Home विषयसाहित्य लेख मैत्रेयी की मुश्किलें

मैत्रेयी की मुश्किलें

88 views
हालां कि नागेंद्र कभी भागा नहीं मैत्रेयी दत्ता से। उस के पजेसिवनेस से कई बार आजिज जरूर आया, हद से ज्यादा आजिज आया। सोचा कई दफा कि अब इस औरत से पिंड छुड़ा ले, दो-चार बार कोशिश भी की लेकिन वह अचानक पानी की तरह आती, फूलों-सी महकती, चिड़ियों-सा चहचहाती, किसी समर्पिता की तरह ऐसे समर्पित हो जाती गोया कुछ हुआ ही न हो। नागेंद्र लाख रूठे, लाख ऐंठे वह अपने मनुहार, प्यार और इसरार में सान कर ऐसे गूंथने लगती गोया पानी डाल कर आटा गूंथ रही हो। और फिर नागेंद्र के ‘रास्ते’ पर आते ही उसे ऐसे रूंधने लगती जैसे कुम्हार अपने चाक पर माटी रूंध रहा हो। मैत्रेयी दत्ता फिर पजेसिव हो जाती।
नागेंद्र उस से कहता भी कि, ‘मुझ पर इतना दावा तो मेरी बीवी भी नहीं करती।’ वह एक क्षण के लिये चुप लगा जाती। ऐसे जैसे उस के आस-पास कोई हो। लगभग निष्क्रिय। पर वह एक झटके से उबरती और तुरंत सक्रिय हो जाती। अचानक वह अपने पुराने आशिकों के बारे में बतियाने लगती। ऐसे जैसे एकालाप कर रही हो। पर नागेंद्र भी पास है उस के इस एहसास के लिये वह उस के बालों में उंगलियां फिराती रहती। बतियाते-बतियाते अचानक मनुहार करते हुये पूछने लगती, ‘आप तो मुझे नहीं छोड़ देंगे, जिदंगी भर मेरा साथ निभाएंगे न ?’
‘मेरी ओर से तो कोई दिक्कत नहीं है। तुम अपनी ओर से सोच लो।’ नागेंद्र जोड़ता, ‘देखना, तुम्हें मैं नहीं, तुम मुझे छोड़ोगी !’
‘मैं क्यों छोड़ूंगी ?’ मैत्रेयी अकुलाती हुई पूछती।
‘क्यों कि चुपके-चुपके वाले अवैध संबंधों में औरत ही मर्द से कतराती है, मर्द नहीं।’
‘तो संबंधों को वैध बना दीजिए न !’
‘कैसे ?’
‘शादी कर लीजिए मुझे से !’
‘पर मेरी शादी तो हो चुकी है। दो बच्चे हैं मेरे।’
‘तो क्या हुआ ?’ मैत्रेयी नागेंद्र को लगभग फुसलाती हुई बोलती, ‘‘मैं दीदी के साथ निभा लूंगी।’
‘वो तो ठीक है। पर क्या ‘दीदी’ भी तुम्हें निभाने को तैयार होगी ?’
‘मैं उन्हें भी मना लूंगी।’
‘यह ‘मनाना’ कहानियों, फिल्मों में हो जाता है, असल जिंदगी में नहीं।’ नागेंद्र जोड़ता, ‘कम से कम मेरी बीवी किसी कीमत पर मानने से रही।’
‘तो मैं कहीं अलग रह लूंगी। आप आते-जाते रहियेगा। लेकिन आप शादी कर लीजिये। मैं आप से खर्चा भी नहीं मांगूंगी।’
‘क्यों रखैल बन कर जिदंगी जीना चाहती हो। तुम दोस्त बन कर जिदंगी में रहो यही ठीक है।’
‘रखैल बनने को कहां कह रही हूं।’ वह तरेरती हुई बोली।
‘चोरी से की गयी ऐसी शादियों में औरत की हैसियत रखैल से भी गयी बीती होती है।’ नागेंद्र बोला, ‘देखो दोस्ती तक तो ठीक है, आगे और मत उलझो-उलझाओ। कोई कायदे का कुंवारा लड़का देख सुन कर शादी करो यही ठीक रहेगा तुम्हारे लिये भी, हमारे लिये भी और समाज के लिये भी।’
‘जो इतनी ही हानिकारक हो जायेगी समाज के लिये हमारी आप की शादी तो चलिये मैं शादी ही नहीं करूंगी।’
‘अब यह तुम्हारा अपना फैसला है। मैं इस में क्या कर सकता हूं भला? पर यह जान लो अकेली औरत को हमारा समाज जीने नहीं देता है।’
‘अकेली कहां हूं ?’ वह पूरे अधिकार के साथ बोली, ‘आप तो मेरे साथ हैं ही।’
नागेंद्र चुप लगा गया।
एक दिन अचानक मैत्रेयी बिस्तर में नागेंद्र से कहने लगी, ‘‘मैं पांवों में बिछिया पहनती हूं, आप ने कभी पूछा नहीं इस के बारे में ?’’
