Home हमारे लेखकदयानंद पांडेय अटल बिहारी वाजपेयी याद आते हैं….

अटल बिहारी वाजपेयी याद आते हैं….

सरोकारनामा से दयानन्द पांडेय दवारा लिखित

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अटल बिहारी वाजपेयी याद आते हैं। एक बार लखनऊ से चुनाव में अटल जी के ख़िलाफ़ रामजेठ मलानी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने आ गए। जेठमलानी अटल जी की कैबिनेट में क़ानून मंत्री रह चुके थे। पर किसी बात पर नाराज हो कर वह भाजपा से अलग हो गए। एक समय वह राजीव गांधी के बोफ़ोर्स घोटाले के समय रोज पांच सवाल पूछते थे। राजीव गांधी के पास कोई जवाब नहीं रहता। तो बोफ़ोर्स की तर्ज पर जेठमलानी ने लखनऊ में अटल जी से भी रोज पांच सवाल पूछते थे। अटल जी हरदम लखनऊ में नहीं रहते थे। एक बार लखनऊ आए अटल जी तो पत्रकारों ने उन से जेठमलानी के सवालों के बाबत सवाल किया।
अटल जी ने एक लंबा पॉज लिया और बोले , मेरे मित्र राम जेठमलानी को नहीं मालूम कि चुप रहना भी एक कला है। अगले दिन से जेठमलानी के रोज के सवाल स्वत: समाप्त हो गए। जेठमलानी चुनाव में ज़मानत ज़ब्त करवा कर लखनऊ से विदा हुए थे तब। अखिलेश यादव भी अगर राजनीतिक सूझ-बूझ रखते तो इन छापों पर ख़ामोश रहते। बात इतनी नहीं बिगड़ती। पर समाजवादी इत्र की बदबू में तबाह और त्रस्त हो कर वह तो जब देखिए लाल टोपी लगा कर किसी सांड़ के आगे खड़े होने के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। अखिलेश से बौखलेश हुए जा रहे हैं। छापे योगी नहीं , मोदी की सरकार डलवा रही है पर वह निशाना मोदी नहीं , योगी पर साध रहे हैं। क्यों कि राहुल गांधी की संगत में रहने के बावजूद इतना तो वह सीख ही गए हैं कि सीधे मोदी से नहीं टकराना है। मोदी से टकराएंगे तो चूर-चूर हो जाएंगे। अरविंद केजरीवाल ने बीते दिल्ली चुनाव में यही किया था। मोदी से सीधे नहीं टकराए थे। पर अखिलेश को अभी अपने बौखलेश से भी छुट्टी लेना सीखना होगा। और जानना होगा कि योगी , शिवपाल यादव नहीं हैं। कई मामलों में वह मोदी से भी आगे हैं।
छोटे-छोटे दलों से समझौता कर लेने से ही चुनाव मुट्ठी में नहीं आ जाता। फिर वह भूल रहे हैं कि इन छोटे दलों में ओमप्रकाश राजभर जैसे उठल्लू और मुंगेरीलाल की तरह सपने देखने वाले लोग भी हैं। जो पांच साल में पांच मुख्य मंत्री और दस उप मुख्य मंत्री बनाने की योग्यता रखते हैं। जयंत सिंह जैसे आधारहीन लोग हैं। किसान आंदोलन का कोहरा छंट चुका है। कैराना से पलायन का कांरवां कैराना लौट चुका है। मुज़फ्फर नगर के दंगों की कराह अभी लोग भूले नहीं हैं। फिर अयोध्या , काशी , मथुरा का जादू सिर चढ़ कर बोल रहा है। जिन्ना कार्ड धूल-धूसरित है इस जादू के आगे। जिन्ना कार्ड , आ बैल मुझे मार की तरह पेश आ रहा है।
अखिलेश को यह भी जान लेना चाहिए कि सिर्फ़ दंगों की साज़िश रच कर , पैसा खर्च कर चुनाव अब नहीं जीते जा सकते। यह औज़ार अब पुराने पड़ चुके हैं। अगर यह औज़ार क़ामयाब होते तो कांग्रेस सपा से बहुत आगे होती। क्यों कि कांग्रेस के पास अखिलेश से कहीं बहुत ज़्यादा पैसे हैं। और कि दंगा की साज़िश रचने में भी वह अखिलेश से इक्कीस है। ऐसे ही पैसे खर्च कर बटुरी भीड़ अगर कामयाब होती तो 2014 और 2019 में नरेंद्र मोदी नहीं , राहुल गांधी प्रधान मंत्री हुए होते। क्यों कि तब राहुल गांधी की सभाओं में भी बेहिसाब भीड़ थी। इवेंट मैनेजर राहुल के पास भी थे और हैं। पर उस भीड़ को , उस इवेंट को वह वोट में तब्दील नहीं कर पाए। किराए की भीड़ माहौल बना देती है पर वोट में ठेंगा दिखा देती है। जान यह लेने में भी नुक़सान नहीं है कि इवेंट मामले में नरेंद्र मोदी के आगे अभी सभी लल्लू हैं। पैसा भाजपा के पास भी अकूत है।
