में एक ऋषि या कोई ब्राह्मण भरी राजसभा में राजा को फटकार लगा सकता था।
4)समलैंगिकता:- इस बीमारी से भारत सदैव मुक्त रहा था लेकिन अरब और तुर्क विहारों में स्त्री भिक्षुणियों के अभाव के कारण समलैंगिकता का प्रारंभ जोरों से हुआ ।
5)सांप्रदायिकता:- बौद्धों से पूर्व भी भारत में अनेकों सम्प्रदाय थे और जैन तो ईश्वर व वेद अंतिम प्रमाण को भी नहीं मानते थे लेकिन कोई विशेष तनाव उत्पन्न नहीं हुआ। जबकि बौद्धों ने अपने संप्रदाय को ‘सद्धर्म’ कहना शुरू किया अर्थात अन्य धर्मों को अप्रत्यक्ष रूप से ‘अपधर्म’ कहना शुरू किया, ठीक अजान की तरह जिसमें ‘अल्लाह’, के सिवाय अन्य धर्मों के भगवानों को झूठा कहा जाता है। इस तरह बौद्धों ने प्रथम बार समाज में सांप्रदायिक तनावों की शुरूआत की।
6) समाज का असंतुलन:- बौद्धों ने गृहस्थ से पूर्व सीधे संन्यास की परंपरा शुरू कर समाज के संतुलन के साथ बैठ कर भकोसने वालों की फौज तैयार कर आर्थिक असंतुलन व मुफ्तखोरी को प्रारंभ किया जिसका अंधपालन देश में एक करोड़ से ऊपर के भण्डारेबाज स्वादू भी कर रहे हैं।
7)देशद्रोह:- राज्याश्रय प्राप्त करने व अंतरराष्ट्रीय बंधुत्व के सनक व ब्राह्मणों से ईर्ष्या में बौद्ध इतने आगे चले गए कि वे मिनांडर व मुहम्मद बिन कासिम के पथप्रदर्शक तक बन गये। यहाँ स्पष्ट कर दूं कि अधिकाँश महास्थविर ब्राह्मण ही थे।
पूरे लेख का सार यह है कि बुद्ध व बौध्द धर्म में भी उतना ही अंतर है जितना जीसस क्राइस्ट व ईसाई धर्म में है।

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