‘मैं ने कभी ध्यान ही नहीं दिया तुम्हारे पांव के बिछिया पर।’ नागेंद्र उस की हिप सहलाते हुये लापरवाही से बोला और चुप रह गया। पर मैत्रेयी चुप नहीं रही। बोली, ‘पूछेंगे नहीं मैं बिछिया क्यों पहनती हूं ?’
‘इस में पूछना क्या है ?’ कह कर वह फिर चुप रह गया।
वह भी चुप रही। थोड़ी देर बाद कुनमुनाई। कहने लगी, ‘अच्छा मेरा ब्रेस्ट बहुत टाइट नहीं है इस पर आप का ध्यान नहीं गया ?’
‘क्यों ?’
‘कभी पूछा नहीं आप ने ?’
‘जानता हूं हैबीचुअल हो। इस में पूछने की क्या बात है ?’
‘निप्पल को भी ले कर आप ने कभी कुछ नहीं पूछा ?’
‘तुम कहना क्या चाहती हो ?’ नागेंद्र उकता कर बोला।
‘कुछ नहीं बस यूं ही !’
बात ख़त्म हो गयी।
फिर वह दोनों बार-बार मिलते रहे। बेबात लड़ते-झगड़ते रहे। मैत्रेयी पूरे अधिकार सहित नागेंद्र को हांकती रही। गोया वह उस का दोस्त नहीं उस के रथ में जुता हुआ घोड़ा हो। कभी-कभार वह नागेंद्र के घर पर आती। और ऐसे अधिकार से बैठती गोया उस का अपना ही घर हो। कई बार तो वह उस से लगभग सट कर बैठ जाती, ऐन उस की बीवी के सामने। बीवी कुढ़ कर रह जाती। पर उस की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। जब तब वह नागेंद्र की बीवी-बच्चों के लिये गिफ्ट वगैरह भी ले आती। कई बार कपड़े-लत्ते भी। हद तो तब हो गयी जब वह नागेंद्र के लिये भी कुछ कपड़े ले आयी। उस की बीवी खुल कर कुढ़ी। एक दिन नागेंद्र से कहने लगी, ‘यह क्यों हमारे घर आती है, कपड़े लत्ते लाती है और आप से सट कर बैठ जाती है। और मेरे ही सामने ! क्यों ? क्या लगती है वह आप की ?’
नागेंद्र किसी तरह पत्नी को समझा-बुझा कर शांत करता। पर वह शांत नहीं होती।
शांत होने वाली बात ही नहीं थी यह।
और तब तो और हद हो गयी जब एक दिन मैत्रेयी नागेंद्र की अनुपस्थिति में उस के घर गयी गिफ्ट में सोने की चेन ले कर। उस की पत्नी के लिये। और ‘दीदी-दीदी’ कहती हुई उसे पहना आयी।
नागेंद्र की लंबी क्लास हुई।
अंततः नागेंद्र को मैत्रेयी से कहना पड़ा कि वह उस के घर न आया करे। कुछ दिनों तक वह सचमुच नहीं आयी और बीच-बीच में जब मिलती तो कहती रहती, ‘मैं शादी नहीं करूंगी।’ इस बीच वह नागेंद्र को अपने घर ले जाने लगी। मां भाई, भाभी सब से मिलवाती। बेझिझक। और नागेंद्र से अपेक्षा करती कि जब वह उस के घर आये तो जैसे दामाद लोग ससुराल आते हैं, वैसे आया करे। उस के बार-बार टोकने पर एक दिन नागेंद्र बोला, ‘पर दामाद जैसा बन के तो मैं अपनी ससुराल में भी नहीं जाता। और फिर तुम्हारा घर मेरी ससुराल भी नहीं है!’
‘सुसराल आप की है मेरा घर।’ वह अपने भाइयों को इंगित करती हुई कहती, ‘और यह सब आप के साले हैं।’
‘शादी कब हुई हमारी ?’
