Home चलचित्र #CAA के विरोध के नेतृत्व की राजनीति से गज़वा ए हिन्द की यात्रा

#CAA के विरोध के नेतृत्व की राजनीति से गज़वा ए हिन्द की यात्रा

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जैसे जैसे 2019 अस्तांचल को जारहा है वैसे वैसे भारत अराजकता के दवानल की लपेट में आता जारहा है। हम टीवी पर दिन रात एक ही तरह के दृश्य देख रहे है जिसमे #CAA के विरोध में घरों और गलियों से निकलती एक खास भीड़, जो कपड़ो से पहचानी जा रही है वह सड़को पर आरही है, जिन्हें रोका जारहा है। इनको जब सुरक्षाबल जब रोकती है तो यह भीड़ हिंसात्मक हो कर पथराव, आगजनी करने के साथ गोली भी चला रही है। यूपी में तो 257 पुलिसकर्मी तो गोली लगने से घायल होने की सूचना है। 

यह जो हिंसा हो रही है वह अपनी अनवरत यात्रा जारी रखने वाली है क्योंकि भीड़ की मानसिकता, तथ्यों और सत्य से परे जाकर, धर्मनिर्पेक्षियो के झूठे प्रचार में, अपनी हिंसा व अराजकता का औचित्य ढूंढ चुकी है। अपने अपने घेटोस से इस भीड़ को सड़क पर लाने वाले भले ही राजनैतिक लोग थे लेकिन बहुत शीघ्र ही इसका नेतृत्व, गज़वा ए हिन्द की मानसिकता रखने वालों ने अपने हाथों में ले लिया है। आप देखेंगे बहुत जल्दी ही यह भीड़, सुरक्षाबलों को निशाना बनाने की जगह, उन लोगो को निशाना बनाने लगेगी, जो अपने घरों में बैठ कर, सुरक्षाबलों द्वारा भीड़ को तितर बितर किये जाने का आनंद ले रहे है। मैं समझता हूँ कि झारखंड के चुनावों में बीजेपी की संभावित हार के बाद इस भीड़ की यह रणनीति सामने आएगी। 

इसमे कोई अतिशयोक्ति नही है कि भारत मे गज़वा ए हिन्द की हिंसा, उसके बहुसंख्यक समुदाय के द्वार पर पहुंच चुकी है। आज बहुसंख्यक के लिए हिंसा का सामना करना उनकी रक्षा व उत्तरजीविता का प्रश्न है। मैं समझता हूँ कि आज बहुसंख्यकों में जो धर्मनिर्पेक्षिता का गुणगान करते है या फिर वे जो उदासीनता से ग्रसित है, उनके लिए तटस्थता का परित्याग करना कोई विकल्प नही रह गया है क्योंकि गज़वा ए हिन्द के लिए वे सिर्फ और सिर्फ काफिर है।

मैं ऐसे लोगो में अहिंसा की परित्यागता व कट्टरता की सीमाओं को परिभाषित करने में, हो रहे संशय और दुविधा को समझता हूँ। मेरा मानना है कि जब आप राष्ट्र के प्रति समर्पित और अपने धर्म की रक्षा के लिए कटिबद्ध है तब आप जितनी जल्दी अपने अंदर से इन संशयों और दुविधाओं से मुक्त हो लेते है, आप उतना ही अपने राष्ट्र और धर्म के लिए ईमानदार होते है। आज इसी ईमानदारी की आवश्यकता है।

यह सही है की मानव ने अपने को समाजिक प्राणी मानते हुए, समाज को कुछ स्वीकार्य और कुछ अस्वीकार्य सूक्तियों से बाँधा हुआ है। उनमे से एक ऐसी ही सूक्ति, अहिंसा भी है, जिसे मानव ने समाज के लिए स्वीकार किया है। यह समाज के कल्याण के लिए सफल भी है, लेकिन यह, सिर्फ सामान्य स्थितियों और स्थिर परिस्थितियों में ही सत्य है।

मेरे लिए, विप्लवकाल में अहिंसा के प्रति आसक्ति एक अप्राकृतिक गुण है क्योंकि अहिंसा, प्रकृति के मूल नियम में ही नही है और जो प्रकृति में ही नही, वह कभी भी सर्वकालिक सत्य नही हो सकता है। यदि अहिंसा मानव के उत्थान के लिए इतनी ही आवश्यक होती तो प्रकृति में संहार और सर्जन की निरन्तरता कब की टूट चुकी होती लेकिन ऐसा कभी यह हुआ नही है। मेरे लिए हिंसा का आलिंगन,  सर्जन का मूलमन्त्र है। आप अपने को तभी तक भविष्य के लिए सुरक्षित रख सकते है जब आप अहिंसा की आसक्ति पर पूर्ण विराम लगा देते है। यहां यह समझना आवश्यक है कि अहिंसा का परित्याग करना आपको हिंसक होने की प्रेरणा नही देता है बल्कि वह आप को हिंसा का उपयोग करना सिखाता है।

हाँ अब यहां एक प्रश्न जरूर खड़ा होता है की इस हिंसा की कोई सीमा होती है? 

हाँ इसकी सीमा होती है और यह हो रही घटनाये के पराधीन होती है। मैं अपनी बात को एक हॉलीवुड फ़िल्म के एक डायलॉग से समझाने की कोशिश करता हूँ। मैंने बरसो पहले एक फ़िल्म देखी थी, ‘Once Upon A Time In West’। उसमे हेनरी फोंडा ने फ्रैंक नाम के एक पेशेवर कातिल का चरित्र निभाया था, जो रेल कंपनी के मालिक मोर्टन के लिए, रेल ट्रैक और स्टेशन के लिए जमीन पर कब्जा कराने के लिए काम करता था। वो क्रूर है, जो भी जमीन देने से मना करता था उसको डरा धमका और प्रताड़ित करके, जमीन पर कब्ज़ा कर लेता था। ऐसी ही एक जमीन पर कब्जे के लिए जब फ्रैंक एक पुरे परिवार को मार देता है,  तो मोर्टन, फ्रैंक से कहता है,’ Not bad. Congratulations. Tell me, was it necessary that you kill all of them? I only told you to scare them (मुबारक हो फ्रैंक, लेकिन एक बात बताओ, तुमने सबको मार डाला, क्या यह जरुरी था? मैंने तो तुमसे सिर्फ लोगो को डराने के लिए कहा था’)।

उसके जवाब में फ्रैंक कहता है,’People scare better when they’re dying.(लोग अच्छी तरह से तभी डरते है, जब वो मरने लगते है’)।

पूर्व में मेरे अपने संशयों और दुविधाओं के उत्तर, फ्रैंक के जवाब में ही मिले है। यह दुनिया, विशेषतः आज का भारत, फ्रैंक से भरी पड़ी हुयी है और ये लोग भी डरते तभी है, जब वे मरने लगते है। आज जब फ्रैंक हमारे दरवाजे पर आगया है तब उसको जवाब भी फ्रैंक के उत्तर से ही देना होगा क्योंकि वही एक रक्षाकवच शेष रह गया है।

#pushkerawasthi

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