Home हमारे लेखकप्रांजय कुमार छात्रों के विरोध के नाम पर

छात्रों के विरोध के नाम पर

by Pranjay Kumar
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आप बीएसएनल के ऑफिस जाते हैं, लौट कर बीएसएनल के कर्मचारियों को गाली देते हैं. आप एसबीआई के ऑफिस जाते हैं और लौट कर एसबीआई के कर्मचारियों को गालियाँ देते हैं. आप सचिवालय जाते हैं और लौट के सचिवालय के बाबू को गालियाँ देते हैं.
फिर भी आपकी जिद है कि कम्पनी हो तो सरकारी हो, नौकरी मिले तो सरकारी मिले.
वह एसबीआई या बीएसएनल या सचिवालय का कर्मचारी कौन है? आपका ही छोटा या बड़ा भाई है, आप ही के चाचा मामा हैं, आप ही हैं. कोई ऐसा नहीं है जिसके परिवार में दो चार सरकारी कर्मचारी ना हों. आप उन्हें तो कामचोर या घूसखोर नहीं कहते…पर बाकी विभाग को कहते हो. क्या पूरे विभाग में सिर्फ एक हरिश्चंद्र था जो आपके हिस्से आया?
क्या आप बीएसएनल के एम्प्लोयी होते तो आप पूरा मन लगाकर, ईमानदारी और मेहनत से काम करते? आप पूरे विभाग को, उसके वर्क-कल्चर को बदल देते?
जी नहीं! यह किसी व्यक्ति या विभाग की समस्या नहीं है. समस्या यह है कि ये विभाग सरकारी हैं. और सरकार बिजनेस करने के लिए नहीं बनी है, सरकारी विभाग एफिशिएंट नहीं हो सकते. यह उनके मूल चरित्र के विरुद्ध है.
क्योंकि हर व्यक्ति अपने नियत इन्सेन्टिव स्ट्रक्चर को रिस्पॉन्ड करता है. जो करने का रिवॉर्ड मिलता है वह करता है, जो करने का पनिशमेंट मिलता है वह नहीं करता. जब दोनों में से कुछ नहीं मिलता तो कामचोरी को ही रिवॉर्ड गिनता है.
यह समस्या व्यक्ति की नहीं है. प्रॉब्लम उस कर्मचारी में नहीं है, उस संस्था में है जिसके लिए वह व्यक्ति काम कर रहा है. समस्या यह है कि ये संस्थाएँ सरकारी हैं और सरकारी तंत्र एफिशिएंट नहीं हो सकता, उत्पादन नहीं कर सकता. उस तंत्र में जाकर एक व्यक्ति को खुद उसके जैसा होने के अलावा और कोई उपाय नहीं है.
उत्पादन के साधनों पर जनता का अधिकार होना चाहिए, यह बात सुनने में बहुत आकर्षक लगती है. पर यह कहने वालों को इसकी समझ नहीं है कि उत्पादन के साधन हैं क्या? उत्पादन के साधन सिर्फ कोयला-लोहा-पानी-बिजली नहीं हैं. ना ही उत्पादक सिर्फ वे मजदूर हैं जो भट्ठी में कोयला झोंकते हैं और हथौड़े से लोहा पीटते हैं. ऐसा होता तो जापान एक धनी देश नहीं होता, और अफ्रीकी देश इतने गरीब नहीं होते.
उत्पादन का सबसे बड़ा साधन मनुष्य का मस्तिष्क है जो यह सोचता है कि उत्पादन किस चीज का करना है, और कैसे सबसे अधिक एफिशिएंट तरीके से करना है. उत्पादन का सबसे महत्वपूर्ण साधन मनुष्य की उद्यमिता है जो उसके इन्सेन्टिव स्ट्रक्चर से एक्टिवेट होती है. इस साधन पर सरकार का अधिकार हो ही नहीं सकता. यह सिर्फ स्वतंत्र मनुष्य की स्वतंत्र बुद्धि में हो सकता है.
आज हमारे युवा बुद्धि की इस स्वतंत्रता से वंचित हैं. उन्हें गुलाम होने को, नौकरी करने को तैयार किया गया है. ये सारे खान सर- फान सर शिक्षक नहीं हैं, गुलामों की फैक्ट्रियां हैं. इन युवाओं को यह नहीं समझ में आने वाला कि एक गुलाम समाज में एक समृद्ध इकॉनमी हो ही नहीं सकती. सरकार का काम नौकरियाँ देना नहीं है, सरकार सबको नौकरी दे ही नहीं सकती… क्योंकि सरकार मूलतः एक अनुत्पादक संस्था है, एक परजीवी संस्था है. सरकार टैक्स लेकर रोजगार नहीं दे सकती, रोजगार से टैक्स ले सकती है. सरकार उत्पादन नहीं करती…बैल दूध नहीं देता…बैल को दुह के कोई दूध नहीं मिलने वाला, चाहे बैल जर्सी नस्ल का ही क्यों न हो?

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