‘आप मत करिये शादी। पर मैं ने आप को दिल से अपना हसबैंड मान लिया है।’ कह कर उस ने झुक पर नागेंद्र के दोनों पैर छू लिये।
नागेंद्र हतप्रभ रह गया।
अब वह जब भी मिलती नागेंद्र के पैर जरूर छूती। मिलते समय भी, बिछड़ते समय भी।
नागेंद्र बार-बार यह सब करने से उसे मना करता। कहता कि, ‘प्यार और सम्मान दिल से होता है, दिखावे से नहीं। और फिर तुम पढ़ी-लिखी, नौकरी करने वाली एक समझदार औरत हो।’
‘मेरे पैर छूने से आप का मान घटता हो तो बता दीजिये। बाकी मैं दिखावा नहीं करती हूं। जो भी करती हूं दिल से करती हूं, सम्मान से करती हूं। मुझे आशीर्वाद दे सकते हों तो दे दिया कीजिये। नहीं भी दे सकते हों तो मत दीजिये। मुझे कोई ऐतराज नहीं।’
‘तुम्हारी इस भावुकता का मेरे पास कोई जवाब नहीं है।’ कह कर नागेंद्र निरुत्तर हो जाता।
लेकिन वह ऐसे समर्पित रहती जैसे पानी नदी को और नदी सागर को। उस की भावुकता की, उस के प्यार की यह पराकाष्ठा थी। जो कभी-कभी नागेंद्र के लिये असह्य हो जाती। पर वह कहीं सुना हुआ एक गाना गाने लगती, ‘दिल डंसता है, न प्यार डंसता है, अंखियों को तेरा इंतजार डंसता है।’ वह जैसे तड़प कर गाती, ‘साजन न हो घर में तो सिंगार डंसता है।’ उस की तड़प यहीं नहीं ख़त्म होती और गाती, ‘साजन नहीं तो ससुराल जाऊं कैसे, डोली डंसती है, कहार डंसता है।’ उस का यह गाना नागेंद्र को कहीं गहरे भेद जाता। बिंध जाता वह। जैसे कोई हिरनी शिकारी के तीर से बिंध जाये। उसे हिरनी वाला वह लोकगीत याद आ जाता जिस में राजा दशरथ अपने बेटे राम के लिये एक हिरन का शिकार तय करवाते हैं। शिकार के पहले हिरनी भागी-भागी जाती है माता कौशल्या के पास। उन से अनुनय-विनय करती है कि वह उस के हिरन को न मरवायें। पर कौशल्या हिरनी की बात नहीं मानतीं और कहती हैं कि मेरे बेटे के जन्म दिन पर इसी हिरन का मांस पकेगा। यह तय हो चुका है। हतप्रभ हिरनी कहती है कि अच्छा चलिये मांस आप पका लीजिये पर मेरे हिरन की खाल ही मुझे लौटा दीजिये। उस खाल को ही लटका कर रखूंगी और संतोष कर लूंगी। मेरे हिरन की याद मेरे लिये बची रहेगी। लेकिन कौशल्या हिरनी की इस प्रार्थना को भी अस्वीकार कर देती हैं। यह कहते हुये कि हिरन के खाल से तो मैं खंजड़ी बनवाऊंगी जिसे मेरा बेटा बजायेगा। और वह सचमुच हिरन की खाल से खंजड़ी बनवा देती हैं जिसे उन का बेटा जब तब बजाता रहता है। और जब-जब खंजड़ी बजती है हिरनी व्याकुल हो जाती है, अपने हिरन के लिये पागल हो जाती है ! तो क्या मैत्रेयी भी अपने किसी हिरन की याद में तो नहीं तड़पती रहती है ? तड़पती रहती है और गाती रहती है, ‘साजन नहीं तो ससुराल जाऊं कैसे/डोली डंसती है, कहार डंसता है !’
क्या पता ?
नागेंद्र सोचता है और जरा आगे जा कर सोचता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि मैत्रेयी के लिये नागेंद्र भी हिरन की खाल सरीखा है, और हिरन नहीं न सही, उस की खाल तो है। या कि कहीं कोई खंजड़ी बजती है तो वह व्याकुल बेसुध उस के पास भागी चली आती है। इस रूपक को सोच कर ही वह डर जाता है।
बुरी तरह।
मैत्रेयी नागेंद्र को फोन करती है। पूछती है, ‘क्या कर रहे हैं ?’
‘कुछ ख़ास नहीं। क्यों ?’
‘बाहर मौसम कैसा है देखा ?’
