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मार्क्स के पैदा होने के पहले

Vivek Umrao

by Umrao Vivek Samajik Yayavar
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मार्क्स के पैदा होने के पहले, मार्क्स के पैदा होने के समय, मार्क्स के पैदा होने के बाद। मार्क्स जैसे सैकड़ों योरपीय समाज में होते रहे हैं। खुद मार्क्स योरप का था, जीवन का लंबा समय इंग्लैँड में गुजारा। जो मार्क्स ने लिखा है वह उससे पहले का लिखा हुआ का माडीफाइड वर्जन रहा है। विडंबना यह है कि तीसरी दुनिया के अधिकतर लोग जो खुद को मार्क्स का भगत कहते नहीं अघाते हैं, उन्होंने मार्क्स की कैपिटल को ढंग से पढ़ना समझना तो दूर, छूकर देखा भी नहीं होगा, लेकिन ज्ञान बांटते रहेंगे। जब मार्क्स को नहीं पढ़ा (जबकि मार्क्स इन भगतों के ईश्वर हैं) तो मार्क्स के पहले लोग क्या लिख गए, इसको पढ़े जाने का सवाल ही नहीं, तब कैसे मालूम होगा कि मार्क्स मौलिक चिंतक थे या नहीं थे। लेकिन चूंकि सोवियत संघ में सत्ता प्राप्ति के लिए एक प्रोपागंडा चाहिए था, तो उसी प्रोपागंडा को सच मान लिया गया।
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मजेदार बात यह है कि सोवियत-संघ व चीन जो खुद को साम्यवादी कहते हैं, मजदूरों व किसानों का शोषण सबसे अधिक करने वाले समाजों में से हैं। लेकिन हर बात में सर्वाहारा, बुजुर्वा जैसे शब्द कुतर्क प्रोपागंडा ठेल देगे। भगत लोग पूजा करते रहेंगे, जो पूजा नहीं करते हैं, उनको गाली देते रहते हैं। ठेलना ही विद्वता है।
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चीन की तो पूरी इकोनोमी ही कामगारों के शोषण पर आधारित है, फिर भी मार्क्स व साम्यवादी भगतों को चीन महान देश दीखता है, साम्यवाद का माडल दीखता है। इन सैडिस्टिक मानसिकता के भगतों को क्या कहा जाए। भरे पेटों के खाए अघाए लोग हैं, अपनी कई पीढ़ियों तक के बच्चों के लिए व्यवस्था कर रखी है। खुद के जीवन में एक भी गंभीर काम ऐसा नहीं किया होगा जिससे साम्यवाद का पहला अक्षर भी होता हो, लेकिन योरप अमेरिका को गाली देने व चीन रूस को महान व अद्वितीय बताने में अपनी सारी ऊर्जा झोंके रहेंगे।
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कारण यह है कि खुद को बड़का चिंतक के रूप में प्रायोजित करके, यह वाली वाहवाही भी तो लूटना है। पेट तो भरा है ही, खाए अघाए हो हैं ही। चिंतक, विचारक, क्रांतिकारी होने की लिप्सा की भी जमकर पूर्ति हो जाए।
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दुनिया में कामगारों का शोषण नहीं होना चाहिए, कामगारों के काम करने के घंटे कम होने चाहिए, काम करने की स्थितियां व वातावरण बेहतर होना चाहिए, कामगारों के साथ बराबरी का व्यवहार होना चाहिए। इत्यादि-इत्यादि बहुत कुछ योरप के समाजों ने दिया, माडल खड़े किए, विचारधारा आगे बढ़ाई। इस तरह के प्रयोग मार्क्स के पैदा होने के भी पहले शुरू हो चुके थे।
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पढ़ने की औकात तो हो, हजारों पेजों के दस्तावेजों व किताबों को एक-एक दिन में, एक-एक हफ्ते में पढ़ने की औकात तो हो। दिमाग खुला हो, सभी धाराओं को पढ़ने समझने की शुद्ध भावना हो। इत्यादि बहुत कुछ। तब तो समझ आएगा। नहीं तो करोड़ों लोगों को पुराणों में ही ब्रह्मांण का संपूर्ण ज्ञान दीखता है, पुराणों के बाहर ब्रह्मांण का अस्तित्व ही नहीं होता है, एक से बढ़कर एक तर्क व सबूत पेश किए रहेंगे। इसी तरह मार्क्स, लेनिन, स्तालिन, माओ टाइप्स पुराण हैं।