फिर पैसे के मामले में तो मायावती तक अखिलेश से बीस हैं। लेकिन वह मुसलसल चुप हैं। लाल ? अरे नीली टोपी लगा कर भी उन के लोग किसी सांड़ के आगे खड़े नहीं हो रहे। अब से ही सही अखिलेश को यह एक बात भी ज़रुर जान लेनी चाहिए कि इस उत्तर प्रदेश के चुनाव में उन का मुक़ाबला भाजपा या योगी से नहीं , मायावती और उन की बसपा से है। मुक़ाबला इस अर्थ में कि नंबर दो पर सपा रहेगी कि बसपा। क्यों कि नंबर एक पर तो भाजपा बहुत मज़बूती से खड़ी है। अंगद के पांव की तरह अडिग। बहुत मुमकिन है कि 2022 में 2017 से ज़्यादा सीट भाजपा ले आए। ज़मीनी राजनीति की हक़ीक़त तो फिलहाल यही है। आप की कमिटमेंट वाली राजनीति कुछ और कहती है तो बात अलग है। वह आप जानिए। वह आप की दुविधा और सुविधा है। इस लिए भी 2022 में बाइसकिल का नारा दब जाता है क्यों कि लोगों को चढ़ गुंडों की छाती पर , मुहर लगेगी हाथी पर ! नारा भी याद आ जाता है। हाथी पर मुहर लगाने की बात पर मायावती का भ्रष्टाचार भारी पड़ जाता है। उन के साथ गुंडई , भ्रष्टाचार और यादववाद का जहर है तो इन के पास भ्रष्टाचार और दलित क़ानून का कहर है। यह जहर और कहर उत्तर प्रदेश के लोग सदियों में भूल पाएंगे। मुस्लिम तुष्टिकरण की बीन भी दोनों के पास है।
तिस पर अखिलेश पर सब से बड़ा इल्जाम पिता मुलायम की पीठ में छुरा घोंपने का है। लोग कहते ही रहते हैं कि जो अपने बाप का नहीं हुआ , वह किसी का नहीं हो सकता । लोग औरंगज़ेब से उन की तुलना करते हुए , उन्हें औरंगज़ेब कह देते हैं। खिलाने-पिलाने , पालने-पोसने , पढ़ाने-लिखाने वाले चाचा शिवपाल सिंह यादव के साथ उन का अपमानजनक व्यवहार भी सब के सामने है। 2017 में अखिलेश की हार का यह बड़ा फैक्टर था। अभी भी है। गायत्री प्रजापति और आज़म खान जैसों के आगे उन का बेभाव समर्पण भी लोग कहां भूले हैं। वैसे भी उत्तर प्रदेश की सत्ता कोई लखनऊ का विक्रमादित्य मार्ग नहीं है जिस पर स्थित सभी प्राइवेट बंगले अपने और अपने परिवार के लोगों के नाम आने-पौने दाम पर रजिस्ट्री करवा कर हथिया लिया जाए और कोई चूं तक न कर पाए। कितने लोग जानते हैं कि लखनऊ का समूचा विक्रमादित्य मार्ग अखिलेश यादव और उन के परिवारीजनों के नाम है ? कांग्रेस से जुड़े वकील विश्वनाथ चतुर्वेदी तो बाक़ायदा अखिलेश यादव का नाम ले कर तमाम फर्जी कंपनियों का मालिक उन्हें बता रहे हैं। अखिलेश इस पर क्यों चुप हैं ? क्यों नहीं कुछ बोलते ? फिर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही मुलायम और अखिलेश के परिवारीजनों की आय से अधिक संपत्तियों के बाबत सी बी आई से फिर से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। जिसे बीते पंद्रह-बीस बरसों से मुलायम दबवाए हुए हैं। लेकिन अखिलेश तो इस पर भी ख़ामोश हैं।
फिर अखिलेश की तरह बौखलाहट और गुरुर में चूर उन के प्रवक्ताओं के भी क्या कहने ! अनुराग भदौरिया जैसे अभद्र , बड़बोले , मनबढ़ , मानसिक रुप से विक्षिप्त और जहरीले प्रवक्ताओं की फ़ौज भी उन का सत्यानाश कर रही है। याद कीजिए 2014 में इसी तरह कांग्रेस की तरफ से संजय निरुपम , शक़ील जैसे मनबढ़ और जहरीले लोग कांग्रेस का सत्यानाश करने में बढ़-चढ़ कर आगे थे। कांग्रेस के पास अभी भी पवन खेड़ा , गौरव वल्लभ , सुप्रिया श्रीनेत , अखिलेश सिंह जैसे बदमिजाज प्रवक्ताओं की फ़ौज खड़ी है , कांग्रेस पर कुल्हाड़ी मारती हुई। किसी भी पार्टी के प्रवक्ता को शालीन , शार्प , शांत और सभ्य होना चाहिए। प्रवक्ता बड़बोला , मनबढ़ नहीं। ऐसा प्रवक्ता जो मां को मां ही कहे पिता की पत्नी नहीं। जैसे कांग्रेस के पास कभी जनार्दन द्विवेदी थे। भाजपा के पास अभी सुधांशु त्रिवेदी हैं।

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