‘हां, आंधी तूफान जैसा है। लगता है बारिश भी होगी। बादल भी बहुत घने हैं।’
‘तभी तो आप को फोन किया है।’
‘क्या बात है !’ नागेंद्र चहका।
‘मैं आप से अभी मिलना चाहती हूं।’
‘इतने ख़राब मौसम में ?’
‘नहीं इतने अच्छे मौसम में।’
‘क्या बेवकूफी की बात कर रही हो !’
‘बेवकूफी की नहीं सुंदर बात। बड़ी प्यारी बात !’ वह बड़े इसरार से बोली, ‘मना मत कीजियेगा प्लीज !’
‘अच्छा बोलो कहां ?’ नागेंद्र उकता कर बोला। क्यों कि वह समझ गया था कि मैत्रेयी अब किसी भी हाल में उसे छोड़ने वाली नहीं है।
‘कहिये तो आप के घर आ जाऊं ?’
‘क्या बेवकूफी की बात करती हो !’
‘अच्छा, मेरे घर के पास वाले रेलवे क्रासिंग पर मिलिये। मैं वहीं मिलती हूं।’ वह बोली, ‘रेलवे क्रासिंग, मतलब रेलवे क्रासिंग !’
‘और कहीं कोई ट्रेन आ गयी तो ?’
‘तो कट जाइयेगा। पर मिलियेगा रेलवे क्रासिंग पर ही।’ वह अब पूरी तरह पजेसिव फार्म में आ गयी थी।
‘ठीक है भई, पहुंचता हूं।’
वह बोला, ‘पर ऐसा न हो कि पहुंच कर टापता रह जाऊं और तुम्हारा गाना गाऊं कि अंखियों को तेरा इंतजार डंसता है।’
‘ऐसा नहीं होगा, आप पहुंचिये। मैं फोन रखती हूं।’
नागेंद्र पहुंचा रेलवे क्रासिंग पर। और सचमुच बिना किसी की परवाह किये बीच रेल क्रासिंग पर खड़ा हो गया। आंधी पूरे शबाब पर थी। इक्का-दुक्का मोटी-मोटी बूंद भी टपकने लगी थीं। जो जहां था, दुबका हुआ था। पर नागेंद्र धूल में नहाता क्रासिंग पर ऐसे खड़ा था गोया स्टेच्यू !
धूल में नहाई मैत्रेयी आयी। मुसकुराई। पांव छुये। लग रहा था जैसे उस से चिपट जायेगी। पर चिपटी नहीं बोली, ‘जहां मन हो वहां ले चलिये। बस भीड़-भाड़ में नहीं। ले गया वह हजरतगंज के एक रेस्टोरेंट में जहां भीड़ नहीं थी। सिर्फ दो जोड़े थे अपने ही में खोये। मस्त। बिजली चली गयी थी। हल्का हल्का अंधेरा था। कैंडिल लाइट वाली रोशनी थी। जो जोड़े में आने वालों की मुफीद पड़ती थी। और बाहर बारिश शुरू हो चली थी। वह चिपटती हुई खुसफसाई, ‘कितना अच्छा लग रहा है। है ना !’ नागेंद्र उसे महसूसता हुआ चुप ही रहा। वह बुदबुदाती रही, बतियाती रही। उस की तारीफों के पुल बांधती रही। अचानक बुदबुदाना छोड़ कर वह बोली, ‘एक काम करेंगे ?’
‘क्या ?’ अब की वह बुदबुदाया।
‘मुझे अपने साथ इस बारिश में भिगो दीजिये !’
‘क्या ?’
‘हां, इस बारिश में आप के साथ भीगना चाहती हूं।’
‘क्या बच्चों जैसी जिद करती हो।’
‘तो आइये मेरे लिये थोड़ी देर बच्चे बन जाइये !’
‘लोग क्या कहेंगे ?’
‘कुछ नहीं कहेंगे। कहेंगे भी तो प्यार कहेंगे और सभी मजा लेंगे।’
‘यह जिंदगी है, समाज है, फिल्म नहीं है।’
‘कुछ नहीं यही जिंदगी है। बाकी सब बकवास !’ कह कर वह उठ खड़ी हुई। वेटर को पैसे दे कर वह लगभग उस के साथ रेस्टोरेंट से बाहर आ गया। बारिश में भीगने के लिये।
सड़क पर दोनों अनायास भीगते हुये चले। लगभग सट कर। गनीमत थी कि सड़क भारी बारिश के चलते लगभग खाली थी। अगर कुछ था तो चारों तरफ पानी ही पानी।
एक लंबी हिच के बाद नागेंद्र भी रोमांटिक हो गया। फिर दोनों भींगते हुये गुनगुनाने लगे फिल्मी गाने। फिल्मी गानों के कई-कई मुखड़े। बरखा रानी जरा जम के बरसों से लगायत ताल मिले नदी के जल में, नदी मिले सागर से। गाते-गाते वह अचानक बोली, ‘आप मेरे सागर में समा क्यों नहीं जाते ?’