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ऐसे भी देश हैं जहां के लोग एलोपैथ को रातदिन गालियां देते हृैं, एलोपैथ को गालियां इसलिए देते हैं क्योंकि योरप को गालियां देना होता है। लेकिन होमियोपैथ को महान बताते हैं। इन महापुरुषों को इतना भी नहीं मालूम कि एलोपैथ हो या होमियोपैथ, दोनों ही योरप की ही हैं।
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योरप ने क्या किया। योरप ने एलोपैथ दिया, एलोपैथ में खामियां दिखी तो होमियोपैथ आ गया, होमियोपैथ में बहुत अधिक लिमिटेशन थीं। एलोपैथ का अच्छा लिया, होमियोपैथ का अच्छा लिया और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की ओर बढ़ गया। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तो कल्पना से परे आगे बढ़ गया है। लेकिन बहुत ऐसे देश हैं जहां का तंत्र व लोग अभी भी एलोपैथ, होमियोपैथ की धींगामुस्ती में व्यस्त हैं, शोध पत्र लिखे जा रहे हैं, पीएचडी बट रहीं हैं, विभाग खुल रहे हैं। जबकि इन सबका कोई मतलब नहीं, सांप निकल गया लेकिन सांप के निकलने के बाद बने प्रिंट पर लाठी पीटते रहने जैसी बात है।
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ऐसे ही योरप में साम्यवाद समाजवाद इत्यादि विचारधाराओं का उद्भव व प्रयोग इत्यादि मार्क्स इत्यादि के पैदा होने के पहले ही शुरू हो चुके थे।
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योरप के अनेक देशों में जो व्यवस्थाएं हैं वे लोकतंत्र, साम्यवाद, समाजवाद इत्यादि का सम्मिलित रूप हैं। साम्यवाद समाजवाद का व्यवहारिक स्वरूप। समय के साथ लगातार और अधिक संवर्धित होते जा रहे हैं। सबसे प्रमुख कारण यह है कि यहां हर एक आदमी का महत्व है, हर एक आदमी की बात का वजन है, हर आदमी को अधिकार हैं। ऐसा नहीं है कि किसी वर्ग को या नौकरशाही को या सत्ताधारकों को या किसी पार्टी के पदाधिकारियों को दुनिया का सबकुछ पता है और दूसरों को इन लोगों के अनुसार चलना चाहिए।
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नास्तिकता-नास्तिकता का फर्जी ढोल बजाने से कुछ नहीं होता, साम्यवादी नास्तिकता तो घोर आस्तिकता है क्योंकि यह थोपी हुई नास्तिकता होती है। साम्यवादी पार्टी के प्रति आस्तिकता को नास्तिकता कहा जाता है।
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यह सब बातें समझ में तब आती हैं जब हमारी सोच व मानसिकता जादू, दैवीयता, ईश्वरीयता इत्यादि से बाहर आती है। जब हम यह महसूस करते हैं कि रातों-रात किसी मार्क्स को अचानक शून्य से वैचारिक प्रकाश नहीं प्राप्त हो सकता है। तब हम पीछे जाकर खोजना शुरू करते हैं, गहरा व व्यापक अध्ययन करते हैं।
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तब हमको मालूम पड़ता है कि मार्क्स, सीमोन बोअर, ज्या पाल सात्र, फ्रॉयड इत्यादि लोग तो वेस्टेज थे। तब हमको यह अहसास होता है कि जिस समाज के वेस्टेज लोगों को हम ईश्वर माने बैठे हैं, उस समाज में किस तरह का चिंतन हुआ होगा, तब हम और गहरे उतरना शुरू करते हैं। लेकिन इस सबके लिए हमें अपने अंदर अध्ययन करने व मौलिकता व ऑब्जेक्टिविटी व इच्छाशक्ति चाहिए होती है।
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हमें कम से कम इतना स्मार्ट तो होना ही चाहिए कि हम अपनी अच्छाइयों को संजोएं और दूसरों की अच्छाइयों को आत्मसात करें। संवर्धित होते जाना ही जीवन है। हमें संवर्धित होते रहना चाहिए। हमें सड़ना नहीं चाहिए।

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