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यौन उत्पीड़ित व शोषितों का समझौतावादियों द्वारा अन्याय #Meetoo

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भारत मे लोगो ने #Metoo के दर्शन, अमेरिका की ग्रीनकार्ड होल्डर, मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री की असफल भूतपूर्व अभिनेत्री और मॉडल तनुश्री दत्ता द्वारा नाना पाटेकर और विवेक अग्निहोत्री पर मोलेस्ट, जिसे कौमुक छेड़छाड़ या यौन उत्पीड़न कहते है, किये जाने का आरोप लगाने पर किये है। 

तनुश्री के आरोप मिथ्या है या सही उस पर तो मैं कुछ नही कहूँगा लेकिन यह अवश्य कहूँगा की उनकी स्वीकारोक्ति के अनुसार , उनको उनके 10 साल पहले मोलेस्ट किये जाने का ज्ञान, चर्च की शरण मे आकर ही हुआ है। मुझे इससे फर्क नही पड़ता कि अब तनुश्री ईसाई धर्म अपना चुकी है लेकिन भारत के आज के वातावरण को देखते हुये मुझको उनकी विश्वनीयता पूरी तरह संदिग्ध लगती है।

हो सकता है, तनुश्री के साथ ऐसा ही हुआ हो लेकिन मैं उसकी बात सुन कर यह क्यों नही मानू की भारत मे जब चर्च और वेटिकन, भारतीय की मीडिया, लिब्रल्स और धर्मनिर्पेक्षिता के पुरोधाओं की सहायता से एक बलात्कारी बिशप को बचाने व बलात्कार पीड़िता नन को पतिता सिद्ध करने का कलुषित प्रयास कर रहा है तब, भारत के जनमानस से ध्यान हटाने के लिये, मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री के अपवाद स्वरूप राष्ट्रवादियों को विवाद में घसीटने का यह एक प्रयास है? क्या तनुश्री, जो उनके ही अनुसार पीड़िता है, उनके मुख से पीड़ित नन के समर्थन में किसी ने सुना है? 

तनुश्री फ़िल्म इंडस्ट्री की है तो क्या मुम्बई की फ़िल्म इंडस्ट्री में कास्टिंग काउच और महिलाओं के शोषण किये जाने की यह अपवाद स्वरूप घटना है? क्या उनको तब नही मालूम था कि यह सब कुछ दशकों से इस फ़िल्म इंडस्ट्री की जीवन शैली व वहां प्रॉफेशनल हैजर्ड के रूप में नही स्वीकारा गया है? जब आप यह जानते है कि आप को वहां खड़े रहने के लिये, जगह बनाये रखने के लिये और सफलता की सीढ़ी चढ़ने के लिये क्या कर सकते है और आप क्या नही कर सकते है, इसका अधिकार तो आपके पास है, फिर यदि सफलता प्राप्त करने के लिये समझौते किये है, तो वह उत्पीड़न व शोषण क्यों माना जाये? तनुश्री को वहांअसफलता हाथ लगी है, यदि वह सफल होती तो आज इस पर बात करती? क्या वह सफल होती तो वह उनके लिये समझौता होता और आज असफल है तो यह उत्पीड़न व शोषण बन गया है?

तनुश्री को छोड़ भी दिया जाय तो मैं यह मानता हूँ कि यह जो #MeToo में गड़े मुर्दे उखड़ रहे है, यह बहुत आवश्यक था, हालांकि यह एक शाश्वत सत्य है, जो बहुत पहले से होता था, आज भी होता है और आगे भी होता रहेगा। यह एक सामाजिक बीमारीं है जो पहले सीधा सीधा शोषण था, वो आज के भैतिक युग मे समझौते में भी बदल गया है। जैसे जैसे समाज भौतिकवादी होता जारहा है वैसे वैसे शोषण/समझौते भी बढ़ते जारहे है। समाज के लिये यह एक गम्भीर विषय है, जिस पर गम्भीरता से न सिर्फ पुरषों को बल्कि महिलाओं को भी अंतरात्मा में झांक कर, मनन करना पड़ेगा। इसका कारण यह है कि यह MeToo जो अपने उत्पत्ति पर यौन उत्पीड़न व शोषण को परिलक्षित करता था, उसने अपना कलेवर बदल दिया है। अब लोगो ने इसमे अपनी जरूरत व अभिलाषाओं के लिये समय समय पर किये गये समझौतों को भी MeToo की गाथा में शामिल करके, पीड़िता का मुखोटा लगाने का कुप्रयास भी होने लगा है। 

यह यौन उत्पीड़न व शोषण इतना संवेदनशील विषय है कि जो भी अपने को पीड़ित/पीड़िता बताते हुये अपनी बात कहेगा, उसके प्रति लोगो की सहानभूति होगी व आरोपित पर आक्रोश भी उभरेगा। यह ऐसा संवेदनशील विषय है कि ऐसे में यदि इस विषय पर तटस्थता से विचार रक्खे जाय तो यह पूरी संभावना है लोगो के आरोपो के साथ आक्रोश, विशेषकर महिलाओं द्वारा, सामने आयेगा ही आयेगा। इसी लिये पीड़ित और आरोपित से परे, दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों से यही कहूंगा कि इस MeToo में कही जारही हर गाथा को, सिर्फ भावनाओ के आधार पर, उसे यौन उत्पीड़न व शोषण स्वीकार करने से पहले, अपने विवेक का अवश्य उपयोग करे। 

कहीं न कही इस भौतिक युग मे जहां स्त्री व पुरुष सामान रूप से अपने लक्ष्यों, अभिलाषाओं, लालसाओं और अर्थसिद्धि को लेकर आत्मकेंद्रित है, वहां उसी को यह तय करना है कि यह सब प्राप्त करने के लिये,उसके द्वारा निमित लक्ष्मणरेखा ज्यादा महत्व रखती है या उस सबको प्राप्त करना ही महत्वपूर्ण है तो फिर उसके लिये किये गये समझौतों को उत्पीड़न व शोषण की संज्ञा में लाना मुझको सही नही लगता है। मुझे यह वर्षो पूर्व किये गये समझौते आज MeToo के रूप में स्वीकार्य नही है। 

मैं हर उस MeToo की पीड़िता के साथ खड़ा हूँ जिसने यौन उत्पीड़न व शोषण की विभीषका का सामना किया है लेकिन समझौते में कल का स्वीकार्य उत्पीड़न व शोषण को उससे जोड़ना, कही न कही वास्तविक पीड़िताओं के साथ अन्याय है और इस सामाजिक कलुषिता पर किये जाने वाले मंथन को भटका रहा है।

#pushkerawasthi

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