नागेंद्र कुछ बोला नहीं और भरी सड़क पर उसे बाहों में भर कर चूम लिया। चूम लिया भरी बारिश में तो वह जरा छिटकी। बोली, ‘बड़े बेशर्म हैं आप !’ और इतराती हुई लगभग छम-छम करती हुई आगे-आगे चलने लगी। तेज-तेज।
‘क्या बेवकूफी कर रही हो ?’
‘क्या ?’
‘मदारी की बंदरिया की तरह आगे-आगे मत चलो। साथ-साथ चलो।’ वह बोला, ‘जिस को नहीं देखना होगा, वह भी देखने लगेगा। कम से कम तमाशा तो मत बनो।’
‘मैं तो चाहती हूं कि पूरी दुनिया मुझे देखे आप के साथ !’
‘और हमें बेशर्म कहती हो ?’ यह कहते ही वह छम-छम करती चाल थाम कर नागेंद्र के साथ चलने लगी। बोली, ‘अब पानी में छप्प-छप्प कर के चलने का मन हो रहा है।’ नागेंद्र ने उस की ओर देखा और मुस्कुराया। पर वह चालू रही, ‘जानते हैं आप अगर हम को-आप को इस तरह गुलजार या जावेद अख़्तर जैसा कोई शायर देख ले तो एक बढ़िया रोमांटिक गाना लिख दे। नोंक-झोंक वाला।’ वह फिर मुसकुराया। उस ने गौर किया कि बारिश में तरबतर उस की साड़ी और ब्लाऊज से छन कर उस की ब्रा और पेंटी तो साफ दिख ही रही थी जहां-तहां उस की गोरी और मादक देह भी। उस की चाल, उस का अंदाज और उस का व्यवहार और मादक था। अचानक वह इसरार पर आ गयी कि, ‘मेरे घर चलिये।’
‘इस तरह भीगा हुआ देख कर तुम्हारे घर के लोग क्या सोचेंगे ?’
‘सोचेंगे क्या दामाद का वेलकम करेंगे !’
‘हरदम बेवकूफी की सूझती है तुम्हें ?’
‘कुछ नहीं बस चलिये !’
‘अच्छा अगर तुम्हारे घर में मौका पा कर मैं कुछ कर बैठूं तो बेशर्मी की ताजपोशी मत करना !’
‘ठीक है लेकिन मौका देख कर।’
नागेंद्र जब मैत्रेयी के साथ उस के घर पहुंचा तब भी बारिश थमी नहीं थी। अंधेरा हो चला था और बिजली गुल थी। खैर, घर में पहुंच कर यह हुआ कि हाथ-मुंह धोया जाये। हाथ-मुंह धोने के लिये इमर्जेंसी लाइट लिये मैत्रेयी
ही नागेंद्र को बाथरूम तक ले गयी।
और बाथरूम में पहुंचते ही नागेंद्र ने मैत्रेयी के साथ बेशर्मी कर दी। बाद में हाथ मुंह धोया।
बाद के दिनों में हो यह गया कि जहां-तहां जिस-तिस से वह नागेंद्र का परिचय करवा देती। नागेंद्र के दोस्तों से भी बिना किसी संकोच मिलती। अपनी कुछ सहेलियों में तो उस ने बाकायदा नागेंद्र के साथ अपनी होने वाली शादी का शगूफा छोड़ना शुरू कर दिया। उस की दो तीन सहेलियों ने तो नागेंद्र को बेझिझक जीजा जी कहना शुरू कर दिया। नागेंद्र मैत्रेयी की इस मूर्खता से परेशान रहने लगा। एक दिन उस ने मैत्रेयी से इस का कड़ा प्रतिवाद किया। समझाया उसे। पर वह कुछ नहीं बोली। नागेंद्र ने और तफसील में जाते हुये उस से कहा कि, ‘मूर्ख दोस्तों से बेहतर है बुद्धिमान दुश्मन !’

Related Articles

Leave a Comment